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सत्यमेव जयते in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts

Story | 40mins

सत्यमेव जयते in 

Authorजयप्रकाश पवार
A modern take on the importance of truth in the current setting of societal scenarios. Voiceover Artist : RJ Atul Author : jayprakash pawar
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सत्यमेव जयते जोर-जोर से दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनकर अजय ने अपने घर का मुख्य द्वार खोला तो उसे सामने जो नवयुवती नजर आयी, वह बेहद घबराई हुई लग रही थी और जोर-जोर से हाँफ भी रही थी। "सर जी, हमें बचा लीजिए।" अजय के दरवाजा खोलते ही सामने खड़ी नवयुवती ने गिड़गिड़ाते हुए उससे कहा। "क्या हुआ आपको ?" अजय ने गौर से नवयुवती के चेहरे का मुआयना करते हुए पूछा। "हमें तो कुछ नहीं हुआ, पर इस वक्त हमारी इज्जत पर खतरा मंडरा रहा हैं। प्लीज, आप हमें रातभर के लिए अपने घर में छुपा लीजिए।" कुछ पलों तक सोच-विचार करने के बाद अजय अधूरे मन से 'आइए' कहकर दरवाजे से एक तरफ हट गया, जिसके बाद नवयुवती ने घर में दाखिल होने में एक पल की भी देरी नहीं की। "क्या आपके मेरे घर में शरण लेने का एक्चुअल रिजन यही हैं जो आपने मुझे बताया ?" दरवाजा बंद करने के बाद अजय ने दुविधाभरी निगाहों से आगन्तुक नवयुवती के चेहरे को देखते हुए सवाल किया। "हाँ सर जी, हमारे आपके घर में छुपने के लिए जगह माँगने की असली वजह यही हैं, जो हमने आपको बताई। प्लीज, हमारी बात पर यकीन कीजिए, हम कोई फ्रॉड लड़की नहीं हैं।" आगन्तुक नवयुवती ने काफी लंबे समय से बुरे हालात का सामना कर रहे किसी बेबस इंसान की तरह मायूस स्वर में अजय के सवाल का जवाब दिया। "क्या आप मुझे जानती हैं ?" "जी हाँ, क्योंकि मैं आपके क्लिनिक में आकर आपसे अपना एकबार ट्रीटमेंट करा चुके हैं। आपके क्लिनिक में डेली काफी लोग ट्रीटमेंट कराने आते हैं, इसलिए आपको हमारा ट्रीटमेंट करने की बात याद नहीं होगी, पर हमने अपनी पूरी लाइफ में आपके जैसा एक डॉक्टर देखा हैं, इसलिए हम आपको उम्रभर नहीं भूल सकते हैं।" "क्यों, मैंने आपका गलत ट्रीटमेंट कर दिया था क्या ?" "नहीं, हमने आपसे ट्रीटमेंट कराने के बाद आपकी लिखी हुई मेडिसिन्स में से सबके सिंगल-सिंगल पिसेज ही खरीदकर लाए थे और ये देखकर आप जान गए थे कि हमारे पास मेडिसिन्स के लिए पैसे कम पड़ गए होंगे, इसलिए आपने हमसे जो ट्रीटमेंट की फीस ली थी, वो जबर्दस्ती हमें लौटाकर सारी मेडिसिन्स खरीदने के लिए मजबूर कर दिया था। इस छोटी-सी एक ही मुलाकात से हम जान गए कि आप बहुत अच्छे इंसान हैं, इसलिए हमने इस कॉलोनी के इतने सारे घरों में से सिर्फ आपके ही घर का दरवाजा खटखटाया।" "सॉरी ! मुझे आपके इतने सारे घरों को छोड़कर छुपने के लिए मेरा घर चुनने की वजह पता नहीं थीं, इसलिए मैंने आप पर डाउट किया। आई एम रियली सो सॉरी फॉर इट।" "आपको हम पर डाउट करने के लिए अफसोस जताने की कोई जरूरत नहीं हैं, क्योंकि आपने हम पर डाउट करके कोई गलती नहीं की हैं। आजकल के जमाने में काफी लोग पैसे ऐंठने या अपने दूसरे नाजायज उद्देश्यों को पूरा करने के लिए तरह-तरह के ट्रैप बिछाते रहते हैं, इसलिए थोड़ा एलर्ट रहना जरूरी हैं।" "बातों से आप काफी समझदार लगती हैं। क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ ?" "श्योर, हमारा नाम छाया हैं। हम ......।" आगन्तुक नवयुवती की बात पूरी होने से पहले ही दुबारा मेनडोर पर दस्तक सुनाई दी तो अजय उसकी बात से ध्यान हटाकर मेन गेट की ओर बढ़ गया। "सर जी, प्लीज गेट मत खोलिए।" आगन्तुक नवयुवती जिसका नाम उसके अनुसार छाया था, ने लपककर अजय के करीब आते हुए दबे स्वर में उससे अनुरोध किया तो अजय ने गेट की चिटकनी तक पहुँच चुका अपना हाथ वापस खींच लिया। "ये वही कमीना होगा जो हमें अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए हमारे पीछे पड़ा हैं।" अजय के सवालिया निगाहों से छाया की ओर देखने पर उसने पिछली बार जितने ही धीमे स्वर में अपने मन की आशंका जाहिर की। "ऐसी कोई बात हैं, तब भी मुझे गेट खोलना ही पड़ेगा, क्योंकि मैंने गेट नहीं खोला तो उसका ये शक यकीन में बदल जाएगा कि आप इसी घर के अंदर हैं और फिर वो काफी देर हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा। आप ऐसा कीजिए, अंदर के किसी कमरे में जाकर छुप जाइए, मैं उसे डाँट-डपटकर भगाता हूँ।" अजय के धीमें स्वर में छाया को समझाने के बावजूद वह अंदर जाने की बजाय अपनी जगह पर खड़ी-खड़ी दुविधा व आशंका मिश्रित निगाहों से अजय को देखती रही तो अजय ने उसकी मनोदशा को भाँपकर उसे आश्वाशन देते हुए दुबारा समझाया- "देखिए, आपको डरने या परेशान होने की कोई जरूरत नहीं हैं। ये जो कोई भी हैं, मैं इसे किसी भी कंडीशन में अंदर नहीं आने दूँगा। अब आप जल्दी से अंदर जाकर छुप जाइए, नहीं तो उसे डाउट हो जाएगा। अजय के उसे दूसरी बार समझाने पर वह तुरंत अंदर चली गई, जिसके बाद अजय ने गेट खोल दिया। "डॉक्टर साब, थोड़ी देर पहले एक लड़की आपके घर आयी क्या ?" सामने खड़े खूंखार व कुरूप चेहरेवाले युवक ने अजय के बगल से उसके घर के अंदर झाँकते हुए उससे सवाल किया। वह युवक था तो अजय की ही उम्र का, पर अजय के व्यक्तित्व और उसके व्यक्तित्व में जमीन-आसमान का अंतर था। "नहीं।" अजय ने बिना सोच-विचार किए जवाब दिया। "आप झूठ बोल रहे हैं, क्योंकि वो पवन की किराना दुकान के पासवाली टर्निंग के बाद से अपुन की नजरों से ओझल हुई और उसके बाद इस गली में जो चार मकान हैं, उनमें से तीन में वो नहीं हैं, इसलिए जरूर वो आपके घर ही आयी होगी।" "ये तुम्हारी गलतफहमी हैं। मेरे घर न कोई लड़की आयी और न कोई लड़का। अब तुम जाओ यहाँ से और दुबारा मेरे घर का दरवाजा खटखटाकर मेरी नींद में खलल मत डालना, नहीं तो मुझे पुलिस को बुलाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।" "डॉक्टर साब, ये पुलिस की धमकी किसी और को देना, अपुन पुलिस से डरनेवालों में से ......।" अजय ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही दरवाजा बंद कर दिया और घर का छोटा-सा बरामदा पार करके हॉल में आ गया। "बाहर आ जाओ, मैंने उसे खिसका दिया हैं।" अजय को हॉल में छाया नजर नहीं आयी तो उसने अपने बेडरूम की ओर देखकर कहा। शायद उसने छाया के उसके बेडरूम में छुपे होने का अनुमान किचन और स्टोररूम का दरवाजे बाहर से बन्द होने और सिर्फ बेडरूम का दरवाजा अंदर से बन्द होने के आधार पर लगाया था। कुछ पलों के बाद छाया अजय का अनुमान सही साबित करती हुई बेडरूम का गेट खोलकर बाहर निकल गई। "पानी पिएगी आप ?" छाया के बाहर आने के बाद अजय ने उससे पूछा, जिसका छाया ने अपने सिर को नीचे की तरफ हल्का-सा झटका देकर 'हाँ' में जवाब दिया। "कौन हैं वो और आपके पीछे क्यों पड़ा हैं ?" अजय ने छाया को सोफे पर बिठाकर ठंडा पानी पिलाने के बाद उससे सवाल किया। "उसका नाम तो रजत हैं, पर लोग उसे रज्जू दादा कहते हैं। उसका मकान किसी दूसरी कॉलोनी में हैं, पर वो लगभग एक साल से हमारी कॉलोनी में किराए पर एक घर लेकर उसमें बिना लायसेंस का शराब का ठेका चला रहा हैं, इसलिए लगभग एक साल से डेली दिनभर हमारी कॉलोनी में रहता हैं। बदकिस्मती से पन्द्रह-बीस दिनों पहले उस कमीने की गन्दी नजरें हम पर पड़ गई, जिसके बाद वो हमें अपनी हवस का शिकार बनाने की फिराक में लगा हुआ हैं। उसने आज से पहले दो बार और हमारे शराबी पिता को घर छोड़ने के बहाने हमारे घर में आकर हमारी इज्जत पर हाथ डालने की कोशिश की, लेकिन एक बार हमने शोर मचाकर कॉलोनी के लोगों को जमा करके और दूसरी बार उसका सिर फोड़कर उसकी कोशिश नाकाम कर दी। वो आज भी नशे में धुत्त हो चुके हमारे पिता को छोड़ने के बहाने हमारे घर आया और उसने हमारे पिता को बिस्तर पर सुलाने के बाद हमें अपनी हवस का शिकार बनाने की कोशिश की, लेकिन हम आज भी उससे जैसे-तैसे बचकर बाहर निकले और कॉलोनीवालों को मदद के लिए पुकारा, पर आज हमारी मदद के लिए कोई घर से बाहर नहीं निकला तो हमें भागकर इस कॉलोनी में आना पड़ा और आपके घर का द्वार खटखटाना पड़ा।" छाया ने बिना रुके एक बार में ही अजय को अपनी सारी व्यथा सुना दी। "आज आपकी कॉलोनीवाले आपकी मदद के लिए घर से बाहर क्यों नहीं निकले ?" "पहली बार रज्जू के हमारे साथ जबर्दस्ती करने की कोशिश करने पर हमारी कॉलोनी के जितने लोग हमारी चीखने-चिल्लाने पर हमारी मदद के लिए आए थे, उन्हें बाद रज्जू ने डरा-धमकाकर उसके मामले में टाँग न अड़ाने की चेतावनी दे दी, इसलिए रज्जू के दूसरी बार हमारे साथ यही हरकत करने की कोशिश करने पर कोई घर से बाहर निकला और आज कोई घर से बाहर निकला।" "और आपके पिता आपकी कोई मदद क्यों नहीं करते हैं ?" "वे तो डेली रात में नशे में धुत्त होने के कारण हिल-डुल तक नहीं पाते तो वे क्या मेरी मदद करेंगे।" "अरे, मैं रज्जू के आपके साथ जोर-जबर्दस्ती करने के दौरान आपके पिता के आपकी मदद न करने की वजह नहीं पूछ रहा हूँ, बल्कि मैं ये पूछ रहा हूँ कि इन घटनाओं के बाद जब होश में आने पर उन्हें इनकी जानकारी होती हैं तो वे रज्जू को डाँट-डपटकर या उसकी पुलिस स्टेशन में शिकायत करके उससे आपका पीछा छुड़ाने की कोशिश क्यों नहीं करते ?" "वे रज्जू को डाँट-डपट करेंगे या उसकी पुलिस स्टेशन में शिकायत करने में हमारी हेल्प करेंगे तो रज्जू अगले दिन से उन्हें मुफ्त में शराब पिलाना बन्द कर देगा, इसलिए हमारे बाबूजी ये बात मालूम होने पर रज्जू पीठ पीछे उसे गाली-गलौज करके उसकी हरकत पर अपनी नाराजगी जाहिर करने की फॉर्मलिटी पूरी कर देते हैं और अपने काम से लग जाते हैं।" "छाया, आप ये बात मुझे नहीं बताती तो मैं शायद ही कभी जान पाता था कि कोई पिता ऐसा भी हो सकता हैं जो मुफ्त की शराब के लिए किसी को अपनी बेटी के साथ कुछ भी करने की मौन स्वीकृति दे सकता हैं। बाइ द वे, आपकी माँ या आपके भाई-बहन .....?" "हमारी माँ जब हम करीब पाँच साल के थे, तभी हमें छोड़कर ईश्वर के पास चली गई और हमारे कोई भाई-बहन तो शुरू से नहीं हैं।" "सो सैड ! आप एक काम कीजिए, कल पुलिस स्टेशन जाकर उस कमीने रज्जू की कम्प्लेंट कर दीजिए। पुलिस के डंडे पड़ेंगे और रेप के अटैम्प के क्राइम में कुछ दिनों तक जेल की चक्की पिसेगा तो साले की अक्ल ठिकाने आ जाएगी और फिर वो खुद-ब-खुद आपका पीछा छोड़ देगा।" "हम दो-तीन बार पुलिस स्टेशन भी जाकर देख चुके हैं, पर कोई फायदा नहीं हुआ। पुलिस रज्जू को एक-दो घंटे पुलिस स्टेशन में बिठाकर रखने के बाद उससे मोटी रकम वसूल करके उसे छोड़ देती हैं और हम जाकर इसकी वजह पूछते हैं तो पुलिस हमें अपने पक्ष का गवाह लाने के लिए कहकर खिसका देती हैं।" "और गवाह आपको मिलते नहीं होंगे ?" "हमारे बाबूजी ही हमारे पक्ष में गवाही देने के लिए तैयार नहीं होते हैं तो दूसरे लोग किसलिए हमारे फेवर में गवाही देकर बेवजह रज्जू से दुश्मनी मोल लेना चाहेंगे ?" "डोन्ट वरी, इस बार मैं आपके फेवर में गवाही दूँगा।" "पर आपने तो उसे हमारे साथ जोर-जबर्दस्ती की कोशिश करते तो नहीं देखा हैं, फिर आप .....?" "जोर-जबर्दस्ती की कोशिश करते नहीं देखा, पर मैंने उसे आपका पीछा करते हुए मेरे घर तक आते तो देखा हैं और उस कमीने को सबक सिखाने के लिए मेरी इसी बात की गवाही काफी होगी, क्योंकि किसी महिला को अपने साथ हुई जोर-जबर्दस्ती या छेड़-छाड़ की घटना की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए किसी आई-विटनेस की जरूरत नहीं होती हैं। अब आप आराम से मेरे बेडरूम में जाकर सो जाइए। हम लोग बाकी की बातें सुबह करेंगे।" "हम आपके बेडरूम में सो जाएँगे तो आप कहाँ सोएँगे ?" "यहीं हॉल में सोफे पर।" "अरे, आप हमारे लिए क्यों तकलीफ उठा रहे हैं ? आप अंदर जाकर सो जाइए, हम यहाँ सोफे पर सो जाते हैं।" "देखिए, आप यहाँ सोएगी तो गेट पर हल्की-सी खटपट होने पर डर जाएगी और रातभर न खुद सोएगी और न मुझे सोने देगी, इसलिए जिद छोड़िए और बेडरूम में जाकर सो जाइए।" अजय की इस बात पर कोई प्रतिक्रिया न देकर छाया ने उसे सिर्फ मदद के लिए धन्यवाद दिया और चुपचाप अजय के घर के बेडरूम में चली गई, जिसके बाद अजय बाहर सोफे पर सो गया। ....................... अगले दिन अजय अपने साथ छाया को पुलिस स्टेशन लेकर गया और पुलिस स्टेशन के इंचार्ज से छाया के साथ हुई घटनाओं की रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया, लेकिन उसने रिपोर्ट दर्ज न करके अजय को इन घटनाओं के कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्षी या कोई ठोस सबूत लाने की बात कहकर खिसकाने की कोशिश की। मगर अजय को खिसकाना इतना आसान नहीं था। उसने तुरंत पुलिस अधीक्षक को कॉल करके थाना इंचार्ज की यौन-उत्पीड़न जैसे गम्भीर अपराध के मामले को दबाने की कोशिश के बारे में बताया, जिसके बाद पुलिस अधीक्षक ने थाना इंचार्ज को कॉल करके जमकर लताड़ लगाई और इसका परिणाम ये हुआ कि थाना इंचार्ज को तत्काल छाया की शिकायत दर्ज करके रज्जू को गिरफ्तार करना पड़ा, जिसके बाद रज्जू की गुंडागर्दी और अवैध शराब की दुकान की वजह से नाराज छाया की कॉलोनीवाले भी रज्जू के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर दी और रज्जू को तीन बार छाया के घर में घुसकर उसके साथ बलात्कार करने का प्रयास करने के साथ-साथ अवैध रूप से शराब बेचने और कुछ लोगों के साथ मारपीट करने के मामले में जेल भेज दिया गया और कोर्ट ने भी उसके क्रिमिनल रिकॉर्ड को देखते हुए उसे बेल देने से इनकार कर दिया। पर इससे छाया को सिर्फ रज्जू नाम के अभिशाप से मुक्ति मिली, उसके पिता नाम के प्राणी से नहीं, जो आमतौर पर अन्य लोगों के लिए कुदरत का दिया हुआ वरदान होता हैं, पर छाया के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं था। उसने रज्जू के जेल जाने के बाद अपने शराब के व्यसन की पूर्ति के लिए रज्जू के जैसे ही ब्रजेश नाम के एक दूसरे लफंगे से दोस्ती कर ली और उसके साथ छाया की शादी करके उसे अपना दामाद बनाने का वादा करके उसके पैसे से डेली शराब पीना शुरू कर दिया। हालाँकि ब्रजेश नाम के उस दूसरे युवक ने रज्जू की तरह कभी छाया के सामने उसे अपनी हवस का शिकार बनाने का इरादा जाहिर नहीं किया, पर उसने छाया को ये अहसास जरूर दिला दिया था कि वह उसके पिता पर जो पैसे लूटा रहा हैं, उसकी एवज में छाया को उसकी जीवनसंगिनी बनना पड़ेगा। अपनी खराब पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर इस काम के पारिश्रमिक से ग्रेजुएशन कम्प्लीट कर चुकी सुंदर और सुशील छाया के लिए बृजेश जैसे आवारा, नाममात्र के पढें-लिखें और तरह-तरह के दुर्व्यसनों के आदी युवक को अपने जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करना आसान नही था, इसलिए वह इस नई मुसीबत से पीछा छुड़ाने के लिए मदद के उद्देश्य से एक दिन अपने उसी मददगार के पास पहुँची, जिसने थोड़े दिन पहले उसकी रज्जू नाम की मुसीबत से पीछा छुड़ाने में मदद की थीं। "छाया, तुम्हारी समस्याओं की जड़ तुम्हारे बाबूजी हैं और उनसे पीछा छुड़ाने के दो ही उपाय हैं। या तो तुम कोई ढंग का लड़का देखकर शादी कर लो या फिर इस कस्बे को छोड़कर कहीं दूर चली जाओ।" अजय ने छाया की नई समस्या सुनने के बाद उसे उससे निजात पाने के दो विकल्प बताएँ। "हमारा इस पूरी दुनिया ऐसा कोई नहीं हैं, जो हमें किसी दूसरी जगह शिफ्ट होने में मेरी मदद कर सकें और इस वहशी दरिंदों से भरी दुनिया में एक युवा लड़की के लिए किसी भरोसेमंद सहारे के बिना अपने लिए आशियाना और रोजगार खोजने निकलने का क्या नतीजा निकलने की पॉसिबिलिटी हैं, ये न आपसे छिपा नहीं हैं और न हमसे, इसलिए इस विकल्प को अमल में लाने से तो हमारे लिए सुसाइड कर लेना बेहतर हैं, क्योंकि क्या पता, हम किसी अनजान जगह पर जाकर ऐसे लोगों के चंगुल में फँस जाएँ, जो हमें मरने का भी मौका न दे और हमें मौत से बदतर जिंदगी जीने के लिए मजबूर होना पड़े। रही बात कोई ढंग का लड़का देखकर जल्दी से जल्दी शादी करने की, तो हमारे लिए ये काम भी आसान नहीं हैं, क्योंकि हमारे सम्पर्क में फिलहाल कोई ऐसा लड़का नहीं हैं और इत्तेफाक से कुछ दिनों में हमारे सम्पर्क में कोई ऐसा लड़का आ भी गया तो इस बात की कोई गारंटी नहीं हैं कि वो हम जैसी बेसहारा लड़की जिससे शादी करने पर दहेज में एक शराबी बाप के अलावा कुछ भी मिलने की पॉसिबिलिटी नहीं हैं, से शादी करने के लिए तैयार हो जाएगा, इसलिए इस विकल्प के बारे में भी सोचने का कोई सेंस नहीं हैं।" अपने दिए गए सुझावों पर छाया की नकारात्मक प्रतिक्रिया सुनकर अजय सोच में पड़ गया। "छाया, मैं तुम्हें कैसा लगता हूँ ? आई मीन, यदि मैं तुम्हें अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहूँ तो क्या तुम इसके लिए तैयार हो सकती हो ?" कुछ देर तक सोच-विचार करने के बाद अजय ने छाया के सामने एक प्रश्नमिश्रित प्रस्ताव रखा तो छाया सोच में पड़ गई। "तुम्हें मेरा प्रस्ताव नहीं जँच रहा हो तो तुम बेझिझक इनकार कर सकती हो।" छाया को सोच के सागर में गोते लगाते देख अजय तुरंत उसे इससे बाहर निकलने के लिए एक विकल्प दे दिया। "ऐसी कोई बात नहीं हैं। हम तो इस वजह से सोच में पड़ गए थे कि आप हमसे ऊँची जाति के हैं, इसलिए आप हमें जीवनसंगिनी बनाएँगे तो आपकी जाति के लोग आपका सामाजिक बहिष्कार कर देंगे और हम नहीं चाहते हैं कि आप हमें परेशानियों से छुटकारा दिलाने के चक्कर में खुद किसी बड़ी परेशानी में फँस जाएँ, इसलिए हम आपके इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकते।" "छाया, मेरे एकॉर्डिंग मेरे प्रपोजल को रिजेक्ट करने का ये राइट रिजन नहीं हैं और तुम्हारी बातों से मुझे ऐसा भी नहीं लगा कि तुम मुझे अपना जीवनसाथी बनाने लायक नहीं समझती हो, इसलिए अब मैं सिर्फ तुमसे ये जानना चाहता हूँ कि तुम मेरे प्रपोजल पर डायरेक्ट अपनी कन्सेन्ट दोगी या मैं तुम्हारे इनकार करने के तरीके को तुम्हारी इनडायरेक्टली कन्सेन्ट मान लूँ ?" "देखिए, आप हमारी बात समझने की कोशिश कीजिए। ये डिसिजन आपको बहुत भारी पड़ेगा।" लेकिन अजय पर न छाया की इस चेतावनी का कोई असर हुआ और न उसके इस निर्णय का उसके परिवार व समाज के विरोध का। उसने ये निर्णय लेने के तीन दिन बाद ही छाया के साथ अपने दो खास दोस्तों की उपस्थिति में एक मंदिर में शादी कर ली और छाया को अपने घर लाकर उसके साथ गृहस्थ जीवन जीना शुरू कर दिया। लेकिन, कुछ दिनों बाद ही उसे छाया की चेतावनी को नजरअंदाज करने के दुष्परिणाम नजर आने लगे। ..................... 'पूरी लगन व निष्ठा के साथ किए जानेवाली मेहनत कभी न कभी जरूर रंग लाती हैं।' इस आमधारणा को ब्रह्मवाक्य समझकर अजय पिछले पंद्रह-सोलह वर्षों से सिर्फ जीवन जीने के लिए जरूरी आधारभूत साधनों का उपयोग करते हुए पूरी लगन व निष्ठा के साथ अपने व अपने परिवार के सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा था, लेकिन उसके जाति-पाति के बंधन को तोड़कर छाया को अपनी जीवनसंगिनी बनाने के उसके इस एक निर्णय ने उसकी बरसों की मेहनत पर पानी फेर दिया और अब उसे उसका अपने व अपने परिवार के सपनों को पूरा करने का ख्वाब दिवास्वप्न लग रहा था। उसका जन्म हाथीपुर नाम छोटे-से गाँव के एक ऐसे कृषक परिवार में हुआ था, जो अपने गाँव के कुछ सम्पन्न परिवारों में गिना जाता था, पर पूरे गाँव के लोगों की कुल सम्पत्ति ही किसी शहर के दोयम दर्जे के एक या दो अमीर व्यक्ति की सम्पत्ति के बराबर भी नहीं रही होगी, इसलिए उस गाँव के सम्पन्न परिवारों की हैसियत भी शहरों व आर्थिक रूप सम्पन्न गाँवों के धनाढ्यों के सामने कुछ नहीं थीं, पर कुँए के मेंढक के कुँए को ही पूरी दुनिया व खुद को कुँए का राजा समझ लेने जैसी सहज मानवीय प्रवृत्ति की वजह से अजय का परिवार व उसके जैसे सम्पन्न मानेवाले गाँव के चंद अन्य परिवार आत्ममुग्धता के भँवर में फँसकर जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए अपने पुश्तैनी व्यवसाय के साथ-साथ कुछ और करने या परिवार के एक-दो सदस्यों को बाहर नौकरी या व्यवसाय करने भेजने की जरूरत नहीं समझते थे, जबकि बीसवीं सदी के अस्सी व नब्बे के दशक में बहनेवाली परिवर्तन की बयार महसूस होते ही गाँव के गरीब माने जानेवाले परिवारों में से कुछ ने अपने युवा बच्चों को नौकरी और व्यवसाय करने बाहर भेज दिए और कुछ ने गाँव में ही अपने परम्परागत व्यवसाय को हाशिए पर रखकर नए व्यवसाय शुरू कर दिए जिसकी वजह से इक्कीसवीं सदी के आगमन तक अजय का परिवार व हाथीपुर के अन्य सम्पन्न माने जानेवाले परिवार दोयम दर्जे के परिवार बनकर रह गए। और इसका परिणाम ये हुआ कि गाँव में अपनी हैसियत घटने का अंदाजा होने के बाद अजय का परिवार व अन्य सम्पन्न माने जानेवाले परिवार ईर्ष्या, कुंठा व निराशा का शिकार हो गए। साथ हीं इन परिवारों के सदस्यों के शारीरिक श्रम करने या गाँव में उपलब्ध छोटे-मोटे व्यवसाय को अपनाना अपनी शान के खिलाफ समझने की अपरिपक्व सोच और अपनी झूठी शानो-शौकत दिखाने की प्रवृत्ति की वजह से उन्हें अपनी चल-अचल सम्पत्तियाँ गाँव के नवोदित अमीरों को बेचने या उनके पास गिरवी रखने के लिए बाध्य होना पड़ा। जिसके बाद ये परिवार अपनी खोई हुई हैसियत व सम्पत्तियाँ वापस पाने के लिए अपने बच्चों पर बड़े होकर मोटी आय अर्जित करने का कोई जरिया हासिल करने के लिए जरूरत से ज्यादा दबाव डालने लगें। अजय के अलावा सुनील भी इन परिवारों के बच्चों में शामिल था। अजय और सुनील पहली कक्षा से बारहवीं कक्षा तक एक-दूसरे के सहपाठी रहें और बचपन में एक-दूसरे के अच्छे दोस्त भी थे, पर आठवी कक्षा की परीक्षा में अजय के अपने जिले में टॉप पर आ जाने और सुनील जिले के टॉप टेन विद्यार्थियों में भी शामिल न हो पाने की वजह से दोनों का आठवीं कक्षा का रिजल्ट आने के बाद से सुनील, अजय के प्रति अपने मन में ईर्ष्या की भावना रखने लगा और उसने अजय से दोस्ती भी तोड़ ली। अजय का अगली कक्षाओं में भी लगातार सुनील से काफी बेहतर रिजल्ट आने की वजह से सुनील की अजय के प्रति ईर्ष्या नफरत में बदलती चली गई। वह हर समय अजय को अपमानित होते देखने या उसके साथ कुछ बुरा होते देखने के लिए बेताब रहने लगा, लेकिन अपनी परिवार की आकांक्षाओं के बोझ के नीचे दबा अजय कभी ऐसा कोई काम नहीं करता था, जिसकी वजह से कोई उसे अपमानित करता या उसके साथ कोई अप्रिय घटना घटती। इस वजह से सुनील का सपना सालों तक पूरा नहीं हुआ। बारहवीं कक्षा में अध्ययनरत रहने के दौरान अजय ने बारहवीं के बाद एमबीबीएस करने के लिए पीएमटी के फॉर्म भर दिए। सुनील को जब इस बात की जानकारी हुई तो उसने भी अजय का अनुसरण करते हुए पीएमटी के फॉर्म भर दिए, लेकिन पीएमटी में भी अजय ने काफी अच्छी रैंक हासिल करके अपने स्टेट के एक नामी कॉलेज में एडमिशन ले लिया, जबकि सुनील को बड़ी मुश्किल से स्टूडेंट्स की अंतिम च्वाइस माने जानेवाले कॉलेज में एडमिशन मिल पाया। ये भी सुनील को अजय से मिलनेवाली एक शिकस्त ही लगीं और अजय के लिए उसके मन का द्वेषभाव और ज्यादा बढ़ गया। पर अजय के लिए राहत की बात ये थी कि उसे जिस कॉलेज में एमबीबीएस करने का चांस मिला था, उस कॉलेज में सुनील को एडमिशन न मिल पाने की वजह से अजय को अगले कुछ सालों तक उसकी बुरी नजरों का सामना नहीं करना था। करीब तीन साल पहले उसे जब एमबीबीएस की डिग्री मिली तो उसे लगा कि अब थोड़े ही दिनों बाद उसके व उसके परिवार के ख्वाब पूरे होनेवाले हैं और जब उसने अपने गाँव के पासवाले कस्बे पारसगढ़ आकर प्रेक्टिश शुरू की तो उसे अपना ये ख्वाब हकीकत में बदलता नजर आया। सुनील ने भी अजय का अनुसरण करते हुए एमबीबीएस की डिग्री मिलते ही पारसगढ़ में आकर अपना क्लिनिक खोल लिया। पारसगढ़ में इन दोनों के आने के पहले कुछ झोलाछाप डॉक्टरों के अलावा कोई भी एमबीबीएस या इससे बड़ी डिग्रीधारी डॉक्टर नहीं थे और कोई सरकारी अस्पताल भी नहीं था, इसलिए इन दोनों के पारसगढ़ में क्लिनिक खोलते ही पारसगढ़ और उसके आसपास के लगभग बीस-बाइस गाँवों के ज्यादातर मरीज उपचार कराने के लिए झोलाछाप कहे जानेवाले डॉक्टरों को छोड़कर इन दोनों के क्लिनिकों का रुख करने लगें। शुरुआत के आठ-दस सप्ताह तक दोनों के पास लगभग बराबर तादाद में मरीज आते रहे, लेकिन इसके बाद अजय के रोगियों के प्रति सेवाभाव, गरीबों का कम फीस या निःशुल्क इलाज करने के रवैये और सुनील के चिड़चिड़े व्यवहार व प्रॉपर फीस लिए बिना किसी का भी उपचार न करने के कारण अजय के क्लिनिक में आनेवाले रोगियों की भीड़ बढ़ने लगी, जबकि सुनील के क्लिनिक में आनेवाले रोगियों की संख्या दिन-ब-दिन घटने लगी। इस वजह से अजय के प्रति सुनील के मन में सालों से पल रहा नफरत का पौधा विषवृक्ष में तब्दील हो गया और सुनील की अजय को बर्बाद करने की तड़प सारी हदें पार करने लगी, लेकिन उसका नसीब उसे काफी लंबे समय अजय को बर्बाद करने के अपने ख्वाब को पूरा करने के मौके की जादुई छड़ी की जगह इंतजार का झुनझुना ही थमाता रहा। मगर, दोनों के पारसगढ़ में क्लिनिक खोलने के लगभग तीन साल बाद जब अजय ने छाया के साथ शादी की तो अजय को अपना ये ख्वाब पूरा करने का सुनहरा अवसर नजर आया और इसके कुछ दिनों बाद सुनील के लिए पारसगढ़ व उसके आसपास के इलाके के अपनी जाति के मुखिया की बेटी नमिता का रिश्ता आया तो उसकी तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहा। उसने पहले नमिता के साथ शादी करके अपनी सामाजिक स्थिति मजबूत की और फिर उसने अजय के अपनी जाति से छोटी माने जानेवाली जाति की लड़की छाया के साथ शादी करने की वजह से उसकी पारसगढ़ व उसके आसपास के गाँवों में खराब हो चुकी छवि को अपना हथियार बनाकर अजय को शिकस्त देने की योजना का क्रियान्वयन शुरू कर दिया। दरअसल अजय और सुनील एक ही जाति के सदस्य थे और उनकी जाति के लोग सामाजिक ऊँच-नीच में हद ज्यादा विश्वास रखनेवाले थे। साथ ही अब उनकी जाति के मुखिया सुनील का ससुर बन चुका था। इसलिए सुनील को इन सब चीजों का अनुचित लाभ उठाकर का उसकी जाति के लोगों के साथ अजय का हुक्का-पानी कर देना अर्थात अजय का सामाजिक बहिष्कार करा देना बिना किसी नुकसान के अपना काम सिद्ध करने का आसान फॉर्मूला लगा और उसने थोड़े दिन में अपने इस फॉर्मूले को अमली जामा भी पहन दिया, जिसका परिणाम ये हुआ कि अजय की जाति के लोगों के लिए उसके कोई भी सम्बंध न रखने के फरमान के दायरे में उससे इलाज कराना भी शामिल होने की वजह से अजय की जाति के लोगों के उससे इलाज कराने पर भी पाबंदी लग गई। इसके अलावा अजय ने पारसगढ़ और उसके आसपास के इलाके में अपनी जाति के लोगों के छाया की जाति के लोगों को अधिशासित करने की स्थिति में होने का भी अनुचित लाभ उठाया और अपनी जाति के लोगों से छाया की जाति के लोगों पर दबाव डालकर उसकी जाति के लोगों के भी अजय से इलाज करवाने पर पाबंदी लगवा दी। पारसगढ़ और उसके आसपास के इलाके की कुल जनसंख्या में से लगभग तीस प्रतिशत लोग अजय की जाति के थे और करीब चालीस प्रतिशत लोग छाया की जाति के थे। इस तरह उस इलाके के लगभग सत्तर प्रतिशत लोगों के लिए अजय से उपचार कराने पर पाबंदी लगा देने के तुगलकी फरमान जारी हो जाने से अजय के क्लिनिक में इक्का-दुक्का मरीज और सुनील के क्लिनिक में मरीजों की भीड़ नजर आने लगी थी। इस बदले हुए हालात से यदि सबसे ज्यादा कोई खुश था तो वह था, सुनील और सबसे ज्यादा कोई दुखी था तो वह थी, छाया। "कहा था न हमने कि आपको हमसे शादी करने का डिसिजन बहुत भारी पड़ेगा, लेकिन आपने हमारी बात को हवा में उड़ा दिया और हमें परेशानी से बाहर निकालने के चक्कर में खुद एक बड़ी परेशानी में फँस गए। अब न आप अपने परिवार की गिरवी पड़ी जमीनें छुड़ा पाएँगे और अपने परिवार के सदस्यों के चेहरों पर खुशियाँ वापस ला पाएँगे।" एक दिन शाम को उदास और गुमसुम बैठे अजय के पास आकर छाया ने उससे कहा तो वह और ज्यादा गहरी सोच में डूब गया। "हम लोग एक काम करते हैं, ये कस्बा छोड़कर किसी ऐसे शहर में रहने चले जाते हैं, जहाँ लोगों का किसी प्रोफेशन में कामयाब या नाकामयाब होना सिर्फ उनकी प्रोफेशनल कैपेबिलिटी पर डिपेंड करता हो, न कि उनकी निजी जिंदगी जीने के तौर-तरीकों या उनके निजी फैसलों पर। हमें पूरी उम्मीद हैं कि ऐसी किसी जगह पर आप नए सिरे से अपनी प्रेक्टिश स्टार्ट करेंगे तो दुबारा बहुत जल्दी अपनी फेमिली की हेल्प करने की स्थिति में आ जाएँगे।" थोड़ी देर तक खामोश रहने के बाद छाया ने अजय को सुझाव दिया। "लगता हैं, यही करना पड़ेगा, क्योंकि हम दोनों की जाति के ठेकेदार अपने तुगलकी फरमान वापस लेंगे नहीं और लोग इन फरमानों की अनदेखी करके मुझसे ट्रीटमेंट कराना स्टार्ट करेंगे नहीं, इसलिए हमारे पास इस जगह को छोड़कर जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं हैं।" अजय ने बिना सोच-विचार किए छाया के सुझाव को स्वीकार कर लिया। "सही कहा आपने, पर हम लोग जाएँगे कहाँ ?" छाया ने कुछ चिंता जाहिर करते हुए पूछा। "दिल्ली।" "क्या दिल्ली जैसे बड़े शहर में आपकी आसानी से प्रेक्टिस जम जाएगी।" "नहीं जमेगी, पर वहाँ पर अपनी निजी प्रेक्टिस स्टार्ट करने के इरादे से नहीं जा रहा हूँ, बल्कि एक बड़े हॉस्पिटल में एज द डॉक्टर जॉब करने के लिए जा रहा हूँ।" "आपका डिसिजन बिल्कुल सही हैं, पर क्या हम जान सकते हैं कि आपने जॉब करने के लिए दिल्ली को ही क्यूँ चुना ?" "वहाँ के एक फेमस हॉस्पिटल में मेरा एक दोस्त जॉब करता हैं, इसलिए वो मुझे अपने या किसी दूसरे बड़े हॉस्पिटल में अट्रैक्टिव सैलरी पर मुझे आसानी से जॉब दिला देगा।" "चलिए, फिर अपने इस डिसिजन को फाइनलाइज कीजिए और दिल्ली चलने की तैयारी कीजिए।" "दिल्ली जाने की तैयारी मुझे नहीं, तुम्हें करनी हैं।" "हाँ, पर यहाँ क्लिनिक खाली करने और वहाँ रहने का अरेंजमेंट्स तो आपको ही करना पड़ेगा न ?" "मेरा काम मैं कर लूँगा, पर घर का सारा सामान अकेले तुम्हें ही पैक करना पड़ेगा।" "क्या हम दिल्ली अपना सारा सामान लेकर जाएँगे ?" "नहीं, सिर्फ डेली नीड्स के जरूरी सामान लेकर ही जाएँगे, पर बाकी का सामान भी पैक करना पड़ेगा, क्योंकि हमें अननेसेसरी सामान गाँव भेजकर ये मकान खाली करना हैं, ताकि हमें बेमतलब इसका रेंट पे न करना पड़े।" "समझ गई। अब यदि आपका डिनर करने का मन हो तो उठिए और फ्रेश होकर हमारे साथ डिनर कर लीजिए, अदरवाइज हम अभी के अभी अननेसेसरी समान की पैकिंग स्टार्ट कर देंगे और फिर उसे पूरा करके ही स्टॉप लेंगे, इसलिए ....।" "ओके, तुम डिनर लगाओ, मैं फ्रेश होकर आता हूँ।" कहकर अजय उठकर बाथरूम में चला गया। ........................ "डॉक्टर साहब-डॉक्टर साहब।" रात के लगभग ग्यारह बजे घर के मेनगेट को खटखटाने की आवाज के साथ चार-पाँच लोगों की घबराई हुई आवाज सुनकर पैकिंग के काम में लगी छाया एकाएक चौंक उठी। "कौन हैं ?" छाया ने मेनगेट की ओर बढ़ते हुए सवाल किया। "बेटी, दरवाजा खोलों। हम लोग डॉक्टर साहब से मिलने आए हैं।" जवाब में एक शख्स का विनम्र स्वर में किया गया अनुरोध सुनकर छाया ने आगे बढ़कर मेनगेट खोल दिया। लेकिन जब छाया को अपने घर के सामने एक साथ बीस-बाईस लोग नजर आए तो उसे बिना पर्याप्त पूछताछ किए घर का द्वार खोल देना अपनी एक बड़ी भूल लगी और उसने इसे सुधारने के उद्देश्य से फुर्ती द्वार बन्द करने की कोशिश की। "बहन, कृपया दरवाजा बंद मत कीजिए, क्योंकि हम लोग आप लोगों को नुकसान पहुँचाने नहीं, बल्कि अपने परिजनों को बचाने के लिए डॉक्टर साहब से मदद मांगने आये हैं।" एक नौजवान ने फुर्ती से दरवाजे के दोनों पल्लो के बीच अपने पैर अड़ाकर छाया का द्वार बंद करने का प्रयास विफल करने के साथ ही विनम्रता के साथ उससे कहा तो छाया ने दुबारा दरवाजे के पल्ले खोल दिए। "हम पर विश्वास करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद बिटिया। ईश्वर आपको सदा सौभाग्यवती बनाए रखें। अब आप जल्दी से डॉक्टर साहब को बुला दीजिए।" एक बुजुर्ग शख्स ने कृतज्ञ निगाहों से छाया को देखते हुए उससे विनम्र स्वर में कहा। "आप लोग चिंता मत कीजिए। हम अभी डॉक्टर साहब को जगाकर आप लोगों की समस्या बता देते हैं, पर हमें बताइए तो कि ऐसा क्या हो गया जो एक साथ इतने सारे लोगों को इतनी रात को यहाँ आना पड़ा ?" "बिटिया, आज शाम को इस कस्बे के सबसे बड़े सेठ भवानीचंद की बेटी की शादी थी, जिसमें बारातियों, कस्बे और आसपास के गाँव के जितने भी लोगों ने खाना खाया, उनमें से ज्यादातर लोगों की तबियत बिगड़ गई हैं और वे लोग सेठ भवानीचन्द के घर के सामने मण्डप में पड़े बुरी तरह से तड़प रहे हैं। कस्बे के झोलाछाप डॉक्टर पुलिस के झमेले में पड़ जाने के डर से उनका इलाज करने से डर रहे हैं, डॉक्टर सुनील अपनी पत्नी का जन्मदिन मनाने में मगन होने की वजह से न घर का दरवाजा खोल रहे हैं, न किसी का फोन उठा रहे हैं और सेठ भवानीचन्द की बेटी की बारात आने के बाद शाम के चार बजे अचानक हुई तेज बारिश से नदी में बाढ़ आ जाने के कारण पास के शहर तक पहुँचने के एकमात्र रास्ते का पुल भी टूट गया हैं, इसलिए अब चार-पाँच सौ लोगों की जिंदगी को सिर्फ कोई बचा सकता हैं तो वो आपके पति हैं। बिटिया, आप उनसे जाकर कहो कि वे हम लोगों की भूल को क्षमा करके मुसीबत की इस घड़ी में हमारी मदद करे। हम बाद में बैठकर अपने आपसी गिले-शिकवे मिटा लेंगे।" "दादाजी, आप इस समय गिले-शिकवे की बात न करें, क्योंकि अभी हम सभी की प्राथमिकता बीमार लोगों की जान बचाना हैं। आप लोग यही रूकिए, मैं डॉक्टर साहब को जगाकर लाती हूँ।" कहकर छाया हड़बड़ाती हुई घर के अंदर गई और अजय को जगाकर वस्तुस्थिति से अवगत कराया, जिसके बाद दोनों अपने घर के सामने आए लोगों के साथ पहले अपने क्लिनिक गए और वहाँ से इलाज के लिए सारे जरूरी उपकरण और उपलब्ध दवाइयाँ लेकर सेठ भवानीचन्द के घर के सामने पहुँचे, लेकिन वहाँ मौजूद फूड पॉइजनिंग के शिकार हुए रोगियों की संख्या देखकर अजय को ये अहसास हो गया कि वो अकेला पूरी रात जागकर भी उपचार करेगा तो भी सभी का उपचार नहीं कर पाएगा, इसलिए उसने कुछ स्वस्थ लोगों को भेजकर कस्बे के सारे झोलाछाप माने जानेवाले डॉक्टरों को अपनी मदद के लिए बुलवा लिया और उन्हें किसी भी रोगी के साथ कुछ उल्टा-सीधा होने पर उसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने का आश्वासन देकर अपनी मदद के लिए तैयार कर लिया। इसके बाद आठ झोलाछाप डॉक्टरों की मदद से अजय ने रोगियों का इलाज शुरू किया। दवाइयाँ और इंजेक्शन खत्म हो जाने की समस्या को ध्यान में रखकर वह पहले ही कस्बे के सभी मेडिकल स्टोर खुलवाकर जरूरी दवाइयाँ और इंजेक्शन मंगवा चुका था। सेठ भवानीचन्द सभी रोगियों के इलाज का खर्च अकेले वहन करने की घोषणा पहले ही कर चुके थे, इसलिए इंजेक्शन और दवाइयों का बिल देने या रोगियों को दिए जानेवाले इंजेक्शन और दवाइयों का हिसाब याद रखने की उसे जरूरत नहीं थी। यदि उसके मन में कोई चिंता थी तो सिर्फ गम्भीर स्थिति में पहुँच चुके साठ-सत्तर रोगियों को बचाने की और बाकी के करीब चार सौ रोगियों का गम्भीर स्थिति में पहुँचने से बचाने की थीं, जिससे उसने अपने सहयोगियों की मदद से पूरी रात अथक परिश्रम करके निजात पा ली। छाया ने भी रातभर जागकर अजय की उसके काम में भरपूर मदद की। दूसरे दिन सेठ भवानीचन्द ने पारसगढ़ कस्बे और आसपास के बीस-बाईस गाँव के अजय और छाया की जाति के खास-खास लोगों की एक महापंचायत बुलाई, जिसमें सुनील व उसके ससुर की आपत्तियों को दरकिनार कर सर्वसम्मति से अजय के सामाजिक बहिष्कार के निर्णय को निरस्त कर दिया गया और अजय और छाया की जाति के लोगों को अजय से उपचार कराने के लिए स्वतंत्र कर दिया। साथ ही अजय और छाया को उनके साथ हुए अन्याय को भूलकर संकट की घड़ी में उदारता दिखाने व कई लोगों की जान बचाने के लिए सम्मानित भी किया गया। "क्या तुम अब भी कहोगी कि मैंने तुम्हारा हाथ थामने का डिसिजन लेकर भारी भूल की थीं ?" घर वापस लौटने पर अजय ने छाया से पूछा। "हाँ, क्योंकि आप मेरी जगह किसी डॉक्टर के साथ शादी करते तो आप जितनी मेहनत करते हैं, उससे आधी ही मेहनत करनी पड़ती।" छाया ने मासूमियत से जवाब दिया। "डोन्ट वरी, अब मुझे भी आधी ही मेहनत करनी पड़ेगी।" "क्यूँ , आप कोई असिस्टेंट रखनेवाले हैं ?" "हाँ।" "किसे ?" "तुम्हें।" "अरे बाबा, मुझे अपनी असिस्टेंट बनाने पर आपको क्या फायदा होगा ? मुझे तो ......।" "बहुत फायदा होगा, क्योंकि कल पूरी रात तुमने जिस चुस्ती-फुर्ती और सूझ-बूझ के साथ मेरी हेल्प की, उससे मैं जान गया कि तुम्हारे अंदर मेरी असिस्टेंट बनने की सारी क्वालिटीज मौजूद हैं और मुझे ये भी उम्मीद हैं कि तुम कोई शॉर्ट टर्म का नर्सिंग का कोर्स करके जल्दी से ऑफिशियली मेरी असिस्टेंट बन जाओगी। क्या तुम इसके लिए तैयार हो ?" "ऑफ कोर्स, इट्स माइ प्लीजर।" "थैंक्स।" कहकर अजय ने छाया को गले लगा लिया। (समाप्त)

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A modern take on the importance of truth in the current setting of societal scenarios. Voiceover Artist : RJ Atul Author : jayprakash pawar