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Part 44

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लक्ष्य की ओर चलने वाले को बीच में विश्राम कहा? सिर्फ चलते जाना है चलते जाना है कहीं भी शिथिलता या आलस्य नहीं ज़रूर सुने, शिखर तक चलो बहुत ही प्रेरणादायक कहनी है। writer: डॉ. कुसुम लूनिया Voiceover Artist : mohil Author : Dr. Kusun Loonia
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आज तो टेलीविजन के लगभग हर चैनल पर उत्तर प्रदेश के जवानों के उनके परिवारों के साक्षात्कार आ रहे थे । जिन जांबाजों कि ऑपरेशन टेरर हंट में शहादत हो गई थी, उनके भाई उनके बेटे कह रहे थे । हमें अपने रिश्तेदारों पर गर्व है । हम भी तैयार हैं । देश चाहे तो आज ही हमारी सेवाएं ले सकता है । कैप्टन राजीव बहुत होगी जो हमले से बुरी तरह घायल तो मगर जिंदा बचने वालों में से था । बोला जो होना था हो गया । मैं तो अभी ठीक होते ही फिर जाऊंगा । एक एक दुश्मन को चिंचन्कर मारूंगा । बिहार के कॅप्टन मिश्रा लालगढ की मुठभेड में शहीद हो गए थे । पटना के एयरपोर्ट पर भयंकर गेट थी । उनका पार्थिव शरीर पहुंचने ही राष्ट्र के वास्तविक नायक की तरह सम्मान एवं संवेदनाओं का क्रम चला । नजदीकी रिश्तेदारों की आंखें आंसुओं से भरी थी, दिल में डाला था । लेकिन सबकी जवान पर एक ही आवाज थी भारत माता की जय हो । केंद्र सरकार का कडा रुख देखकर माओवाद के हिमायती क्षेत्रीय नेताओं ने नक्सलवादियों पर से अपने हाथ पीछे खींच लिए थे । वैश्विक दवाब से विदेशी आकाओं से मदद पहुंचने भी बंद हो गई थी । अकारण हिंसा के हजारों के सामने आने से बुद्धि जीवी हिमायतियों की भी जवान बंद हो गई । इस प्रकार अपने आप को असुरक्षित पाकर नक्सली पूरी तरह बौखला गए थे । वर्चस्व की लडाई को लेकर दो नक्सली संगठन आपस में ही टकरा गए । एक पार्टी के कार्यकर्ता के घर धावा बोलकर दो ले समेत सात लोगों की हत्या कर दी गई । दूसरे ग्रुप ने उनके एक वाहन को विस्फोट करके उडा दिया । उसमें बैठे सभी पांच लोगों की मृत्यु हो गई । नक्सली उग्रता दिखाते हुए हैं । गांव के नेहरिया नागरिकों को पुणा शिकार बनाने लगे । भाई सेवा आतंक से गांव वालों का पलायन रुकवाकर उन्हें अपनी ढाल के रूप में उपयोग करने लगे । सब उनके मन में ये भावना घर कर रही थी कि मानवाधिकार आयोग एवं संयुक्त राष्ट्र संघ की लताड के डर से प्रशासन कोई भी कदम उठाने से पहले पहुँचेगा । लेकिन मानवाधिकार आयोग एवं संयुक्त राष्ट्र संघ से से गृह मंत्रालय ने पहले ही अनापत्ति प्रमाणपत्र ले लिया था । बता, अब प्रशासन को ऊपर से कोई डर नहीं था । सब पूर्व निर्णय था । चिंतनीय बिन्दु सिर्फ इतना ही था कि नागरिकों को कैसे सुरक्षित शीघ्र अतिशीघ्र निकालना चाहिए । सुरक्षा बल, चहुमुखी व्यू, रचनाकर दवाब बढाते गए जनसाधारण को सुरक्षा मुहैया करवाई गई । पूरी तरह की काट एवं चौकसी के मध्य नागरिक निकाल दिए गए । एक भी नक्सली सुरक्षा जांच से धोखाधडी नहीं कर पाया । अच्छा तीसगढ उडीसा, झारखंड वा पश्चिम बंगाल नक्सलियों के सघन काटते । यही पर इस संगठन ने राज्य कमेटियों के कार्यालय बना रखे थे । उनके अधिकतर कमेटी के सदस्य तथा कमांडर इन्ही राज्यों में रहते थे । उन का केंद्रीय कार्यालय कहाँ था किसी को पता नहीं । उन्होंने अपने हेड क्वार्टर को अत्यंत गोपनीय रखा था । विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र को नक्सलियों ने ललकारा था । जब तक सहन हो सकता था हिंदुस्तान की जनता ने सहा । अब पूरा देश जाग उठा था । एक छुट्टी था अच्छा अब नक्सलियों की खैर नहीं थी । उनके सामने दो ही विकल्प थे या तो विचारधारा बदलकर देश की मुख्यधारा से जुड जाओ अथवा प्राण त्यागने को तैयार हूँ । एक तरफ आत्मसमर्पण का विकल्प था, दूसरी तरफ साक्षात्कार था । सुरक्षाबलों के सहयोग है तो युद्धभूमि में रणचंडी खपर नहीं खडी थी । उन्हें देश प्रेमी नहीं सिर्फ देशद्रोहियों का ही चाहिए था । इस बार लडाई आरपार की थी । नक्सलवादियों और सुरक्षाबलों का आमना सामना था । उच्च कोटि के आठ बाल के साथ सुरक्षाबलों का हर नौजवान तैयार था । किंतु इतना आता था कि भारत माता की ये सपूत निरीहता से अब कहीं और नहीं मारे जाएंगे । कटाह इनके वहाँ सहयोग के लिए बंगाल की खाडी में भारतीय नौ सेना की टुकडियों ने पोजीशन ले ली । वायुसेना के विमान वा हेलीकॉप्टर ऑपरेशन चाहिए हिंदी में महत्वपूर्ण सहयोग को तैयार थे । थलसेना सुरक्षाबलों को स्पेशल ट्रेनिंग दे रही थी । आपातकालीन स्थितियों में सेना सीधा सहयोग देने के लिए भी तैयार थी । सेना कि सात विशेष कंपनियाँ सातों नक्सल प्रभावित राज्यों की सीमा पर तैनात हो गई ।

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लक्ष्य की ओर चलने वाले को बीच में विश्राम कहा? सिर्फ चलते जाना है चलते जाना है कहीं भी शिथिलता या आलस्य नहीं ज़रूर सुने, शिखर तक चलो बहुत ही प्रेरणादायक कहनी है। writer: डॉ. कुसुम लूनिया Voiceover Artist : mohil Author : Dr. Kusun Loonia
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