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हम हैं राही प्यार के - Part 7

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मैं पहली क्लास छोड़कर रिया से मिलने आई.एम.टी. जाना चाहता था। लेकिन इनसान जो करना चाहता है और जो करने की उससे अपेक्षा की जाती है, उसमें हमेशा अंतर होता है। मैंने सोचा कि मैं कक्षाओं के बीच मिलनेवाले दस-दस मिनट के अंतरालों में से एक में अपनी किस्मत आजमाऊँगा और उसके कॉलेज जाने की कोशिश करूँगा, सुनिए आखिर क्या है पूरी कहानी| writer: पार्थ सारथी सेन शर्मा Voiceover Artist : Shreekant Sinha Author : Parth sarthi Sen Sharma
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लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात किए थे कि वे सब खुशी खुशी ऐसी गतिविधि में लगी हुई थी, जिस पर उन का स्वामित्व था और जिसके प्रति वे एक जिम्मेदारी की भावना महसूस करती थी । उनमें से अधिकांश के बच्चे पास के खुले स्कूल में पढते थे । संक्षेप में काजल और उसका इनजियो धीरे धीरे आदिवासी महिलाओं को उनकी और उनके परिवारों की जिंदगी सुन खाते में मदद कर रहे थे । मैं सोच रहा था कि क्या धूप में पकडे गांवों में फॅसने ही आदिवासी महिलाओं के बीच काम करने के अनुभव से काजल में भी किसी प्रकार का बदलाव आया है । काजल के साथ लाल देगी उस पहली यात्रा में मैं सिर्फ एक पर्यटक के तौर पर शामिल हुआ था काजल और उसकी संस्था के काम की बुनियादी अस्तर पर एक झलक पाने के उद्देश्य से । लेकिन उसके काम को संसारी नजर से पहली बार देखने पर ही मेरी शहरी नजरों के सामने अब एक अज्ञात रहे कई खुलासे आ गए । एक तो मुझे ये एहसास हुआ कि हमारा देश वास्तव में कितना विशाल है और उसमें कितने सारे गांव है । मुझे ये भी ऐसा हुआ हूँ कि ये गांव भारत की राजधानी से शक्ति के तथाकथित कल यारों से मुख्यधारा मीडिया के संपादक के कमरों से और अंग्रेजी बोलने वाले शहरी भारतीयों के सामूहिक विभागों से जैसे दिया और मेरे जैसे लोगों के अस्थान साडियों के मायने में कितने अलग है । लेकिन काजल के साथ लाल गई है और आस पास के अन्य कामों की बात की यात्राओं में मैं उन सीधे सरल आदिवासियों के सामूहिक स् नहीं और अपेक्षाओं से अभिभूत हो गया । मुझे एहसास हुआ कि मुझे खुले आसमान के नीचे उन आदिवासी बच्चों को पढाने में और उनसे सीखने में सच में मजा आने लगा था । उससे कहीं ज्यादा जो मुझे अपनी युवावस्था में दिल्ली में अमीर माँ बाप के बच्चों को ट्यूशन पढाने में आता था । उन बच्चों को वंदना की अपेक्षा मुझसे पढना ज्यादा अच्छा लगता था । बल्कि जब मैं उनमें से कुछ बडे बच्चों को गणित या विज्ञान पढाता था तो वंदना भी बच्चों के साथ अगर बैठ चाहती थी । ऐसी एक यात्रा के दौरान काजल मुझे पास के नीति नाम के एक अन्य गांव में ले गई । हाँ, उसने मुझे जीएसएस की संस्थापक और सबसे महत्वपूर्ण सदस्य से मिलाया । टिकट बहुत महिला जिन्हें काजल सहित सभी निर्मला दी के नाम से संबोधित करते नहीं पाते । बालों वाली चश्मा धारी निर्मला थी, करीब पचास वर्ष की रही होंगी जब मैं उनसे पहली बार मिला । मैं उनसे पहले और उनसे मिलने के बाद भी अब तक उनसे अधिक मधुर स्वभाव की और एक महिला से नहीं मिला हूँ । मैं बहुत उच्च शिक्षा प्राप्त थीं जैसा की काजल ने मुझे बताया एक समय अमेरिका की किसी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थी लेकिन फिर उन्होंने अपने इन चीजो जीएसएस की स्थापना कि पर्व स्वता उसे सीधे से बनाकर खडा किया तथा इस प्रक्रिया में कई परिवारों के जीवन बदलती है । उनके जीवन में आये इस परिवर्तन के पीछे निश्चित रूप से एक असाधारण का खा नहीं रही होगी । अमेरिका में रहने वाली एक रुपए सबसे आज के निर्मला दी के रूप में और उसके पीछे कोई बहुत बडा कारण भी रहा होगा । लेकिन वो अपने अतीत के बारे में बात न करके अपने एनजीओ के भविष्य पर ध्यान केंद्रित करती थी और आपने आसाधारण प्यार । वह उपलब्धियों के बावजूद निर्मला दी प्रत्येक व्यक्ति के प्रति इसमें भाव रखते थे तथा अपने मधुर मुस्कान और व्यवहार से सबकी प्रिय बन गई थी । मेरी भी काजल और अन्य लोगों ने उन्हें मेरे बारे में बताया था । लेकिन क्या बताया था ये मैं नहीं जानता था । जब मैंने और काजल ने उनके ऑफिस में प्रवेश दिया जो एक छोटा सा लेकिन असाधारण रूप से साफ वहाँ व्यवस्थित पुता हुआ कमरा था । उन्होंने अपनी सीधी पीठ वाली लकडी की कोर्ट से उठकर गर्माहट भरी मुस्कान से मेरा स्वागत किया । हमारे छोटे छोटे गांवों में आपका स्वागत है । वैसे तो मैं जानती हूँ की ये आपकी पहली यात्रा नहीं है और मुझे बहुत खुशी है कि आप अपनी पहली यात्रा के बाद वापस गांव में आए । उन्होंने कहा कि पहला वाकया था जो निर्मला देने मुझसे कहा, मैंने कुछ बेतुके और अनावश्यक शब्द बुदबुदाए लेकिन असाधारण प्रयासों की प्रशंसा में इन पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया और हम सबके लिए चाय बनाने चली गई । मैंने सुना है कि आप गांव वालों के बीच, विशेष रूप से बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए हैं । वे सब उत्सुकता से आपके आने की प्रतीक्षा करते हैं, वो भी फॅमिली भाइयों के लिए । नहीं तो आप उनके लिए शहर से लाते हैं । निर्मला देने हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए का अरे ये तो कुछ भी नहीं है । मैं चाहता हूँ कि आप लोग जो काम यहाँ कर रहे हैं उसमें कुछ अपना योगदान दे सकता हूँ । मैंने कहा हूँ यहाँ हम सबके लिए करने को बहुत कुछ है । काम की कमी तो ना यहाँ है ना और कहीं निर्मला देने । अपनी बेदाग अंग्रेजी में कहा काजल ने पहली बार हमारी बातचीत के बीच हस्तक्षेप क्या मैं सोच रही थी कि यदि पंकज को सच में हमारे काम में दिलचस्पी है तो ये शहर में और कलकत्ता में भी हमारे उत्पादन बेचने के लिए संपर्क बनाने में मदद कर सकता है? हाँ, मैं कोशिश कर सकता हूँ और अब तो इंटरनेट ईमेल की सहायता से संपर्क बताना और मेल वगैरह भेजना बहुत आसान हो गया है । मैंने कहा हालांकि मुझे किसी भी चीज की मार्केटिंग करने का कोई अनुभव याद ध्यान नहीं था लेकिन मैं काजल को निराश नहीं करना चाहता था । ये पहली बार था की मुझे उसके प्रति एक जिम्मेदारी की भावना का अनुभव हुआ था । शहर वापस लौटते समय मुझे एहसास हुआ । वसंत का संक्षिप्त सा मौसम नाकर चला गया था और टाउनशिप के लम्बे चौडे बाॅन के दोनों ओर करीने से कतारों में लगे गुलमोहर पूरी तरह खेले हुए थे । उनके नारंग की लाल फूलों ने पत्तियों को ढक लिया था और वे सच में आश्चर्यजनक रूप से सुन्दर लग रहे थे । विशेष रूप से तपती दोपहर में बिना पात्रों के साफ पर नीले आकाश की पृष्ठभूमि में या ने अपने पिछले पत्र में बोझ लिखा था कि वर्ष के अंत में होने वाली परीक्षाओं के बाद जिनकी तैयारी में वो व्यस्त थी, उसने अपनी छुट्टियों का उपयोग अपने कॉलेज के कुछ दोस्तों के साथ अमेरिका घुमने के लिए करने का निश्चय किया है । वे लोग सडक मार्ग द्वारा पश्चिमी तट से लॉस एंजलिस, लॉस विकास और अन्य स्थानों पर जाने वाले थे । वो बहुत उत्साहित थी और मैं सब से उस यात्रा का इंतजार कर रही थी । पहले की तरह उसके पत्र अभी भी नियमित रूप से आते थे लेकिन मुझे लगने लगा था कि अब उनमें पहले जैसी सस्ता नहीं रह गई थी और उनमें प्यार के स्थान पर श्रम से ज्यादा प्रयास ज्यादा नजर आता था । मैं उसको दोष नहीं दे सकता था । हमारी दुनिया दिन पर दिन एक दूसरे से अलग और दूर होती जा रही थी और अभी सरन तथा समानता के क्षेत्र हर महीने और कम होते जा रहे थे । पत्र चाहे जितने भी नियमित और अच्छी तरह से लिखे गए हो, बातचीत करे कुछ विकल्प नहीं बन सकते हैं और उन दिनों अंतरराष्ट्रीय फोनकॉल्स बिलकुल अकल्पनीय थे । यहाँ तक कि अपने घर पर स्टेडी कॉल करने के लिए भी मुझे पोस्ट ऑफिस या किसी दी थी । एसटीडी बूथ तक पैदल चलकर जाना पडता था । क्या हैं छोटे से कहाँ के घेरे में फोन रखा होता था और जब आप अपने घर वालों से बात कर रहे होते थे तो लगातार उनका बदलती लाल एलइडी दिखाई देती थी । आपको आपने कॉल के कितने पैसे देने हैं? सर्दियों की एक शाम ऐसे ही एक फोन कॉल के बाद सपना इंजीनियर्स हॉल अपने हॉस्टल पहुंचा तो मुझे माहौल में अस्पष्ट रूप से एक उत्तेजना महसूस हुई । वातावरण को छा साहज और अनिश्चित सा था । मैं हॉस्टल के वातावरण में इस अचानक बदलाव की वजह जानने की कोशिश कर ही रहा था कि खालिद ने जो पटना से आया हमारा साफ करके और दोस्त था, उत्तेजित हो गए । कहा आखिर उन्होंने उसे नष्ट कर ही दिया । वो क्रोधित था, हैरान था और शो का पूल भी था । मुझे जल्दी समझ में आ गया कि अयोध्या की बाबरी बच्चे, जो पिछले कुछ वर्षों से गहन अटकलों, विवाद रोज और अवसरवादी राजनीति का विषय बनी हुई थी, उस दिन हिंसक और बेकाबू लोगों की भीड के द्वारा गिरा दी गई थी । अयोध्या में जो एक धार्मिक और आम तौर पर उत्तर प्रदेश का एक सुस्त रहने वाला शहर है । बहुत से हिन्दुओं का विश्वास था या फिर उन्हें विश्वास दिलाया गया था कि वह स्थान जहां भारत के प्रथम मुगल बादशाह वापस जिनके नाम के द्वारा बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया गया था, वहीं स्थान था जहां प्राचीन, पौराणिक, ऐतिहासिक और धार्मिक श्री रामचंद्र जी का जन्म हुआ था । हालांकि कुछ ऐतिहासिक पन्नों में ये तब था अयोध्या के हिंदू और मुसलमानों के बीच ब्रिटिश शासन के समय भी हिंदुओं की पूजा के लिए उस स्थान को पूरा प्राप्त करने के लिए कोई स्थानीय विवाद था । हमने अपनी युवावस्था में पहली बार उस विवाद के बारे में सुना था जब कुछ राजनीतिक संगठनों नहीं, बाबरी मस्जिद के स्थान को पूरा प्राप्त करने के लिए एक आंदोलन शुरू करने का निश्चय किया ताकि वहाँ पर एक राम मंदिर का निर्माण किया जा सके । अंततः वो आंदोलन कुछ नाटकीय वर्षों के दौरान बढता गया और फिर नियंत्रन के बाहर हो गया, जिसके फलस्वरूप दिसंबर के उस दिन यह घटनाक्रम हुआ । खालिद के इस अचानक विस्फोट का सामना अन्य लोगों की खामोशी से हुआ । डाइनिंग टेबल के चारों ओर बैठेगा आज के कपू में शाम की चाय पी रहे थे । वहां मौजूद अधिकतर हिंदू लोगों में से कम ही थे, जो उसके दिल पर लगे गहरे जख्म से सहानुभूति रखते थे । लेकिन सपने कम से कम उस समय कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न करना ही बेहतर समझा । हालत में समर्थन की आशा से चारों ओर देखा, लेकिन किसी को अपने पक्ष में न देखकर निराश हो गया । अपनी चोट पर सहानुभूति की अस्पष्ट कभी देख कर उसका रवैया उपेक्षापूर्ण हो गया और इस बार उसने दिल से कम और वह क्षमता से अधिक अपनी बात दोहराई । उन कमीनों ने सच में हमारी बस किराती । मैं पहले से ही जानता था कि वे ऐसा ही करेंगे, लेकिन किसी ने इसके बारे में कुछ नहीं । क्या शर्म की बात है? ये देश अब रहने लायक नहीं है । इस बार कुछ लडकों ने, जिनमें अलीगढ से आया मेरा रूममेट भी था, खालिद की ओर चुनौतीपूर्ण नजरों से देखा । उसके विरोध और उसकी नजरों का सामना करते हुए स्थिति के निश्चित रूप से बिगडने की संभावना थी, लेकिन किसी ने विषय बदलने का निर्णय लिया । निलॉय बोला, अरे यार, आज का दिन बहुत लम्बा थकावट भरा था । चलो डिनर पर मिलते हैं । जैसे ही वह खडा हुआ, हम सबको भी डाइनिंग रूम से बाहर निकलने का मौका मिल गया जो बारूदी होता जा रहा था । बाद में भी खालिद हमारा साकार हुई और दोस्त बना रहा । लेकिन दिसम्बर के उस शाम के बाद उसने हम में से किसी के आगे बाबरी मस्जिद के गिराए जाने की बात नहीं । छह कभी नहीं अपनी छुट्टियों में और खाली समय में मैंने जीएसएस के कामों में हाथ बटाना शुरू कर दिया था और हालांकि मेरे अंदर निर्मला देखी तरह समाजसेवा का उत्साह नहीं था । फिर भी मुझे अपनी वेतन वाली नौकरी से ज्यादा संतुष्टि जीएसएस के लिए काम करके मिलते थे । जहाँ मैं जिक्स और छोडना डिजाइन करने से ज्यादा ट्राई करता था । कमरे टी जाली लगी । खुली खेती से ठंडी हवा के साथ साथ दूर किसी अदृश्य मध्य की घाटियों की आवाज भी अंदर आ रही थी । हमने जल्दी में थे अपने अस्थायी छात्रावास में, जहाँ हम ने निर्मल आती काजल और मैंने रात को सोने का निश्चय किया था । काजल और मेरे शहर जाने वाली अंतिम बस छूट गई थी । मैं स्वाभाविक रूप से सोच रहा था कि मिस्र खुलकर नहीं को साथ काजल को घर में न देखकर कितने चिंतित होंगे । लेकिन काजल और निर्मला दी बिल्कुल शांत और सामान्य लग रहे थे जैसे कि ये उनके लिए आम बात थी । अभी शाम की शुरूआत ही थी और गांव को कुछ ही देर पहले अंधेरे की चादर नहीं खेला था । कमरे के कोने में लालटेन रखी हुई थी और उसकी टिमटिमाती लाओ कि छाया छूने से पुतिन नंगी दीवारों पर नाच रही थी । हम अपनी अपनी चारपाइयों पर बैठे थे । हमने रात का खाना, रोटी और टन जल्दी ही खा लिया था और अभी भी किसी के सोने का समय नहीं हुआ था । मुझे समझ में आया कि गांवों में शाम चलती हो जाती थी और रातें शहरों की अपेक्षा बहुत लंबी होती थी । जहाँ आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकी उस खेती गई, अनेक भी कलेक्शन थे । निर्मला पीने धीरे से अपना चश्मा उतारा और सावधानी से उसके केस में रख दिया । लालटेन की रोशनी में पहली बार मैंने बिना चश्मे के उनकी आंखें देखी । चश्में के बिना उनकी उम्र कम लग रही थी, लेकिन अच्छी बात थी कि उनके आंखें थकी हुई प्रतीत हो रही थी । लंबे समय से दबाकर रखे जिज्ञासा की भावना से प्रेरित होकर और साथ ही वहाँ पसरे सन्नाटे को तोडने के उद्देश्य से मैंने पूछा निर्मला दें वो कौन सी वजह थी तो आपको इन गांवों में खींच लाई । मेरा मतलब है कि मैं जानना चाहता हूँ कि पहले आप कहीं रहती थी, एक अलग प्रकार का जीवन व्यतीत करते थे । काजल भी अपनी चारपाई से उठकर निर्मला देखी ओर आशा भरी नजरों से देखने लगे । जैसा कि नहीं पाला देखी । कहानी के कुछ हिस्से ऐसे थे जिनके बारे में उसे भी अधिक कुछ मालूम नहीं था । निर्मला जी ने हमारी और देखा एक से दूसरे की ओर और जवाब दिया ये बहुत लंबी का हामी है और बहुत पुराने भी हो गई है । लेकिन अगर तुम सच में जानना चाहते हो तो तुम दोनों को बताने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है । असल में मैं जब पहली बार यहाँ आई तो अकेले नहीं थी । शायद जॉन के बिना मैं अपने देश में नहीं आती बल्कि यूं की ही नहीं पाती । काजल नहीं तो मैं बताया होगा कि मैं अमेरिका में हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में पढाते थे । जॉब भी वहीं पढाता था । हालांकि हमारे विषय और विभाग अलग थे । वो एक हॅाल इंजीनियर था । निर्मला देखो की और कमरे के कोने में रखें । मिट्टी के घडे से पानी निकालकर पीते लगी । वो कमरा लगभग खाली था लेकिन पूरी तरह कार्यात्मक था जिसमें जरूरत की हर चीज जगह पर मौजूद थी । लेकिन कोई भी फालतू चीज नहीं थी । मुझे कमरे की कार्यात्मकता, उसकी स्वच्छता, सुव्यवस्था, खरापन और आत्मविश्वास सबकुछ अच्छा लग रहा था । कई मामलों में वो कमरा उसमें रहने वालों का प्रतिबिंब था जैसे कि अधिकांश कम होते हैं और इससे पहले कि तुम दोनों किसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ, मैं यह स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि हमारे जॉन और मेरे बीच कभी कोई प्यार से ऐसी चीज नहीं थी । तिरमाला देने आगे कहना शुरू किया । हालांकि वह एक सम्मानित सहयोगी और दोस्त था, वर्ष था । अपने कार्य के क्षेत्र में उसने कैसे हैंडसम का आविष्कार किया था जो भूमि में संग्रहित चल को सत्ता पर लाने के लिए पठारों और छोटी पहाडियों पर काम कर सकता था । उसने सोचा था कि वो अपने आविष्कार का प्रयोग और उसमें सुधार लाने का काम यहाँ रहकर कर सकता था, उसका खेतों में प्रयोग करके और साथ ही इन गांव वालों की एक बुनियाद की आवश्यकता पूरी करने में मदद भी कर सकता था । पीने के साथ पानी की संभावनाओं पर हमने चर्चा की । हम एक दूसरे को जानते थे और उसे मालूम था कि मैं भारत से । उस समय मैं युवा थी और शिक्षा के असाधारण माहौल में कांदा और निराशा महसूस कर रही थी । मैं तथाकथित वास्तविक दुनिया में कुछ करना चाहती थी । इसलिए कडी दूसरी से छोड दी गई । और एक सालाना सत्र के अंत में हमने एक लंबा विश्राम लेकर छोटानागपुर पठार के इन गांवों में आकर अपने काम पर प्रयोग करने का निश्चय किया । शक तब मैं नहीं जानती थी कि मैं होंगे और ये भी नहीं कि मेरा जीवन एक परिवर्तन होंगे, मोड लेने वाला है । जैसा की बात में हुआ, नहीं मनाते, इच्छुक हो गई । ये कब की बात है? मैंने पूछा क्योंकि मुझे लग रहा था कि निर्मला दी की कहानी खत्म नहीं हुई थी । काजल चुकी थी, लेकिन ध्यान से सब कुछ सुन रही थी । मैं सोचने लगा कि कहीं पोडेर बलादी की कहानी से अपने जीवन के प्रश्नों के उत्तर तो नहीं ढूंढ रही थी । उन्नीस साल पहले हमने भारत के इस हिस्से में आने का निश्चय मुख्य रूप से जवान के कारण क्या मुझे इन गांवों का कोई अनुभव नहीं था? इस तथ्य के अलावा की यहाँ की स्थलाकृति जॉन के प्रयोगों का समर्थन करते थे । उसके संबंध यहाँ काम करने वाले क्रिश्चियन चर्च से भी थे । खुद भी भक्त टेस्ट था । उसकी वजह से हमें शुरुआती वर्षों में याद रहने में मदद मिलेगी । निर्मला जी ने आगे कहा, हालांकि मैं खुद एक क्रिश्चियन नहीं हूँ, लेकिन मैं कभी कभी चर्चे जाती हूँ और मुझे उनके मानवीय कार्य अच्छे लगते हैं । विशेष रूप से शिक्षा के क्षेत्र में । उन्होंने कहा, तो अब कौन कहाँ है? जॉन जहाँ लगभग पांच साल रहा, उसने अपने आविष्कार को सिद्धौर परिष्कृत किया तथा तुम उसके बनाया । असंख्य ऍम इन गांवों में और इनके आगे भी काम करते देख सकते हैं इन गांव वालों के स्वास्थ्य जीवन के लिए । यहाँ पर में एक मकान के समान रहे हैं इस तरीके से जिसकी हम जैसे शहरी लोग कल्पना भी नहीं कर सकते । निर्मला देने जवाब दिया एक सच्चा इंसान । जॉन ऐसा करने में विश्वास नहीं रखता था । इसलिए उसने अपने आविष्कार के प्रिटेंड के लिए कभी आवेदन नहीं दिया । बल्कि उसने कई और स्थानीय मैदानी को और कार्यक्रमों को ये हैंडपंप और उसके डिजाइन पर आधारित कलपुर्जे बनाने का प्रशिक्षण दिया । उसका योगदान बहुत पडा है । निर्मला भी कुछ पल के लिए रुकीं, पांच वर्ष समाप्त होते होते उसकी यूनिवर्सिटी नहीं । उसे उसके वायदा नहीं विश्राम पर और विस्तार देने से इंकार कर दिया तथा उसे अपनी दुनिया में लौटने का निर्णय लेने पर मजबूर कर दिया । उस समय तक उसका आविष्कार पूरी तरह से दौर व्यापक हो चुका था और उसे लगा के उसका उद्देश्य पूरा हो गया था । इसके लिए अब वो अमेरिका में है और फिर से छात्रों को मैं निकल इंजीनियरिंग पढा रहा है । आप वापस नहीं इस बार का चलने पूछा नहीं मैं नहीं गई । मेरे सामने भी वही दुविधा थी । यूनिवर्सिटी ने मेरे विश्राम को और विस्तार देने से इंकार कर दिया था । इसलिए या तो मुझे वापस जाना पडता या अपनी नौकरी, अपनी सुरक्षा अपनी दुनिया छोडने पर और फिर मैंने अपने आप से पूछा दोनों में से कौन से दुनिया में देते हैं और मैंने यहाँ रुकने का निर्णय ले लिया । पहले अपनी यूनिवर्सिटी की नौकरी छोड दी और तब से मैं यहीं हूँ । यही राय कर काम करती हूँ । जैसा की तुमने देखा है निर्मला देने जवाब दिया उस समय तक गांव वाले भी मुझे पसंद करने लगे थे और एक प्रकार से मुझ पर निर्भर हो गए थे । इस प्रकार जैसे मैंने यूनिवर्सिटी के छात्र कभी नहीं हो सकते थे । आपको अपने निर्णय पर कोई पछतावा नहीं है । मैंने पूछा बिल्कुल नहीं । मैं खुद के और यहाँ के वातावरण के साथ शांति से और जब मैं तुम दोनों जैसे युवा, आधुनिक और शिक्षित लोगों को देखते हो ना तो मुझे और अधिक खुशी होती है । निर्मला दी मुस्कुराई काफी रात हो चुकी थी । पास के किसी गांव में एक कुत्ता भौंक रहा था तथा रात के सन्नाटे में उसकी आवाज और अभी गूंज रहे थे । मैं खुली खिडकी से एक अकेले चुप को बरामदे के आप पारदर्शी अंधेरे में मंडराते हुए देखता है । हमारी बातचीत का परिहारी और थे में अंत की ओर पहुंच गयी थी । निर्मला देने लालटेन बिलकुल धीमी का की थी ये ध्यान रखते हुए कि वह पूरी तरह सोचना चाहिए और हमें कुछ नाइट कहकर सोने चली गई । गहरी स्वत नवे ही नीम के कोर्ट में सामने से पहले मुझे एहसास हुआ कि मैं अपने जीवन में पहली बार रात को एक गांव हो रहा था और इस प्रकार से मुझे बहुत शांति और सुकून महसूस हो रहा था । ऐसा भी पहली बार हुआ था कि मुझे सोने से पहले तैयार की याद नहीं आई । पिछले कुछ महीनों की तुलना में ऑफिस में मेरा काम बेहतर तो नहीं हुआ था लेकिन बढा अवश्य गया था । हमारी कंपनी ने डीजल इंजन का निर्माण करने के लिए अमेरिका की एक कंपनी के साथ संयुक्त उद्यम में प्रवेश करने का निर्णय लिया था । बाकी और व्यवस्था अपने पांव पर साफ रही थी और ऐसे विदेशी सहयोग आम हो गए थे । हम ऐसे सिक्स और जोडना डिजाइन करने की प्रक्रिया में थे, जो अंतर था । इस नहीं, संयुक्त उद्यम कंपनी की फैक्ट्री की मशीनों की दुकानों में इस्तेमाल होने वाले थे । काम का भार अधिक था, लेकिन बहुत नीरज था और मुझे एहसास हुआ कि उन लम्बी बस उसको दो भारों में मेरा मन पटक थे, लगता था, जबकि मेरे हाथ ईमानदारी से ड्राइंग रोड पर काम करते रहते थे । हमारे ऑफिस की दो मंजिला इमारत के ठीक सामने खिडकी के शीशों से वे हरे वह जंगली क्षेत्र दिखाई देते थे, जहाँ जल्दी नहीं फैक्टर खडी होने वाली थी । मुझे अपने स्थान से मिस्टर कुलकर्णी की पेट दिखाई दे रही थी, जो ईमानदारी से आपने ड्राइंग बोर्ड पर काम कर रहे थे, जबकि वहाँ रिश्ते और हमारा निरीक्षण करने के बहाने आसानी से ड्राइंग के काम से बच सकते थे । लेकिन मिस्टर कुलकर्णी अलग प्रकार के इंसान थे और उनकी बेटी अलग तरह की महिला जैसा कि मुझे समझ में आने लगा था, जीएसएस के कामों में मेरी दिलचस्पी और वहाँ की मेरी यात्राएं मेरे और काजल के साथ रहने का जरिया बन गई । कम से कम शुरुआत में दिन भर का मेरा ऑफिस का काम नौ से शाम पांच बजे तक प्रतिदिन हफ्ते में छह दिन मुझे मेरा वेतन प्रदान करता था जो बदले में मुझे मेरी आजीविका का साधन और एक अन्यथा आर्थिक रूप से असुरक्षित समाप्त में सुरक्षा प्रदान करता था । लेकिन मेरी प्रेरणा का स्रोत और मेरी दिलचस्पी अब उस स्वैच्छिक और मानक काम की ओर उन्मुख हो रही थी जो मैं निर्मल आती और काजल की संस्था के आगे कर पाता था । इस तथ्य के अलावा की मुझे वाकई लगता था कि जी । एस । एस । का काम उपयोगी है, विशेष रूप से उन सैकडों गांव वालों के लिए जिनके लिए संस्था काम करती थी और ये की मैं निर्मला दिखे कम और उनके त्याग का सब बात करता था वो । काजल को निराश करने का मेरा डर था, चौबीस से उनके लिए काम करते रहने को प्रेरित करता था, विशेष रूप से तब जब मेरी नौकरी में काम का बोझ बढने लगा था । मैं अपने दोस्तों और सहकर्मियों के माध्यम से ये जीएसएस के लिए कुछ लंबी अवधि के अनुबंध प्राप्त करने में सफल गया था । ऑफिसर्स में इसमें रसोई के मसालों और हजारों की आपूर्ति करने के लिए ये छोटा सा प्रयास था लेकिन इसने नकदी का स्थिर स्रोत पाने में कई महिलाओं की मदद जिसकी वजह से कुछ लाभ कमाने में सक्षम हो गई । उनके चेहरों की खुशी और निर्मला दी और काजल से मिले सच्ची प्रशंसा नहीं । मेरे दिल को जो खुशी थीं वो मेरे बैंक के खाते में बढती रकम से मिलने वाली खुशी से कई गुना थी ।

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मैं पहली क्लास छोड़कर रिया से मिलने आई.एम.टी. जाना चाहता था। लेकिन इनसान जो करना चाहता है और जो करने की उससे अपेक्षा की जाती है, उसमें हमेशा अंतर होता है। मैंने सोचा कि मैं कक्षाओं के बीच मिलनेवाले दस-दस मिनट के अंतरालों में से एक में अपनी किस्मत आजमाऊँगा और उसके कॉलेज जाने की कोशिश करूँगा, सुनिए आखिर क्या है पूरी कहानी| writer: पार्थ सारथी सेन शर्मा Voiceover Artist : Shreekant Sinha Author : Parth sarthi Sen Sharma
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