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गुजरा हूँ जिधर से - Part 1 in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts

Story | 23mins

गुजरा हूँ जिधर से - Part 1 in 

AuthorTej pal Singh 'Tej'
गुज़रा हूँ जिधर से कविता संग्रह Voiceover Artist : RJ Nitin Author : Tejpal Singh ' Tej'
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आप सुन रहे हैं क्योंकि वो एफ एम पर तेजपालसिंह तेज के लिखे किताब गुजरा हूँ जिधर से गजलें और मैं हूँ आपके साथ आर्जेन ऍम सुने जो मनचाहे आदमी उडान में रहे तो खूब है बात जो मैं यान में रहे तो खूब है मारने मरने के या मौके तो काम नहीं तीर पर कमान में रहे तो खूब है आज की महफिल का हर बंदा नवाब है जो खामोशी बयान में रहे तो खूब है जिंदगी थकान के सेवा तो कुछ नहीं जो ताजगी थकान में रहे तो खूब है नमाज मंदिरों में हो मस्जिदों में कीर्तन राम जो कुरान में रहे तो खूब है यू ही मत बवाल कल की कुछ नए सवाल कर चांदनी के वास्ते उठ जरा धमाल कर था के धक्के दिमाग है कि ताजगी बहाल कर मिलने तो मिलिये रोज पर दामन जरा संभालकर कि आदमी की जात का तेज कुछ खयाल कर अंधेरा शहर है कुछ बत्तियां रखते फूल ही काफी नहीं कुछ पत्तियां रखते हैं कुछ हस्तियों ने या बिहार बाकी ये शहर आपकी तो कब्रगाह में कुछ हस्तियां रखते धार के विपरीत यू जलना नहीं आता मुक्तसर सी बात है कुछ मछलियां रखते है शब्द भी भाषा भी है तुझ को नसी फट अनपढों के सामने कुछ तख्तियां रखते गमगीन रहना तेज देशक हर घडी अच्छा नहीं की जूडे में या रहे यार के कुछ तितलियां रखते हैं अपना अपना मिजाज है साहेब किसको किसका लेहाज है ऐसा है वो तो कहता है नास्तिक खुद को रोज पडता नमाज है साहेब अपने हिस्से में चंद साहब से हैं उम्र उनकी दराज है साहेब मैं तो मर मर के भी की लूंगा मुझको इसका रियाज है साहेब चिंता का फन की तेज को क्यों हो कि दोस्त उसका बजाज है साहेब नहीं बेटियाँ सोच रही है खडी टूट के नीचे कोई तो निश्छल हाथों से वन उपवन को सीटें प्रदूषण इस तौर बढा है बस्ती क्या जंगल तक में खुली हवा की मांग कर रहे हैं खुश्बूदार बगीचे धुआ धुआ घर आंगन कैसे घर जाऊँ ऍम गली गली है कि चढ गारा संसद बीच गलीचे चित्र एक भी हुआ ना पूरा राजनीति के रंगों से नारो में यू खुशहाली के चित्र बहुत है खींचे गंगा यमुना तेज उदासी सागर हुआ विनाशक अच्छा हो मानव से मानव मिलजुल प्रेम लीजिए कल आज और कल बंद आंखें खुल गई तेरी जफा के बाद की जिंदगी रोशन हुई तेरी जफा के बाद कल तलक खुशबू मेरी उल्फत में कैद थी बस की हवाओं में घुल गयी तेरी रफाल के बाद की बातों पे अपनी था मुझे बेहद जरूर पर बात मेरी सिर्फ हुई तेरी जफा के बाद सादगी कोड लू की छोड दू में क्या करूँ खुद ही खुद से ठंड गई तेरी जफा के बाद कल भी थी आज भी अपनी हवाएं तेज उल्फत मगर रूसवा हुई तेरी जफा के बाद गो शहरभर आवारगी बरपा हुई संसद में लेकिन शून्य भर चर्चा हुई लोग कहते हैं कि कल जिंदा थी पर आज कल इंसानियत मुर्दा हुई शायरी के मायने को छोडना हूँ शायरी पर हर समय फतवा हुई मैं ही मानी का असर कुछ यू बढा ईमानदारी खुद ही वापदा हुई मौत देशक मूल भी है ब्याज भी जिंदगी पर तेज बस चर्चा हुई मुद्दत बाद मिली है यहाँ की सर से भूल खेली है पांखें अपना कोई आस पास है फिर काहे को बदले झांकी बाजार गर्म है अनुबंधों का मत कर संबंधों की बातें जीवन भर रोज होके गुजरा दिन सब लेना समझी रातें कुर्सी पाने के लालच में तेज लगी हैं लम्बी बातें रेट का सागर सही सागर तो है घर मेरा खस्ता सही पर घर तो है दो आएँ या की न आएं पर मुझको उनके आने का तसव्वुर तो हैं हैं खाक सारी को मौज मस्ती का ख्वाब ही सही मैं सर तो हैं होने को तो हैं वो आदमी बेघर बात में उसकी मगर असर तो है तेज समझे कि न समझे खुद को उसमें जीने का कुछ हुनर तो है आंखों आंखों में जो उनसे गुफ्तगू होने लगी रफ्तार रफ्तार बात दिल की सुर्खरू होने लगी ना तो दिन ही मिले मेरे ना रात ही रोशन हुई बात लेकिन नागहानी चार सौ होने लगी जिंदगी को मौत की मेहमान है लेकिन मौत ने जो दी सादा तो रूबरू होने लगी वक्त ने आवारगी को कुछ दिया ऐसा सबक की आवारगी आवारगी से दूर दूर होने लगी कि उनसे मिलने के बहाने तेज को खुद से मिलने की बराबर जस्ट जू होने लगें । मजदूरी सही मगर आदमी सा है चेहरे का रंग देखिए कुछ चंद नहीं है हमको तो हर एक गाम पे आती हैं क्या पर जीने का हुनर उसका कुछ राग नहीं है हम है कि हम पनपा की पतझड की झाओ में उसका हर एक मौसम मगर कुछ फाल्गुनी सा है बात में दम है ना उसकी ना हाथ में दम है तेवर मगर हम रह का कुछ दामिनी सहाय बाद में बात मिलाना कैसा आंख से आंख मिलाना कैसा हर पल रंग बदलते हैं जो उनसे हाथ मिलाना कैसा जब माली ही गंद चुराए फिर फिर भूल हो गाना कैसा जब मन आंगन हो अंधियारा चौमुख दीप जलाना के साथ तेज हिमालय की चोटी पर हरियल दूब उगाना कैसा बहते हुए पानी को नाशकों से तो लिए जब जब भी रुके बाकी तो चलने को बोली है जिंदगी जीना है तो जीने के वास्ते दोस्त कैसा भी हो पाते ना खोलिए सोने कीगो फितरत नहीं है फिर भी हम चलते चलते रह में सोचो में सो लिए जब जब मिले उलझन नहीं यू कीजिए यार अब हुआई ने रूबरू हर गार्ड खोलिए तेज अब वर्ष में नहीं सदियों को झेलना है वक्त अभी वक्त की बढते नहीं खोलिए सपने कब हुए अपने सपने बस हुए सपने हिंसा भी कहाँ बाकी इंसान भी हुए कितनी जीना है ढेरों में खाई कसम सबने पाउंड का सफर छीना दी कैसी सजा आपने गैरों से गिला कैसा आपने भी कहाँ अपनी सामने दुनिया के हंसाए गए हैं हम घर पर लाके खूब बुलाए गए हैं हम न जान ही थोडी न मरने का हौसला यूबा रहा हर तौर सताए गए हैं हम अपनापन है ये की दीवानगी उनकी की गालियां दे दे के बुलाए गए हम मुद्दा रोटी का जहां का तहां रहा हूँ तब क्या दे दे के सुनाए गए हम उल्फत से कोसों दूर है वह खुद ले के गमलों में दोस्ती के सजाए गए हैं सफर जारी है सफर होने तक बदमजा है जिस गुजर होने तक यू बाद मुदद के नींद आई है सोने दो अबकी शहर होने तक मेरी मैयत को आग मत देना मेरे दुश्मन को खबर होने तक मुझको जल्दी है गुजर जाने की जिंदा रहे वह की कुफल होने तक तो जायज है रूठना रोना उन का पहले उल्फत का होने तक जीना भी नहीं आता मारना भी नहीं आता हम है कि हुए वाहन गलना भी नहीं आता चलने की हिदायत है रुकना भी नहीं आता शोला है बदन अपना जलना भी नहीं आता हो तेज से मुखातिब लेकिन अभी नहीं ऐसा हूँ और पीने का ये असर हुआ है जिंदा अपना हुआ है आंखों को चपल चांदनी पाओ पाउंड सफल हुआ है बस्ती बस्ती सन्नाटा है बेशक कोई ऊपर हुआ है मंजर संबंधों के चलते अनुबंधों का गुजर हुआ है खुद अपनी हस्ती पहचान हूँ तेज मेरा काम नजर हुआ है जो फूल थे वो खार हो गए जो शेर थे तैयार हो गए वक्त ने ढगा तो इस कदर कि हौंसले फरार हो गए वोट की कमर पे मेम नहीं सहज ही सवार हो गए काम अंजल बढे तो यू बढे एक से हजार हो गए कितना बडा असर रहते जो कि हम भी बंदा अखबार हो गए यूँ ही न धमाल कीजिए कुछ बोली सवाल कीजिए आ रहे जो दिल के दिल गरीब ऐसा कुछ कमाल कीजिए जो कल तलक हुआ तो हो गया कल का खयाल कीजिए लूट के गुलों की रंगो बू खुद को ननिहाल कीजिए मौत की बिसात जिंदगी ना काम कुम मलाल कीजिए मौत को तकिया बनाकर जिंदगानी सोच ली छोड करवा दे बहारी पुर बाहर रहो चली वहां मूढ है अनुपम घने रफ्तार क्या बनी छोडकर गश्ती की वो दे किनारा हो चली देखकर सूरत शकल जब फूल मुरझा नहीं लगी क्या कर रही हूँ सी रख कोई ये सोच बारी हो चली है इंसान के हाथों गया इंसानियत का नू बस खयाली यू बढी की खानदानी हो चली आंखों हूँ उसकी या उसकी तेज अब झुकती नहीं कि आंख का पानी मारा तहजीब पानी हो चलिए ऐसा एक दिन मुझे नसीब तो है कोई अपना मेरे करीब दो है पेट की खाई थी उन सेनान अपील उनके हाथों में गो जरीब तो है सभी यूशू तो नहीं है मानो भी सब के कंधे पे गुल सलीब तो है मेरे संग संग जो जीता मारता है कुछ होना हूँ वो बाकी तो है गजल में वक्त की खामी क्या है काफी हो ना हूँ रदीप तो हैं वो की कुछ खींचा की चासा रहता है खुद से खुद जुदा जुदा सा रहता है है वो भी इतना कि शिकस्ता दिल है वो की कुछ ठगा ठगा सा रहता है आस्मा हूँ के भी आज सुबह कुत्ता के है वो की कुछ खफा खफा रहता है मैं से क्या कटे की अब भी साथ ही सुनील की कुछ नशा नशा सर रहता है मोहब्बत का नशा जो उतरा है की थी दिल की कुछ डाॅ रहता है दे रहे हैं जिनमें ऐसे गुजरी जब भी गुजरी दिल पे गुजरी आंख में उसकी जाने क्या है जब बिल्डिंग जी उधर से गुजरी आशिक नजर है इतनी काफी हर एक और मदन से गुजरी बन जा रहा हूँ मैं बन जाता सारी उम्र सफर में गुजरी तू मुझे मत मेरी तबीयत सारी उम्र कुफल नहीं कुछ नहीं बहुत पीटीएम मिलाकर आंसू सबको आंखों से जुडा करार जो तू चाहे है गजल में मानी मिसरे मिसरे में लिखा कर आंसू कैसे गुजरी है उम्र मत पूछो बहुत बेचे हैं सूखा कर आंसू कोई अपना यूमर से गुजरात चश्में कातिल में सजाकर आसु बिल कभी पड जाए जरूरत शायद बस की रखना बचाकर आसु बात बनी पर जरा जरा सी शमा जाली पर जरा जरा सी सन्नाटों की राजधानी में हवा चली पर जरा जरा सी स्वप्न सुंदरी के सपनों में आकर लडी पर जरा जरा सी मजलूमों के चाक जी घर में आग पली पर जरा जरा सी तेज कलम गारों के दरमियां साख बनी पर जरा जरा सी पता नहीं कब दिन निकला कब रात गई बात बात में लेकिन अपनी बात गई रात चांदनी का आना क्या खूब रहा दिल्ली में उत्तरी और जे वह पर गात गई दिल क्या गुजरा जोर गया तारीख की का घाटा गए अम्बर निखरा बरसात गई सतनामी तो चलते दम ही रूट गई बदनामी पर कोसो अपने साथ गई । तेज उम्र जब जब भी गुजरी यू गुजरी पतझड में जून शब्द शजर से पाक गई गोयल है पिंजरे में बंद कौवे हुए घने स्वच्छ संबंधों के पेड पे आ कर बैठ गए कोरियन बन लगा ली लेने पावस खुद ही आह वादित फूलों की गन शब्दों की सीढी पर चढकर उन्हें गिरे विचारे झंड नंगी हुई व्यवस्था बेशक फिर कैसे सुधरे पर बंद हूँ आंसू पीकर जीने का यू काम किया हमने जैसे अपना काम तमाम क्या जानू था की मैं एक ला रहे जाऊंगा फिर भी उसके जाने का एहतराम किया मैं खाने का आना जाना छूट गया घर बैठे ही मैं खाना सर नाम क्या तेज ने जिसको जितना ज्यादा प्यार किया उसने उसको उतना ही बदनाम किया हूँ बढ गई इतनी थकन है यार अब की फूल भी लगने लगे हैं खार जीत को इतना करीबी सही दिया जीत से अच्छी लगी है हार अब किश्तियां तो है मगर नाविक नहीं किस तरह जाए नदी के पार अब अगर शख्स है यू वक्त का मारा हुआ लगने लगी है जिंदगी भी भार अब जनतंत्र के चलते भला ये क्या हुआ नन्ने हाथों में भी है हथियार न जिंदगी न बंदगी नवाह चाहिए काटने को उम्र यानी वह चाहिए दिल्लगी की बात कुछ और है पर जानने को दिल मगर निगाह चाहिए न्याय को ना झूठ सही न सच से वास्ता एक अदद वकील और गवाह चाहिए । जिंदगी और मौत का रिश्ता भी खूब है की जिंदगी को मौत की पनाह चाहिए ये कैसा लोकतंत्र है ये कैसा लोकतंत्र यहाँ शाह को भी हर नजर सिपाह चाहिए बैठा हूँ घर जुटाकर साकी से दिल लगाकर बीता हूँ रोज फिर भी आंसू मिला मिलाकर कभी होश में मिलेंगे तुझे आईना दिखाकर साकिन इलाज रख ली सरेशाम ही सुलाकर जीना है तेज मुश्किल यह मौत को भुलाकर ऍम चलते चलते पांव था के सच्चे झूठे जैसे भी थे हुआ था के सूरज की इतनी सी मंशा है शायद झेल झेलकर धूत कसैली पाओ सकें नए दौर में यौवन यू उन्मुक्त हुआ तो एक एक करके कामसूत्र के दाव था कि आखिर को आंखें सूखी दिल बैठ गया रिश्ते जुडते अंतर्मन के घाव सकें ताकि मल्हार रहे थकी रुदाली तेज धक्का नए रूप में ढलते ढलते पाऊँ था की पत्थर उठाए हाथ जो जिनके सिता नहीं है घर उन्ही के खासकर शीशे से बनी है भीड तो है हर कदम पर भीड में साहिब आदमी की जून में दो चार जने हैं कल अलग था आज सुबह मेरे घर से बावस्ता था आजकल धरती भी घनशाम घर नहीं है इंसान ने इंसानियत को आप ही अगुवा क्या माने वरना बारहा इंसान नहीं है हाथ में जिनके खिलोने चाहिए थे खून में अपने ही उनके हाथ सा नहीं है दिल गुजरा है और रात गई फिर भी ना प्रभात हुई सूखा सूखा अपना आंगन ये कैसी बरसात हुई रीत गए रिश्तों की गागर कि मानवता बदला हुई बाहर बाहर जीत मुकम्मिल भीतर भी डर माप हुई तेज बुझाता क्यों रहता है ऐसी भी क्या बात हुई यू रात बेनकाब हो गयी खान माँ खराब हो गयी आज ही पीढी हिसाब से फिर क्यों सिर्फ शराब हो गयी आवारगी के धुर बाजार में ऐसा दूँगी अजाब हो गई तो उन्हें की या मैंने की पहल बात पर खराब हो गई जिसने मुझ को तेज था पढा किसू और की किताब हो गई लेकिन नहीं लगी कहानियाँ बिटिया रानी लगता है बिटिया हुई सयानी रहे सावन माँ से मेरे से बत्ती आ गए हैं पायल की झमझम संघ भर से पानी नहीं अल्को मैंने चंद्र सितारे गोथे हैं पूछे हैदर फंसे तन के मानी रही आके उसकी अब मधु की मोहताज कहा कल की चिंता मेरे कल है नानी नहीं तो होता तो पल दो पल बतिया लेती दुख अपने सब कहाँ से करूँ बयानी रहे

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गुज़रा हूँ जिधर से कविता संग्रह Voiceover Artist : RJ Nitin Author : Tejpal Singh ' Tej'