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Part 32

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लक्ष्य की ओर चलने वाले को बीच में विश्राम कहा? सिर्फ चलते जाना है चलते जाना है कहीं भी शिथिलता या आलस्य नहीं ज़रूर सुने, शिखर तक चलो बहुत ही प्रेरणादायक कहनी है। writer: डॉ. कुसुम लूनिया Voiceover Artist : mohil Author : Dr. Kusun Loonia
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सुचित्रा के पास किसी तरह के संसाधनों की कमी नहीं थी । उसने पुस्तकालयों से समाचार एजेंसियों से इंटरनेट से इस समस्या विषयक सामग्री एकत्रित करनी प्रारंभ थी किंतु हूँ उसके मात्र इतने से संतोष नहीं हुआ । उसने उन क्षेत्रों के वन हिंदुओं से बातचीत की जो उसके संपर्क में थे । उसने काफी कुछ जाना लेकिन जमीनी सच्चाई तो उसे जमीन पर जाकर ही पता चल सकती थी । क्या उस खूंखार इलाके में जाने की इजाजत उसे मिल पाएगी? सुचित्रा को अच्छे से पता था ना उसके पति और ना ही उसके पिता नक्सली इलाकों में उसे जाने की इच्छा सा देंगे । कटाह चोरी छुपे शतम् वेश धारण कर वे अपनी सहेली के साथ अपने छठी लक्ष्य की ओर निकल पडे । विभिन्न पडावों को तय करती हुई महाराष्ट्र की सीमा से लगे छत्तीसगढ के धनोरा तहसील के दोपहर के दो वजह जब पहुंची तो वहाँ का तापमान पैंतालीस डिग्री था । मकान के टीम की चदरों वाली छतों पर साठ सत्तर लोग काला कपडा बांधे खडे थे । उनमें से कुछ लडकियाँ भी नजर आ रही थी । कुछ ही मिनटों के भ्रमण में सुचित्रा आएगा मुश्किल सहेली पसीने से लगभग हो गई । गर्मी से उनकी हालत गडबडाने लगी । ब्राउन गरीब आदिवासियों के बारे में सोच रही थी जो लगातार इन परिस्थितियों में रहते थे । उसने अपनी आंखों से देखा कि घर चिरौली जिले में नाम आ के स्थान पर चीटियों को पीसकर उनका उपयोग नमक की तरह किया जा रहा था । ऐसे हालत को देख सुचित्रा का मन पे हाथ डाल हो गया । उसके अंतर्मन से आवाज उठी की क्या हिंसा की परिकाष्ठा ही नहीं है । सिर्फ चिडियों को पीस कर खाना ही हिंसा नहीं बल्कि ऐसे हालत पैदा करना हिंसा है । असीम संग्रह नहीं । ऐसे हालात पैदा किए । अत्यधिक शोषण से स्थिति नाजुक बनी । अपने विद्यार्थी जीवन में सुचित्रा अनुव्रत सेवाभारती की सदस्य बन चुकी थी । सोचने लगी कि अपरिग्रह अनुव्रत प्रसार से यहाँ की जनता का भला हो सकता है । अपरिग्रह का आर्थिक ये नहीं होता कि भूखे मारो उत्पादन अथवा क्राॅस करो बल्कि दूसरों का अधिकार छीनना, शोषण कर अब प्रामाणिकता हूँ एवं विश्वास पात्रता को गंवाकर अन्याय से धन संग्रह न करना ही व्यवहारिक अपरिग्रह है । किसी प्रकार अहिंसा अनुव्रत का अर्थ भी मारो नहीं बल्कि मारने वाले को बदलो है । हटा यहाँ की स्थितियों के बदलाव में अनुव्रत सेवा भारतीय जैसी संस्थाएं भी उल्लेखनीय भूमिका निभा सकती हैं । इस तरह से स्थितियों का आकलन करते हुए उसने शीघ्रतापूर्वक अपनी यात्रा संपन्न कर ली । उसी रात उसने नक्सल वाज की समस्या के बारे में अपनी डायरी में ट्रिप पढे लिखे । वही इस प्रकार से थी नक्सलवाद मूल में कोई कानून व्यवस्था की समस्या नहीं बल्कि है । मुख्य रूप से मानवीय, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक समस्या लग रही है जो दूरदर्शिता के अभाव में परिवर्तित हुई । सम्भवता नीति गठ भोलों से नक्सलवाद की जडें जमती गई । प्रशासनिक अमले की दखलंदाजी को प्रारंभिक नीति नियंताओं ने संविधान बनाते समय इसलिए सीमित रखा ताकि आदिवासियों के विशिष्ट पहचान बनी रहे हैं । उनकी संस्कृति प्रशिक्षण बनी रहे, उसी का फायदा उठाकर यहाँ राष्ट्र विद्रोहियों ने अलगाववादी हिंसा भावना विकसित कर दी । उग्र आंदोलन बढते गए, खून खराबा होने लगा, विकास की गति रुक गई और ये अंचल पिछडते चलेगा । इसके अलावा भूमिहीनता की समस्या, उचित रोजगार की कमी, जमीन अधिग्रहण से सही नीति न होना और उचित पुनर्वास की स्पष्ट नीति न होने से उठने वाले शांतिपूर्ण आंदोलन और उनका दमन भी आम आदमियों को नक्सलवाद से करीब ले जाता है । जहाँ सही कसूर पूरी करता है भ्रष्टाचार । अगर नीतियां बनती भी है तो भ्रष्टाचार का दानव सब कुछ निकल जाता है । आम गरीब आदिवासी किसान को दो वक्त की रोटी मर्यादा का जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा, हवा सामान्य विकास चाहिए भरते हिन्दुस्तान से ये मांग कोई ज्यादा नहीं है था । ऐसा हो पाएगा ।

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लक्ष्य की ओर चलने वाले को बीच में विश्राम कहा? सिर्फ चलते जाना है चलते जाना है कहीं भी शिथिलता या आलस्य नहीं ज़रूर सुने, शिखर तक चलो बहुत ही प्रेरणादायक कहनी है। writer: डॉ. कुसुम लूनिया Voiceover Artist : mohil Author : Dr. Kusun Loonia
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