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यह उपन्यास उन तमाम लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी-न-कभी किसी मोटे आदमी का मजाक उड़ाया है। न पढ़ा, न लिखा, न कुछ सीखा, वो अब खोटा हो गया। उसकी जीभ हर पल लपलपाई, वो बेचारा मोटा हो गया। writer: अभिषेक मनोहरचंदा Script Writer : Mohil Script Writer : Abhishek Manoharchanda
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भाग फॅस पूरे घर में एक चुप्पी छा जाती है । सब आपस में एक दूसरे से बात तक नहीं करते हैं हूँ । बकौल भी चिंटू के बारे में सोचता रहता है कि एकदम से अचानक ही सब क्या हो गया और चिंटू ने इस बारे में बाकुल को भी कुछ नहीं बताया । ऍम सारी बातों के बारे में सोचते सोचते पूरा दिन खत्म हो जाता है लेकिन फिर भी सोचना जारी रहता है । तो अगली सुबह फिर वही व्यायाम करने के बाद बकौल और जगह नारायण लौटते हैं । बकौल रोज की तरह वही गर्म पानी में शहद मिलाकर पीता है और उसे याद आता है कि कल पूरे दिन मैडम का ना फोन आया । मैं रात में कोई मिस कॉल शिविर से आने के बाद ये पहली बार हुआ था जब किसी दिन मैडम ने फोन किया हो । थोडा चिंतित हो रहा था । उसने दो तीन बार फोन करने की कोशिश की लेकिन मैडम ने नहीं उठाया । ऍसे पहुंचकर मैडम के कॉलेज से छोडने वाले समय भी फोन किया लेकिन फिर भी कोई जवाब नहीं आया । दिमाग ने सवालों का झुंड घूमने लगा था । थरूर सोन को चेक करते रहना चालू है या नहीं, बैटरी चार्ज है नहीं फोन हराया नहीं ऐसे कठिनाई भरे चार पांच दिन जैसी ऐसे पीते हैं । लेकिन तब तक भी मैडम का फोन नहीं आता है ना बाप कुर्की फोन लगाने पर जवाब आता है । एक शाम को घर के दरवाजे पर पहुंचते ही ठाकुर के अंदर एक सकारात्मक लहर आती है । उसे आ जाता है कि मैं ऍम कॉलेज की टीचर भी तो हैं । चिंटू से पूछना चाहिए मैडम कॉलेज जहाँ नहीं है नहीं । सौरभ घर में आते ही तक और चिंटू चिंटू के नाम की आवाज लगाने रहता हूँ । जब गायत्रीदेवी से उसकी आंखें मिलती हैं तब याद आता है कि चीन तो घर से जा चुका हूँ । रात भर नींद जरूर नहीं आई । लेकिन दिमाग में चिंटू से कॉलेज जाकर मिलने का विचार जरूर आया जहां चिंटू के साथ साथ मैडम के भी मिल जाने का मन में विश्वास आया हूँ । बकौल सुबह बारा की बजाय नौ बजे ही कर से निकल जाता है । कॉलेज में चिंटू को जाकर जो नहीं देखता लेकिन वे रिसेप्शन पर जब तो मैडम के बारे में पूछता है । वहां बैठ आदमी बताता है । उनकी शादी हो चुकी है और उन्होंने कॉलेज छोड दिया है । इतना बोलते ही आदमी फाइल उठाकर ऑफिस की तरफ चला जाता है । इतना सुनते ही बाहर का मन बखपुर के शरीर से ज्यादा भारी हो जाता है । आंखों के ऊपर लगी आंसुओं की थैली ये सब सेंटर लगभग हो चुकी थी । लेकिन बस और जैसे तैसे खुद को संभाल के कॉलेज के बाहर तक आता है । अपनी साइकिल लेकर चलाने लगता है । उसे अचानक सबको चंदेरा अंधेरा सा लगने लगता है हैं । लडखडाते हुए गिरते बढते शिप्रा नदी के घाट पर आकर बैठता है और फिर अचानक से उसकी आंखों ऍम करते हुए हैं । एक बार एक एक नया आंसू बहने लगते हैं कि दूर से देखने पर यह रहे के बाल के लिए ऐसा भी लगता है कि यह नदी में भरा पानी बादलों के बरसने का नहीं बल्कि बगैर के टूटने का परिणाम है । कुछ देर बाद ठाकुर का फोन बचता है, रह देखता है तो फोन तो मैडम का है, थोडी परेशान और थोडी घबराई हुई थी । बडी जल्दी जल्दी में बात कर रही थी उनकी एक बात से बक और के दिमाग की सारी नसें एक और झटके में खींच नहीं ऍम से शादी करना चाहती हूँ । क्या तुम मुझसे शादी करोगी? ऋतु मैडम ने कहा हूँ लेकिन मेरे पास बहुत कम समय अगर तुम उससे शादी करना चाहते हो तो बीस मिनट में महाकाल मंदिर पर आज हूँ, वरना उसके बाद मैं तुम्हें कभी भी नहीं मिल होंगे । पकर की पूरी बात सुनने से पहले ही मैडम इतना बोलते ही सिसकियां भरते हुए फोन काट देती हैं । बकौल खुद ही को कुछ जवाब नहीं दे पा रहा था । कुछ समझ नहीं पा रहा था कि ये सब क्या हो रहा है । बकौल लाल शर्ट और लाल पेन पहने बिखरे बालों में जिस भी हाल में था, उसी हाल में फौरन साइकिल उठाकर निकल गया । जल्दी से मैडम के पास पहुंचने वाले विचार नहीं इतनी ताकत भर दी थी शरीर में शहर की गाडियों से ज्यादा रफ्तार ब कुर्की साइकिल की थी । आज तभी रास्ते में अचानक धीरे धीरे भीड ज्यादा होने लगी । एक जुलूस निकल रहा था मैं खुद को याद आया की आज तो श्रावण का पहला सोमवार है इसलिए महाकाल मंदिर के आसपास बहुत भीड होगी भी । बीस मिनट में मैं कैसे पहुंचेगा ऍम के पास नकुर अपनी साइकिल को वहीं रास्ते में छोडकर दौडते भागते टकराते लडखडाते रास्ता बनाते हुए मंदिर पहुंच जाता है । लेकिन हर तरफ नजर घुमाने के बाद भी ऋतु मैडम कहीं दिखाई नहीं दे रही थी । घडी में भी बीस की जगह पच्चीस मिनट हो चुकी थी । मन कटर धीरे धीरे तेजी के साथ बढ रहा था और जल्दी न पहुंच पाने का खुद पर गुस्सा आ रहा था । तभी जय महाकाल जहाँ का हाल के नारों के बीच एक आवाज आई हूँ कुछ तक और यह ऋतु मैडम की आवाज थी । फॅमिली रही थी वापस लेकिन तो लाल कपडों में दूर से भी सबसे अलग ही दिख चाहते हो । मैं बात कर के पास आकर बोली । बचपन से लेकर आज तक बखपुर के साथ में चल रहा ये लाल चोला पहली बाहर बखपुर के इतने जरूरी समय में काम आया था इसलिए आज बकुल मन में लाल मंदिर वाले बाबा और दादी दोनों को थैंक्यू बोला था । मैडम के चेहरे पर खुशी लेकिन आंखों में आंसू थे और पाकुर की आंखों में खुशी और आंसू दोनों हैं । बाकुल के पूछने पर कि कॉलेज में पता चला कि आपकी शादी हो चुकी है तो मैडम ने जवाब दिया नहीं, कॉलेज में एक और लाइब्रेरी वाली मैं नाम है जिनका नाम भी रितु हैं उनकी शादी हुई है और मेरी तो अच्छा गाई । पापा ने लडका फाइनल कर दिया है । मैं उनसे तुम्हारे बारे में बोल नहीं बस इतना कहा कि मैं किसी और के साथ खुश रह सकती हूँ । पापा मुझे घंटे का समय दे दो । अगर एक घंटे में वापस आ गई तो आप जहाँ बोलो की शादी कर लूंगी नहीं तो फिर मेरा इंतजार मत करना । तो मैडम ने सारी बात बताते हुए कहा ऍम पर अभी ठीक से ध्यान नहीं दे रहा था की ऋतु मैडम ने अगली बात कहीं, हमें आज ही शादी करनी होगी । बकौल उन्होंने बाहर का हाथ पकडते हुए कहा तभी अचानक बतौर को पिता जी की कदकाठी का आदमी आता देखा जिसका चेहरा ठीक से नहीं दिख रहा था बाॅय और तभी उसे ध्यान है कि वह मैडम के साथ महाकाल मंदिर पर खडा हैं । जिस मंदिर में जगह नारायण जी पंडित हैं जिनका पूरा देने यही व्यतीत होता है । इसके साथ ही बकौल को मैं सब भी याद आया हूँ कि मैडम के विधवा होने का पता लगते ही कैसे । पिताजी खुद को अपमानित महसूस करने लगे और फौरन खडे होकर रौद्र रूप में आ गए थे । वो ठाकुर के दिमाग मेरे सारी बातें चल रही थी लेकिन सामने ऋतु मैडम खडी थी । कुछ समझ नहीं आ रहा था और अचानक बतौर की नजर जगत नारायण पर पडती है । ठाकुर सुधबुध खो देता है और इससे पहले की जगह नारायण बकौल को देखते घरे तू मैडम का हाथ पकड के वहाँ से लेकर आगे चला जाता है और फिर तीव्र चिंता के भाव में मानो गुम हो जाता है तो मैडम उसकी चिंता देखकर समझ जाती हैं । सारी बात कोई मुझे माफ कर दो । मैंने सब कुछ कुछ ज्यादा ही जल्दी में सोच लिया । फिर मेरे पर समय नहीं था शायद इसलिए तुम पर धार डाला । मेरा मकसद नहीं था कोई बात नहीं । फॅमिली और चाहूँ मैं चाहती हूँ इतना बोलते ही मैडम जाने लगती हैं । बस और अपनी असमंजस्य भरी मनोदशा को छोडकर मैडम का हाथ पकडता है । एक रिक्शे में बैठाकर थोडी दूर माता जी के एक मंडल में जाता है जहाँ माता जी की मूर्ति के अलावा और कोई नहीं है । वहाँ से सिंदूर उठाकर बकर मैडम की मांग पडता है । वहीं चरणों में रखा मंगलसूत्र उठाकर ऍम को पहनाता है और फिर माता जी के त्रिशूल पर छडे हार उठाकर दोनों एक दूसरे को पहनाते हैं और माताजी का आशीर्वाद लेते हैं । ऍम होती हैं

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यह उपन्यास उन तमाम लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी-न-कभी किसी मोटे आदमी का मजाक उड़ाया है। न पढ़ा, न लिखा, न कुछ सीखा, वो अब खोटा हो गया। उसकी जीभ हर पल लपलपाई, वो बेचारा मोटा हो गया। writer: अभिषेक मनोहरचंदा Script Writer : Mohil Script Writer : Abhishek Manoharchanda
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