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Part 47

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यह उपन्यास उन तमाम लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी-न-कभी किसी मोटे आदमी का मजाक उड़ाया है। न पढ़ा, न लिखा, न कुछ सीखा, वो अब खोटा हो गया। उसकी जीभ हर पल लपलपाई, वो बेचारा मोटा हो गया। writer: अभिषेक मनोहरचंदा Script Writer : Mohil Script Writer : Abhishek Manoharchanda
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भाग सैंतालिस ठाकुर ने कई दिनों तक जगत नारायण को बताने के लिए हर तरह की संभव कोशिश की । व्यायाम पर साथ जाते समय, घर पर साथ खाने के समय तो कभी अचानक महाकाल मंदिर में जाकर तो कभी फोन लगाकर कभी चिट्ठी लिखकर बताने की तो कभी गोपाल की मदद से और भी बहुत से प्रयासों में बाहर जगह नारायण तक पहुंचाने की कोशिश की पर अंत में बस और हर दफा विफल हो जाता है । उसकी जैसे तैसे पैदा हुई हिम्मत जगत नारायण के पास उस बात के पहुंचने की शुरुआत में ही मर जाती थी और दिन के आधे से ज्यादा समय में तो जगतनारायण और गायत्रीदेवी शादी की तैयारियों में ही लगे रहते हैं । इस कारण भी बसखोर को उनके साथ खाली समय ज्यादा मिल नहीं पा रहा था । लेकिन दूसरी तरफ ऋतु मैडम की नाराजगी इतनी बढ चुकी थी कि पूरे एक महीने तक उन्होंने बक और से बात नहीं की थी । बकौल के लाख समझाने के बाद मैडम का गुस्सा अपनी जगह पर स्थायी था लेकिन अपने अंदर ही उसे दबाकर भी रखा था । मैडम कब है गुस्सा उस दिन फूट पडा जब धुकुर की शादी में सिर्फ पंद्रह दिन बचे थे और घर में रवि मंगल अपने बेटे की शादी की पत्रिका देने आया था । उसकी छाती आज आम दिनों से ज्यादा पूरी हुई थी, लेकिन जगत नारायण ने भी उसका बहुत खुशी और सम्मान के साथ स्वागत किया और रवि मंगल से चौगुनी छाती आज जगत नारायण की फूली थी । उन्होंने भी फौरन अपने बेटे बकुल नारायण की शादी की । पत्रिका रवि मंगल के हाथ में थी । जैसे देखते ही रवि मंगल हैरान हो जाता है और बिना कुछ बोले वहाँ से निकल जाता है । गायत्रीदेवी और जगत नारायण भी बची हुई शादी की पत्रिकाएं दूसरे मेहमान और रिश्तेदारों की यहाँ बांटने के लिए घर से निकल जाते हैं । कितने में ऋतु मैडम कमरे से बाहर आकर गुस्से में घर के बर्तन फेंकना शुरू करती है और बखपुर पर जोरों से चिल्लाने लगती हैं । उस पर उन्हें धोखा देने का आरोप लगती हैं तो ऊपर चेता भरोसा कर सकती थी । कर लिया । जितना समय चाहिए था कि दिया अपनी अपनी होते हुए तुम्हारी दूसरी शादी होती नहीं देख सकती हूँ । अगर मुझे चाहते हो तो अपने पापा को सब बताकर मुझे मेरे पापा के घर से ले जाना । वरना तो मैं डर घोडी पर चढ होगी और उधर घर में मैं फंदा लगाकर फांसी पर बस इतना ध्यान रखना इधर तुम्हारा सेहरा सजेगा । उधर मेरी अर्थी इतना बोलते ही ऋतु मैडम तेज कदमों में घर से बाहर निकल कर चली जाती हैं, पर बस और जहाँ पर भी उन्हें नहीं रोक पाता है । एक बार फिर से अकेला मायूस ऍम बीमा सा हो गया था और अपने कमरे में लेटे लेटे बहुत को सोचने लगा मेरे गोपाल के पास चाहता था गोपाल को सब कुछ बताता हूँ । मोबाइल शांति से काम लेने को कहकर कुछ न कुछ रास्ता निकालने की उम्मीद देता है और कुछ समय तक सोचने के बाद है । बाकुल को एक बार सुझाता है और उसके अनुसार नमक और एक दिन अपने मामा जी से मिलने क्षिप्रा घट जाता है और उनके सामने मैं अपने मन की बात कह देता है । हूँ मामा जी मुझे आपसे कुछ जरूरी बात करनी थी मामाजी में शादी नहीं करना चाहता हूँ । ठाकुर की बात को पूरा होने के पहले ही मामा नाराज की में बोल पडते हैं बाकी और ऐसी बातें अगर तेरे सपने में भी आए तो तुझे सोना छोड देना चाहिए । तू जानता भी है कि ये जो दिन आया है कितने वर्षों तक इंतजार किया है तेरे बाप नहीं उस दिन का एक एक दिन, एक एक महीना, एक एक साल कैसे काटा है, उन्होंने हूँ जरा भी अंदाजा नहीं है तुझे इस बात का जिस बात के घर में एक अभी रही बेटा बैठा हो ना उसका आपका सिर अक्सर मोहल्ले में झुका हुआ निकलता है । शरीर में खून नहीं, चिंता दौडती है । बैठना सुकून नहीं पाप लगता है । कितना भटके है ये कितना खुद को परेशान किया है । कितनी लोगों की सुनी है सुबह दोपहर शाम रात कुछ नहीं देखा । हर समय सिर्फ एक एक हयाल की पाकुर की शादी करनी है । हाँ काल की पूछा रोज करते हैं लेकिन आशीर्वाद में सिर्फ बगैर की शादी मांगते लोगों से हरपाल मिलते जुलते लेकिन बाद बकर की शादी पर ले आते हैं । ऐसा कोई तरीका नहीं बचा होगा जबकि ढूंढने का जो तेरे बाप ने नहीं अपनाया हूँ । इसकी सिर्फ एक बच्चा थी । जिंदगी में तकलीफ फॉर परेशानियाँ अगर हो तो बस और एक साथ ही हो । क्योंकि बकौल इतना भोला और सीधा है कि दुनिया उस अकेले को खुशी खुशी नहीं जी नहीं देगी और तेरी शादी होगी । तभी तो पांडेय परिवार का वंश भी आगे बढेगा । लेकिन अगर तेरा ये रिश्ता कहना हुआ होता तो तेरे पिताजी ने तो अपनी जिंदगी के अंतिम समय को गिनना भी शुरू कर दिया था । रवि मंगल को दिए वचन को पूर्ण करने के लिए मैं मानसिक रूप से अपने प्राणों को त्यागने की तैयारियाँ कर चुके थे । तो मैं तो एहसान मानना चाहिए उस आने वाली लडकी का । और इतने संघर्ष के बाद सफलता प्राप्त करने वाले अपने पिता को पूछना चाहिए तुम बडे हो गये वकुल किसी भी कारण से ऐसी बात करना तो मैं शोभा नहीं देता । विद्वान लोग कहते हैं बिगडी बात बनने नहीं, लाख करोड ॅ नहीं मानने फाटे दूध को मथेना माखन हो । सिद्धार्थ मनुष्य को सोच समझकर व्यवहार करना चाहिए क्योंकि किसी कारण वर्षीय दी बात बिगड जाती है तो फिर उसे बनाना कठिन हो जाता है । जैसे यदि एक बार दूध फट गया तो लाख कोशिश करने पर भी उसे मत कर मक्का नहीं निकाला जा सकेगा । इतना बोलते ही मामा जी अपना झोला उठाते हैं और नाराजगी भरे स्वर में ही वहाँ से चले जाते हैं । हैं ।

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यह उपन्यास उन तमाम लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी-न-कभी किसी मोटे आदमी का मजाक उड़ाया है। न पढ़ा, न लिखा, न कुछ सीखा, वो अब खोटा हो गया। उसकी जीभ हर पल लपलपाई, वो बेचारा मोटा हो गया। writer: अभिषेक मनोहरचंदा Script Writer : Mohil Script Writer : Abhishek Manoharchanda
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