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रिफ्यूजी कैंप - Part 12

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‘रिफ्यूजी कैंप’ भारत के लोगों की एक अद्भुत यात्रा है, जो अपनी तकलीफों के अंत के लिए चमत्कार की राह देखते हैं, पर यह नहीं समझ पाते कि वे खुद ही वो चमत्कार हैं। जब तक लोग खुद नहीं जगेंगे, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। मुझे पता है, उम्मीद की इस कहानी को लिखने की प्रेणा लेखक को उनकी बेटी से मिली है, जो यह जानना चाहती थी कि क्या वह अपने पुरखों की धरती कश्मीर की घाटी में लौट पाएगी? writer: आशीष कौल Voiceover Artist : ASHUTOSH Author : Ashish Kaul
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पानीपत जिसका नाम लेते ही इतिहास की वह तीन युद्ध याद आते हैं जिसने भारत का पूरा इतिहास बदल कर रख दिया । अभिमन्यु की बस भी हरियाणा स्थित उसी पानीपत के बस अड्डे पर आकर रुक गई । अभिमन्यु और अभय प्रताप बस से उतरे । हर बस अड्डे का नजारा जैसा होता है । पानीपत बस अड्डे का भी ऐसा ही था । कोई जा रहा था तो कोई आ रहा था । किसी को बस मिल गई थी तो किसी की छूट गई थी । कहीं बच्चे दौड रहे थे तो बस के पीछे फेरी वाले अपना सामान बेचने की छोड देते हैं । खान पान के स्टॉल थे । तेल से उबलती कढाइयों में से समूह से निकल रहे थे तो कहीं लस्सी के गिलास होता है । हर तरफ शोर था । सामने दिख रहे टेलीफोन बूथ की तरफ अभयप्रताप पढते हैं । मैं बलदेव को फोन कर लेता हूँ कहकर मजबूत के अंदर चलेगी । उन्होंने अंदर जाकर टेलीफोन डायरेक्ट्री से आर्यन कॉलेज का नंबर और फोन लगाकर बात करनी है । अभिमन्यु बूथ के बाहर खडा होकर इस नए शहर को निहार । उसके सामने से कुरुक्षेत्र की बस बस आगे चली गई और अभिमन्यु ने देखा की छह फीट लंबा सिख लडका अपने हाथ में चाकू लेकर एक लडके के पीछे दौडते दौडते बस अड्डे में घुस गया । अपनी जान बचाने के लिए तेजी से कूदता मानता दौड रहा था । हल्ले गुल्ले में भी ये दो नाम गूंज रहे थे जो पहले चढा था वो हर जो था और जो बाद में चढा वो सतपाल एक पल के लिए उसे पकड भी लिया था और सतपाल ने एक जोर का झटका देकर अपने आपको हरजोध से बचा लिया । अभिमन्यु उन्हें देख रहा था । अभिमन्यु ने अभय प्रताप को देखा हूँ । अभी प्रताप फोन में व्यस्त हैं । अपनी जान बचाता भागता सतपाल दो आदमियों से टकरा गया । वो आदमी गिर पडे । गिरने वाले लोग उस पर चिल्लाने ही वाले थे । किस सतपाल के पीछे पडे हरजोध को उन्होंने देख लिया जिसके हाथ में चाकू था । वो लोग कुछ बोले बगैर अपना गिरा हुआ सामान जल्दी जल्दी में बटोरकर वहाँ से भागने लगे । सतपाल वहाँ खडी एक बस में चढ गया । हाथ में चाकू लेकर दौडने वाले लडके को अगर अभयप्रताप ने देख लिया होता तो शायद वो उन लडकों के पीछे गाडी में जाकर क्या खून खराबा हो रहा है । वो देखने जरूर जाना हैं पर उन्होंने उसे देखा ही नहीं । अभिमन्यु ने वो धारदार चाकू ही देखा था और ये भी देखा था कि जिस लडके के हाथ में चाकू था अंदर से पांच छह लडकों ने उसे खेली है । अभिमन्यु समझ गया ये उससे एक लडके के लिए जाल था जो जान लेने के लिए भाग रहा है । अभिमन्यु देखना चाह रहा था कि क्या होगा पर अभी प्रताप ने बूथ से बाहर आकर चलने के लिए चलते चलते अभिमन्यु बार बार मुडकर देखा है कि आगे क्या हो हुआ कुछ भी नहीं और जो आपने अपनी पिस्टल निकाल ली तो उसकी जान लेने पर अमादा, लडकों के पसीने, छूट और कोई अपनी जान बचाने के लिए जहाँ से जैसे मिले बस से नहीं कर पाते हैं और जो आपने पिस्टल अपनी जेब में रख दी है और बस से ऐसे उतर आया जैसे कुछ हुआ ही नहीं । जैसे उसके लिए ये रोज मर्रा की बात अभिमन्यु ने जो देखा था वो अपने पापा को बताना चाह रहा हूँ । पर साइकल रिक्शा में बैठे बैठे अभय प्रताप ने ही बोलना शुरू किया । अभी अगर आरती हाँ होती तो वह सबसे पहली बात तो ये बताती है कि ये वो भूमि है जिसे कृष्ण भगवान ने उन पांच गांवों में शामिल किया था जो युद्ध डालने के लिए उसने दुर्योधन से पांडवों के लिए मांगे थे । रिक्शा चल पडा कृष्ण के लिए यह पावन भूमि रही होगी या नहीं यह तो मालूम नहीं पर अभिमन्यु ने बस से आते वक्त यहाँ के हरे भरे लहलहाते खेतों को देखकर एक अजीब सी खुशी का अनुभव किया था । जो सब्जी रंग उसके बाद ही में खटक रहा था वहीं रंग उसके मन में यहाँ पर उमंग पैदा कर रहा था । रिक्शा आर्यन कॉलेज के बडे सिर्फ प्रांगण में रुक गया । अभय प्रताप और अभिमन्यु मुख्य बिल्डिंग तक चलते चलते पहुंच गए । कुछ दिन सोमवार दूर से ही दिखाई दे रहा था की कक्षा में लेक्चर चल रही है । एक का दुख का छात्र आते जाते हो बाकी हर जगह पर शांति बडे से पोर्ट से गुजरकर अभय प्रताप और अभिमन्यु ने उस बिल्डिंग में कदम प्रिंसिपल ऑफिस दूसरी मंजिल पर है । ये बात अभय प्रताप ने वहां से गुजर रहे एक चपरासी से जाना है । वो सीढियों से चलकर प्रिंसिपल के कॅश कैबिनेट बाहर बोर्ड पर बलदेव भाटिया का नाम देखकर अभयप्रताप बडी तसल्ली चपरासी के जरिए अंदर चिट्ठी भेजकर अभय प्रताप ने प्रिंसिपल को अपने आने की कितना करते हैं । आपने प्रताप नहीं थी कि बलदीप तुरंत उन्हें बाहर आकर मिलेगा या अंदर बुला लेगा । पर ऐसा कुछ नहीं । बाहर रखे लकडी के बेंच पर अभय प्रताप और अभिमन्यु काफी देर बैठे रहेंगे । अभय प्रताप थोडा सा अपमानित महसूस करने लगे कि अंदर से बुलावा दोनों केबिन में गए । बलदेव भाटिया अपनी कुर्सी पर ही बैठे रहे ना उन्होंने उठकर अभयप्रताप का स्वागत किया । ना ही खुशी चल रही है प्लीज हवसी एक फॉर्मेलिटी के तहत भाटिया ने अभय प्रताप को बैठने के लिए कहा । पर अभिमानियों का मन नहीं हुआ कि वहाँ बैठे वो कुर्सी के पीछे चुपचाप खडा रहा । अब प्रताप को देखकर बलदेव भाटिया ने पूछा चाय पी हो गया ठंडा? भाटिया के उस सवाल से अचानक अभिमन्यु ने महसूस किया कि वो किसी तनाव से बाहर आ गया है । चाहे अभयप्रताप ने शांति से जवाब दिया । भाटिया ने अभिमन्यु से पूछा क्या पडते थे कश्मीर ऍम? अभिमन्यु ने एक विद्यार्थी की तरह जवाब दिया । भाटिया ने अभय प्रताप को देखकर कहा, अगर तुम जम्मू से निकलने से पहले ही मुझे फोन कर देते तो मैं तुम्हें वही रोक । साल के बीच में एडमिशन मुश्किल है । अभी प्रताप ने हैरानी से भाटिया को देखा और फिर अभिमन्यु अभिमन्यु निराशा से अपने पापा को देख रहा है । अब है प्रताप ने आंखों से ही उसके मन में आशा जगह करता हूँ । अभिमन्यु तुम जरा बाहर मेरा अभिमन्यु बाहर चला है पर उसी पूरा विश्वास था कि उसका एडमिशन यहीं पर है । कभी कभी ऐसा हो जाता है कि आपका मन आपको पहले से ही बता देता है कि अब आपके साथ क्या होने वाला है । बेफिक्र होकर अभिमन्यु बाहर की बेंच पर जा कर रहे हैं । लेक्चर खत्म इसका निर्देश जोर जोर से होते घंटानाद नहीं किया और जो नजारा अभिमन्यु ने देखा वो शायद कश्मीर की खूबसूरत वादियों से भी ज्यादा । मनभावन अपनी अपनी क्लास से निकलकर सारे छात्र बाहर आ गए और आर्यन कॉलेज के उस प्रांगण नहीं जैसी मेले का रूप ले लिया जहाँ किसी भी बात पर पाबंदी नहीं थी । मुस्कुराते चेहरे खिलखिलाती बातें और था । के लगती हसी ने अभिमन्यु के मन में चैतन्य पैदा कर दिया । वहाँ के छात्रों ने उनके मनपसंद कपडे पहने हुए थे । यहाँ पर कोई भी ड्रेस कोड लागू नहीं था । लडकियों ने अलग अलग फैशन की सलवार कमीज, लेडीज यहाँ तक कि दिल्ली वगैरह शहरों से आई लडकियों ने मिनीस्कर्ट भी पहने हुए थे और उस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं । वो खूबसूरत थी अभिमन्यु ने पानी में लडकियों को सिर्फ चोटियों में देखा था । यहाँ की लडकियों की अलग अलग हेयरस्टाइल्स ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया । क्या लडकियों के बाल उन्हें इतनी अलग अलग और सुंदर बना देते हैं? काफी देर तक अभिमन्यु हर आती जाती । लडकी के बालों की ही रचना तो देख रहा था । किसी ने किया था किसी के बाल कंधे तक तो किसी के लम्बे खुले बाल लडकों के दिलों में हलचल पैदा कर रहे हैं । कमाल तो तब हो रहा था जब उसके पास से आने जाने वाली कुछ कुछ लडकियाँ बेज्जत उसे देख कर एक स्माइल देकर आगे निकल रही है या फिर आती जाती बडी सहजता से लोग बोल कर गुजर जाती हूँ । अभिमन्यु था अभी ऍम हाँ इडली ही ऐसा होता था कि उसको सेकंड रुक ना मिला । गोरा चिट्टा कश्मीरी तेजी में पला बढा लडका यहाँ पर ॅ आउट करना । बिना जान पहचान किए लडकियों ने उसे शरारत भरी निगाहों से जब देखा तो अभिमन्यु को अपनी तल्खी से बाहर आने में कोई समय नहीं । उसके लिए ये दुनिया ही अलग है । वादी में लडके की तरफ से आंख उठाकर देखने में लडकी के छह महीने लग जाते थे पर यहाँ लडका लडकी की बात करना, दोस्ती करना उतनी सीरियस बात नहीं लग रही थी । कॉरिडोर से गुजरते लडके लडकियां बेस बिक्री से एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर घूम रहे थे । कहीं कहीं पेडों के पीछे दुनिया से बचते कपल्स भी नजर आ रहे थे पर उन में जरा भी झिझक नहीं थी । भले ही झिझक हो पर बेशर्मी भी नहीं कितनी अलग अलग तरह की फॅमिली सब शायद ही कोई ऐसी लडकी हो जिसने लिप्स्टिक ना लगाई हो या अपने नाखूनों में नील पेंट ना लगाई हूँ । लडके भी कम नहीं थे यहाँ का हर लडका अपने आपको मैंने प्यार किया का सलमान खान समझ रहा था या फिर कयामत से कयामत तक का । आमिर खान जो उन दिनों की सबसे हिट फिल्म थी वो भी हेयर स्टाइल में लडकियों से पीछे नहीं थे । पढाई के नाम पर हर किसी के हाथ में वसीक नोट होगी और शर्ट में लगा एक । शायद ये लडकों का फैशन टीचर्स को भी अपेक्षा नहीं थी कि वह स्कूल की तरह बक्से उठा कर आए । उल्टा अभिमन्यु ने महसूस किया कि शिक्षक भी बडे अंडरस्टैंडिंग वाले थे । जानते थे कि बच्चों की यही दिन है । मौज मस्ती करने के जानते थे कि बच्चों की यही दिन है । मौज मस्ती करने तो फालतू की रोक टोक नहीं । बिल्डिंग बिल्डिंग के एंट्रेंस की सीढियों पर कुछ लडके आती जाती लडकियों को देख कर सीटी बजा रहे हैं और लडकियां भी छोडे जाने पर एतराज नहीं देता है क्योंकि वह जानती थी ये तो बडा हेल्दी सपना उस कैंपस में वह सुरक्षित है । कुछ लडके अपनी नई नहीं बाइक का बॉक्स झाड रहे थे तो कोई अपनी सी एस कार्य सीढियों पर गप्पे मारते छात्र अपने टीचर से भी हंसी मजाक करते नजर आए । उधर प्रिंसिपल के कैबिन में मामला गंभीर था । साल के मध्य में आकर दाखिला देने के लिए भारतीय राजी नहीं था । पार्टियाँ जी इसे आप एक स्पेशल के समझे कश्मीर के हालात किसी से छिपे नहीं । अभी प्रताप ने अपनी बात रखते हुए कहा मैं कश्मीर के हालात समझ रहा हूँ और मैं नियमों को ताक पर रखकर कोई निर्णय नहीं ले सकता । आप समझे प्रताप जी आप अगर मेरी जगह होती है तो आप क्या करते हैं नियमों को तोडती नियम इंसान के लिए होते हैं । इंसान नियमों के लिए नहीं । मैं तुम्हारी जगह होता तो नए नियम बनाने की अपनी ताकत को पहचानता और नए नियम बना । बिना झिझक अभय प्रताप ने जवाब दिया, ये जाहिर था कि अभय प्रताप का वह जवाब बलदेव भाटिया को बेहद पूरा लगा । पर अभय प्रताप का वो इरादा ही नहीं आप के हाथ में अधिकार है । उसका इस्तेमाल कीजिए । बोल दी गई अपने आप को फिर नियंत्रित करके एक याचक की तरह अपने प्रताप ने का । अभी प्रताप की आवाज से बलदेव हो । उसने अपना अधिकार जताते हुए कहा, बातें करना बहुत आसान है । वह प्रताप जी और उस पर अमल करना उतना आसान नहीं है । वरना आज अब पानीपत नहीं कश्मीर हो । इस बात पर बुरी लगने की बारी है । अब मैं बताता हूँ जो उन्हें बुरी लगी, उनके मन में आया कि ये वहीं बलदेव हैं, जो मेरे वजूद के लिए सलाम ठोकता । दस साल पहले सिक्कों के खिलाफ लिखे एक आहत कर देने वाले आर्टिकल के चलते बलदेव की गिरफ्तारी हुई हैं । सिखों से डरकर कोई भी उनकी जमानत के लिए नहीं आया था । इत्तेफाक से उन दिनों यानी उन्नीस सौ में अभय प्रताप अमृतसर में थे । खालिस्तान की मांग जोर पकड रही थी । अमृतसर के हालात पर उन्हें आर्टिकल लिखना था तो रिसर्च के लिए वहाँ गए हुए हैं । उन्होंने उन सिखों और बलदेव भाटिया में सुलह कराकर बलदेव भाटिया की रिहाई करेगी । इतने सालों में ये बात अभय प्रताप बिल्कुल भूल गए थे । पर आज न जाने उन्हें ये बात याद कहाँ से आ गई । तब भी अभी प्रताप की शख्सियत का दबदबा उतना ही था जितना की परसों तक था । तब वक्त ने अभय प्रताप का दामन थामा था और आज बलदेव पार्टियाँ करने अवैध प्रताप ने फिर शांति से कहा, अभिमन्यु को एक छत्तीस सही माहौल की जरूरत है । इसका यहाँ एडमिशन बहुत जरूरी है । कुछ कीजिए पर बलदेव भाटिया को तो अब है प्रताप को और गिडगिडाते हुए देखता हूँ । अभिमन्यु की कागजात चेक करते हुए उसने कहा चलो एक पल के लिए मैं अपने अधिकार का इस्तेमाल करके उसे एडमिशन दे भी दो और किस आपने अपने बेटे की मार्च देखिए इतने कम मार्क्स में कैसे एडमिशन करा दूँगा । अभय प्रताप आंखों में नहीं चाहिए और तुरंत उसने जवाब वो बडा होशियार हैं । बस खेल कूद में थोडा ज्यादा ध्यान रहता है । वो फुटबॉल का एक बेहतरीन हैं । स्पोर्ट स्पोर्ट टीम एडमिशन करा लीजिए उनकी नहीं हूँ । अगर उसके मार्क्स भी अच्छे होते हैं तो मैं एक पल के लिए सोच मैं कुछ नहीं आप जा सकते । अभिमन्यु की फाइल बंद करके अभी प्रताप के हाथ में रखते बलदेव अभी प्रताप को क्या करना है, समझ में नहीं आया । बलदेव के इस बर्ताव नहीं उन्हें तोडकर रखती है । वो सोचने लगे कि बाहर बैठे अभिमन्यु को क्या करूँ? जम्मू जाकर आरती को क्या मोदी का वापस कश्मीर लौटने की कोई सूरत नहीं । कैंप के हालत भी हाथ खराब है । जेब में गिने चुने पैसे बाकी थी । हजारों ख्याल उस पल उनके मन में दौडते लाचारी । बेबसी ने उन्हें ऐसे घेर लिया कि कब बलदेव के पैरों में गिरकर गिडगिडाने लगे । उन्हें शायद खुद समझ नहीं आया । उन्होंने बलदेव की पैरों में गिरकर कहा मुझ पर इतना एहसान कर दो । बलदेव पढना मेरे बेटे का भविष्य बिगड जाएगा । पैरों में गिरे अभयप्रताप देखकर बलदेव भाटिया का अहंकार शांत हो गया । पर अकड अभी भी कायम बस बस मेरे सामने ये सब मत करो । अभी प्रताप को तकरीबन छोडते हुए बलदेव पार्टियाँ का अभी प्रताप वैसे ही अपने घुटनों पर बैठे रहे हैं और फिर एक बार उन्होंने बलदेव के सामने हाथ जोडे हैं और अपनी गर्दन चुका हूँ । बेबसी के कुछ पल गुजर गए और अभय प्रताप की कान में शब्द पडेंगे । मैं एडमिशन दे सकता हूँ पर साइंस नहीं । आठ । अभय प्रताप ने अपनी गर्दन नीचे रखकर ही जवाब और भी उठकर खडे हो । एडमिशन के लिए पैसे लाए हूँ या खाली हाथों उसमें मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता । बलदेव भाटिया ने फिर किसी को लाया हूँ । अपने सिर को उठाते । अभयप्रताप ऑफिस में जाकर सारी फॅमिली करते । बलदेव ने कहा उस कॅन्सर्ट चुकाकर मैं प्रताप नहीं । अभय प्रताप पहली बार लगा कि उन का सब कुछ छिन गया है । उन्होंने अपनी सारी ताकत होती है को इतने खामोश हो गए कि उनकी खामोशी जानलेवा सी थी । उन्हें देखते ही अभिमन्यु उठ खडा हुआ और पूछा एडमिशन हुआ अभी भी अभय प्रताप की नजरें नीचे ही थी । उनकी हिम्मत नहीं थी कि अभिमानियों से नजर मिला पाएंगे । कुछ पैसे निकालकर अभिमन्यु की हाथ में रखते हुए अभिमन्यु से नजरें चुराते हुए उन्होंने सिर्फ इतना कहा यहाँ से आगे तो उन्हें अपने आप को संभालना है । अब तुम बडे हो गए । बस अपना ख्याल रखना है । एडमिशन हो गया है । अभिमन्यु क्या कहेगा इसका इंतजार किए बिना वो वहाँ से चल पडेंगे । अभिमन्यु के लिए उसके पापा बिल्कुल अजनबी से लगे हैं । लगा कि ये वो इंसान नहीं है जिनको मैं कैबिन में छोड कर आया था । वो कुछ समझ पाता तब तक तो अभय प्रताप चलते चलते हैं । काफी दूर निकल गई । अभिमन्यु को पीछे छोड आगे आगे चल रहे मैं आपको बस यही सोच रहे थे कि मैं इतना गिरकर मेरे बेटे की नजरों में कुछ नहीं अभयप्रताप । पहली बार शायद अपनी वजूद पर शर्मिंदा । पीछे मुडकर देखने की उम्मीद नहीं । वो आगे चलते ही चले गए ।

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‘रिफ्यूजी कैंप’ भारत के लोगों की एक अद्भुत यात्रा है, जो अपनी तकलीफों के अंत के लिए चमत्कार की राह देखते हैं, पर यह नहीं समझ पाते कि वे खुद ही वो चमत्कार हैं। जब तक लोग खुद नहीं जगेंगे, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। मुझे पता है, उम्मीद की इस कहानी को लिखने की प्रेणा लेखक को उनकी बेटी से मिली है, जो यह जानना चाहती थी कि क्या वह अपने पुरखों की धरती कश्मीर की घाटी में लौट पाएगी? writer: आशीष कौल Voiceover Artist : ASHUTOSH Author : Ashish Kaul
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