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Part 45

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लक्ष्य की ओर चलने वाले को बीच में विश्राम कहा? सिर्फ चलते जाना है चलते जाना है कहीं भी शिथिलता या आलस्य नहीं ज़रूर सुने, शिखर तक चलो बहुत ही प्रेरणादायक कहनी है। writer: डॉ. कुसुम लूनिया Voiceover Artist : mohil Author : Dr. Kusun Loonia
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पूरे देश में ऑपरेशन जयहिंद की चर्चा थी । बडे बुजर्ग उधान में त्राता कालीन शहर के दौरान भी इसी विषय पर बातचीत करते हैं । स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, चिकित्सालय, हम ऑफिस तक में लंच के समय यही चर्चित विषय था । गृहणियाँ भी बडी उत्सुकता से टेलीविजन पर खबरें देखती कि सुरक्षाबलों को कहाँ तक सफालता कम मिल रही है । दैनिक समाचारपत्र बुलेटिन पत्र पत्रिका सब ऑपरेशन छह हिंद की भरपूर जानकारी मुहैया करा रहे थे । सचित्र पूरे के पूरे प्रस्तावों पर विषय सामग्री परोस रहे थे । कुल मिलाकर देशभक्ति की लहर चली हुई थी । युवा वर्ग अपने गैजट के साथ देशभक्ति की भावना बाहर रहा था । इसी विषय से जुडे संदेशों का मोबाइलों पर आदान प्रदान होता । फेसबुक ॅ सोशल साइट से ऑपरेशन जाए के समर्थकों की संख्या बढती जा रही थी । सच कहा जाए तो पूरी दुनिया की नजर अभी भारत पर ही लगी थी । पतन के मेटर इस ऑपरेशन की सफलता की दुआएं कर रहे थे । वास्तव में देखा जाए तो चाहूँ और नक्सली हिंसा के विरुद्ध वातावरण निर्मित हो गया था । सेवाके पुत्री आर्या ने भी ऑपरेशन जय हिंद के बारे में सुना । बेहद चिंतित हो गई । इन विषम परिस्थितियों में नक्सली क्षेत्र में किसी के साथ कुछ भी हो सकता था । वह शीघ्र अतिशीघ्र अपने पिता के बचाव के बारे में चिंतन करने लगी । बेहद हो रहा धीर गंभीर बहादुर एवं दूरदर्शी साक्षी आर्या की स्कूली जीवन की अभिन्न सहेली थी । एसपीजी कमांडो ट्रेनिंग में वे अपने बैच में प्रथम स्थान पर रही थी । अभी राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु एक गोपनीय पद पर अपनी सेवाएं दे रही थी । आर्य ने साक्षी से वस्तु स्थिति पर चर्चा करते हुए सशक्ति योजना बनाने में सहायता चाहिए । काफी सोच विचार के पश्चात साक्षी बोली कि हम इतना आसान नहीं है । हमें दो तरफ से मौत का खतरा है । एक ओर तो नक्सली घात लगाए बैठे हैं, दूसरी ओर सुरक्षा बल एवं सेना से भी बचना आएँ । चारों तरफ भयंकर खतरा मंडरा रहा है । परिस्थितियां भी बडी विकट हैं । गंतव्य की दूरी स्पष्ट नहीं है और चहु ओर जोखिम बहुत है । आता हमें अपनी टीम को थोडा विस्तार देना होगा । कम से कम हमें तीन मददगार और चाहिए जिसमें पुरुष सहयोगी आवश्य हूँ । साक्षी का सुझाव आ गया को बहुत पसंद आया किन्तु आएगा कौन । उनके साथ इतने खतरनाक मिशन में जान जोखिम में कौन डालेगा? अरे सोचा कि अपने भाई आरे को ले लो । तत्काल दिमाग ने कहा कि इतने छोटे तो कहाँ नहीं जाएगी । उससे मेरे खयाल आया की सेवा भारती के अब्दुल्ला साहब से बात करनी चाहिए । दूसरा विचार आया की है तो स्वयं घट है । अन्य कोई सामने दिख नहीं रहा है । सबसे बडी बात यह है कि इस अभियान है तो प्रशिक्षित भी नहीं । हताहत अन्य विकल्प पर ही विचार करना होगा । आरपीएफ की प्रशिक्षण की बात मस्तिष्क में आते ही उसके समक्ष नंदिता बसु का चेहरा घूम गया । बेहद तेज तर्रार लडकी ट्रेनिंग में उसके मित्र बनी थी । कुछ समय पूर्व की शादी भी हो गई थी । कोलकाता गए प्रतिष्ठित बंगाली परिवार के इकलौते पुत्र शांतनु घोष से प्रेम विवाह किया था । विवाह कोलकाता में ही हुआ था किन्तु वे अभी दिल्ली ही रह रहे थे क्योंकि दोनों के कार्यक्षेत्र दिल्ली ऑफिस नहीं थे । शांतनु सुरक्षा सेवाओं में इन सब से भी उच्च पद पर आसीन था । आर यानी सोचा कि अगर ये दंपति उसका साथ देने को तैयार हो गया तो काफी मजबूत टीम बन जाएगी । पूर्व निर्धारित समयानुसार साया सात बजे आ रहे हैं । उनके घर पहुंची । इतने दिनों बाद अपनी प्यारी सहेली को देखकर लंजता की पांच खेल गई । दरवाजे पर ही उसने आॅटो गले लगा लिया । फिर भीतर आई तो आप ने देखा कि नंदिता ने उसके स्वागत की कितनी शानदार तैयारी करना की है, जो चॉकलेट के एक बंगाल के प्रसिद्ध गोलगप्पे, कोलकाता की मसाला बूढी हरियाणा की पसंद का पूरा नाश्ता मौजूद था । शांतनु भी समय से घर आ गया था क्योंकि नंदिता ने उस से पहले ही सारी बातें बता दी थी । तीनों ने हसते खिलखिलाते मस्ती से नाश्ता किया । अब नंदिता एवं शांतनु आर्या को अपने अध्ययन कक्ष में ले गए । आर्या के चेहरे पर मस्ती की जगह गंभीरता चाह रही थी । पूर्व वातावरण एकदम शांत था, जैसे तूफान के आने से पहले आती । नीरवता भंग करते हुए धीरे से नंदिता ने पूछा ऍम सब ठीक तो है ना? फॅसने मिश्रित सहानुभूति से सवाल पूछा था । आर्या के रुलाई फूट पडी । अब तक का रखा सब्र का बांध टूट गया । उसने बताया, मैं अपने पापा से बहुत प्यार करती हूँ । उन्हें नक्सलियों ने कैच कर लिया था । खोजते खोजते अभी कुछ दिनों पहले ही उनकी जिंदा होने के समाचार मिले हैं । बटाहर हाल में अपने पिताजी को वापस लानी चाहती हूँ । नंदिता जो चुपचाप सुन रही थी, उसकी आंखों में भी आंसू आ गए । शांतनु उसके करीब जिसका और अपने रूमाल से नंदिता के आंसू पोछे हारया सकपका गई? क्या नंदिता उसके पिताजी को जानती थी जो उनके लिए कम तीन हो रही थी? सच्चाई क्या है? उसने धीरे से पूछा नंदिता क्या उसको नंदिता ने भी लगाते हुए बताया मलकानगिरी जिले के जिलाधिकारी के रूप में कार्य थे मेरे पापा । पिछले वर्ष नक्सलियों ने उनका अपहरण कर लिया था और सरकार से आपने चौदह खूंखार साथियों को छुडाने के एवज में उनकी रिहाई की शर्त रखी थी । मेरे पापा के साथ एक जूनियर इंजीनियर का भी अपहरण किया गया था । उस से तो मैं दूसरे दिन रात को गांव के वहाँ पीपल के पेड के नीचे बेहोश हालत में छोड गए । लेकिन मेरे पापा की तो बहुत भयंकर हालत की थी । ऍम गया था । ऊपर लिखा था फॅमिली सरकारी ऍम नंदिता ईजी से सुबह नहीं लगी, शांतनु से सहलाता रहा । नंदिता ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, एक फॅमिली था क्या ऐसी भी बच्चे मौत के अधिकारी थे । आर्य आनंदिता के पिता की कहानी सुनकर सिहर उठी । मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रही थी ऍम तेरे पापा की रक्षा करना कुछ देर तो होती रही । किसी ने किसी को टोका नहीं । समय हार घाव की मरहम होती है । इतनी देर तक के अविरल अल्लू प्रभाव है । दिल का दर्द आंखों के राष्ट्रीय नमकीन पानी बनकर निकाल गया । धीरे धीरे दोनों सथियों का मन को छलका । हुआ आर्या मैं भी नक्सलियों से भयंकर नफरत करती हूँ । यहाँ तुम्हारी लडाई एक बेटी की अपने पिता को लौटा लाने की लडाई में मैं तुम्हारे साथ हूं । नंदिता ने संजीदगी से कहा शांत उन्होंने स्थिति को संभालते हुए आर्या से आगे के कार्यक्रम के बारे में जानना चाहा । आर्य ने कहा, आज तो बहुत विलंब हो गया है । अब मुझे जाना ही होगा । कल इस बार है । अवकाश का दिन था । कल ही एक मीटिंग रख लेंगे । रिवॉल्विंग रेस्टोरेंट की सबसे ऊंची इमारत पर लंच के समय आर्या, साक्षी, नंदिता, इवन, शांतनु पहुंच चुके थे । इंडियन नेवी का कमांडर विशाल कुछ मिनटों में पहुंचने वाला था । विशाल और शांतनु चचेरे भाई थे । वैसे मेरे भाई का मित्र ज्यादा थे । हाँ, खूबसूरत बात होने । विशाल के आते ही रौनक आ गई । हाँ, सीट हार को के साथ सब ने प्रारंभिक भोजन का आनंद लिया । अब माहौल ऑफिशियल हो गया था । रेस्टोरेंट के कोने की टेबल पर एकांत में बैठाया । ग्रुप धीरे धीरे मंत्रणा कर रहा था । आर्यन एक ओर कागज सामने खोलकर रख दिए थे । विशाल नाकाम में कुछ सिलेक्ट करता जा रहा था । गहरे विचार विमर्श से पूरी रूपरेखा बना लेंगे । आज से ठीक चार दिन बाद पांचवे दिन प्रातः उन्होंने कोच करना था । बेहद समर्पित एवं पुणे तैयार । प्रशिक्षित ये आवाज मित्रमंडली यहाँ शिवा को जीवित यहाँ पाएगी । हाँ ।

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लक्ष्य की ओर चलने वाले को बीच में विश्राम कहा? सिर्फ चलते जाना है चलते जाना है कहीं भी शिथिलता या आलस्य नहीं ज़रूर सुने, शिखर तक चलो बहुत ही प्रेरणादायक कहनी है। writer: डॉ. कुसुम लूनिया Voiceover Artist : mohil Author : Dr. Kusun Loonia
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