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कार्तिक केंद्र द्वारा काल विश्व की प्राप्ति उधर छत्रक रह रहेंगे, लोग से टकराता है और ऍम भीषण पहुंचा के कारण ब्रेन की लोग जलकर नष्ट हो जाता है । और इधर गोलक के बाहर प्रतीक्षा कर रहे प्रमुख जी को गनी संकेतों से ये आभास होता है की गोलक अपना कार्य कर रहा है । वो प्रतीक्षारत है कि कुमार नरेन्द्र वापस हैं और साथ ही बेच इस उद्देश्य है तो गए थे वो उद्देश्य भी पूर्ण हूँ । भाषा में मन की संतुष्टि का जो भाव छिपा होता है वो वास्तविक संतुष्टि से सतह बहुत अधिक और प्राप्ति के उपरांत नई आशा को प्रेरित करने वाला होता है । जो पुनर्निर्यात आशा में परिवर्तित होने वाला है और पूरा एक नई आशा और उसके प्राप्ति के उपरांत माया चलने ताशा इसी प्रकार जीव आशा और उसके पश्चात नहीं आशा में सुख को खोजता फिरता है परन्तु सकता आशा में नहीं है ये बहुत नहीं जानता । यहाँ पर आशा ऐश्वर्या कार्य हेतु प्रेरित है । आता आशा के उपरांत नई आशा तो होती है परंतु सुख शांति के साथ कृष्णा वाइब्रेट मरीचिका के साथ नहीं । जहाँ ईश्वर का कार्य करते हैं वहीं घर में है और धर्म के कार्यों में कृष्णा और एक मरीचिका का स्थान का ऐसी धर्मनिष्ठ आशा के साथ सब पक्षी दोनों हाथ बांधकर गोलप के खुलने की प्रतिक्षा कर रहे थे और वन में चारों की प्रतीक्षा गोलक के द्वार खुलने की प्रक्रिया प्रारंभ सर्वप्रथम इंडोर निकला और उसके उपरांत जब गणपति गजेंद्र के करना निकले के प्रमुख जी के साथ खडे सभी लोग विचार करते लगे कि क्या पूरा वाले आ गए । सभी ने इंदौर की तरफ देखा तो इन दोनों के मुखमण्डल पर विजयी भाव स्पष्ट थे और आने वालों के मुक्ता भाव पर रखना तो नई चुनौती थी । उनके मुखों का भाव भी अपना भाव समझ नहीं पा रहा था । जब मुख में एक ही आपको अथवा चार चार आंखे हूँ अथवा दस दस गान हूँ अथवा वर्णन करना ही चोटिल हो तो भाव का अनुमान असंभव सभी पाषाण की भर्ती चढ थे । विचारों के विचारशीलता भी जो विचार न कर सके तो इस पर मन बुद्धि पंगु हो जाती है । मनवर थी के पंगु होने से शरीर तो अपना कर मैं भी भूल जाता है । सभी गोलक से निकलने वाले विभिन्न आकृतियों के कारण महल में रहने वालों की आंखों का केंद्र बन चुके थे । धीरे धीरे भीड बढती जा रही थी । अंततः डंडधार बोझ चंदेश्वर व कुमार कंटेंट गोलक से निकाले उनके निकलते हैं । महल में पूरा जय खोज प्रारंभ हुआ । बाहर आ जाता हूँ तो केंद्र की जय गणपति गणेशचंद्र की जय इस प्रकार के जाए खोज रही कुछ समय के लिए ही सही परंतु मानसिक वर्ष रेडी कोर्चा में वृद्धि हुई । जब प्रमुख जी को गडों के विषय में जानकारी हुई तो वे भी सभी की भर्ती प्रसन्न हुए और उन्होंने करोडों का परिचय सभी मुख्य व्यक्तियों से कराया । इसके उपरांत गढ भी आपने प्रभु की जीवन रक्षा है तो बताए गए कार्यों में संलग्न हो गए । अब को श्रृंगा पूरा को नई शब्द टी वार नहीं ऊर्जा प्राप्त हो गई थी । अब को श्रृंगा पूरा के पास यदि कुछ करने के लिए शेष था तो वो थी कार्ति केंद्र की प्रतीक्षा । इधर कार्तिक केंद्र कोकाब मार्ग से बाहर निकल चुके हैं । कार्तिक केंद्र वर्लड भेंगी दोनों ही अपने अपनी अशोक वर्दी प्रगति के साथ आगे बढते हैं । आज वे अपने काम तब तक पहुंच जाएंगे इस की बोर्ड संभावना कुमार गांधी केंद्र को है । काटी केंद्र बहुत समय से शांत है । अब ये अपना मांग जोडते हैं । लाॅन्ड्रिंग इजी आपका क्या अनुमान हैं? कब हो ऍम हम लोग कितने समय भी पहुंच जाएंगे । प्रभु सम्भवता आज सायंकाल के और वही हम पहुंच जाएंगे । वहाँ पहुंचने के उपरांत शिखर अभिषेक काल विश्वासपात्र प्राप्त कर वापस होना होगा हूँ । मेरे हुआ मंदराचल पर्वत के बद्ध एक विशाल जलाशय जिसकी गहराई बहुत अधिक है । मेरा अनुमान है कि वह गहराई हजार हाथ की लंबाई के सवाल होगी । उस पार जलराशि में तलहट्टी वहाँ ऊपरी सत्ता के बाद थे । बात छिपाकर रखा गया है । अच्छा उसे निकालना भी एक दुष्कर कार्य होगा । दुश्कर कार्य होगा परंतु आपको देवश्री नहीं उसको निकालने की थी तो अवश्य ही बताई होगी । कब हूँ वो भी तो बताई है पर हम तो जब से वो अस्त्र निर्मित हुआ है तब से प्रथा बताया उसका उपयोग हुआ । इस कारण आज तक कालवश निकालने की प्रक्रिया कभी क्रियानवयन नहीं हुई । विधीवत विधान सीखने में तथा उसके उपरांत उसके क्रियान्वयन में कई बार बहुत अंतर प्रतीत होता है । परंतु प्रभु आप सात हैं और प्रभु आशुतोष इंद्रा वहाँ का आशीर्वाद हो तो असंभव कार्य भी आसान हो जाता है । किसी प्रकार की चर्चा करते हुए दोनों को मेरे उ वह मंदराचल पर्वत के मध्य पहुंचकर दो स्थान दृश्य होता है, जहाँ पर वो पात्र छुपा हुआ है । वो व्यापार जलसंग्रह इस प्रकार प्रतीत हो रहा है । मारो सबूत जिसका कोई ओर छोर ही नहीं दिखाई दे रहा है । इतने विशाल जलसंग्रह से एक छोटा सा पात्र प्राप्त करना लगभग असंभव प्रतीत होता है । तब कोबार कार्तिक केंद्र नहीं शिखर अतिशिक्षित कार्य सम्पन्न करने को लगभग हिंदी से कहा । साथ ही यह भी कहा कि उन्हें क्या करना होगा? तब लाट भरेंगे ने कहा प्रभु! सर्वप्रथम हमें एक विशाल पांॅच विशाल कक्ष को ढूंढना है जिसमें बहुत सारी व्यवस्थाएँ हैं जिनकी सहायता से हम कावेश प्राप्त कर पाएंगे । लाॅचिंग विशाल कक्ष वो बेन पर्वत श्रृंखलाओं के थे । आपको कुछ तो अनुमान होगा अथवा दिवस पीने कुछ संकेत तो बताए ही होंगे । प्रभु संकेत तो अवश्य ही बताएं हैं परन्तु ये कहकर लटकेंगे शांत हो गया । विचार करते हुए ऊपर स्वक्ष आसमान को ने हाथ नहीं लगा । फिर और वह दिशा को निहारने लगा । तब कार के केंद्र ने अनुमान लगाया कि कुछ दिशाओं और आसमान से संबंधित संकेत हैं । मन में विचार करते हुए कार्य केंद्र नहीं । लड हिंदी से कहा लड करेंगे जी मुझे ऐसा अनुमान हो रहा है कि कुछ खास बानवे दिशाओं का संबंध है । क्या हूँ वायु तारामंडल? मैं मयूर के सिर पर लगी । कल की वह मयूर के पाँच का अंतिम छोड जब चंद्रमा के साथ एक सीधी रेखा में आए और इन तीनों से मिलने वाली काल्पनिक रेखा जैसा स्थान कोई स्पष्ट करेगी, वहीं पर उस विशाल कक्ष का बाहर का होगा । मैं अभी थोडा तैयार समझ नहीं पाया कब हो । अभी सायंकाल होने का समय हो रहा है । कुछ समय पश्चात आपको आसमान में मयूर तारामंडल दिखाई देगा । पहले भी प्रभु इसके पूर्व कभी इस तरह का कार्य नहीं किया । मुझे तो पृथ्वी लोग पर आए हुए अधिक समय भी नहीं हुआ है । साथ ही जब से पृथ्वी पर हूँ लगभग आपके साथ ही हूँ । मैं भी आज की पहली बार इसका परीक्षण करूंगा । इस प्रकार की चर्चा परिचर्चा में समय व्यतीत होने से शाम से रात्रि का पहर काम प्रारंभ हो गया पता ही नहीं चला । तभी कार्तिक केंद्र की दृष्टि खूले नीलगगन में गईं । कार्तिक केंद्र ने देखा कि कहाँ कार्य धीरे धीरे प्रकाश नये होते जा रहे हैं । दोनों ही अपनी दृष्टि आकाश पर चलाए हुए थे कि एक का एक कार्य केन्द्र के स्वर में उत्साह का मिश्रण दिखाई दिया । वो देखो मयूर तारामंडल दिखाया नहीं । हाँ संभव वही है । अब विचार कीजिए कि चंद्रमा कहाँ से उतर होगा और किस ओर चलेगा । नहीं समझ गया । कुछ संपन्न गलत समझ में आ गई । अब मेरे साथ शुत्रता से आ गया । पूर्व दिशा से निकलने वाला छतरवार दक्षिण दिशा से होते हुए पश्चिम की ओर जाएगा । अब हमें चंद्रबाबू मयूर की कल की पंख का आखिरी छोर वाह वाह स्थान खोजना है जहाँ ये चारों एक सीधी रेखा में हूँ । इसलिए हमें पश्चिम की दिशा की ओर से होते हुए उत्तर की ओर पडा है तो उन्होंने विशाल जलपरी क्षेत्र के किनारे किनारे सफलता से चलते हुए पश्चिम से होते हुए उत्तर की ओर बढ नहीं चाहिए । अब सब भाग के पर अथवा प्राम्भ के हाथ में था क्योंकि यदि चंद्रमा एक बार उदय होकर उस स्थिति से गुजर गया जहाँ से एक रेजो रेखा सीधी रेखा बनती है तो फिर एक दिन और प्रतीक्षा करती होगी । आज की रात आसमान साफ है । एक दिनोपरांत यहाँ बादल होंगे अथवा नहीं ये कौन जानता है । आटा दोनों ने अपने मन में भ्रम को धारण कर अब का पूरा बाल बुद्धि वसावर्धक लगाया । बल बुत दिवस साबर थे । जब ब्रह्मा के साथ लग गई तब होने वाले कार्य को धर्म कहते हैं । इस धर्म मैं कार्य को खान कर सकता है । रात्रि के दूसरे शहर के आरंभ होते होते खून को लगा कि तीन बिंदु एक रेखा में आने वाले हैं, वो तीनों बिंदु है । चंद्रबाबू मयूर कल की वह मयूर के पंखा का आखिरी हिस्सा । बस वहीं पर दोनों रुक गए । ऐसे ही चंद्रबाबू उस बिंदु पर पहुंचा जहां से तीनों एक रेडियो रेखा पे आ गए । तब वे उसी स्थान पर थे, जहां चारों दो एक देखा रेखा पे आ गए । तब उन्होंने देखा कि उनके ठीक पीछे एक पर्वत में तो ऐसा प्रतीत हो रहा है । दोनों समझ गए कि तुम आ रही है और अब इसको कैसे खोलना चाहिए, यही प्रश्न शेष है । इस भ्रष्ट परताप केंद्र पहले ही निश्चित थे कि लटक भृंगी को ज्ञात होगा । इसी आधार पर उन्होंने लडकी रहेंगी से कहा, आपको द्वार खोलने की युक्ति तो पता ही होगी । प्रभु मुझे क्या बात है? परन्तु इसके लिए चल में उतरता होगा चल मैं जल की गहराई तो आप कह रहे थे कि बहुत अधिक है, इतने गहरे जल में किस प्रकार संभव है । अपने पास इतने गहरे जल में उतरने का कोई साधन भी तो नहीं है । तब वो कह रहे चल में उतर रहा तो है परन्तु बहुत कह रहे जल में जाना नहीं है था । यही द्वार के सामने ही द्वार खोलने की व्यवस्था है । चल में कुछ हाथ नीचे एक पत्थर को जो बहुत ही भारी है । वो एक खातों के टुकडे के सहारे दिखाया गया है । धातु के टुकडे को तोडना है, ऐसे ही उसे तोडेंगे पत्थर चल में हो जाएगा । उस पत्थर से खातों की रस्सी बंधी जो जल के भीतर से द्वार से बनती है । जब पत्थर होगा तो उसके बाहर से द्वार पीछे की तरफ खुल जाएगा । कुछ बाल भारती केंद्रों विचार करते रहे और उसके उपरांत कार्तिक केंद्र ने एक प्रश्न किया क्या ऐसे भी रहा तो संभव है जो चल से अभिक्रिया न करें और इतनी अधिक मजबूत हो रस्सी जिस हाथों से निर्मित है प्रभु वो बहुत सी धातुओं का एक विशेष अरुण बात का मिश्रण है जिसमें चल लगवा वायु अथवा मिटटी से अभिक्रिया नहीं होती है था वो अभिक्रिया मुक्त है अच्छा वो रस्सी अभी भी सुरक्षित होगी और अपना कार्य पूरी तरह से करेगी । लडकी रहेंगी जी एक प्रश्न और मेरे मन में आ रहा है कि यदि हमने वो पत्थर वहाँ से विस्थापित कर दिया तो क्या दोबारा उसको उसी स्थान पर स्थापित कर पाओगे क्योंकि आपने कहा था कि वह बहुत ही भारी है । इस पर लड पढेंगी नहीं कुछ भी उत्तर नहीं दिया बल्कि स्वता ही दुविधा में पड गए और विचार करने लगे कि उन्हें ये प्रश्न देवदत्त मडी जी से पूछना चाहिए था । पहले पूछा नहीं और उन्होंने बताया नहीं, अब मैं क्या करूँ? इतने विचारशील भावभंगिमा को देखने के उपरांत कार के केंद्र समझ गए, लेट रहेंगी, दुविधा में हैं । तब कार्तिक ने कहा लेट उबरेंगी जी, आप चिंतित ना हो क्योंकि मैं समझ गया उस पत्थर को पुनर्स्थापित नहीं करना है । करन इतनी उत्तम व्यवस्था जब प्रयोग हो जाती है तब उसकी गोपनीयता भंग हो जाती है । यहाँ पर गोपनीयता सर्वप्रथम है । मेरे विचार से अब पत्थर को वहाँ पुनर्स्थापित करना प्रयोजन हीन है । इसी कारण देवदत्त बडी जीत नें आपको ये विषय नहीं बताया । इतना सुनने के उपरांत लगता देंगी का मन शांत हो गया और द्वार को खोलने की व्यवस्था में लग गया । सर्वप्रथम लड फेंकीं, आपने अशोक के साथ जो अस्त्रों वस्तुएं लाया था उसको निकालने लगा । शस्त्रों के साथ लाई गई वस्तुओं में उपयोगी वस्तु खोजने का प्रयास करने लगा । कोई भी वस्तु कोई भी विद्या सदैव उपयोगी नहीं हो सकती है । जहाँ सोई उपयुक्तहै वहाँ तलवार अनुपयोगी है और जहाँ तलवार उपयोगी है वहाँ कोई अनुपयोगी । इसी प्रकार सतह एक ही वित्त या कार्य नहीं करती है । जिस नगर में सभी व्यक्ति स्वस्थ हूँ, वहाँ वैध देखा ज्ञान व्यस्त हो जाता है । रेगिस्तान में जहाँ कृषि योग्य भूमि ना हो, कृषक का संपूर्ण ज्ञान व्यस्त हो जाता है । इसी प्रकार सात लाई हुई सभी वस्तुएं बहुत उपयोगी ही थी । परन्तु यहाँ इस समय कौन कार्य करेगा? वही वस्तु लाॅबी खोज रहे थे । उनके साथ कार्तिक केंद्र ने भी सहयोग किया । जब लट्ठ देंगी अपने उपयोग की वस्तु निकाल रहे थे । उसने ही समय में कार्तिक एंड्स विशाल कक्ष के द्वार के सब लोग पहुंचे । उसे ध्यान से देखते हुए बोले, लाॅबी, क्या आप जानते हैं कि इतना ही कर पाए थे? किंलटन भरेंगे भी । कुछ तक चलकर कार्तिक केन्द्र के पास पहुंच गए और द्वार को देखते हुए बोलिए प्रभु, मैं अभी आपका आश्रय नहीं समझा । दोनों द्वारों पर भिन्न पच्चीकारी है । सामान्य तो द्वारों पर पच्चीस कार्य सवा नहीं होती है । मुझे लग रहा है कि यहाँ कुछ समझाने का प्रयास किया गया है । दोनों चंद्र किरणों के प्रकाश में समझने का प्रयास करते हैं । यहाँ दोनों का शरीर बढता जाता है । जैसे जैसे रात से बढ रही है, वैसे वैसे द्वार पर बनी पच्चीकारी और अधिक स्पष्ट दिखने लगती है । तब काॅलिंग इसे कहते हैं कुछ और प्रतीक्षा कीजिए मेरे अनुसार यहाँ पर इस प्रकार के प्रदार्थ का लेपन किया गया है कि रात में ही कोचर इसके दो अर्थ हो सकते हैं । प्रथम यदि दिन के समय यहाँ कोई आ जाए जिसकी संभावना नगर नहीं है तो भी उसको कुछ ला दिखाई दी हुई थी । रात्रि को ही मयूर तारामंडल चंद्रमा के उपर स्थिति में ही ये द्वार खोला चाहिए । करन मेरा चंद्रमा मयूर तारामंडल के इस वार का मिलना असंभव है । इत्ती चर्चा के साथ द्वार पर बनी बच्ची कार्य पूर्ण तैयार स्पष्ट हो गई । उस स्पष्ट रूप से संकेत बने थे किस स्थान पर जल में नीचे उतरता है? अब क्या था? बिना विलंब ये ही एक मजबूत लॉक हाथों का हथौडा लेकर लगभग हिंदी जल में बहुत रही । एक ही त्रप्रहार से वह खातों का टुकडा टूट गया और उसके टूटते ही अत्यंत भारी पत्थर जो रस्सी से बंधा था, जाल में नहीं जाने लगा । उसके नीचे जाते ही द्वार पर खिंचाव ऊपर नहीं लगा और द्वार जोरदार फरवरी के साथ खुल गया । द्वार के खुलते ही कार्य केंद्र नहीं उसमें छापते का प्रयास किया परन्तु अंधेरा होने के कारण कुछ देख ना सके तब तक लड भरेंगे भी जल्द से निकलकर बाहर आ गए । उन्होंने अपने अधोवस्त्र को बदलाव और कुछ ही क्षणों में वो भी कार्तिक केन्द्र के साथ खडे थे ।

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