Made with  in India

Buy PremiumDownload Kuku FM

शिव से शिवत्व तक - Part 13

Share Kukufm
शिव से शिवत्व तक - Part 13 in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts
7 KListens
शिव से शिवत्व तक | लेखक - आशुतोष Voiceover Artist : Shrikant Sinha Author : Ashutosh
Transcript
View transcript

सभी अत्यंत आश्चर्यजनक रूप से उसे देखने लगे । सभी आवाज थी तगडा । आधार ने कहा श्री क्या है? प्रभु यही तो मैंने कहा था कॅश शास्त्र का कुछ भी प्रहार नहीं हो रहा था । जब मैंने अपने अस्त्रों का प्रयोग किया था तब ब्रेक प्रमुख सीधे बीस नहीं कहा । अरे ये तीनों को अपने आप पूर्ण रूप से ही बाहर आगे और ये बहुत शरीर तो अपने आप ही अत्यंत तीव्र गति से मृता में मिलता जा रहा है । यही एक स्रोत प्राप्त हुआ है और इससे कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है । वो भी हमारे हाथों से रेत की भर्ती निकलती जा रही है । पहली बार प्रमुख जी को किसी नहीं इतनी अधिक आतुरता के साथ देखा था और वो भी कुछ गलत नहीं पा रहे थे । देखते ही देखते हैं वो मृत शरीर में मिलता जा रहा था । एक का एक उन्होंने प्रभु की ओर देखा और अपने दोनों आँखे बंद कर दिया सम्भवता वह प्रभु की उस असीन लोग अशक्ति से कुछ सहायता मांग रहे थे । ऐसी योग शक्ति जिसका भाग स्वतः प्रभु को भी पूर्ण रूप से नहीं था । प्रभु ने का प्रमुख आंखे खोली और विचार कीजिए ये आखिर कौन सा कारण अथवा कौन सी वस्तु अथवा कौन सी वो व्यवस्था यहाँ पर पहले थी और अब नहीं है क्योंकि बाढ लगने के पूर्व ये शरीर सुरक्षित और बाढ लगते ही इस शरीर में छह होने की गति अत्यंत हो गई । जैसे ही ये बात प्रमुख जी के कानों में पडी जैसे ब्रत शरीर को संजीवनी प्राप्त हो, उसके मस्तिष्क में विचारों की गतिशीलता बृहती से प्रारंभ हो गई । वे तुरंत ही उठ खडे हुए और उन्होंने प्रभु को प्रणाम किया । उठते ही उनकी दृष्टि चारों दूर घूमने विचार उतर अब घूम कर कुछ देखना चाह रहे थे । अब वे उस बाढ वाले अस्थान देखकर एक विशेष फोन पर आपने दृष्टि चारों माने । एकाएक उन्होंने पूछा जितने भी सैनिक वह सेवक कुमार नरेन्द्र के साथ थे वे सभी अविलंब ओपस फिट हूँ । सभी सैनिक बस से बस कुछ ही क्षणों में समक्ष उपस् थित थे । प्रमुख पीने का जब कुमार गन इंद्रा पांच चलाया तब बाण लक्ष्य की तरफ सीधे आया अथवा पहले आघात कहीं और हुआ तो उसके उपरांत बाढ ने द्वितीय लक्ष्य ऍफ शरीर को चुना । सभी सैनी के एक दूसरे का मुख्य देख रहे थे । कारण जब कुमार घनेन्द्र नहीं लक्ष्य संधान किया तो सभी कहीं ना कहीं छूटने का प्रयास कर रहे थे क्योंकि गणतंत्र नहीं अपनी स्कूल दृष्टि तो बंद कर ली थी परंतु अंतदृष्टि चाकरी कर ली थी । सामान्य सैनिकों, वार सेवकों को इस विषय में कोई ज्ञान नहीं था । पता जब उन्होंने अपना लक्ष्य संधान किया तो सेवकों वह सैनिकों ने अपने प्राणों के भय के कारण अपने को छुपाना ही पे कर सकता है । केवल एक ही सेवक था जिसकी उम्र गगनेन्द्र वकार केंद्र से कुछ ही वर्ष अधिक थी । वो अभी किशोरावस्था में ही था और गणतंत्र के साथ अधिक से अधिक समय व्यतीत करना चाहता था । उसका नाम था इंदूर । उसके कुछ कहते ही सभी का ध्यान उसकी तरफ आकृष्ट हुआ । हाँ बताओ बताओ तुमने क्या देखा हूँ? उसने प्रभु की तरफ मुख करके कहना प्रारम्भ किया मैंने देखा है हाँ ये बताओ क्या देखा है ज्यादा शीघ्रता करूँ यहाँ पर समय का अत्यधिक मूल्य हैं तब हूँ । मैंने देखा कि बाढ कुमार नरेन्द्र के धनुष से निकलकर एक पत्थर पर जा लगा और वहाँ से वो अपनी दिशा प्राप्त करके उसको लाभ के अ स्थान पर जा लगा । दंड था प्राण अपने लक्ष्य पर कैसे पहुंचा? क्या इस पर भी विचार करना होगा? इससे क्या अंतर पडेगा? तब मुख्य ने क्या क्या तो मुझे वो स्थान दिखा सकते हो जहाँ बांध सबसे पहले लगा । जी अवश्य सभी उस स्थान पर पहुंचकर देखने, बात समझने का प्रयत्न कर रहे थे परन्तु सभी का समझने का दृष्टिकोण अलग अलग था । कोई सोच रहा है कि लक्ष्य चूक गया । कोई सोच रहा था कि दोनों अ स्थान पर एक ही बांध से संधान करना ये ऍम को नहीं हो सकता है । दोनों ही विचार एक दूसरे से पूर्ण रूप से विपरीत है । कोई सोच रहा है जब आप बंद कर के लक्ष्य साधा जाएगा तो वो तो कहीं भी जा सकता है और कोई सोच रहा है की बच्चों के कार्य से क्या अभिप्राय परन्तु प्रभु प्रमुख चीज कुछ और ही आकलन कर रहे हैं । पूर्ण निरीक्षण के उपरांत प्रभु जी ने अपनी हुई तो दाढी पर हाथ फेरा और वो हाथ गले के नीचे तक ही देते थे लेकर और ऐसा ही किया अंत में ऊपर की तरफ अपना बुक करते हुए सभी की तरफ एक प्रश्नवाचक मतलब ठीक । हाँ । क्या बाढ लगने के बाद किसी वस्तु के कितने अथवा टूटता नहीं अथवा किसी भी प्रकार की कोई और बनी सुनाई थी? हो इन दोनों का जी जी मुझे तो नहीं सुनाई पडी । मुझे इस प्रकार प्रतीत हुआ जैसे बाढ लगने से कोई वस्तु टूट गई और वह खडखड खर खर खर खर करते हुए नीचे की तरफ लोगों लगता हूँ क्या तुमने उस वस्तु को देखा? नहीं? नहीं मैंने नहीं देखा । हाँ यह अवश्य है कि वो जो भी था मेरे समीप से लुढकता हुआ गया था परन्तु क्षमा चाहता हूँ क्योंकि मेरा ध्यान कुमार गवेन्द्र के बाढ पर था । इस कारण मैंने संभावना उस पर ध्यान नहीं दिया । प्रमुख पीने का तुम मुझे वहाँ ले चलो जहाँ पर तुम उस समय खडे थे और जहाँ पर तुम्हें उस वस्तु के कितने का आभास हुआ । सभी इंदूर व प्रमुख जी के साथ एक विशेष स्थान की तरफ चल पडे । वो स्थान इस स्थान से सौ कदम से अधिक रहा हूँ । सभी इस विचार में पढ रहे थे कि बाढ से किसी वस्तु का क्या संबंध हो सकता है । यदि बाढ पत्थर से टकराया तो क्या हुआ? पत्थर टूट गए होंगे और वे नीचे की तरफ लुढकते हुए चले गए होंगे । इससे क्या अर्थ हो सकता है? परंतु प्रमुख ही के मन मस्तिष्क में कुछ अलग ही चल रहा था । उन का अपना आकलन कुछ और ही कह रहा था । इस प्रकार सभी उस स्थान पर पहुंचे जहां हिंदू उस समय खडा था जब कुमार गणतंत्र नहीं पानी चलाया था । सभी इस प्रकार खडे थे कि अब प्रमुख जी क्या आप कहेंगे । इस सब के बीच प्रभु आगे की तरफ आकर बोले समय हमारे पास बहुत ही कम है इसलिए तुरंत बिना विलंब किए हुए एक वस्तु को खोज निकालना है और वह वस्तु किस प्रकार की है वो आपको प्रमुख से समझायेंगे । धन्य है आपका आपको कैसे पता चला कि मुझे एक को वस्तु की आवश्यकता है, ये मैं अपने अनुमान मात्र से कह रहा हूँ परन्तु मुझे नहीं चलो शुद्धता करो वो जो सामने इतना कहना ही था कि इंदूर मित्र गति से वहां पहुंचा । उसने ऍम भारी । एक तरफ ऍम उसका एक हिस्सा करते गोलाकार आकार ता था वो उठा लिया । सभी उसको देखना चाह रहे थे । आपके पढकर प्रमुख ही नहीं उसको अपने हाथों में लिया और उसको ध्यान से देश नहीं लगेगा । फिर उन्होंने अपनी दोनों आंखों को बंद करके संभावना था इस वक्त धन्यवाद प्रमुख कब हूँ । अब प्रतीत हो रहा है कि कार्य हो गया है क्या और कौन सा कार्य पूर्ण हो गया । प्रमुख जी हूँ सर्वप्रथम हमें उस स्थान पर पहुंचना होगा जहाँ कुमार नरेन्द्र का बाहर क्या विलंब हो जाने से सारे किए कराए कार्य पर पानी फिर सकता है । सभी अति शीघ्रता के साथ उसी स्थान पर पहुंच जाते हैं जहाँ कुमार घनेन्द्र का बता दे रहा था । अब आगे बढकर प्रमुख चीन उसी वस्तु को समायोजित करने का प्रयास कर रहे हैं । उसे पुनर्समायोजन करने में कुछ समय लग रहा है । ये अच्छा सभी में बढती जा रही है कि आखिर ये क्या है और क्या हो रहा है? कौन सा कार्य संपन्न हो गया है? अंत में दंडधारी अपनी अधीरता प्रदर्शित करते हुए कुछ कहने का प्रयास करने ही वाले थे की प्रमुख जी की दृष्टि उन पर पडी और उस दृष्टि में क्या था कि टाॅफी ने कुछ ना कहना कि उचित समझा । छोटे से अंतराल में प्रमुख जी ने अपना कार्य संपूर्ण कर लिया और बोलना प्रारंभ कर दिया होगी आप पर जिसने आघात क्या और हम सभी मिलकर उसे समझ नहीं पा रहे थे की वो कौन था और कहाँ से आया था? क्यों आया था? इस सबसे परे एक बात और क्या फिर जीवित अथवा मृत वो बिल्कुल नहीं रहा था । इनमें अब एक सूत्र मिल गया है । प्रकाश की किरण अब दिखने लगी है दण्डक हारने का प्रमुख कृप्या पहेलियां ना पूछा है बल्कि आप को जो जानकारी हो गई है ना उसको यदि उचित जानेंगे तो बताते । इतने लम्बे अंधकार के बाद एक प्रकाश के किरण भी बहुत महत्व रखती है । सभी को बता दिया जाएगा प्रमुख जी का संदू लेकिन अभी उसके लिए उपयुक्त समय नहीं है । इस समय एक एक पल महत्वपूर्ण है आप सभी ध्यान से देखो । बस इसके बाद प्रमुख सीने अपने सेवकों को अपने पास बुलाया और उनसे कुछ कूट भाषा में कहा । रेल तुरंत ही प्रमुख जी के आदेश का पालन करने के लिए उनके शिविर की तरफ चले । शिविर से एक कार्ड का संदूक लेकर आते हुए दिखाई पर उनके आते ही प्रमुख सी सभी सेवकों, वहाँ सैनिकों को वहाँ से दूर जाने को कहा और साथ ही प्रमुख जी ने उनको इस तरफ न देखने का आदेश दिया । अब वहाँ पर प्रमुख जी दंड, आधार भुत जंगेश्वर माँ प्रभु इंदुर वह तीन सेवक शीर्ष रहेंगे । अब प्रमुख जीने प्रभु से उनके पास जाकर उनके कान में कुछ कहा । तब प्रभु ने माँ से कहा कि वे और हिंदू यहाँ से चाहें तब मारने का क्यूँ क्या वो यहाँ नहीं रह सकती है । प्रभु जी ने अपना मस्तक नीचे की तरफ झुका लिया और कुछ भी उत्तर नहीं दिया । कब प्रमुख जी को देख कर आप हमारे सभी पाएं क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर प्रमुख नहीं देंगे । इसका उत्तर मैं आपको तब प्रभु माँ के पास आए और उन्होंने माँ के कानून कुछ कहा और उनके कहते ही जैसे वहाँ में एक वित्त उत्प्रवास होगी और मुस्कुराते हुए आगे आई आप बोली इंदूर चलो चला जाए । जैसे ही माँ पर इंदूर वहाँ से अपने शिविरों के लिए चले गए । प्रमुख जी ने अपना संदूक खोला और उससे अलग अलग अच्छा छोटे छोटे संदूक निकले और उन संदूकों को धीरे धीरे खोला और अपने सामने रखने के बाद सेवकों कुछ समझाया । उनमें से एक सेवक पीना विलंब किए हुए उस यन्त्र के पास चला गया जिसे अभी अभी प्रमुखी नहीं पुणा स्थापित किया था । अब प्रमुख ही उस स्थान के समीप जहाँ पर बाढ गिरा था, पहुंच गए तभी दो सेवक दो विशाल था तो पात्र लेकर आए और उनमें इतना स्थान था कि कोई भी व्यक्ति उनके अंदर आसानी से बैठ सकता था । दोनों में समान रूप से नदी का चल कर दिया गया है । अब उन में से तीन संदूकों को एक तरफ रखा गया और शेष तीन संदिग्धों को । दूसरे तरह इस घटनाक्रम पर प्रमुख जी का पूरा ध्यान था । अब उन दोनों सेवकों ने तीन संदूकों से छोडना निकले । वहाँ चल से भरे हुए ठाकुर बातों में धीरे धीरे डालकर कुछ प्रतीक्षा करने लगे । पूरा धीरे धीरे छोडने को उसी बात रबर डाल दिया और पुणा प्रतीक्षा करने लगे । कुछ विश्वास था उनके मन में सम्भवता आत्मविश्वास से भरे हुए नहीं लग रहे हैं । प्रमुख ने उनकी तरफ देखा और धीरे से पूछे ध्यान से सुनी और ध्यान से उपयोग की थी । नारंगी पूरा पैक नहीं । जब जल भस्म के साथ हो वो चाहे रंगहीन चढे पर तमान उसपर विकीरण अस्त्रशस्त्र हो जाए । ऐसे ही रंगहीन हफ्ते जब पा जाए दो भिन्न अश्वेत छोड पुनः रंगीन हो जाए तब वह मानुष बने संपूर्ण इस वार्ता लाभ मुसीबत, संभावना पूर्ण रुपये नहीं समझ सके । तब प्रभु आगे आए और यहाँ पर तीन भिन्न प्रकार के नारंगी भूरा वाॅक छोड आप चल में मिला रहे हैं । तुरंत ही इसमें हवन भस्म मिलाएं और धीरे धीरे मिलने पर इसका रंग कम होता जाएगा । सही अनुपात प्राप्त होने पर रंगहीन हो जाएगा । ये रंगहीन जब जब मनुष्य के संपर्क में आएगा तब मनुष्य के ऊपर एक विशेष प्रकार की परत चढ जाएगी । उस परत पर अस्त्रशस्त्र अथवा किसी विशेष विकिरण का प्रभाव नहीं पडेगा । यदि मेरा विचार सकते हो तो प्रमुख थी । इससे पहले कि प्रभु कुछ आगे कहते प्रमुख पीने का प्रभु आप सत्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर सकते । आप एक दिन सत्यरूप हो जाएंगे । इतना कहने के बाद भी शांत हो गई । खुद धीरे धीरे तरफ रंगहीन होने लगा और कुछ ही समय में वो सही अनुपात प्राप्त करने के पास पूर्ण तैयार रंगहीन हो गया । सेवकों ने संकेत दिया कि वह पूर्णतय आचरणहीन हो चुका है । इसके उपरांत जो घटना घटित हुई उसकी कल्पना करना बहुत ही दुष्कर है । प्रमुख जीने मन ही मन में प्रभु को प्रणाम किया और एक एक करके अपने दोस्तों को शरीर से अलग करने लगती है । सर्वप्रथम उन्होंने अपनी पगडी फिर धीरे धीरे करके शरीर पर मात्र एक लंगोट ही रह गया था । फिर धीरे धीरे करके एक एक वस्त्र को शरीर से इंकार कर दिया । अब उनके शरीर पर मात्र एक लंगोट ही रह गया था । अब सभी को समझ में आ चुका था की क्यूँ यहाँ से सभी को जाने को कहा गया था और तो आप माँ को भी जाने को कहा गया था जब वहाँ से प्रभु ने कान में कुछ कहा तब माँ मुस्कुराते हुए चली गई । अब प्रमुख चीन उसके हाथ पात्र के सभी आए और अपना अंतिम अंतःवस्त्र भी काटने के उपरांत उस था तो पात्र के भीतर खडे हो गए और फिर धीरे धीरे उसमें बैठकर अब बाहर से कुछ भी प्रतीत नहीं हो रहा था । सब लोगों की दृष्टि उसी पात्र की तरफ लगी हुई थी । सब तरफ पूर्ण सन्नाटा छा गया था । आपने ही विश्वास की ध्वनि स्वयं को प्रतीत हो रही थी । कुछ समय उपरांत उस खातू पात्र से एक विशेष तरह की लाल वर्ण युक्त लाओ बाहर निकलती प्रतीत होने लगी जो स्वतः धीरे धीरे बढने लगी और उसने विभत्स रूप ले लिया । उसने प्रचालित होने के प्रारंभ में सभी सामान्य रूप से उसको आप इस बात को देखते हैं पर हुआ सभी पूर्ण रूप से चिंतित थे । प्रभु के भी मस्तिष्क में चिंता का चेन्नई भर आए थे । परन्तु ने प्रमुख ही के वैज्ञानिक ज्ञान पर पूरा विश्वास था तो वे चिंतित होने के साथ संपूर्ण रूप से आप स्वस्थ भी थी । सभी उस प्रचलित अपनी को शांत करने का प्रयास करने के लिए प्रभु की तरफ देख रहे थे । परन्तु प्रभु अभी भी पूर्ण आश्वस्त सकते और वे था तो पात्र की । वो देख रहे थे । कुछ और समय व्यतीत हुआ और अच्छे वाले तक नहीं । धीरे धीरे शांत होने लगी और अंत तथा पूर्ण शांत हो गई । सभी अब और भी आश्चर्यचकित हो गई जब उन्होंने देखा कि पात्र के बाहरी भारत में चल की छोटी छोटी बूंदे ठोस आकाश लेकर जम चुकी थी । पूरा का पूरा पात्र गतिशीलता को प्राप्त हो चुका था । सभी पात्र के अत्यंत समीर थे और वे समझ नहीं पा रहे थे कि अब क्या करें । तभी प्रभु ने ध्यान से देखा तो भी प्रतीत हुआ कि अभी भी अंदर ही है और वो भी रंगहीन । तभी उनको प्रमुख जी की पूरी बात याद आ गई और मन ही मन बहुत बताएँ । रंगहीन पांच आये तो भिन्न अश्वी तोकचोन पुनः रंगीन हो जाए । तब वहाँ मानुष बनी और प्रभु जोरदार होने के साथ दंडधारी जी दोनों से चोट को इस था तो पात्र में धीरे धीरे डालेंगे । इतना सुनते ही दण्डवत हारने उन दोनों संदूकों को तुरंत ही अपने हाथों से उठाकर उसके हाथों पात्र के पास रखा और धीरे धीरे उस धातु पात्र में डालना प्रारम्भ किया परन्तु उसका कोई भी प्रभाव न होते दिखाई संभावना दण्डक हार चीज बहुत ही शीघ्र परिणाम चाह रहे थे । उन्होंने प्रभु की तरफ देखा तब प्रभु ने उनको ही दे धीरे छोडना डालते रहने का संकेत अपना सिर हिलाकर थोडा और समय व्यतीत होने पर बाहर साधा । पर जवाब ऍम पिघल कर चल के रूप में पहले लगा और अंदर के तरफ का रंगहीन ऑप्शन अब रंग में परिवर्तित होने लगा । कुछ ही समय पश्चात हो तब पूर्ण रूप से उसी दिन का हो गया जिस प्रकार वो पहले था जब प्रमुख जी ने उसमें प्रवेश किया था । अब प्रभु ने ठंडक हार को रुकने का संकेत दिया । अब प्रभु ने ब्रह्म परम शक्ति से सहायता मांगने के लिए अपने दोनों नेत्रों को बंद कर दिया । वो अपना सिर्फ नीचे की तरफ झुका लिया । इस समय प्रभु के दोनों हार एक दूसरे से जुडे हुए थे । पूरा मन मस्तिष् इन्द्रियाँ वह थी । एक आकार हो चुका था कि ठंडा हार की जोरदार होने, उनके कारणों को प्रभावित करेंगे हूँ की छह हो प्रभु की जय हो, सभी उस जयघोष में अपनी वहाँ शक्ति को मिला देना चाहते थे । अंततः ध्वनि धीरे धीरे बढने लगा क्योंकि उस स्थान पर तो प्रभु प्रमुख जी के अतिरिक्त बात पांच ही बैठे हैं । ठंड आधार भुत चंदेश्वर वह तीन सेवक वे सेवक वसानी जो दूसरी दिशा की ओर मुख करके खडे थे, उन्होंने भी अपनी सोच तार आवाज से संपूर्ण वनप्रांत को गुंजायमान कर दिया । अभी प्रभु ने अपनी आंखों को नहीं खोला था परन्तु उस था तो पात्र से प्रमुख चीज अब खडे हो चुके थे । वह दिखाई पडने लगे थे । प्रमुख उस पात्र से बाहर निकले और सर्वप्रथम उन्होंने प्रभु को का नाम क्या है? वे कुछ कहते इसके पूर्व जैसे प्रभु को अपनी मन मस्तिष्क में ही सब क्या हो गया था । उन्होंने अपने नेत्र खोलते हैं ।

Details
शिव से शिवत्व तक | लेखक - आशुतोष Voiceover Artist : Shrikant Sinha Author : Ashutosh
share-icon

00:00
00:00