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Part 38

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यह उपन्यास उन तमाम लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी-न-कभी किसी मोटे आदमी का मजाक उड़ाया है। न पढ़ा, न लिखा, न कुछ सीखा, वो अब खोटा हो गया। उसकी जीभ हर पल लपलपाई, वो बेचारा मोटा हो गया। writer: अभिषेक मनोहरचंदा Script Writer : Mohil Script Writer : Abhishek Manoharchanda
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ढाका करते हैं । ऍम शर्मा की खडी हो चुकी थी है जाने को तैयार थी बहुत लेट हो गया है हमें अब चलना चाहिए । मैडम ने कहा हाँ बस करने सहमती दिखाते हुए फौरन दरवाजा धीरे से खोला । नीचे देखा कोई नहीं था आप चाहिए मैं दरवाजे को लगा कर आ जाऊंगा । ऍम को जाने का इशारा कर के कहा मैं जाने लगी और पहली सीढी से उतरी थी की बस करने उनका एक हाथ पकड लिया । पार्टी बकुल को देखा और आधे चान्द्र की तरह मुस्कुराते । शर्माते हुए बा कुरसे अपने हाथ को छुडाया और चली गई । बकौल फिर से छत पर था उसे अब हवा कुछ अलग महसूस हो रही थी । आज मानो रहा था अपने सामने उसे सबको छोटा लग रहा था । ऐसा लग रहा था जैसे आज उस एरिया में मिल गई हूँ एक जुंबा ने किसी के साथ होने के एहसास ने बकुल को मन से इतना मीर बना दिया था कि आत्मविश्वास और उत्साह से भरपूर ये कोई नया ब खुद पैदा हुआ जान पडता है । चेहरा फूल से ज्यादा खेला था आंखों में आज चांद और तारों से ज्यादा चमक थी और मन में उत्साह से चलती ठंडी हवा से कई गुना ज्यादा और तेज था । आसमान जरूर काला था इस बार लेकिन बागोर की जिंदगी में रोशनी आ चुकी थी । पूरी तरह हो चुका था । मैं दुनिया में होकर भी किसी और दुनिया का हो चुका था । दिमाग छोड जवान भी बैठ चुकी थी । हर बार होटल को छूकर अंदर जा रही थी और स्वाद का एहसास पूरे शरीर को चखा रही थी । आसमान के अंधेरे को देखते देखते कब आंखों के पढते लगे पता ही नहीं लगा और सुबह जब तक बतौर की आंखें खुलीं, लगभग सब लोग शिविर में जा चुके थे । बकुल भी जब अपना बाहर लेकर नीचे आया तो नीतू आंटी आप भी वहीं खडी थी और बाकी और को देखते हैं । शर्मा नयी खबर अपने दुपट्टे से फौरन अपना से ढक लेती हैं । बकेवर नीतू आंटी को बाय कहता है और नीतू आंटी पास में आती हैं । मकूर क्या रे कागज देती हैं । हाथ का इंतजार करूंगी मैं । वहाँ की सारी चींटियां अपनी आठवाँ लगा कर रखती हूँ । हमेशा हाथ में वो सारे शेठी निकालकर बताती हैं जो बक करने ऋतु मैडम के लिए भेजी थी । बस और कुछ बोले इससे पहले नीतू आंटी बागपुर के पैर पडती हैं । आपके फोन का इंतजार रहेगा । बोलते बोलते चली जाती हैं । बकुल कागज खोलकर देखता है तो उस पर नीतू आंटी ने फोन नंबर लिखा है । बकौल को झटका लगता है और सारा मामला पूरा साफ साफ समझ आ जाता है कि उसकी एक पीछे ठीक कभी ऋतु मैडम के पांच नहीं पहुंची और जो वापसी चिट्ठी उसके पास आई है तो मैडम की नहीं बल्कि नीतू आंटी की भेजी हुई थी । मगर पंद्रह दिन के शिविर को पूरा कर अपना दो से ढाई किलो तक वजन कम करके फिर से महाकाल की नगरी ही यानी अपने घर पहुंच चुका था । चेहरे पर खुशी है मन में तरंग और दिमाग में ऋतु मैडम छाई हुई थी । बस मकर में बहुत बदलाव आ चुके थे । पहले मायूस आह शांत रहने वाला बाॅल अब ऊर्जा से भरा हुआ दिख रहा था । उसने हस्ते खेलते शिविर के अपने किस्से गायत्रीदेवी को सुनाए और कैसे कैसी कसरत करवाते क्या खिलाते पिलाते सबकुछ बडे उत्साह से बताया । जगत नारायण भी बागपुर में थोडा बदलाव देख कर खुश हैं और अब इसी तरह से आगे जीवन को निरंतर रखने गाना देश भी देते हैं । शिविर वालों के अनुसार ही थाने पीने पर जोर दिया देखना कितनी जल्दी तुम्हारी शादी करवाएंगे । अब जाकर पलंग पर बैठे हुए जगह नारायण ने कहा हूँ और रोज की तरह समाज और उन्हीं की जाती की ये किताब खोलकर बैठ जाते हैं । जिसमें अविवाहित लडके और लडकियों के बारे में सारी जानकारियां होती हैं ताकि समाज के लोग आस पास में किताब की सहायता से लडका लडकी देखकर रिश्तों की बातों को आगे बढा सकें । जगह नया है उसके दाम में से लडकी को पसंद करते तो नंबर देखते तुरंत कॉल करके उसके परिवार से शादी की बात करते हैं । कुछ दिनों से मंदिर से आने के बाद में रोज नहीं किया करते थे तो बस और खाना खाकर बैंड पर पहुंचाई था की तू मावलंकर कॉल उसके पास आ जाता है तो बस खुर्जा पूछता हूँ कि उन्होंने बकौल का नंबर कब लिया तो मैडम याद दिलाती हैं । चिंटू के पापा बनकर जब कॉलेज में आए थे तब के नंबर अब काम आए ऍसे छोडकर पांच मिनट के लिए बकर को फोन जरूर करती हैं । इसीलिए और हमेशा उनके कॉलेज की छुट्टी के समय वहल निकालकर उनके फोन के इंतजार में बैठ जाता हूँ । कई बार ब्रैंड पर बीच अभ्यास में उनका फोन आ जाता तो बस और अभ्यास छोड पहले उनसे बात करता हूँ तो कई बार बार आ के बीच में भी सोना जाता तो कुवैत छोडकर भी साइड में बात करने चला जाता हूँ । हर जगह फॅार देखता तो सब उसके इंतजार में रुके रहते हो और उसे घूरकर देखने लगते हैं । इस बात के तब तो कडवा सेट ठाकुर के पैसे भी काट लिया करते थे जिसका बकुल को कोई फर्क नहीं पडता हूँ । जब इंसान प्रेम में होता है तो उसे प्रेम के अलावा संसार की सारी चीजें हो गया जरूरी मालूम पडती है । पाँच में बखपुर ॅ अक्सर मिस कॉल से बात करते थे । अगर एक बेल बजी तो उसका मतलब हम जाग रहे हैं तो बेल बजी मतलब खाना भी खा लिया और इसका जवाब सामने वाला भी दो बैल बजाकर देता हूँ । अगर खाना खा लिया होता तो एक ही होती थी तीन बेल बजी मतलब क्या भी फोन करके बात कर सकते हैं । अगर सामने वाले की भी हाँ है तो तीन बैल से ही जवाब आता है जो अक्सर नही होता था और आखिरी में चार बैल मतलब आप सो जाते हैं । इस तरह बाकी और की जिंदगी की है सबसे सुखा दिन प्रेम में डूबे ऐसे बीत रहे थे जैसे ये दिन नहीं बल्कि ईश्वर के द्वारा दिए गए वरधान के पलोन इन सबके बीच बकुल ने गोपाल को भी उसकी जिंदगी में चल रहे इस खूबसूरत समय के बारे में बताया जिससे गोपाल के मन में भी प्रेम में पडने का भाव जाग्रत हुआ और मैं अब बरातों में गाना गाने के अलावा लडकियों पर भी विशेष नजर रखने लगा था और बारात में नाचने कूदने वालों के गानों से ज्यादा प्रेम गीत गाने लगा था । और एक शोभा यात्रा में तो लडकी को देखकर गोपाल भगवान के भजन भी जगह प्रेमगीत की तरह का पडा और इस बार पर उसकी जमकर बडी पिटाई भी हुई और सेट अप तो कडवा ने पैसे भी काटे । ऍम सुबह सुबह बाग और अपने पिता जगत नारायण के साथ रोज की तरह से आया । हम करके घर लौटा है और तभी चिंटू घर में आता है । उसके हाथ से लगा एक और हाथ अंदर आता है जो एक लडकी का हाथ है और दोनों ने गले में हार पहना है । लडकी की मांग भरी हुई है । गले में मंगलसूत्र हैं । चिंटू अंदर आकर चुप चाप गर्दन झुकाकर लडकी का हाथ पकडे खडा हो जाता है । इस पूरे दृश्य को देखकर कुछ और सोचने की जरूरत नहीं थी फिर भी इस द्रश्य पर पुख्ता मोहर लगाने के लिए गायत्रीदेवी ने चींटियों से पूछा कि सब क्या है? चिंटू माँ मैंने से शादी कर ली । चिंटू डॅाक जाॅब सबके मिलेजुले भाग से बोला । नालायक राचा जगह नारायण ने फॉरेन चिंटू को दो जोर के थप्पड मारे । साथ खडी लडकी ये देख पीछे हट चुकी थी । हरी रूक तू क्या कर रहा हूँ? गायत्रीदेवी ने जगह नारायण का हाथ पकडा । उन्हें दूर करते हुए कहा अरे कॉलेज में पढने जाता था ये करने जाता था । अरे लोग क्या कहेंगे कि बडा भाई को मारा बैठा है । अभी छोटी ने शादी कर ली और यदि भाग कर इतना बोलकर एक और चांटा मार दिया जगह नारायण ने चिंटू को आतंक को पूछ लेंगे तो पहले क्या हुआ? गायत्रीदेवी फिर से रोकते हुए बोली चिंटू क्या हुआ ये किसी को बताया था नहीं तो उन्हें और सुबह तो कॉलेज के लिए निकला था और एकदम से शादी । क्या ये सब गायत्रीदेवी ने हिंदू से सारे सवाल कर दिया । इसके पापा ने इसका रिश्ता कहीं और तय कर दिया था तथा आज सगाई के लिए आने वाले थे । इसने अपने घर बोला कि ये मुझे पसंद करती है, लेकिन इसके पापा नहीं माने । पिछली हमें भाग कर शादी करनी पडी । चिंटू ने सारा किस्सा सुनाया । जगह बालकृष्ण नारायण पांडेय के खानदान में आज तक ऐसी नीच हरकत किसी ने नहीं की । अपने गोल की मान मर्यादा को बोल कर जो कोल कई नाक कटा सकता है । मैं स्कूल का वंशज नहीं हो सकता । जगत नारायण का चेहरा गुस्से में लाल हो चुका था । पापा ही हमें माफ कर दीजिए । रमेश के अलावा कुछ और समझ नहीं आ रहा था इसलिए सब कुछ अचानक हो गया । लडकी ने बीच में बोल माफी मांगने की कोशिश की तुम बडे हो चुके हो, अपना बुरा भला समझ सकते हो । अपना सामान लेकर जा सकते हो तो मैं घर से हमारा नाटा बस यही तक था । ये बोल कर जगत नारायण जाने लगते हैं । पिता जी साफ कर दो नहीं पार चिंतु जगत नारायण के पैर पकडते हुए बोला मेरे मान सम्मान और स्वाभिमान के बीच में अगर मैं खुद भी आ जाओ तो ये माफी नहीं है । समझ लो जैसे तो वर्षों पहले अनाथ हुआ था आज फिर से हो गया । इतना बोल कर जगह नारायण पैरों से चिंटू को धक्का देकर निकल जाते हैं । जगत नारायण के निर्णय की आ गई कोई और नहीं बोलता हूँ इसलिए गायत्रीदेवी और बाकी और चुपचाप खडे रहे हैं और चिंटू अपना सामान लेकर चला जाता है । बकौल और गायत्री देवी की आंखें नाम हो जाती हैं ।

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यह उपन्यास उन तमाम लोगों के लिए है जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी-न-कभी किसी मोटे आदमी का मजाक उड़ाया है। न पढ़ा, न लिखा, न कुछ सीखा, वो अब खोटा हो गया। उसकी जीभ हर पल लपलपाई, वो बेचारा मोटा हो गया। writer: अभिषेक मनोहरचंदा Script Writer : Mohil Script Writer : Abhishek Manoharchanda
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