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हम हैं राही प्यार के - Part 4

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मैं पहली क्लास छोड़कर रिया से मिलने आई.एम.टी. जाना चाहता था। लेकिन इनसान जो करना चाहता है और जो करने की उससे अपेक्षा की जाती है, उसमें हमेशा अंतर होता है। मैंने सोचा कि मैं कक्षाओं के बीच मिलनेवाले दस-दस मिनट के अंतरालों में से एक में अपनी किस्मत आजमाऊँगा और उसके कॉलेज जाने की कोशिश करूँगा, सुनिए आखिर क्या है पूरी कहानी| writer: पार्थ सारथी सेन शर्मा Voiceover Artist : Shreekant Sinha Author : Parth sarthi Sen Sharma
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तेल को टाउनशिप जमशेदपुर शहर के दूसरे किनारे पर स्थित थी और हालांकि उसे अब पचास वर्षों से अधिक समय हो गया था । लेकिन वहाँ पे अधिक पुराने स्टील के भाई बंधु की तुलना में अभी भी नहीं थी । तो मेरी युवावस्था के अगले तीन वर्षों के लिए मेरा गृह नगर बनने वाली थी । जैसा की कहा जाता है कि तथा रिया से मेरी बेचैनी भरी जुदाई के बावजूद मेरे वहाँ बितायें दिन अच्छे और सुखद थे । या शायद मुझे आज ऐसा लगता है कि बीच के इतने वर्षों के बाद जिनमें ये क्षमता होती है कि वे वास्तविकता को किसी अलग ग्रुप में दिखाएँ लेकिन फिर कौन कर सकता है की अनुभूति क्या है? सच्चाई क्या है या फिर अनुभूति के अलावा सच में कोई वास्तविकता है भी या नहीं? मुझे टेल्को टाउनशिप के प्रवेश द्वार की घोषणा करता वो विशाल ठोस में राम याद हैं जिस पर मेरा ध्यान ऍम जब मेरा ऑटोरिक्शा मेरी दाहिनी ओर स्थित फैक्ट्री के बंद लोहे के गेट को पार करके ऍम ट्रेनी प्रशिक्षण इंजीनियर्स हॉस्टल की ओर बढ था जिसका नाम और क्या हो सकता था? इंजीनियर्स कॉल था । आज तो वास्तव में इंटरनेट और मोबाइल फोन के बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल है । लेकिन अगर मैं अपनी युवावस्था के उन दिनों की याद करूँ जब उन का अस्तित्व नहीं था तो आज का युवा पाठक सोचेगा कि मैं किसी बहुत पहले विलुप्त हो चुकी दुनिया से आया एक प्राचीन प्राणी हूँ । एक प्रकार का डायनासोर और उसके मासूम कल्पना पूरी तरह गलत नहीं । लेकिन ये सच है कि जमशेदपुर में मेरे पूरे प्रवास के दौरान न तो इंटरनेट था और ना मोबाइल हूँ तथा कभी कबार पब्लिक फोन बोर्ड से किए गए कॉल के अलावा रिया और अपने परिवार से संपर्क बनाए रखने का इकलौता जब गया था पोस्टल डिपार्टमेंट के माध्यम से भेजे गए पत्र बेशक हमारी कल्पना, इंटरनेट या मोबाइल फोन जैसी भविष्य की सुविधाओं की कल्पना करने के लिए पर्याप्त रूप से उपचुनाव नहीं थी इसलिए हमारे मन में कोई अभाव की भावना नहीं थी । इंसान उन चीजों की कमी महसूस नहीं कर सकता जिस के वो कल्पना नहीं कर सकता । इसलिए दिया थे उत्सुकता से प्रत्याशित पत्र मेरे लिए हमेशा ही अपेक्षित आनंद का स्रोत होते थे । जब भी कोई अतिरिक्त पोस्टमैन मेरे प्लांट में ड्यूटी पर होने के दौरान मुझे होस्टल के बंद कमरे के नीचे उन्हें सरकार था, मैं अपने जीवन में पहली बार अपने परिवार, अपने घर और अपने शहर से दूर था लेकिन पता नहीं क्यूँ मैं कभी घर को याद करके दुखी नहीं होता था । अच्छा इसलिए कि मेरी परवरिश किसी अपेक्षा के साथ हुई थी की पढाई पूरी करते ही मैं अपने पैरों पर खडा हो जाऊंगा । मैं कंपनी द्वारा अनुरक्षित निकाल पर रूप से सुसज्जित होस्टल में रहता था जो कंपनी द्वारा ही निर्मित और अनुरक्षित एक्स अम्बोना टाउनशिप के बीच में स्थित था । इस हॉस्टल का निर्माण ब्लॅक के रहने के लिए किया गया था जो मेरी तरह हाल ही में अपने कॉलेजों से निकले थे, देश के विभिन्न हिस्सों से आए थे और जिन के रूप में हमारे विशाल देश पे एक छोटे से सुक्ष्म जगत को देखा जा सकता था । तेल को ने जो मुसीबत उठाई थी कम से कम उन दिनों में हमारे विशाल देश के विभिन्न हिस्सों में दूर दराज के कॉलेजों में जाकर दुबारा अनुभवहीन इंजीनियरों को नौकरी की पेशकश करने की वो सिर्फ श्रेष्ठ प्रतिभावों को आकर्षित करने के लिए नहीं थी बल्कि मुझे लगता है कि अपने कार्यबल में एक प्रकार की विविधता को बढावा देने के लिए भी थी जिसकी की आज के आधुनिक प्रबंधन करूँ । अब जाकर वकालत करने लगे हैं । मैं कहा नहीं सकता की भर्ती में इतनी विविधता ने कंपनी की कितनी मदद की क्योंकि इनमें से बहुत से युवा वह प्रतिभाशाली लोगों ने दो साल बाद ही कंपनी और अपनी पहले नौकरी छोड दी । कंपनी के उन्हें रोकने के पर्याप्त प्रयासों के बावजूद उस ने उन्हें युवावस्था के दिनों में हमारे जीवन को काफी समृद्ध किया था । इसके लिए मैंने को सच्चे दोस्त बनाया । सब साकार भी नहीं । ऐसे दोस्त जो आपसे युवावस्था में बनाते हैं पंजाब से उत्तर प्रदेश के धूलभरे कसमों से दक्षिणी बिहार की औद्योगिक बस्तियों से झारखंड । उस समय सर एक मांग था, वास्तविकता नहीं । कोलकाता से केरल के सुदूर तटों से तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों वाले कस्को से दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों से सुदूर सूरत कम थे और उडीसा से भी सिर्फ शायद किसी सत्य को उजागर करते हुए । हालांकि उस समय मुझे इसका कोई कारण समझ में नहीं आया था । कश्मीर, उत्तर पूर्वी राज्यों और आश्चर्यजनक रूप से गुजरात आप थे तथा मुझे याद नहीं है कि मेरा कोई भी सहकर्मी इनमें से किसी राज्य से आया था । हम युवा थे और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं । हम अपने परिवारों से दूर रहते थे और साहसिक होने का दिखावा करते हैं जब कि वास्तविक में साहसिक नहीं थे क्योंकि हम सब अपने मध्यमवर्गीय परिवारों से जमशेदपुर आए थे । जहाँ तक वास्तविक काम का सवाल था, हमें फैक्ट्री के ही विभिन्न विभागों में लगभग तीन माँ का प्रशिक्षण दिया गया और इसलिए कम से कम शुरूआती महीनों में हमारे ऊपर कोई विशेष जिम्मेदारियाँ या काम का भार नहीं था । सत्ता आसान आनन्ददायक होते थे और शाम में भी तथा हमारे पास अपने लिए पर्याप्त समय होता था । दोस्त बनते थे और चुका हो जाते थे । कुछ वर्षों तक दोस्त बने रहे, कुछ कभी कभी याद आते थे और कुछ कई वर्षों बाद फेसबुक के माध्यम से फिर मिल गए । हम अपनी नई खरीदी मोटर साइकिलों पर, आसपास के जंगलों और छात्रों पर, जिनसे जमशेदपुर खेला हुआ है, पूरे पूरे दिन के लिए घूमने जाया करते थे । जब मुझे तो छोटा नागपुर के हरे पठारों के बीच में ऐसा हुआ है विचित्र से नाम वाले सुबर्णरेखा नदी के तट पर जिसका शाब्दिक अर्थ है सुनहरी रेखा वाली नदी हलो मेरा राम राजेश कुमार सिंह है । मुझे एक साल से नियर मेरे रूम ऍम में सिर्फ कंपनी के ग्रेजुएट इंजीनियर प्रशिक्षुओं को रहने की इजाजत थी । मेरे छोटे में जीईटी कहा जाता था । प्रशिक्षण की अवधि दो वर्ष की होती थी इसलिए किसी एक समय पर हॉल में दो बच्चों के प्रशिक्षुओं की रहते थे । एक जूनियर और दूसरा उससे एक साल सीनियर राजेश सीनियर बैच का था, मेरे उस कमरे में आने के एक वर्ष पहले से हॉल में और जमशेदपुर में रहता था । हाय मेरा नाम पंकज है । मैं अपना परिचय दिया । हमने हाथ मिलाये और जैसा की प्रचालन है खास तौर से पुरुषों के बीच । वो उत्तरी बिहार के किसी शहर से आया और वहीं के इंजीनियरिंग कॉलेज में पढा था । राजेश कुछ शर्मिला था काम बोलने वाला लेकिन सीधा वह सफल व्यक्ति जिसके विचार साधारण थे और आवश्यकताएं उससे भी साथ था । वो एक शांत और मित्रवत स्वभाव का है । लेकिन हाल में कुछ अन्य लोग थे जिनसे मेरी धीरे धीरे अधिक दोस्ती हो गई क्योंकि राजेश से मेरी बातचीत से भी तो और सुविचारित होती थीं । वो लीची के मौसम में निरपवाद रूप से अपने गृहनगर से स्वादिष्ट ली क्या लाता था और मुझे खिलाता था क्योंकि उसे अपने गृहनगर के इस प्रसिद्धि पर करवा था जो कि उचित था कि पूरे भारत में सबसे स्वादिष्ट ली क्या वहाँ मैं वो बिना एक शब्द बोले स्वादिष्ट नीतियों का एक बडा सा गुच्छा लाकर मेरे बिस्तर पर पटक देता था । छुट्टियों के दिन कुछ बुजुर्ग लोग राजेश की तलाश में आकर हमारा दरवाजा खटखटाते थे क्योंकि उनके लिए राजेश एक संभावित पूछ रहा था जिससे वे अपनी बेटियों, भतीजियों या रिश्ते की अन्य अविवाहित लडकियों की शादी करवाना चाहते थे । मैं देख सकता था के राजेश अपने समाज में एक बहुत योग्य वर्क की श्रेणी में आता था । एक पारंपरिक बडों द्वारा तय किए गए विवाह के लिए हर प्रकार से उपयुक्त स्वाभाविक रूप से सभी संभावित ससुराल वाले बिहारी भूमिहार समुदाय के होते हैं । लेकिन राजेश ने मेरे रूम में के तौर पर अंतिम वर्ष पूरा करने तक शादी नहीं तो संभावित दुल्हनों के पिताओं से मिलने से कतराता था और बिना शिष्टता या अभिमान दर्शाये उनसे बचने के लिए अनेक मुसीबतें उठाता था । बहुत बात पर मुझे पता चला कि मन ही मन बहुत कॉलेज के प्रिंसिपल जिनका वो पसंद तेरा छात्र था की बेटी से साथ ही करना चाहता था । राजेश ग्रामीण पृष्ठभूमि से था और उसकी लगभग पूरी स्कूली शिक्षा उत्तर बिहार के उसके पैतृक गांव में हुई थी जिसके बाद हॅास्टल में आया । हो सकता है कि हमारी अलग अलग धन से हुई परवरिश नहीं या उसके स्वाभाविक रूप से अंतर्मुखी स्वभाव नहीं हमारे बीच के भाईचारे को वास्तविक दोस्ती में न बदलने दिया हूँ । लेकिन मैंने हमेशा इसका आदर किया था और मेरे पास ये मारने का कारण है कि वही मुझे ना पसंद नहीं करता था । तो शरद ऋतु के अंतिम दिनों की कुछ सर्दी से सुबह थी जब सुबह कि हवा सामान्य सूती कपडों के ऊपर कुछ गर्म कपडे पहनने का संकेत देती है और सूरज के पृथ्वी को जो खाने की असीम शक्ति में कमी आने लगती है उसने एक स्वागत युग की छुट्टी थी और गौतमपुरी आलो और मैंने पास के दालमा जंगलों में एक दिन की ट्रैकिंग के लिए जाने का कार्यक्रम बनाया था । रांची जमशेदपुर के बाहर का एक शहर की ओर जाने वाली हाइवे पर सडक के किनारे स्थित एक आपकी लेकिन लोकप्रिय ढाबे पर आपने मोटर साइकिल हूँ और स्कूटरों द्वारा पहुंचने में हमें एक घंटे से अधिक समय लग गया जहाँ हमने ट्रैक शुरू करने से पहले नाश्ता करने और अपने दुपहिया वाहन पार्क करने का निश्चय किया था । वो जगह ढाबे से कुछ अधिक और एक समुचित रेस्टोरेंट से कुछ कम थी । फिर भी उसके पास बीयर बार का लाइसेंस था । हम लोग वहाँ पहले भी आ चुके थे और ढाबे का मालिक हमारी सूरत में देखकर समझ गया था कि हम टाटा के अस्तबल के शिक्षित करना चाह रही है । जल्दी से ब्रंच भारी नाश्ता करके हम ने डाल बाकी शीर्ष तक अपनी ट्रैकिंग आरंभ करते हैं । डालमा खारा भरा वनाच्छादित बाहर था जो कभी कभार आने वाले जंगली हाथियों के झुंड की मेजबानी के लिए जाना जाता था । फिर के ऊपर खुले आसमान और ठंडी सांस की तरह बैठे शरद ऋतु की हवा के साथ हरे भरे वनाच्छादित पहाड पर ट्रैकिंग करना । मेरे जैसे शहरी नस्ल वाले इंसान के लिए बहुत ही सुखद और तो लाभ अनुभव था । हम लाल मिट्टी वाले पहाडी रास्तों पर आगे बढ रहे थे हरी हरी झाडियों और कटीले झाडों के बीच से लेकिन कहीं कोई भी हाथ का झुंड नजर नहीं आया बल्कि सोचने की बात थी कि कोई भी जानवर नजर नहीं आया । शीर्ष पर गुजरे जमाने की एक छह, नौ शर्मा इमारत और हमारे जैसे घुमक्कडों के लिए एक एक आखिर चाय की झोपडीनुमा दुकान थी, चाय बेचने वाला है । किशोर उम्र का लडका था जो निश्चित रूप से आस पास के किसी काम का होगा जिस पर हमारा ध्यान नहीं गया था । हमने उससे चाय लाने के लिए कहा और काफी हद तक कृतज्ञता वरदान की भावना से वशीभूत होकर लगभग ना खाने योग्य ब्रस्ट बिस्किट भी मंगवा ली गई । पहाड की चढाई में हमने जो मेहनत, प्रयास और पसीना खर्च किया था, उसकी पूरी पूरी भरपाई उस ठंडी हवा नहीं करती जिसने शीर्ष पर पहुंचने के बाद हमारा पसीना सुखाया । हम नीचे सुदूर वह चौडी घाटे में सब कुछ सुनाई नही । नदी सुबर्णरेखा का घुमावदार पन्ना देख सकते थे और उससे भी अधिक दूर पहचान में न आने वाली फैक्ट्रियों और प्लास्ट फॉर्मेशन विस्फोट भट्टियों से निकलता तो वहाँ भी हम चारों ही शहरों में पले बढे थे । हालांकि अलग अलग शहरों और देश के अलग अलग हिस्सों में गौतम का भी घुमक्कड था और उसने अपने कॉलेज के दिनों में कई शौकिया ट्राई को में भाग लिया था । उसने अपना ये सॉफ्ट नौकरी में आने के बाद भी चाहते रखा था और हमेशा एक छुट्टी की तलाश में रहता था ताकि शौकिया यात्रियों के समूह से जोडकर उनके साथ पहाडों और जंगलों में ट्रैकिंग के लिए जा सकते है । अधिकतर ऐसा होता था कि हमें उसकी साहसिक यात्राओं के बारे में तब पता चलता था जब आपने पहले से सामली रंगत को धूप में और सामना करके नहीं था । राजीव और आलू शारीरिक रूप से फिट थे लेकिन गौतम जितने साथ ही नहीं थे । मैं हालांकि खिलाडी नहीं था लेकिन शारीरिक रूप से इतना स्वस्थ था की शर्मिंदगी से बच्चा हूँ । इसलिए हम चारों का गुड अक्सर आस पास के जंगलो बाहर हो या नजदीक छोटा नागपुर इलाके के छात्रों पर ट्रेकिंग के लिए निकल जाता था । दालमा पहाडी के शीर्ष पर स्थित चाय की दुकान एक किशोरावस्था का लडका अरुण चलता था जो फांसी के एक गांव में रहता था और जिस दिन भी मौसम साफ होता था पहाडी के ऊपर अपनी दुकान लगाने पहुंच जाता था । इस तो रस्का आशा के साथ की कोई साहसिक यात्री या ट्राय कर ऊपर आ जाएगा और उससे कुछ खरीदेगा ये उसके लिए मुश्किल और नीरज जी बन रहा होगा । लेकिन वह खुश और प्रसन्नचित लग रहा था । शायद जीवन से की गई अपेक्षाओं की कमी और प्रत्येक दिन को जीने के लिए संघर्ष करने की क्षमता ही थी जो छोटा नागपुर के उस साधारण से दिमाग वाले लडके को हम जैसे आधुनिक समय के असंतुष्ट शहरी लडकों से अलग करती थी । हमारे लिए जाहिर तौर पर सब कुछ आसान रहा था । हमें कभी किसी स्पष्ट अभाव का सामना नहीं करना पडा था । फिर भी हम भविष्य को लेकर आशंकित थे, वर्तमान से संतुष्ट थे, एक बेहतर जीवन जीने की इच्छा रखते थे । हालांकि ये नहीं जानते थे कि वह जीवन कैसा होना चाहिए । लेकिन उस सप्ताह हान की दोपहर को साफ व नीले आकाश के नीचे बैठे हुए डालमा पहाडी के शाॅप कृष्य पक्षियों की चहचाहट सुनते हुए जब हमारी आंखें और मस्तिष्क आराम कर रहे थे तथा हमारी मांसपेशियां खत्म हुई थी, हमारा सांसारिक थी और हमारा अनिश्चित भविष्य अप्रासंगिक लग रहा था । हमें एहसास हुआ कि हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ऐसे खूबसूरत फिर भी साधारण पाल हैं तो हमें कभी कभी मिलते हैं । एक दूसरे से और हमारी दूसरी जिंदगियों से अलग होकर वेज बंद किया जो दुर्भाग्य से हमें परिभाषित करती पहुंचे थे । हम ये और दुर्भाग्य की बात है, अपनी गलतियों को पहचान नहीं पाते हैं । दोपहर खत्म होने तक हम पहाडी की तलहटी पर वापस आ गए । अचानक आई दो भर के बारिश की छोटी से बौछार से भी के हुए और अपने रेस्टोरेंट, आबे तथा मोटरसाइकिलों की ओर चल पडेंगे । अब हम सिर्फ चार भूख थे । वह खाके युवक थे । हमने अगले दो घंटे तंदूरी चिकन पर धावा बोलते हुए ठंडे बियर की चुस्कियां लेते हुए बिताये और दोपहर की धूप का आनंद लेते हुए थी, देते हैं, आराम से नीचे उतरते रहे । हम लगातार बातें करते रहे । अपने अतीत थी वर्तमान की और संभावित भविष्य हस्ते रहेंगे, बहस करते रहे और यहाँ वहाँ अलग से धरे पडे रहे तथा आखिरकार समय आ गया वापस हो जाने का, अपने हॉस्टल के कमरों में जाने का, अगले दिन ड्यूटी पर जाने का, अपने दूसरी जिंदगी में लौटने का । हालांकि रिया अपनी पहली छुट्टियों के लिए लगभग एक साल बाद भारत आने वाली थी, लेकिन मैं यही चाहता तो उससे पहले ही छुट्टी ले सकता था । मैंने दिसंबर के अंतिम सप्ताह में सात दिनों की छुट्टियाँ लेने का निश्चय किया । ऐसा न करने पर मेरे आकस्मिक अवकाश रद्द हो जाते और हालांकि मुझे अपने घर की या घरवालों की खास कमी नहीं महसूस हो रही थी । लेकिन मुझे लग रहा था कि ये घरवालों के विशेष रूप से माँ के प्रति मेरा टाइप था । हालांकि वास्तव में ना उन्हें उस की आवश्यकता थी और ना ही उन्होंने मुझसे कभी मांग की थी । लेकिन मैंने अपनी पहली तन्खा माँ के लिए बचा कर सकती थी । थापनाओं या प्रतिबद्धता की वजह से नहीं, सिर्फ उन्हें खुशी देने के लिए । ये एक प्रकार से एक सुविचारित प्रयास था ये साबित करने का कि वे अभी भी अपनी अन्यथा स्वच्छंद बेटे पर एक मौन अधिकार रखते थे । उन्हें सच में इस बात से खुशी हुई । मुझे ये भी पता चला कि मेरे जमशेदपुर जाने के बाद मेरी जानदारी के बिना पिता जी ने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए, जिनकी संख्या कम ही थी, एक पार्टी रखी थी मेरी नौकरी लगने और कमाना शुरू करने गए जश्न को मनाने के लिए । दिसंबर में जब मैं जमशेदपुर से दिल्ली अपनी छुट्टियाँ मनाने आया तो मेरा स्वागत कडाके की ठंड और कोहरे से हुआ । दिल्ली में दिया के बिना अधिक समय बिताएं । मुझे कुछ एक साल हो गए थे । मुझे वहाँ अकेलापन महसूस हो रहा था क्योंकि मेरे अधिकतर दोस्त या तो दिल्ली से बाहर चले गए थे या मेरे दक्षिणी दिल्ली के घर से बहुत दूर रहते नहीं । दिल्ली में बिताई । उन संक्षिप्त छुट्टियों के दौरान पर्याप्त खाली समय होने के कारण मैं बहुत से परिचित स्थानों पर गया जहाँ मैं और रिया कुछ ही महीनों पहले घंटो एक साथ समय बिताया करते थे । बातें करते हफ्ते एक दूसरे को देखते रहते हैं । लेकिन अब घंटे बहुत लंबे प्रतीत हो रहे थे और रेस्टोरेंट के बिल अनावश्यक रूप से अधिक मैं प्रकार से बोर ही हो रहा था । लेकिन मुझे रिया की कमी उतनी नहीं महसूस हो रही थी जितने मैंने सोची थी । हालांकि मेरे अधिकतर दोस्त और कॉलेज के साथ पार्टी बाहर निकल गए थे और अपने अपने जीवन में व्यस्त हो गए थे । लेकिन राजेश वही था । वो अभी भी अपने पिता के सरकारी आवास में अपने माता पिता के साथ रहता था और उसे कैंपस भर्ती के माध्यम से एक बडी भारतीय एयर कंडीशनर माॅडलिंग कंपनी में नौकरी मिल गई थी । उसे उपनगर में स्थित अपने फैक्ट्री कम ऑफिस तक पहुंचने के लिए रोज दो घंटे से ज्यादा समय डीटीसी की बसों में गुजरना पडता था । इसलिए हमारी मुलाकात मेरे संक्षिप्त छुट्टियों के दौरान पडने वाले एकलौते सप्ताहांत में लंच पर होनी जो हमने अपने पुराने कॉलेज के गेट पर स्थित पुराने वह परिचित दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट में लिया । सब कुछ बिल्कुल पुराने दिनों जैसा था । हमने तो से मंगाए और अपने जीवन के बारे में बातें साझा की । राजेश की तुलना में मेरी दुनिया ज्यादा बदली थी क्योंकि मैं दूसरे शहर में बिल्कुल नए वातावरण में और नए दोस्तों के बीच रहने लगा था । मैं खेला भी रहता था । जल्दी हमें समझ में आ गया कि हम दोनों की दुनिया अपने एक समान नहीं रह गई थी और बातचीत के लिए एक आम आधार मिलना मुश्किल था । इसलिए हमने अपने कॉलेज के पुराने दोस्तों के बारे में बात करना शुरू कर दिया । रवि पुना वापस चला गया है और अपने पिता के कारोबार में शामिल हो गया है । मुझे लगता है कि वह उसी से जुडा रहेगा । अगर इतने अमीर पिता के होने पर उसे नौकरी ढूंढने की क्या जरूरत है? राजेश ने हमारे आम तो रवि गुप्ता के बारे में सूचना दी हूँ । पी उसको जमशेदपुर में एक दूसरी टाटा कंपनी में नौकरी मिल गई है । मुझे लगता है उसे पहचान की वजह से नौकरी मिली है । मैंने कहा राजेश और इंडिया की बात ना छोडने को लेकर सावधान था । मुझे लगता है उसे डर था कि उसकी बात करने से मुझे दुख होगा । हालांकि पहचानता हूँ वो जानने के लिए उत्सुक रहा होगा । क्या तुम रेड स्टार में ही काम करते रहना चाहते हो? रोज के आने जाने से बहुत थकान होती होगी ना । मैंने पूछा मैं सही मायने में उसके लिए चिंतित था और ईश्वर का शुक्रिया अदा कर रहा था कि मैं उसके जैसी स्थिति में नहीं था । देखते हैं मैं कंपनी का ट्रेनिंग प्रोग्राम पूरा करके सेल्स व्यापार के गुर सीखना चाहता हूँ । उसके बाद शायद नौकरी हूँ । लेकिन मैं ये नौकरी अभी होने के मूड में नहीं आने जाने में परेशानी तो होती है लेकिन मुझे लगता है कि मैं बहुत कुछ सीखता हूँ । हाँ, तुम राजेश नहीं पाई । मैं तो काफी आराम से कम से कम फिलहाल तो हूँ । मेरे बस एक ही परेशानी है कि इतनी बडी कंपनी में मैं खुद को खोया हुआ महसूस करता हूँ । फिर मैं जिंदगी मजे से कट रही है । मैंने खुद को सांत्वना विवेक को कोटा के माध्यम से भारत इलेक्ट्रॉनिक्स में नौकरी मिल रही है तो उसे दो हफ्ते पहले मिला था तो काफी खुश था और संतुष्ट हैं । राजेश् होना विवेक ही हमारा पुराना सहपाठी था और उसी यूनिवर्सिटी स्पेशल बस में आया जाया करता था । ऍर आमने सामने बैठक हालत खाते हुए और खिडकी विशाल कांच में व्यस्त सडक के भीडभाड देखते हुए अपनी सुखद बहुत ही करता अच्छे करते रहे हैं । हालांकि वह साप्ताहांत था लेकिन हमारे कॉलेज के दो होस्टलों के एक छात्र सस्ते खाने या खाने के बाद ही सिगरेट की तलाश में छोटे छोटे गुट बनाकर खून रहे थे । हालांकि हमें कॉलेज छोडे कुछ ही महीने हुए थे फिर भी हमें कोई जाना पहचाना चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था । कम से कम दूर से तो नहीं । आपने बिल चुकाने के बाद हम वहाँ से साथ साथ निकले और लगभग पूरे रास्ते साक्षर पर फिर अपने अपने घर और तेजी से अलग होते जीवन की ओर चल पडे । मेरी छुट्टियाँ अकेले ही घूम फिर कर और घर में कर्तव्य परायण बातचीत करके बीत रही थी । जल्दी ही समय आ गया । तब एक दिन बहुत सुबह अंधेरा रहते ही मुझे उत्तरी दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर जाना था और जमशेदपुर के छत्तीस घंटों की एक आपकी यात्रा के लिए ट्रेन में सवार होना था । मुझे लगभग ऐसा लग रहा था कि मैं अपने घर वापस आ रहा हूँ जबकि मुझे जमशेदपुर में रहते हुए छह महीने हुए थे और दिल्ली में मैं अपना बचपन बिताकर बडा हुआ था । वो

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