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Part 29

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लक्ष्य की ओर चलने वाले को बीच में विश्राम कहा? सिर्फ चलते जाना है चलते जाना है कहीं भी शिथिलता या आलस्य नहीं ज़रूर सुने, शिखर तक चलो बहुत ही प्रेरणादायक कहनी है। writer: डॉ. कुसुम लूनिया Voiceover Artist : mohil Author : Dr. Kusun Loonia
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संघर्ष की स्थिति में कायरता का परिचय व्यक्ति की बहुत बडी हार है । हिम्मत के साथ हाथ है को सहन करने वाला सब के लिए आदर्श बन जाता है । अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के मुख्य द्वार के समीप ही सडक के दायीं और मध्यम आकार का एक टेंट लगा हुआ था । वहाँ अनुव्रत सेवाभारती ने अपना आपातकालीन कार्यालय बना रखा था । अनुव्रत सेवाभारती के इस कार्यालय पर आज बेतहाशा भीड थी । मुख्य अधिकारी कुर्सियों पर बैठे थे । बाकी सभी कार्यकर्ता एवं आगंतुक सामने दरियों पर बैठे थे । लोगों के इतने हो जून के बाद भी कहीं कोई शोरगुल नहीं था । चारों तरफ नहीं बढता । पतली हुई थी । सभी के चेहरों पर उत्सुकता थीं । गौरीपुर आपदा सहायता अर्थ गई । सेवा भारती की टीम के सदस्य वहाँ मौजूद हैं । एक सवाल सभी के समक्ष उपस् थित था कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो मिस्टर संकल्पी टीम को आधे रास्ते से लौटना पडा । अनिष्ट की आशंका की अफवाह फैल गई थी । उनके परिवार वालों को पता चलते ही अपने प्रियजनों को ले जाने वाले भी पहुंच रहे थे । जी ड्राइवर की पत्नी तो बेतहाशा विलाप कर रही थी । उसके साथ उसकी सहेली थी । मैं उसे समझना दे रही थी । उन्हें देख अब्दुल्ला साहब ने सतीश जी ड्राइवर का हाल चाल ले आने को कहा । जी ड्राइवर को विश्व बुझा तीन लगा था । शिवानी रिश् प्रतिरोधी दवा का तुरंत लेट कर दिया था । इसलिए उसकी जान बच गई । नहीं तो ट्रक ड्राइवर की तरह उसकी भी मौत सुनिश्चित थी । उसके पट्टी बंधी थी, किन्तु है चल फिर सकता था । सतीश के संग लंगडाता लंगडाता ड्राइवर आया तो उसे देख कर उसकी पत्नी ने विलाप करना बंद किया । अब्दुल्ला साहब ने उसकी पत्नी को संबोधित करते हुए कहा प्राथमिक चिकित्सा करके पैर पर पट्टी बांधी गई हैं कहाँ? आप इन्हें साथ ले जाओ और दो दिन पश्चात पुना पट्टी करवाने ले आना । बाटल जी के दोनों पुत्र पुत्री पत्नी भी एकदम घबराए हुए पहुंचे । पत्नी के चेहरे की तो होश उड रहे थे । पुत्र ऍम थे । पुत्री पापा पापा चला घर हो रही थी । बडा पुत्र अब्दुल्ला साहब के पास आया है । अब्दुल्ला साहब ने दुखी मन से कहा अंदर सघन चिकित्सा कक्ष में है । अंदर गए पिताजी की हालत छोटे पुत्र की रुलाई छूट गई । शेर पर बंदी पट्टियां बंद आंखें स्थिर का आया । देख कर एक बार तो बडा पुत्र भी सहन गया हूँ । इस हालत में पाठक जी को देख उनकी पत्नी वा पुत्री फिर सुबह सुबह घर होने लगी । अब्दुल्ला साहब उठकर उनके पास ठंडा मानते हुए आए । बोले उन की कमी से बेहोशी छाई हुई है । भगवान ने चाहा तो शीघ्र ठीक हो जाएंगे । बाकी सभी कार्यकर्ताओं के पारिवारिक जान भी आते जा रहे थे । अपने संबंधियों के कुशल छेम पूछ रहे थे । इस क्षेत्र के पार्षद, विधायक एवं मंत्री जी सभी सांत्वना जताने पहुंच गए । आखिर इतना संगीन मामला जो था । विपक्षी दल के भी कुछ नेता पहुंच गए थे । इस समस्या पर सरकार को घेरना जो था । मंत्री जी ने सेवाभारती को इस छतिपूर्ति स्वरूप लाखों रूपये की राशि सहायता करने की घोषणा की, ताकि उनका ये वोटबैंक यथावत बना रहे हैं । बहुत सारे मीडियाकर्मी उपस् थित थे । उनके प्रमुख समाचारपत्रों के संवाददाता एवं प्रमुख न्यूज चैनलों के पत्रकार उपस्थि थे । विशव वस्तुस्थिति जानना चाह रहे थे कि उनके साथ क्या दुर्घटना हुई है । सेवा भारती के इस सेवा दल के साथ आखिर हुआ क्या? जिस स्थिति से अब्दुल्ला साहब बचना चाह रहे थे, जिसका सामना करते हुए उनकी जो काम रही थी, इस समय आखिर आॅन से कैसे काम चलेगा । उनका बायां हाथ पाठक ही अनिश्चितकालीन बेहोशी में था और दायां हाथ वहाँ न जाने कहां और किन परिस्थितियों अब सामने जो कुछ भी है उसका उत्तरदायित्व तो अब्दुल्ला जी का था । भारी हॅसते स्वर में अब्दुल्ला साहब ने बोलना प्रारम्भ किया । हमारी यात्रा बेहद उत्साहजनक वातावरण नहीं चल रही थी । दिल्ली से उत्तर प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार तक की यात्रा बेहद सुखद थी । बिहार बंगाल के मध्य न जाने कहाँ पर घने जंगलों के मध्य राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही हमारे सेवादल को चालीस पचास हथियारबंद नकाबपोशों ने घेर लिया । हमारे ट्रक जी सर, सारी सामग्री उन्होंने लोट ली । उनके कुछ साथी तो हमें मारने पर आम दाद है, लेकिन उनके मुखिया की योजना हमारे अपहरण के बदले मोटी रकम वसूलने की थी इसलिए हमें ले गए और जंगल में किसी गंदी सी मजबूत दार जगह पर हमें कैद कर लिया । कितना बोलते बोलते उनकी साथ भूल गई थी । काश रखा पानी धोखा किया, फिर बोलना प्रारम्भ किया । हमारी इस यात्रा के मुख्य व्यवस्थापक पाठक जीत है और सह व्यवस्थापक शिवमंगल जी अचानक वो मुझे इस विविधता से हम सब घबरा गए । यह स्वाभाविक ही था । हमारी जगह आप होते तो खबर आ जाते हैं । लेकिन इन विकट परिस्थितियों में भी एक शख्स ऐसा था जिसने बिलकुल भी धैर्य नहीं खोया । हमारे अपहरण से लेकर हमारी रिहाई तक उसने एक्शन का उपयोग किया । अपनी आत्मशक्ति से एक एक को उसने ऊर्जा से भरे रखा हूँ । एक एक श्वास के साथ जागरूक रहा हूँ । खून का एक कतरा देश के नाम कर दिया हो । छोटे कौन है, कहाँ है? अब्दुल्ला साहब ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, भारत के करीब दो अरब आबादी को आज आतंकवाद और नक्सली हिंसा से सबसे ज्यादा खतरा है । बेहद अक्रूर हैं । नक्सली मुझ से काम हथियार से अधिक बात करते हैं । शांति व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करें । इंसानों की जान लेना इनके बाएं हाथ का खेल है । कुछ समय पूर्व दंड कारणें, मुख्य प्रशासनिक अधिकारी का अपहरण किया । अपने चार साथियों को छुडाने के लिए तीन दिन तक जब सरकार से बात नहीं बनी तो उसने अपराध अधिकारी को मौत के घाट उतार दिया । सिर धड से अलग खडे धारा अपनी मांगे लिखा हुआ कागज लटकाकर थाने के आगे शाह फेंक गए । पर हमारा साथ ही जिसके बारे में जानने को आप उत्सुक हैं, मैं उनसे डरा नहीं । उसने विकट स्थितियों को समझा । हिम्मत नहीं हो रही है । एक एक करके सबको निकाल दिया । आज उसी की बदौलत सब साथ ही जिंदा है और सबको निकालते निकालते आखिर में खुद ही फंस गया पे रहम नक्सलियों की क्या ऐज में न जाने में कैसा होगा । अब्दुल्ला साहब ने रूंधी आवाज में अपनी पूरी बात रखी थी । अंत में तो वो भी अपनी रुलाई रोक नहीं पाए और बच्चों की तरह सुबह नहीं लगे । नेताजी विधायक आज ही पारशा जी सब साफ ना दे रहे थे । पत्रकार बंधुओं भी कुछ देर के लिए नमकीन हो गए । कुछ समय पश्चात बुना उन्हें अपने पत्रकारिता धर्म का खयाल आया । पॅन हैं कुछ खोजी पत्रकारों ने शिवा के प्रोफाइल का बता लगाया कि श्री राम कॉलेज के प्रथम वर्ष के विद्यार्थी के रूप में इसने राठौर जैसी बडी हस्ती को पानी पिलाया था और समय सुजाता को न्याय दिलाया था । प्रोफेसर कुलकर्णी हत्याकांड में भी भाई बहुत बडी हुआ था । उन्होंने ये भी पता लगाया कि कश्मीरी आतंकवादियों से शिवा ने सूझबूझ से सैकडों जाने बचाएं नहीं । देर रात तक वहाँ आवागमन बना रहा है । तिन तो रविवार को कोई समाचार नहीं था । व्यथित मन से अगली सुबह अब्दुल्ला साहब एवं पारशा चीजें शिवा के घर जाने का कार्यक्रम बनाया । आज के मुख्य समाचारों में शिवा वर शिवा के कारनामें चाय थे । सब की सहानुभूति शिवा के साथ ही भारत माता का ये सच्चा सबूत बच कराए । सारा ही ऐसी प्रार्थना कर रहा था । क्या शिवा वही पाएगा

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लक्ष्य की ओर चलने वाले को बीच में विश्राम कहा? सिर्फ चलते जाना है चलते जाना है कहीं भी शिथिलता या आलस्य नहीं ज़रूर सुने, शिखर तक चलो बहुत ही प्रेरणादायक कहनी है। writer: डॉ. कुसुम लूनिया Voiceover Artist : mohil Author : Dr. Kusun Loonia
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