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Part 2 in Hindi

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2 K Listens
AuthorAditya Bajpai
इस उपन्यास में जिस कालखंड की चर्चा है, वह आजादी के पहले का है। उस समय देश के क्षितिज पर आजादी के बदल छाए हुए थे, देश भर में जुलूस और सभाओं का माहौल था writer: मनु शर्मा Voiceover Artist : Mohil Author : Manu Sharma
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बाहर दो समय नहीं अंगडाई ली और परिस्थितियां बदलती चली गईं । सोमारू की सजा बहाल रही हूँ । याला जगजीवन दास की जमानत हाईकोर्ट से हो गई । इसकी सूचना हम लोगों को नहीं थी । इसी मंगलवार को सवेरे सवेरे खुद हनुमान जी का प्रसाद लेकर हासिल हुआ । उसके पीछे वहीं लंगडा नौकर था । जब उसने दरवाजा खटखटाया, वहाँ पूजा पर थी पी आ रहें नहीं रही थी । मैंने ही द्वार खोला । उसे देखते ही आवाक रह गया । वो तो सोचता ठाक है जेल में होगा हूँ और ये तो साक्षात हाजिर है । फॅसने भी हम लोगों को कुछ बनाया नहीं । मेरा आश्चर्य मन से उठकर आर्थो में केंद्रित हो गया था । मैं उसे एक्टर देखने लगा । ऍम मुस्कराया तो भारी माॅ पूजा कर रही तो क्या कर रही हैं और कोई नहीं पियारी चाहती है । अच्छा दुबियारी अब यही रहती है । उस की बात चल रही है । ऍम रहा नहीं तब तक तो लगता है मुझे ही रुकना पडेगा । इतना कहता हुआ भीतर घुसाया और दालान में पडी मारेगी चौकी की ओर बढा पीछे पीछे मैं नौकर भी था तो मैंने उसे देखा बल्कि अपनी नजरों से उसे कई बार गिरेगा भी और कोई प्रतिक्रिया नहीं । सारा उफान जैसे किसी अज्ञात निराशा में डूब गया हूँ । चौकी के सामने की जमीन पर लड्डुओं से भरी दौरी और पूजा के टोल जी लग कर बैठ गया । ॅ ऊपर जाकर के है तो की लाला जी आए हैं अपने गले में पडी गेंदे की गदराई माला पर हाथ फेरते हुए वह मुस्कराया मेरी दृष्टि लाला कीगो रही थी बस मैं सीढियाँ चढने लगा । मनुष्य की विक्सन शीलता जहाँ उसकी जीवंतता का प्रतीक है, वहीं अतीत से जुडे रहना उसकी व्यवस्था भी है । उस से अलग होने का सारा प्रयास उसकी मजबूरी की एक भवदीप जागती की तरह उस पर चिपक जाता है । आज वही चखती मुझे लाला पर जबकि दिखाई दी हूँ पर वहाँ उसके व्यक्तित्व के अलग आपको ढक नहीं पा रही थी । सूचना मैंने सबको टी पी । आ रही नहीं लेने के बाद भी नहीं उतरी । परमाणु जल्दी पूजा समाप्त कर चली आई । हमेशा की भांति विनम्रता होते हुए सदेश अदायें शब्दों में परमात्मा के प्रति हजार हजार आभार उसने व्यक्त किया भी । वह जेल से छूटकर चलाया है और फिर भी एक धर्म के सिद्धांत को दौर आते हुए बोला भाग्य में कलंक पता था । सोशल लकी गया । अब आप लोगों के आशीर्वाद और हनुमान जी की ग्राॅस फिर आप लोगों के बीच में आ गया हूँ । इतना कहते हुए उसने फिर नौकर को इशारा किया । उसने कपडे से ढकी तौर इसे एक दोना निकाला । वो लाला ने लेकर माँ को थमा दिया । मुझे आज है धोनी में सात लड्डू और तुलसीदल था । वो एक कोने पर महावीरी लगी थी । एक और लाला का ग्राॅस और दूसरी ओर प्रसाद की मैं माँ अजीब दुविधा में थी । पापी के हाथों में आकर भी गंगा जल अपनी महत्ता थोडे ही होता है । फिर प्रसाद तो प्रसाद है माने उसे लेकर माध्यम से लगाया और धन्यवाद देकर ऊपर चली गई । पीटीआर्इ जी क्या लाला अपना बाकी पूरा करें? इसके पहले ही माँ बोल पडी अरे इतना प्रसाद तो बहुत है, इसी में हो जाएगा । लाला ने फिर नहीं की वो उसने हाथ जोडकर चलते हुए निवेदन किया कि रविवार को आप सब लोग मेरे यहाँ पधारें और वहीं भोजन करें फिर देखा जाएगा । माँ जल्दी में किसी तरह पिंड छुडाना चाहते नहीं । और मैं इतनी सरलता से झडने वाला नहीं था । वो फिर गडबड आया हूँ । यदि आप ना सके तो जग्गू और पियारी को अवश्य भेजी है । उस दिन रानी बहु वगैरा सभी आएंग यानी बहुत का नाम ऐसा था की माँ को सोचना नहीं । अच्छी बात है । कहती हुई वहाँ ऊपर चली नहीं पर मैं लाला को पहुंचाने बाहर तक आया । लडकी भी तो यहीं कहीं रहती है । जब तुम्हारे साथ मंदिर में आती थी निश्चित रूप से उसका है चंपुओं सेना यदि कोई दूसरी स्थिति होती तो मैं थोडी अनाकानी करता । पर प्रसाद की बात थी उस माया मरक के पीछे चल पडा । सुमेर चाचा की दुकान खोल गई थी । पीपा महेश मिट्टी के तेल का कैनिस्टर बगल में रखें और सीढी जमीन पर दुख लायक दुकान पर बैठा बी डी पी रहा था । याला को देखते ही हाथ जोडकर दोनों खडे हो गए जैसे साक्षात भगवान आ गई हूँ । दोनों के लिए लाला की उपस् थिति अप्रत्याशित थी । दोनों के लिए लाला महान था क्योंकि धनी और शक्तिशाली था । हर पाप और अपराध के ऊपर उसका व्यक्तित्व चादर साफ फैल सकता था । दोनों को लाला इस समय पांच के पहाड पर देवता साथ खडा दिखाई दिया । बे लाला ने नौकर की दौरी से प्रसाद का दोना निकालकर सोमेर की ओर बढाया और बडे नाटकीय ढंग से बोला हो आपने बातों का प्रायश्चित कर रहा हूँ साहब जी प्रारब्ध में जो लिखा है वही होता है । भागी में जेल की रोटी बनाती थी तो खाया क्या? बताया था कि ब्रोम करते हुए भी हाथ चलता है । मैं तो गया था काले खत्म होने और खुद ही अपने मुख पर कालिख पोत ली । इतना कहते कहते उसकी आवाज भारी हो गई तो मैं समझ नहीं पाया कि लाला के संदर्भ में बोल रहा था परसो मेरे और भी पानी । दोनों सहानुभूति में सिर हिला रहे तो तुम्हारी लडकी को जग्गो के साथ देखा था । वो बेचारी भी पहले मंदिर जाती थी, सोचा उसे आशीर्वाद भी देता । चालू ॅ जरूर जरूर । इतने बडे आदमी की बात सुमेर कैसे टाल सकता था उसने धरती चंपा तो बनाया हूँ । सब जाती हुई भीतर से आई । लाला ने दो लड्डू निकालकर उसके हाथ पर रख दिया तो हनुमान जी के यहाँ दर्शन करने जाती थी ना लोग उनका प्रसाद आजकल तो हमारे दरवाजे आया है । चल तूने लड्डू चुप चाप ले लिए । ॅ जो मैं रह गया । जो मेन लाला की इतनी आलोचना करता था आज अपनी लडकी से पैर हुआ रहा है । पर वो आगे बढे इसके पहले ही लाला बोल पडा नहीं नहीं हम लोग लडकियों है पैर नहीं छुआते । वैदेही होती है देवी । इसके बाद उसने क्षमता को बाॅंटी से देखा साहब तो तुम्हारी लडकी सयानी हो चली है । लाला बोला और जंबो सबको चाहते हुए भीतर तरह गई । अब इसके हाथ पीले कर डालो । सोचता तो बहुत हूँ । वार गए के लिए सयानी । लडकी ऐसा पहाड होती है लाला जी, जिसका बोझ उठाए हुए समाज में रह ही नहीं पाता और उसे उतारकर फेक भी नहीं सकता । ॅ पर घबराओ मत साहब जी कोई बात होगी तो संकोच कहना मुझे जो हो सकेगा जरूर करूंगा । लाला नहीं चलते हुए दो लड्डू पी पा के हाथ में भी धरती दोनों परम कट हो गए । लाल आगे बढा ऍफ का घर तो जानते ही हो गए । उस ने बडे प्रेम से पूछा हूँ और मैंने सिर हिलाकर स्वीकार किया । ॅ बेटा एक दोनों यहाँ गया हूँ और कहना लाला जी मेरे यहाँ भी आए थे, तुम्हारे यहाँ भी आने वाले थे । पर देर हो चली थी, नहीं सके । याना बोलता रहा मेरी और से नहीं दे देना इसमें हालत क्या है यू आज शाम तक मेरा आदमी उसके यहाँ आवश्यक जाएगा, तब उसी से भेज दीजिएगा ॅ । अरे देश हो सकता हूँ पर तुम्हारे द्वारा भेजने का कुछ और मतलब तुम हमारे प्रतिनिधि होकर जाओगे था । मैं तो हमारा न कर ही रहेगा । ना । और फिर हसने लगे पर दानिश तो मुसलमान है उसे हनुमान जी के प्रसाद से क्या मतलब हूँ? प्रसाद से मतलब हो चाहे ना हो पर उससे मेरा मतलब है सच्चाई आपसे हाॅट पडी फिर उसने लीपापोती की । ऍम तो एक दूसरे का रहेगा । ई प्रसाद तो भगवान का है और भगवान हम सकता है । हाँ, मेरी समझ को बचकाना समझकर थपथपाता हुआ चला गया तो मैं दोनों लेकर लौट रहा था की माँ को भी के लिए निकल पडी । नहीं मुझे देखते ही वह ओवल पडी कितना लाल जी है तो मैंने सारी बातें उन्हें बता दूँ । मैं चकित भी नहीं और मुस्कुराईं ऍम भी है । फॅमिली हुई आगे बढी क्योंकि उन्हें देर हो रही थी । देश का राजनीतिक क्षितिज खान नहीं लगा था । हिटलर की युद्ध लो लोग । मदांधता ने जून उन्नीस सौ में रूस पर आक्रमण कर दिया हूँ । जिस विशाल देश की नेशनल प्रगति ने नेपोलियन के भी हौसले पस्त कर दिए थे, टेलर उसी को विजिट करने का दुस्साहस कर बैठा हूँ । इधर जापान ने टिकट दिसंबर को पर्ल हार्बर पर अचानक आक्रमण कर दिया और युद्ध में शामिल हो गया । फिर क्या था फिलिपिंस, इंद्रजीत, इंडोनेशिया, मलाया वर्मा एक के बाद एक जापान के समक्ष धराशाई होते गए । अंत में फरवरी उन्नीस सौ बयालीस में सिंगापुर पर और मार्च में रंगून पर भी जापानियों का कब्जा हो गया । तानी अंग्रेजों की प्रत्येक पराजय पर प्रसन्न होता हूँ । अपने मित्रों की सभा करता हूँ और मिठाई के नाम पर सूजी का हलवा खिलाता था । हूँ यदि पैसे की व्यवस्था ठीक हो जाती दो युद्ध हलवाई की जलेबी का पूरा थाल एम और लेके लडकों को पांच दिया जाता था । यह स्थिति केवल दान इसकी ही नहीं थी तो प्रत्येक सुराजी कुछ ऐसे ही मना स्थिति में था । रंगून के पतन कर समाचार सुनकर तो राम केशन ही रहू नाच नाचने लगा था रविवार गोद तीसरे ब्राॅन मेरे यहाँ आया बी आ रही थी और रामकिशन भी कुछ देर बाद सिर्फ देव भी चला आया । वो बहुत दिनों पर आया था किसी से उसे देखते ही प्यारी बोझ अरे आज की टाॅल के गया तो नहीं बोला सोचता हूँ किसी बुला रहे मैं तो नहीं डाला जा रहा हूँ फॅसने अब सब की शंका को वाणी दी और जो बहुत है कि लाला जी ने हमें इतने अनुनय विनय के साथ बुलाया है । यही तो हम भी नहीं सोचता रहे हैं । फॅमिली हो सकता है जेल की हवा खाने के बाद वो भी कच्चे दिखाने आ गयी । वो सौंप चाहे जंगल में चलता रहे हम मदारी की पिटार्इ में बंद हो जाये उसके विश्व में कोई फर्क नहीं पडता । बीजेपी दे बोला और विश्व तंत्र को तोड दिया जाए तो तब दो बच्चों का खिलौना हो जाएगा पर रहेगा । साथ ही सिर्फ देख हट नहीं लगा तो वहाँ पर आदमी में फर्क है । बिहारी बोली होकर खाकर कभी कभी सुधर भी जाता हूँ लगता है या पर भी गांधी जी का प्रभाव पड रहा है धान इसने कहा मैंने कई बार कहा है कि गांधीजी हिरदय परिवर्तन की बात तो करते हैं पर एक जिन्ना का हृदय परिवर्तन ना कर पाए किंतु हमने तो हिंदी परिवर्तन होते हुए देखा है । टिहरी बोली और उसने मनोहर का सारा संदर्भ दोहरा दिया हूँ पियारी के तरफ पर सब चुप हो गए । दिन तू लोगों का मन नहीं मान रहा था कि लाला में सचमुच कोई बदलाव आया है । ऍम तो एक दोहा भी सुनाया जिसकी दूसरी पंक्ति थी डाॅ बहुत हैं । नजरे जीता, जोर कमांड दुश्मन भी अधिक ने सरकार से बुलाए तो चलना चाहिए और फिर लाला तो दोस्त भी है, दुश्मन भी ऍफ का या मजाक प्रस्ताव बन गया और सब लाला के विश्ववेश्वर वाले मकान कर चल पडेंगे । हाँ अच्छा खासा जमा बडा था । हॉल तालान यहाँ तक कि चौक में भी लोग बैठे हुए थे । लाला बाहरी दरवाजे पर खडा सबकी अगवानी कर रहा था । वो टन इसको देखते उसे सीने से लगा लिया हूँ । ये भारत में लाभ भी अजीब था, दिल मिले चाहे ना मिले पर शरीर तो एक बार मिल ही गया वो उसने हम सब की भी अच्छी आवभगत की और हॉल में ले जाकर संभ्रांत लोगों के बीच बैठाया । वहीं अनाथालय के मैनेजर के साथ ही यानी बहुत ही बैठी थी और बगल में गांधी टोपी लगाए । छोटे सरकार भी नेपाली नरेंद्र बहादुर भी और एक गद्दीदार सोफे पर । कलेक्टर फिनले भी उन के बगल में ही कुछ और वो काम भी थे जिन्हें व्यक्तिगत रूप से पहचानता नहीं था । वो जान मैं अभी कुछ देर थी जो क्या बैठने की सजा, दान इसको कब कबूल होती है । उस ने मेरा हाथ पकडा और धीरे से हाल के बाहर आया हूँ । यहाँ मामला कुछ समझ में नहीं आ रहा है । तरह तरह के जानवरों को इकट्ठा किया है वो भी एक ही बाडे में । बात कुछ जरूर है इसके बाद मैं कुछ और पीछे आया वो जिससे उसकी आवाज मेरे कानों से टकराकर किसी और कान तक ना पहुंच पाए । देखते हो साले का चेहरा का हुआ है । उस ने फिल्म की ओर संकेत करके कहा जापान नहीं हो लिया दुरस्त कर दी है और अच्छा आते हैं कि हिन्दुस्तानियों को किसी तरह मिलाया जाये । ऍम मिशन आया था एक लुभावना सपना लेकर पर साले बैरंग लौटे ऍम थोडा भी गजब को भेजा रखता है उसने । उसके प्रस्ताव को पोस्ट ऍम क्या होता है पहले ही जानता था और ना मैंने उससे पूछा हूँ क्योंकि दानिस जब चालू हो जाता है ना तो उसे रोकना बडा मुश्किल होता है । हाँ, इसी मैंने बार बार अनुभव किया था और इस बार भी लगा था कि वह गांधी जी का आलोचक अवश्य पर उसके मन में उनके प्रति श्रद्धा की कमी नहीं है । उनकी देशभक्ति, उनकी ईमानदारी और उनके सत्य की मैं बहुत तारीफ करता है । पर उनकी अहिंसा उसकी समझ के बाहर है । आज कल सुभाष बापू सिंगापुर पहुंच गए हैं रे राजबिहारी बोर्ड से मिले देखना कोई गोल आवाश्यक खेलेगा । इसके बाद ही कुछ लोग उधर आ गए । फॅार साहब को प्यास लगी थी । ठंडी बीयर के लिए भाग दौड हो रही थी । अरे कितना भी ठंडा पिलाओ पर उसका कलेजा तार होने वाला नहीं है । कलेजे में तो आग लगी हैं । चेहरा धुआ धुआ हुआ जा रहा है । दानिश के बे मतलब बढ बनाने के पक्ष में मैं नहीं था तो कोई सुनेगा तो क्या कहीं का पर्व है । अपनी आदत से बाज आने वाला नहीं है । फिर भी उसने मेरी मनोस्थिति भात नहीं बढ । बढाना तो नहीं छोडा पर व्यवस्थान अवश्य छोड दिया । डाॅक्टर की ओर आया । निश्चित रूप से वह इस घर के जर्रे जर्रे से वाक्य था । वो इधर जनान खाना था । वहाँ पर तो के बैठने की व्यवस्था की । यहीं किनारे लालू भी बैठा था । वो हमें देखते ही बाहर निकाल आया । ॅ तुम दिया । मैंने कहा इन्हीं लोगों के साथ आया हूँ । उसने मुस्कराते हुए एक और संकेत दिया । वहाँ टाई के साथ अनाथालय की कुछ करते दिखाई थी हूँ । लालू का रोम रोम संतुष्ट तथा प्रसन्न था । शायद मेरे जीवन में पहली बार ऐसे समारोह में सम्मिलित हो रहा था । वो भी दर्शक बनकर नहीं वरन समारोह का एक अंग बनकर । फिर डानी वहाँ से भी एक दूसरे गलियारे की ओर मुडा जैसे लाला की पूरी कोटी ही मुझे दिखा देना चाहता हूँ । वहीं बगल का एक कमरा लगभग बंद था हूँ । हीटर से बिजली की रोशनी हूँ । उसने दराज से झांक कर देखा फिर मेरी गर्दन पर हाथ लगाकर मेरी भी आप दराज जब हटा दी । भीतर यशोदा मेकअप कर कपडे बदल रही थी मैंने जो ही अपनी गर्दन हाॅल बदल रही है उसने इतने जोर से कहा कि मैं वहाँ से कैसा क्या कहीं सुनने की तो क्या कहे कि मैं बाहर आ गया था और उसी ऑल की डैडी के भीतर हो गया जहाँ हमें पहले बैठाया गया था । तुम बडे डरपोक हो यार डाॅ फिर मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा तो देश सोचते वही हो जो मैं सोचता हूँ । अंतर यही है कि मैं बोल देता हूँ और तुम मुझे बनाए जाते हो क्योंकि तुम गुलाम हो मैं गुलाम मैं कुछ बोला नहीं केवल मुस्कराया हाँ तुम गुलाम हो । जो मन की बात कहना सके उससे बडा गुलाम और कौन हो सकता है? और मैं उस की गुलामी का जुआ उतारकर पे चुका हूँ क्योंकि जब तक मैं भीतर की गुलामी से मुक्त ना हो तब तक बाहरी गुलामी से कैसे मुक्त हो सकता हूँ । डानिश बडबडाता रहा कि हांथ जोडे हुए लाला आया और विनय की मूर्ति की तरह बीच में खडा हो गया । हाल की दृष्टि उस पहुँच गयी हूँ मैं कुछ बोल नहीं वाला था की उस की निगाहें इन लोगों पर पडी ऍम भाई वहाँ के खडे हो आज तो हमारे बगल में बैठे उसके कहने का ढंग ऐसा था की ये खिलखिलाहट कई अधरों को छोडती निकल गई । हम दोनों उस भरी हुई चौकी पर किसी तरह जगह बनाकर बैठ रहा हूँ । लाला ने बोलना शुरू किया । भाइयों आज हमारा सौभाग्य है कि आप यहाँ पधार रहे हैं तो इससे भी बडा सौभाग्य यह है कि अपने कॅरियर साहब की ओर संकेत करके खुद से आने की तकलीफ उठाई है । आखिर मेरी हैसियत ही किया है एक मामूली व्यापारी की । वो भी एक ऐसे व्यापारी की जिसने बडी बडी छोटी अनेक गलतियाँ की हैं जिससे मैं मैंने एक कमजोरियाँ हैं । मुझे लगता है मैं पागल आदमी हूं, नीज हूँ फिर भी आप लोगों ने मेरे यहाँ आने की कृपा की । मैं आपका आभारी हूँ । लाला का गला भर आया था । इसके बाद और अधिक नहीं बोलता हूँ सारी सभा पर एक अजीब सन्नाटा । ॅ लाला अपनी प्रकृति के सर्वथा विपरीत दिखाई दे रहा था । मानव प्रायश्चित की मुद्रा में हूँ पर मुझे ऐसा लग रहा था क्योंकि उसने अपने भाषण में ये भी कहा कि आज देशभर गंभीर खतरा है । हमें आपसी भेदभाव भुलाकर एक हो जाना चाहिए । इतना कहते हुए उसने जहाँ कलेक्टर की ओर देखा, वहीं दानिश और रानी बहु को नजर अंदाज नहीं किया । वहाँ एक ढेले से दो शिकार कर रहा था । एक तरफ हमारी और दोस्ती का हाथ बढा रहा था । दूसरी ओर खतरे का बेंगल बजाकर कलेक्टर साहब को भी सन्तुष्ट कर रहा था । मुझे लगा पुराना लाला भी मरा नहीं । व्यवस्था के घेरे में लाचार अवश्य हो गया है । जरूर इन सब के पीछे उसका कोई बडा मकसद होता हूँ । कभी कभी अधिक जुडने से भी विरोधी को एक अलग जाती है । लाल आके आदेश है विनम्रता मालूम दाने से कहने लगी जो बच्चों है वरना बाजी बात है डालने सकपकाया पर चुप चाप अपनी जगह पर बैठा रहा हूँ । उसके चेहरे का रंग बदलता रहा हूँ । रहस्य का और अधिक उद्घाटन हुआ । कलेक्टर फिर ले के भाषण है । लाला के बाद उसने अपने अंग्रेजी टोन में बैठे हुए हिंदी में बोलना प्रारम्भ किया और संक्षिप्त भाषा में कहा तो हमें खुशी है कि कल तक अलग अलग रहने वाले आज एक जगह पर इकट्ठा हैं । एक दूसरे के दुश्मन आजकल मिल रहे हैं क्योंकि आपका ऐसा होना सबसे जरूरी है आजादी के लिए भी और आजादी की रक्षा के लिए भी । आज क्रिप्स मिशन को कामयाबी नहीं मिली, ना मिले पाए । किसी ना किसी मिशन कंट्रोल कामयाबी मिलेगी और आप आसान होंगे । इस पर तालियां बजी पर जब उसने यही कहा कि आपसी फूट के रहे थे, आप शायद उस मिली हुई आजादी को भी गवा बैठेंगे तो दानिस गन मनाया और उठने उठने को हुआ । पर मैंने उसका हाथ पकडकर दबा दिया । मेरा विवेक कलेक्टर के भाषण के बीच में तो करने की अनुमति नहीं दे रहा था वो अब कश्मीर साफ थी । सारे आयोजन के पीछे लाला और फिर लेगी मिली भगत ले । ऐसे शासक आसन में बाहर ही खतरे के सामने हमारी एकता को खडा करना चाहते थे । इनके लिए बता रहै तरह के प्रलोभन का सहारा ले रहे थे । दूसरी तरह उसका लाभ उठाकर लाला ऐसे लोगों को अपनी तस्वीर की गंदगी साफ करने में लगे थे । अब भोजन का समय आया पहली पंगत के लिए लाला ने अपनी दृष्टि से संभ्रांत लोगों को झाड झाड कर उठाया । सरकारी अफसरों के लिए बगल में बडे कमरे में कुर्सी टेबल का प्रबंध किया । किलो छत पर बिठाए गए । वो एक और प्यालियां खडकने लगी और दूसरी ओर पूर्वे वापस टलों की खडखडाहट आरंभ होगा । किन्तु पहली संगठनाें यानी बहुत को छोडकर हमारी गोल का कोई नहीं उठाया । जानी बहु को मैं अपनी गोल का क्यों का हूँ? तो हमारे साथ आए भी नहीं थी । धान इसको या अच्छा भी नहीं लगा तक बढाया । ॅ साले ने अपनी बातों खाने पर बैठा दिया । फिर उसने बिहारी की और संकेत कर रहा हूँ । आपको भी पहली पंकज के लिए नहीं उठाया गया । वो आप के साथ हूँ । बिहारी मुस्कुराते हुए बोली मेरे साथ होने से क्या होता है? पीआर तो है आपकी । दानिश ने इस ढंग से कहा और ऐसे दिलाया कि मुझे भी अच्छा नहीं लगा । थोडी देर बाद लाला दौडा हुआ आया लगता है उससे मेरी मनोस्थिति की गंद कहीं से लग गई थी उसने हाथ जोडकर का ऍम मिनट के देर है । संगत उठाने वाली है । आप लोग तो घरी के आदमी है । मैंने सोचा पहले बाहर वालों से निपट लू नहीं नहीं कोई बात नहीं इस बार ऍफ फिर भी घर चला गया । धान इसकी अगले बताओ अपने ही लोगों को भारी पड रही थी । पर इसमें ईमानदारी का इतना प्रकाश था की हम उस की आज को भी बर्दाश्त कर लेते थे । किंतु इस समय लाला के निवेदन पर वह भी शांत हो गया । वो बगल के कमरे से प्यालियों और चम्मचों की खडखडाहट ए कुछ तेज नहीं तो साफ जाहिर था कि साहबों का खाना खत्म हो चुका है । उस कमरे से भी एक बाहरी दरवाजा था । बोल लाला ने सबको अभिवादन करते हुए उधर से ही पैदा किया । उसी कमरे से हमीर निकला और हम लोगों के बीच आकर बैठ गया । ऍम मेरा आश्चर्य मैं इतना खेल पाया था कि उसने बताया कि सहारों का खाना अलग पकडा था और बावर्चियों की देख रेख में लगा था । उधर भी जो रायॅल खाने भी आ गए हम किशन ने कहा यही तो जिंदगी भर ॅ अपनी सच्चाई पर वाॅटर उसे लगा कि नहीं क्या क्या किया उसने फिर लीपापोती आरंभ कि आखिर घर घर कबतक अब तो सब एक ही है । पहली मंगत वोट चली थी । लोग पान चबाते और सिगरेट के शौकीन के ही आप पासिंग अशोका धुआँ उडाने नीचे चले आए थे । बगल की अंधी गली में झमझम की आवाज के साथ ही कुत्तों के भौंकने का स्वर्ण और बच्चों का कोलाहल सुनाई पडा तथा ऊपर से कोई चीज की जा रही है और कुछ लोग उस पर टूर पढ रहे हैं । दानिश के लिए ऐसी परिस्थितियां आज सहन हो जाती थी । वो एकदम बाहर निकल गया । पीछे पीछे में भी बाहर चला पर बिहारी द्वारा रोक लिया गया क्योंकि दूसरी पंकज के लिए लोग उठाए जा रहे थे । उसमें हमारी भी भरी थी । फिर मैं भी बाहर आ गया । छत के एक ओर की सफाई हो चुकी थी तो काट के लम्बी पट्टी पर लोग बैठाए जा रहे थे । दूसरी ओर के बदले बटोरकर उसी अंधी गली में फेंकी जा रही थी । मैंने ऊपर से ही देखा, उन पर कुत्ते लगाए और भिखमंगों के साथ ही आज बनाएंगे । गरीब बच्चे टूट पढ रहे थे तो उसके बहुत कर गायों को तो पीछा कर देते थे पर आदमी और कुत्तों ने जैसे समझौता कर लिया था, बिक मांगे झूठन से अपनी झोली भर रहे थे । किन्तु कुत्ते और बालकों की जीभें सामान रूप से झूठी पत्तलों पर चल रही थी । मैंने पहली बार देखा था की धोखा आदमी और जानवर का भेद मिटा देती है । दूर खडा चुपचाप डाॅॅ शायद यही देख रहा था । उसका स्थिर मॉल उसकी मूखर्ता से भयानक होता था । निश्चित रूप से वह किसी विस्फोटक स्थिति में था । तब तक मैं बिहारी द्वारा बुला लिया गया क्योंकि मेरी पंगत पर उसी जा चुकी थी । नाला ने कई बार हम लोगों को देखा और फिर पूछ ही बैठा ऍम कहाँ है? मैंने संकेत से उसे बताया । उसने ही खाली की और जहाँ का और ऊपर से चलाया ऍम भाई तो भारी पत्ता लगाए जा चुकी है । तो पहले आप बाहर वालों से निपट लें तो मैं तो घर का आदमी हूँ । अपने दोस्तों के साथ आखिरी बंगाल में बैठ जाऊंगा हूँ । नीचे से उठी दानिश की आवाज आते आते छितराकर हल्की पड गई थीं । लाला गंभीर हो गया । जरूर को सोचने लगा था पर कुछ बोला नहीं, खाना खिलाने की व्यवस्था में लग गया । सभी लोग तो बैठ रहे हैं फॅसने आखिर किन दोस्तों की बात कही है । ऐसा तो नहीं है कि उसने सोचा होगी मैं नहीं बैठा हूँ । फिर यदि वह मुझे अपने साथ बैठने के लिए कहेगा तो क्या कहूँ कहूंगा की बिहारी नहीं जबरदस्ती क्या मैं मुझे अपने साथ ही घर ले जाना चाहती थी । ये गाने भी बडा विकसित राज है । रामकिशन की है आवाज प्रतिक्रिया शून्य रहे गई और फिर भी आगे कुछ कह नहीं पाया । भोजन समाप्त कर जगह हम नीचे उतरे । डाॅ तो सीधे भागता हुआ बाहर आया । बाहर खडा दानिश भिखमंगों और इन गरीब बच्चों को जूठी पत्तलों से हटा चुका था । मैं उसे घेरे हुए खडे थे पसंद नहीं क्योंकि ॅ के दोस्त बन चुके थे । मैं उनसे कह चुका था कि तुम सब मेरे साथ खाना खाओगे । जैसे उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ । वो उन लडकों में से एक तो अपने दोस्तों को बुलाने के लिए ही होता जा रहा है । शायद अपने जीवन में इतना अच्छा भोजन में नहीं पा सके । लोगों को विदा देता हुआ लाला भी बाहर आया । उसने दाने से पुराना का मेरे यहाँ आप तो खाने चलते हैं । मैंने कहा ना मैं तो घर का आदमी हूँ दोस्तों के साथ सबसे बाद में बैठूंगा वो तुम्हारे दोस्त तो कब के खा चुके हैं । कहाँ खा चुके हैं वो तो मेरे साथ खडे हैं उन भिखमंगे और बच्चों के विस्फारित ऍम हालांकि आकृति पर डॅालर भी चुप चाप उन्हें देखता रहा हूँ । फिर कहे भी तो क्या कहीं दम नहीं तमाशा खडा कर देते होता नहीं लाला झुंझलाया और अपने क्रोध को दबाता हुआ भी कर कुछ किया हूँ । तमाशा ही फॅसा हूँ आदमी और कुत्ते में फर्क करना जरूर तमाशा है । जाहिर था कि दानिश का यह व्यवहार अधिकांश लोगों को अच्छा नहीं लगा । स्वयं रामकेशव और तैयारी भी उसके पक्ष में नहीं थे । जानी बहुत ही उसे समझाना चाहती थी । इस दे वक्त की शहनाई से क्या फायदा हो, पर म्याऊं का भुगतान पकडे सब जानते हैं कि दान इसका विद्रोह जब फनकार घर खडा हो जाता है तब फुंफकारने के सेवा और कुछ नहीं जानता हूँ । इसी से किसी ने कुछ विशेष नहीं कहा हूँ । हमीद भी बाहर निकाल आया था । उसने बडे ढंग से उसे बुलाते हुए कहा हूँ अरे दरा सुनना जी है । उसके पास क्या ताॅबे को उसे दिखाकर पूछा तो मैं ऐसे बहुत जानते हो । हमें समझ नहीं पाया की ढाणी क्या कहना चाहता है । ये सब तुम्हारे तरह है । हम ईद का चेहरा लाल होने लगा हूँ । यानी बोलता गया ॅ होने वाले कोई बात नहीं है । सच मुझे हमारा हमारा प्रतिनिधित्व करते ध्यान इस ने अपने को शामिल कर धनी क्रोध को दबा दिया । फिर भी मैं चकित हो उस की ओर देखता रहा । धान इस बोलता गया । इन कुत्तों की अर्थव्यवस्था भी हमें लोगों जैसी है । यदि हमारे तुम्हारे जैसे हैं तो वह देखो वो लाला जैसा है । उसने छोटे सरकार की कार की ओर संकेत क्या जिसकी पिछली स्टेट से उसका अल्सेशियन झांक रहा था । डाॅन के इस कथन पर लाला की प्रतिक्रिया बडी थी की थी तो देखिए दोनों का भी सीधी नहीं हो सकती क्योंकि उसने देखा डानिश को मिलाना या उसके मन में बनी अपनी तस्वीर पर नहीं रेखाएं खींच पाना पर लकीर खींचना है । काफी देर हो गई थी । मैं बिहारी के साथ चलाया तो दूसरे दिन पता चला कि हम लोगों के आने के बाद फॅसने हंगामा खडा कर दिया था । वे भिखारियों और गली के बच्चों को लेकर ही पंगत में बैठना चाहता था । पर लाला के आदमी इसके सख्त खिलाफ थे हूँ । हमेशा की तरह रहना अपने आदमियों को लगाकर फट गया था । इन सबको क्यों नहीं खिलाओगे धान इसमें रोकने वालों से पूछा तो हम लोगों ने कह सकता ठेका ले रखा है और आपको निमंत्रण है किंतु आप सडक के कुत्तों को कहीं है कि हम खिलाडी ये कैसे हो सकता है । तो क्या यह सडक के होते हैं और नहीं तो क्या हूँ? अगर ये कुत्ते हैं तो वे क्या है उन धान । इसने इस बार गुर्दों की ओर इशारा करके पूछा और जोर से हंसा वे भी होते हैं और ये भी कुत्ते हूँ । अरे हमारे लाला की नुमाइंदो अट्टाहास करता हुआ बोलता गया । उनको तो के काटने बार लाला दसौली जाकर अठारह सौ या लगाकर बढ जाएगा । पर जब ये कुत्ते काटेंगे ना तो लाला के साथ तुम सब लोग पागल होकर मरोगे । क्योंकि भूके इंसान के कांटे की दवा नहीं होती । इसलिए इन कुत्तों को खिला दो । मेरी बात मानो सुना है । इसके बाद भी वे लोग उन्हें पंगत में बैठाने के लिए तैयार नहीं हूँ । चार चार दुनिया और सब्जी बांटने के लिए किसी प्रकार राजीव ॅ इतने पर मानने वाला कहाँ था? मैं सबको लेकर लाला के फाटक को घेरकर सत्याग्रह कर बैठा । अभी डॉक्टर के लोग भीतर बाहर के लोग कहाँ है? अजीब स्थिति पैदा हो गई थी । ऍम किशन ने बताया कि लाला को अंत में झुकना ही पडा । उन सबकी पंगत बैठी सत्याग्रह है । विजयी हुई ऍप्स कृष्णा पर गरीबों को रोटी कांडी ही दिला सकता है । इस घटना की गंभीर प्रतिक्रिया हुई हूँ । अधिकांश लोगों का विचार था कि दान इसको ऐसा नहीं करना चाहिए था । यदि मान ना मिले तो आपना चाहिए और यदि आप जाते हैं तो आपको आप प्रदान नहीं करनी चाहिए । माँ का भी कुछ ऐसा ही मत्था पीटीआर्इ से सारी घटना सुन लेने के बाद बस इतना ही बोली गाय टिहरी के बजट को और ओटावा कपास किंतु कुछ लोग ऐसे भी थे जो दान इसके इस व्यवहार की आलोचना के साथ ही ये भी कहते थे कि लाला इसी का बात रहे हैं । जो भी कुछ हुआ अच्छा ही हुआ तो ही दिन देते होंगे । जुलाई की संध्या भी कर लतपत हो रही थी । बादल बढते जा रहे थे मैं लालटेन जलाकर डालन में पडने की तैयारी में था कि गंगा राम आज की ताजा खबर लेकर आ धमका मैंने उसे बैठाया पर बातें बहुत धीरे धीरे आराम वकील हूँ जो की माँ सुनेगी तो बिगडेंगी हूँ । मैं नहीं चाहती थी कि उनका लाडला पढाई की अतिरिक्त कहीं समय गवाएं हो । गंगा राम ने बताया कि हो सकता है आप आंदोलन तेज हो जाए और गांधी जी अंग्रेजों से भारत छोडने के लिए कहे किन्तु कहने से कोई बारह थोडे छोड देगा । धानी ठीक ही कहता है की आजादी खून बहाने से मिलती है वहाँ जोडकर गढ बनाने से नहीं मैंने कहा और फिर इसी संदर्भ की एक बहस में हम दोनों के बीच में नहीं चलते चलते उसने यह भी बताया कि लाला के यहाँ के दावत की खबर सद्भावना गोष्ठी के नाम पर छपी है । ये सद्भावना दोस्ती क्या होती है? भगवान जाने सहयोग कुछ ऐसा की जो ही गंगा राम निकला तो ही दानिश ने प्रवेश किया । एकदम भीगा हुआ सराबोर मेक दहाडता हुआ भरा रहा था । उसने आते ही कमीज उतारकर गा रही हूँ । आज रहे अपनी प्रकृति के सर्वथा विरुद्ध गंभीर दिखाई दे रहा था । जरूर कोई बात है । पहले कुछ बोला नहीं किन्तु जब मैंने उसे कपडा बदलने वाला बैठने के लिए कहा तब कुछ भरी और दबी आवाज में बोला वो नहीं मैं आऊंगा नहीं । कल किसी समय आ जाते हैं तो बडा अच्छा होता हूँ । क्यों एक बडी जरूरी बात है और वह चुप चाप कुछ सोचने लगा हूँ । अवश्य ही लोगों ने लाला के साथ उसके व्यवहार की आलोचना की होगी । अब जो हो गया उस पर इतना सोचने की क्या आवश्यकता हूँ । आवश्यकता तो नहीं थी पर सोचना पड रहा है । वह ऐसी ही गंभीरता से बोला हूँ । पर कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि लाला इसी का बात था । मैंने कहा अब मुस्कराया, मेरी बात पर नहीं, वारंट अपनी भूल पर ऍम बात नहीं है । लाला तो उसी का पात्र था और है भी तब कौन सी बात है? मैं आने पर ही बताऊंगा हूँ और चलने को हुआ । मैंने उसे फिर टोका । पर कुछ लोगों का विचार है की तो मैं ऐसा नहीं करना चाहिए था । वाले ही लोगों का विचार हो । पर मैंने जो भी किया ठीक किया । फिर उसने विस्तार से मुझे समझाया हूँ । ये तो तुम जानते ही हो कि मैं संगत में बैठाया नहीं जाता हूँ क्यों? क्योंकि मैं मुसलमान हूं । मेरे बैठते ही बहुत सारे रोड जाते । देखो हम ईद भी पंगत में नहीं बैठा था । इसी स्थिति को बचाने के लिए मैं निकल आया और फिर लाला को बेनकाब करने का मौका भी मिल गया । मैंने सोचा इसका मुखौटा अच्छी तरह उतार ही दो दिन तो ये अवसर नहीं था । यही तो सबसे अच्छा दरधा उसने मुझे नकारते हुए कहना जारी रखा हूँ । इतने लोगों के सामने उसे नंगा करने का क्या मतलब था? उसकी स्थापित हो रही छवि को जोर कर बिकेट देना । उसके नाटक का पडता पार्श् करना हूँ और एक बात और हो गई । मैंने गरीब और सडक के आदमी को गांधी जी की महत्ता समझाई । धीरे धीरे वास्तविक रूप में आने लगा हूँ आ गई ताकि आंदोलन कुछ लोगों का ही आंदोलन है अधिकांश लोग इससे टेस्ट का वो उदासीन हैं । चकता क्या आंदोलन धरती का आंदोलन नहीं होगा, आम आदमी से जुडेगा नहीं । गरीब किसान और मजदूरों की इसमें हिस्सेदारी नहीं होगी तब तक आजादी की लडाई जीती नहीं जा सकती । मुझे का डानिश यथार्थ के धरातल पर बडी दृढता से खडा है । लेकिन जब उससे मैंने पुनहाना बैठ जाने को कहा हूँ फिर गंभीर हो गया । मानो कोई दार उसके भीतर झनझना उठा हूँ । कल आ जाते तो बडा अच्छा होता । उसने कहा पर बात क्या है मैं समझ नहीं पाया और नाम है बताने की स्थिति में था । जब चला पानी हम चुका था पर बादल अब भी पसीज रहा था । मैंने इस स्थिति की कल्पना नहीं की थी । स्कूल से छोटे ही मैं सीधे दान इसके घर पहुंचा हूँ । आज आसमान साफ था, संध्या अपना आंचल बटोर चुकी थी । बिना किसी झिझक के पहले ही दस्तक पर दरवाजा खोल दिया गया तो सलमा दिखाई नहीं हूँ । मुस्कुराती हुई नहीं बल्कि खोई हुई नहीं । ऐसा लगा जैसे कोई बात हो गई है मैंने ये दृष्टि चारों ओर दौडाई झूठ है बडता नाली पर पडे पडे आ गए थे जैसे कई दिनों से खाना बना हूँ । अम्मीजान अंधेरे नहीं जो चार डालन में लेती भी वो माहौल उदास और बोझ था भाई जान कहाँ है? मैंने सलमान से पूछा तो उसने दाहिनी ओर की कोटरी की तरफ इशारा किया ऍम आ रहे थे डॅडी लेता था क्यों इतने उदास क्यों? मैंने पूछा क्या बताऊँ? जानबूझ कर मुसीबत मोल ले नहीं फॅसने हाथ पकडकर मुझे अपनी बगल में बैठाया और धीरे धीरे खोलने लगा हूँ । उस दिन नहीं लाला यहाँ से तुम्हारे चले आने के बाद मैं फिर यशोदा के कमरे की ओर गया था । मैंने झांक कर देखा हूँ । मैं अपना श्रंगार उतार रही थीं वो जो ही गहने श्रंगार दान पर रखकर वे भीतर की कमरे में कपडे बदल नहीं गई । मैंने उसके गले का देश कीमती हार डालियाँ और धीरे से बाहर चला आया । वो इतना कहकर अपनी जेब से निकालकर जडाऊ हार मुझे दिखाया । ॅ तो कई हजार रुपए का होगा हूँ मेरे मुख से निकला हूँ हार उठाते समय तो मैं किसी ने देखा नहीं, नहीं बिल्कुल नहीं यहाँ तक कि भिखमंगों केवस पंगत में बैठकर भोजन करके जब मैं उठा तो यशोदा से मिला था और से बोला था मेरी तो अच्छा जी की आपको जबरदस्ती अपनी संगत में बैठ आता हूँ । पर आप समय दिखाई नहीं पडी । तब उसने क्या का जो रही थी? उदास थी और चिंतक धान । इसने उससे मिलने का कारण स्पष्ट किया । मेरा मकसद तो यही था कि उसका मेरे ऊपर कोई संदेह हो । इसलिए चलते समय भी मैंने उसे छेडकर बातें पर तुम्हें अच्छा नहीं किया । मैंने कहा हूँ अब मैं यही सोचता हूँ । पर उस समय ऐसा लग रहा था कि मैं ठीक कर रहा हूँ । तुम यकीन नहीं मानोगे जग्गु भाई । जब मैंने इतने देवराज एक जगह देखें तो मेरे भीतर बैठा कोई झटपटा उठा । मुझे लगा एक और इतनी दौलत और दूसरी ओर जूठी पत्तलें चाटते लोग तो क्यों नहीं है उन गरीबों में चर्चा पांच दिया जाए तो यह तो आजादी के बाद होगा । ये मैंने कहा पर चुराकर नहीं छीन कर बता जाएगा और दहाडते हुए कहा जाएगा कि इस पर अब तुम्हारा कोई हक नहीं है । ये सब गरीबों के पसीने की कमाई हैं, जिसको तुमने हरा करके रखा हुआ है हूँ हो गया हूँ । मैं कुछ जल्दी ही कर बैठा हो । कुछ दुःख गर्व बोलता रहा हूँ । सोचा जब कांतिकारी लोग पार्टी चलाने के लिए सरकारी खजानों पर डाका डालते हैं तब क्यों नहीं मैं भी कुछ इकट्ठा कर लोग रोज रोज चंदे के लिए, हर व्यक्ति के सामने हाथ फैलाने से तो छुट्टी मिलेगी । किन्तु जब हम चंदा मांगते हैं तब पैसा ही नहीं मानते । उस व्यक्ति की सहानुभूति भी मानते हैं और तुम जानते ही हूँ । किसी आंदोलन के लिए पैसे से अधिक जन सहानुभूति आवश्यक होती है । मैं बोलता हूँ फिर मांगने और चोरी करने में फर्क भी तो हैं । एक गंगा जैसा पवित्र और दूसरा गंदले नाले जैसा दोषित यहाँ है तो उसकी आवाज कोई डगमगाई हो । लेकिन जब जवान होती हुई सलमान मेरे सामने आती है तो कुछ सोचने लगता हूँ । इतना कहना था की अम्मी जहाँ एकदम कोठरी में घुस आईं तो क्या तो उसकी शादी चोरी करके करेगा । अरे कमीने! कभी ये तो सोचा होता है कि मैंने कितनी तकलीफ से तो मैं पाला पर कभी नहीं खराब नहीं । उन का ग्रोथ पडा । मुझे लग रहा था कि वह और सलमान बाढ में खडी होकर हमें सुन नहीं थी । काफी हुई । हम में जानकी दुर्बल दे भाव की और ग्रोथ आंखों से बहने लगा । ऍम बताती हूँ, मेरा दाहिना हाथ का कट कर मुझे चली पीछे पीछे दानिस और सलमान एक ऐसी सलमा इससे काठ मार गया था जिसे ज्ञान हो गया था कि मेरी बढती उम्र के कारण ही भाई जान को यह तो कर्म करना पडा है । दालान में जहाँ बकरियां बंधी थी वहीं एक बडी सी चक्की जमीन में खडी थी । वहीं आकर रुक गई और बोली हूँ इसी चक्की को बीस बीस कर मैंने इन दोनों को पाल आएं पर कभी बेईमानी नहीं । इसके बाद उसने अपनी मुसीबत की कहानी सुनानी शुरू की । इसकी अखबार जान बनारसी साडी के बडे अच्छे कार्य करते पर उनका अपना करेगा नहीं था । अहमद मिया की यहाँ बुनाई करते थे । मैं हमारे अच्छे दिन थे । दोनों वक्त की रोटी नसीब हो जाती थी । पर अल्लाहताला को कुछ और ही मंजूर था । दो दिन के बुखार में ही फॅसे । तब ये कमीना तीन साल का था और सलमान मैं छह महीने की हमें क्या करती? पदार्थ मशीन औरत थी जाती तो कहाँ जाती? मैं कुछ रुकी उनका मौन अधित की गहराइयों में खोता चला गया हूँ । बीबीसी घर के सामने गली के उस तरफ जहाँ अब एक पक्का मकान खडा है, वहीं जो पडी थी उसी में रम देखा परिवार रहता था । उसका शौहर मूंगफली बेचता हूँ और वह चक्की बेटी थी । उन दिनों पाँच सेर गेहूं की पिसाई तो पैसे मिलती थी, उसी रन देने यहाँ चक्की भी दी और बेचारी महाजन के यहाँ से ये हूँ भी ला देती थी । इतनी वाली है । मुझे स्पष्ट लगा कि वह भावुकता में डूबने लगी हैं । फिर सांस लेकर वह पुनः बोलने लगी । तीन बजे बैठ जाती थी । पांच सिर्फ पीसते पीसते सवेरा हो जाता था । लोगों ने ये भी राय दी कि आधार से गेहूँ निकाल कर यदि उसकी जगह सफेद जो गरीब भेज दे तो तुम्हें एक पैसे की और भी बचत हो जाएगी और किसी को पता भी नहीं चलेगा । पर मैंने ऐसा कभी नहीं किया । भूखी रह गई, पर नियत खराब नहीं । फिर किट किट आते हुए उन्होंने दाल इसकी और देखा और इसका मैंने चोरी की । लगता है जैसे मेरी औलाद दी नहीं है । आज तो छुट्टी होगी इसके अब्बा कीरू ऍफ उनकी आंखों से तब अपने लगा अम्मीजान का कहना था की दान इसको खुद हार्ले जा घर लौट आना चाहिए और लाला से माफी मांगनी चाहिए । ऍम इसके लिए तैयार नहीं था । प्रयास हार तो बता सकता था, पर माफी नहीं मांगेगा । आखिर उससे माफी क्यों मांगें? जिसके अपराध जिन्होंने खोले के ढेर की तरह उसकी आंखों के सामने सादा बिल बनाया करते हैं । उसने अबराज नहीं गलती की है । मैं उसे सुधर सकता है, लेकिन तो माफी नहीं मांगेगा । बढनी जन अपने निश्चय पर फॅस अपने निश्चय पर इस मानसिक खिंचावने घर के वातावरण में जहर खोल दिया । दो दिनों से चूल्हा नहीं जला । ॅ मेरे माध्यम से समाधान निकालना चाहता था । उसका कहना था कि मैं ले जाऊँ और लाला को देकर कहूँ कि उस दिन मैंने इस गलियारे में गिरा पाया था जिसका हो से आप सौंप दी । बनाया था तो उस समय लौटा देना चाहिए था । यदि लाला पहुंचेगा तो क्या कहूँ मैं बोलत पर अब तो कई दिन हो गए हूँ । मैं चुप हो गया । सोचने का मुझे कोई रास्ता नहीं सोच रहा था । लगा जैसे मैं अंधी गली में खडा हूँ । इसी समय पत्थर के तरह भी जान की आवाज मुझे टकराई हूँ क्या देना कि दाने चुराकर ले किया था । अगर तुम नहीं कहोगे तो मैं कोई में डूमर होंगी तो हम नहीं जान का करो । हद से बाहर था तो लगा की सच मुझे मैं कुछ भी कर सकती हैं । डाॅ गया उसके अहम की बर्फ पिघलने नहीं तुम कह सकते हो कि मैंने चुराया है ऍम अब मुझे ही कोयम्बेडु मरना होगा । फिर रहे उसी कोठरी में जाकर चुप चाप लेट गया । हाँ, अब नहीं था मेरे हाथ में हार था हूँ । सामने हम नहीं जानती । दिन लगा था और उस धुंध लगे में शर्मा के चेहरे पर चिपक । टीचर तो की आकृति थी तो मैंने स्थिति को संभालने की कोशिश की । इसे जरूर लाला को लौटा देना चाहिए । मैं जरा जोर देकर बोला पर एक बात में समझ में नहीं आएगा क्या? यही कि उस व्यक्ति के सामने सत्य की अहमियत क्या है जिसकी सारी जिंदगी झूठ पर टिकी है । अम्मी जान मुस्कराईं मुझे लगा कि तनाव कुछ जीरा पडा । फिर बडे विचित्र अंदाज में दिए की ओर इशारा करते हुए मैं बोली इस अंधेरे में उस दिए की अहमियत है नहीं, कितना छोटा कर दिया है और कितना बडा सा देर हो स्टार्क के समक्ष क्या कहता हूँ हम नहीं ध्यान ही बोलती चली गई वो तो सच कहकर देखो तो लाला पर क्या प्रभाव पडता है । क्या तुम लोग ना कह सको तो मैं ही सलमान को लेकर चली जाऊँ और कहूँ कि मेरे लडके से गलती हो गई है । माफ करो नहीं नहीं तो मैं नहीं जाना है वहाँ मैंने झटके से उठा और बाहर निकल आया । ॅ सलमा को लेकर कभी भूल से भी उसके घर मत जाना । वो आदमी नहीं जानवर है । नहीं नहीं आप के जाने की आवश्यकता नहीं । मैं पुणा संभालने की कोशिश करता हूँ । मैं घर जाऊंगा और आपकी भावना का आदर करते हुए जो भी संभव होगा करूंगा । किसी तरह अम्मीजान मान गईं । मामला ठंडा बडा अंधकार में आगे बढा चला जा रहा था मूल पर गली का ऍम आ रहा था होया अपना हीमो देख रहा हूँ रोशनी की दर्जा पर पि ऍफ हराया पर शीघ्र ही मेरे भीतर एक आवाज गूंजी तोहरे खेत में हजारों का हार है और तुम खेले हो यदि कोई छीन लेगा तो तुम क्या करोगे हूँ मेरा भाई ही मेरा पीछा करने लगा मेरे पैर और तेजी से आगे बढे वो मैंने कहने को तो कह दिया है पर अब क्या करूंगा? मैं सोचता रहा उस राज अधिकांश अता नरेंद्र मेरे सिरहाने ही बैठी रही बहुत कम में उससे लिपटकर हो सका ऍम सुबह स्टार छोडते समय इसी निष्कर्ष पर पहुंचा की सारी बातें प्यारी से कहूँ वही कोई रास्ता निकाले मेरे हस्बैंड की जेब में अब बाहर भी चुप चाप पडा था किंतु वह इतना भारी है कि अपनी उपास्थिति का एहसास हर गौर से देखने वाले को करा जाएगा । हो सकता है मेरी आशंका निर्मूल हो किंतु मैं अपनी माँ की प्रकृति से इतना नया तो था की रह रहे घर में रहा मुझे पर चला जाता था वो हिन्दू में क्या करूँ, कहाँ बताऊँ ले देकर मेरे पास एक ही जगह । वहीं ठाकुर के सिंघासन के पीछे अहमियत की गंदी किताब भी वहीं छिपाई थी । डानिश की क्रांतिकारी पुस्तक भी । वहीं अब क्या ये हार भी नहीं छिपा दूँ ना देख लेंगे । तब ऍम को तो उन्होंने देख लिया होगा जो हेमा रामकली दादी के यहाँ हनुमान जी का पूजन करने गईं । अवसर पाते ही मैंने अपना सारा अंतर मर्थन बिहारी के सामने उगल दिया । उस हार को देखते ही मैं चकित रह गईं तो बडा बुरा हो गया । मैं बोली थीं जो हो गया सो हो गया । आप इसे किसी तरह लाला को लौटा दीजिए नहीं तो अम्मी जान कोई में कूद कर जान दे देंगे । फिर मैंने विस्तार से दान इसके घर की परिस्थिति से उन्हें अवगत कराया । कुछ देर बैठ चुप चाप सोच ही नहीं फिर बोली हूँ मेरा ले जाना ठीक नहीं होगा । ऍम सोचने लगी । उस की मुद्रा से लगा कि वह कहना चाहती थी कि मुझे नहीं लेगा नहीं उसने मुझे लौटा दिया । तब उस ऐसान को चुकाने के लिए कुछ भी करना पड सकता है । अचानक उसकी मुद्रा बदली । अरे लाला बडा पैसे वाला है दो चार हजार के हार से गोचर की कौन सी टांग टूट जाएगी वो भी धान इसके ही मत की दिखाई थी कि से बैठकर पार्टी का काम चलाया जाए और अम्मी जान से कह दिया जाए कि लौटा दिया गया है तो बडी बच्चे हैं । लाला से जाकर पूछ कर सकती है । यदि ऐसी बात है तब तो मुझे लौटा ही दो । पर मैं क्या कहूं की इतने दिनों तक से मैं इसे रखे क्यों रहा हूँ? ऍम की उसे दिन लौटाने के लिए खोज रहा था पर आप मिले नहीं । फिर आज कल करते करते देर हो गई तो सरल है किंतु ऍम तैयार नहीं हो रहा था । ऊँचा हो जाओ, अभी चले जाओ, मिल जाएगा नहीं तो देर हो जाएगी तो वह भी घर से निकल जाएगा जहाँ वो जल्दी करूँ । कहाँ भेज रही है सवेरे सवेरे मान ने घर में घुसते हुए पूछा वो मुझे ऐसा लगा मैं एक बार फिर झारखण्ड छोड दिया गया । बिहारी ने एकदम बात बदल दी । ये कोई कभी देने अपने दोस्त के यहाँ जा रहा है । वहीं कह रही थी कि जल्दी करो जाओ जाओ नहीं तो स्कूल जाने में देर हो जाएगी । वहाँ कुछ नहीं बोली जो जहाँ पूजा के घर में चली गई । पीआरए ने संकेत क्या कि जल्दी से एक कॉफी निकालो और चलते वरुण हाथ में कॉफी लिए और जेब में हार दबाए । जब मैं घर से निकला हूँ तब आठ बच्चे थे । वो मेरे चाचा की दुकान खोल गई थी । मैं उधर बडा भी । अचानक मुझे याद आया कि आज मंगल है । हाला अवश्य मृत्यंजय के हनुमान जी का दर्शन करने आएगा । तब क्यों नहीं वहीं कार्य संपन्न कर डालूँ । मेरे रास्ता साफ था पर मस्तिष्क अनेक प्रकार की संभावनाओं और प्रश्नों में उलझ । क्या यदि लाला अभी मंदिर न आया होगा तो क्या करूंगा और यदि आकर लौट गया होगा तो यह होता तो होगी । उसी को हार देकर लौटाऊंगा । क्योंकि कुछ तोले का हार अब मेरे मन पर कई मन का बोझ डाल रहा था । उसे जल्दी से जल्दी किसी भी तरह में उतारकर एक देने के पक्ष में था । प्रभु की बडी कृपा की मंदिर के पास पहुंचती ही लाला का लंगडा नौकर डोलची लिए दिखाई दिया मैंने । मैं संजय महादेश को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया भगवान वही स्थिति से किसी तरह बारों और बीट है । हनुमान जी के मंदिर की ओर जलाऊं । दूर से ही देखा लाला लकडी की एक बडे बंदे के तहत मूर्ति के समक्ष डंड बता प्रणाम करते होगे । ढोलका यशोधा पीछे हाथ जोडे घडी है और मैं लंगडा सदा की भांति पिछले हमने के पास खडा मुझे हो रहा है क्यों? जो मैं पास आता जा रहा था । मेरा मन उद्वेलित होता जा रहा था । आखिर कहूँ तो कैसे कहूं? निकट आकर हनुमान जी को प्रणाम करता हुआ आंख मूंदकर हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा । लाने देखा वहाँ पर कुछ बोला नहीं, फेरी करता है मेरा पांच चलता रहा हूँ किन्तु उसकी फेरी समाप्त हो गयी । वह चलने का हुआ । फिर भी मैं मुझे कुछ बोला नहीं और ना अन्य दिनों की भांति प्रचार ही दिया । ॅ जरूर उस दिन के दाने के व्यवहार से नाराज है । पार्ट के मध्य में मैं कभी किसी से बोलता नहीं था, पर उस समय मेरी रहता ही बोल पडे तो मैं आपके घर जाने वाला था, पर अच्छा हुआ जो आपसे भेंट हो गई । लेकिन अमृता ऊपर से और उसकी नाटकीय मुद्रा प्रश्न बातचीत हुई हूँ । मैंने ढंग है हार जीत से निकाल कर उसकी ओर बढाया हूँ । उस दिन के हार मैंने आपके यहाँ गिरा पाया था । आप को लौटाने आया हूँ । उसने हार हाथ में लिया देखा आठ से यशोदा की ओर बढा दिया । उसने एक रहस्यमयी दृष्टि मुझ पर देगी तो उस दिन और लौटाने आए । आज बॅास पडा स्थिति के लिए मैंने बडी तैयारी की थी फिर भी पसीना छोटे लगा हूँ । मैंने उसी दिन सोचा था कि आपको लौटा दूं । मैंने बहुत खोजा पर आप ना मिले और ना नहीं । मैंने यशोदा की ओर संकेत करके कहा और कहता गया फिर काम आता गया और देर हो गई । उसने हार लौटा हैं के लिए मुझे धन्यवाद नहीं किया बल्कि अजीब ढंग से हस्ता रहा हूँ । फिर उसने यशोधा को संबोधित करते हुए कहा हूँ की ऊंची तुमने तो कहा था कि जो ही में हार श्रंगार दान पर रखकर भीतर कपडे बदलने लगी रहे गायब हो गया । पर इसमें तो दालान में गिरा पाया है । अब तो मेरे पहले के नीचे की धरती खिसकने लगी हूँ । मुझे लगा कि मैं घर जाऊंगा । यशोदा की आवाज ने मुझे एक धक्का मार दिया । जी हां मुझे ठीक की आधे मैंने उतारकर श्रंगार कार्य पर रखा था और आपने तो कहा था की हार को सुबह खा ले गया है । बंगला बोला चुप हो जी निश्चित है की हार की चोरी उसी पर लगाई गई थी किंतु इस समय उसका मुंह बंद करने के लिए लाला उसे डाॅ । मैं ये नहीं कैसा का कि मैंने इसे दालान में पाया है । झूठ बोलने और उस पर जोड देने के लिए जिस साहस की आवश्यकता होती है उसका मुझे नितांत अभाव था । मेरे सब पक्ष शब्दों का इतना बढा अकाल कभी नहीं पडा था । लाला हस्ता जा रहा हूँ सामने हनुमान जी की प्रतिमा भी मुझ पर हसते दिखाई पडी । मानव कह रही हो झूठ के चक्कर में जो पढते हैं उनकी यही गति होती है अपनी हंसी के बीच में लाला ने एक विश्व भरी बीच वही लगता है यह तुम्हारी जान तो को अच्छा नहीं लगा । फिर मैं नहीं लगा और धन्यवाद देते हुए बोला अच्छा एक दिन तो हम उसे मेरे यहाँ ले आना । मैं अपने हाथ से उसे एक ऐसा ही हार पहनाऊंगा की बेहतर कुछ होगी । तुम भी खुश हो जाओगे और फिर उसकी हंसी से अचानक वाहन अच्छे लगने लगी । उस लाला ने मुझे प्रसार नहीं दिया । वर्णिक ऐसा भिजवा दे दिया जो रह रहेगा । मुझे आज भी साल टाॅक

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इस उपन्यास में जिस कालखंड की चर्चा है, वह आजादी के पहले का है। उस समय देश के क्षितिज पर आजादी के बदल छाए हुए थे, देश भर में जुलूस और सभाओं का माहौल था writer: मनु शर्मा Voiceover Artist : Mohil Author : Manu Sharma
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