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हम हैं राही प्यार के - Part 13 in  |  Audio book and podcasts

हम हैं राही प्यार के - Part 13

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मैं पहली क्लास छोड़कर रिया से मिलने आई.एम.टी. जाना चाहता था। लेकिन इनसान जो करना चाहता है और जो करने की उससे अपेक्षा की जाती है, उसमें हमेशा अंतर होता है। मैंने सोचा कि मैं कक्षाओं के बीच मिलनेवाले दस-दस मिनट के अंतरालों में से एक में अपनी किस्मत आजमाऊँगा और उसके कॉलेज जाने की कोशिश करूँगा, सुनिए आखिर क्या है पूरी कहानी| writer: पार्थ सारथी सेन शर्मा Voiceover Artist : Shreekant Sinha Author : Parth sarthi Sen Sharma
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मेरे बहुत सारे रिश्तेदार निकट के भी और दूर के भी इस विशाल शहर के विभिन्न हिस्सों में रहते थे, लेकिन मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि वे कहा और कैसे रहते थे । इतने सालों से संपर्क छूट जाने के कारण खून के रिश्ते हैं, जो कभी निकट थे । धीरे धीरे बहुत दूर हो गए थे और पीछे छूटा सुनने ही उनके पूर्व अस्तित्व का एकमात्र यादगार रह गया था । मेरे सामने विशाल संगमरमर से बनी लॉर्ड कर्जन की इमारत खडी थी, जिसका निर्माण भारत के निर्धन लोगों की कीमत पर भारत के समृद्ध लोगों द्वारा दान किये गए पैसों से हुआ था । स्मारक उस सुदूरवर्ती रानी की भी उतनी ही याद दिलाता था जो कभी अपने इस आकर्षक प्रभुत्व का दौरा नहीं करती थी, जितनी की उनके वायसराय और भारत के राजा हुआ जमींदारों की चाटुकारिता की, जो अपने नाम और यश के लिए उनके अस्तित्व पर निर्भर करते थे । लेकिन इसके निर्माण के पीछे कारण जो भी रहा हूँ, ये सफेद इमारत अत्यधिक सुंदर, भवते, चमकता और सौहार्द्रपूर्ण थी । हालांकि एक व्यर्थ प्रयास था । मैं स्मारक के सामने बने मुख्यमार्ग के किनारे फुटपाथ पर धीरे धीरे टहल रहा था । आस पास के दृश्य सुंदर थे और वर्ष के इस समय जब गर्मी अपनी चरम पर नहीं थी, यहाँ की चौडी सडकें जिन के किनारे पेड लगे थे और सामने हरे भरे मैदान थे, बहुत सुखद ऐसा सुपर ना कर रही थी । और ये शायद शहर का सबसे अधिक ब्रिटिश प्रभाव वाला क्षेत्र था जिसके पास ही एस्प्लेनेड, न्यूमार्केट, पार्क स्ट्रीट जैसे क्षेत्र थे जिनके राम बहुत प्राचीन तो नहीं लेकिन एक अलग अतीत का आह्वान करते थे । शहर और शहर में रहने वाले जल्दी में थे जो कि मेरे आस पास के ट्रैफिक की हलचल से साफ पता चल रहा था और किसी के पास अतीत के बारे में सोचने का समय नहीं था । लोग अपने भविष्य की ओर पढ रहे थे उम्मीद से भरे हुए लेकिन चिंतित भी । मेरे पास काफी समय था क्योंकि समीर के शेड में मेरा काम अनापेक्षित रूप से जल्दी समाप्त हो गया था और मैं निरुद्देश्य सात सडकों पर पहल कहा था । मेरे मन में कई विचार उभर रहे थे लेकिन बिना कोई ग्रुप लिए गायब हो रहे थे क्योंकि उन्हें अस्पष्टता का वो लाभ नहीं मिल रहा था जो बातचीत से आता है । तब किसी विशेष व्यक्ति से बात करना चाहता था जो किसी से नहीं । हम दूसरों के साथ कितना समय बिताते हैं, उनसे बात करते हैं, उनके साथ हस्ते हैं, लेकिन ऐसा कभी कभार ही होता है कि हमें समय, स्थान, व्यक्ति और मानसी का व्यवस्था का उचित सहयोग प्राप्त हो । जब एक और विचार उत्पन्न हो और दूसरी ओर हम उन्हें किसी के सहानुभूतिपूर्ण और समझ पूर्ण कानून तक पहुंचा सकें, तभी हमें एहसास होता है कि प्रत्येक व्यक्ति एक द्वीप के समान होता है का क्या अर्थ है? पता नहीं क्यों मुझे लगाते । इस समय वो काजल ही होती है जिसके साथ में अपने विचारों को बात कर अस्पष्ट रूप देने का प्रयास कर सकता था । हालांकि अभी भी मेरे बारे में बहुत कुछ था जो वो नहीं जानती थी लेकिन फिर में मुझे लग रहा था कि वह कोई निर्णय लिये बिना मेरी बात को समझने का प्रयास करेगी छाने की मुझे लगा कि अगर कलकत्ता में इस फुर्सत पूरे दिन वो भी मेरे साथ होती तो अच्छा होता है । लेकिन जैसे ये विचार मेरे अवचेतन मन में आया, मैंने उसे जानबूझकर बाहर धकेल दिया । इस बात के प्रति सचेत होते हुए नहीं तो ऐसा होना संभव है और न ही सही निष्ठा और नैतिकता के मेरे सहजभाव नहीं । मुझे दिया के बारे में सोचते हैं, को प्रेरित कर दिया जो मुझ से मीलों दूर कहीं बैठी थी । एक ऐसी दुनिया में जो भी मिल गई, नितांत अजनबी और अनजानी । लेकिन मैं उसके बारे में कुछ ज्यादा नहीं सोच पाया । जब भी का जीव सी लगने वाली फिटर मेरे पास से गुजरी तो मैं समय और स्थान के अपने वर्तमान वातावरण में लौट आया । फिट इन को एक दुबला पतला दाढी वाला आदमी चला रहा था जो सफेद कुर्ते पाजामा के ऊपर एक बंडी पहने हाथ में बूढे से घोडे की कमान था में उसके ऊपर बैठा था । चालक के कपडों की तरफ रिटर्न को देखकर भी लग रहा था कि उसने बेहतर दिन देखे थे । आज के कारों और बसों के युग में वो एक अनोखा चुका था । उन दिनों का आवर्तन जब कलकत्ता बल्कि भारत जिसकी वो राजस्थानी था, औपचारिक वस्त्र पहने कठोर भी अच्छे हो हूँ और गोरी चमडे वाले विक्टोरियन अंग्रेजों द्वारा शासित था । मेरे मन में तो एक विक्टोरियन महिला की कल्पना भी उपर आएगा जो आपने विस्तृत जटिल पूछा । आप और केशविन्यास में शहर की ट्रॉपिकल जलवायु के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त है । काम कर अपनी गाडी में बैठे हैं । आपने अगले सामाजिक दौरे के बारे में सोचती हूँ । खुद को इस विदेशी और अपरिचित माहौल में खुश रखने की कोशिश करते हुए अपने पास वोल्ट गांव के केले हरे भरे खेतों से मिलो । तुम जहाँ वो बडी हुई थी, क्या वो भी इस विदेशी अनजाने जगह पर रहते हुए उतने ही खुश लिफ्ट और उत्साहित थी, जितने दिया है? या वो अपने घर से दूर आकर असहज और व्याकुल है । तभी एक और हाथ से खींचने वाला रक्षा मेरे पास से निकला । बीते समय का एक और घटना जा रहा वैसी एक दुबला पतला बिहार याद नहीं तो शायद महानगर के अराजक यातायात का आती नहीं था । एक मोटे और कोरे चश्मा धारी आदमी को, जो शहर में अपनी हैसियत से परिचित था, बैठकर कठिनाई से रिक्शा खींच रखता । दोनों एक दूसरे से इतने अलग लग रहे थे कि उनके बीच एक विभाजन का अभाव अप्रासंगिक लग रहा था । शहीद मिला तो एक समय डॉक्टर लोनी स्मारक के नाम से जाना जाता था की पृष्ठभूमि में एक हॉल में प्रसिद्ध हो । कोई बांग्ला अभिनेत्री एक टीवी चैनल का रिपोर्टर को इंटरव्यू दे रही थी । उसको संतुष्टि प्रदान करते हुए एक छोटी सी सहज भीड उनके आसपास एकत्रित हो गई थी और उत्सुकता से दृश्य को देख रही थी । चैनल का स्टाफ इस प्रयास में लगा हुआ था कि उस अनचाही भीड का कोई सदस्य कैमरे के फ्रेम में ना आ जाए । उस दृश्य को देखकर मेरे मन में लाल देखी, साधारण ग्रामीण महिलाओं का और उनके अथक संघर्ष का ख्याल आ गया जो खुद के और अपने परिवारों के जीवन के लिए करती थी । जबकि यहाँ मैं आधुनिक उदार भारत को अपनी जमीन तलाशते देख रहा था कैमरे के फ्रेम के बाहर लेकिन कम वास्विकता से नहीं । कुछ देर बाद अपनी ही धुन में अकेले चलता हुआ मैं पार्क स्ट्रीट पहुंच गया जो अंग्रेजों का एक परिचित माहौल उत्पन्न करने का एक और प्रयास था । पार्क स्ट्रीट कुछ कुछ लंदन में स्थित उनकी ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट जैसा था । एक शहर के केंद्र में तो उन्होंने एक अनजान और परिचित धरती पर बनाया था । एक शहर जिसमें उनकी जगह कभी नहीं पाई थी और जहाँ रहने वाले लोगों को वे कभी समझ नहीं पाए थे, वहाँ सडक के किनारे ऍम और कैलोरीज जैसे नाम वाले रेस्टोरेंट थे तो एक समय लगभग पूरी तरह कलकत्ता के ब्रिटिश कोलेन जनों के स्वामित्व प्रबंधन और संरक्षण में थे, जिनमें उनके अब सरचार्ज व्यापारी और विदेशी कंपनियों के मैनेजर, बैरिस्टर और उनकी मिल अंसार, पत्नियाँ शामिल थी । अंग्रेजों के जाने के बाद भिन्न रेस्टोरेंटों के नाम नहीं पतले थे और कहीं कहीं फर्नीचर मा आंतरिक सच्चा वैसे ही थी । लेकिन लोग मालिक, मैनेजर राहत सब बदल गए थे । लोगों का एक बिल्कुल नया दल भारतीय व्यापारी, अधिकारी, यात्री और घुमने आए । कुछ परिवार भी अब उन कुर्सियों पर बैठते थे । मैं भी पार्क स्ट्रेट के उन मसूर रेस्टोरेंट में से एक में खाने के लिए जाना चाहता था । लेकिन मेरे अंदर किसी चीज ने शायद हिचकिचाहट एक प्रकार के अपराध भाव जिसे बैठ ठीक से व्यक्त नहीं कर पा रहा था । अनुचित अपव्यय या दादी के साथ समय बिताने के कतर्व्य नहीं, मुझे रोक दिया और मेरे कदम एक भीड भरे कोने की ओर जो टैक्सी स्टैंड बिता चल पडेंगे । एक को और प्राचीन काली पीली टैक्सी मुझे बैठाकर चल पडे । शहर के देर से होते हुए एक समय के इस ब्रिटिश शहर की सडकों से गुजरते हुए जिसका स्वतंत्र युग के नवनिर्मित स्थानों के साथ विलय हो गया था मेरी दादी के घर की ओर जहाँ सालों पहले मेरे पिता जी ने युवावस्था में प्रवेश किया था, मेरी दादी हाथ में पीतल की थाली लिए जिसमें धूप और नारियल के कुछ देशों का मिश्रण चलकर सुगंधित हुआ फैला रहा था । एक कमरे से दूसरे कमरे में घूम रही थी । ऐसा भी घर को शुद्ध करने के लिए कर रही थी । ये उनका दैनिक नियम था जो वे तब से करती आ रही थी जब वर्षों पहले तेरह वर्ष की उम्र में वे विवाह करके अपनी ससुराल आई थी । उनके इस नियम में तब भी बाघा नहीं आई थी जब उनके पूरे जीवन और घर में सब कुछ उथल पुथल हो गया था । कभी सैकडों हजारों अन्य असंदिग्ध परिवारों की तरह ढाका स्थित अपने घर और दुनिया को छोडने पर विवश कर दी गई थी तो अब एक दूसरे देश की राजधानी है । भारत के विभाजन के बाद हुई बर्बादी की घटनाओं के दौरान वे लोग कलकत्ता आ गए थे । बाहर शाम गिर गई थी और अंधेरा होने लगा था । पडोस के घरों में एक एक करके बिजली की लाइट ऑन हो रही थी और उनकी खुली खिडकियों से दिखाई पड रही थीं और घरों में रहने वालों की झलक भी दिखा रही थी । पास के घर में एक लडकी संगीत का अभ्यास करने का प्रयास कर रही थी और उसकी तनावपूर्ण अनिमेष आवाज हवा में उडते, परसों से छनती हुई, खुली खिडकी से अंदर आ रही थी तो मेरे साथ मंदिर चल हो गए । मैं तो मैं नारी खेल दादू से भी मिलाना चाहती हूँ । चलोगे तो दादी ने एक पल के लिए मेरे सामने रखते हुए पूछा और अपने हाथ में पकडी । पीतल की थाली मेरे सामने करती, जिसका धुआ और गर्माहट मुझे अपनी हथेलियों में अवशोषित करते अपने चेहरे पर लगाना था । उस प्रथा के अनुसार जो मैं अपने घर में बचपन से देखता आ रहा था, मैं जानता था कि मैं उनके साथ जाकर असहज महसूस कर सकता हूँ । बोर भी हो सकता हूँ । लेकिन मैं दादी को निराश नहीं करना चाहता था, जो मेरे लिए मेरे पिता जी और उनकी या कहीं अपेक्षाओं की जीती जागती प्रतीक थी । हाँ हाँ, ठीक है मैं चलूंगा । जब भी आप चलना चाहिए । मैंने जवाब दिया स्पष्ट रूप से प्रसन्न हो गई । शायद उन्होंने मुझसे पूछने से पहले उस प्रश्न का कई बार अभ्यास किया था । उसके औचित्य के बारे में खुद से सवाल करते हुए । लेकिन अब मेरे जवाब में उन के विश्वास की पुष्टि करती थी । कुछ ही देर में तैयार हो गयी । उसी साडी को पहनकर मैंने ध्यान दिया तो सुबह मैं उनके लिए लाया था । मुझे ऐसा हुआ कि अगर वे मेरे लिए मेरे पिताजी का प्रतीक थी तो मैं भी उनके लिए उसे इंसान का प्रतीक था । उनके बेटे का उस बैठेगा जिसे उन्होंने उसी घर में पडा किया था और फिर सालों पहले जाते हुए देखा था । अब उनका बेटा वापस आ गया था । भले ही सिर्फ दो दिनों के लिए हम ईंटों से बनी पक्की गलियों में चलते हुए दादी के मंदिर में पहुंचे । इन कलियों में हमारे जैसे कई घर थे जिनमें वे परिवार रहते थे जिन्हें विभाजन के बाद करीब तो पीडितों पहले अपने घर छोडकर यहाँ आने पर विवश होना पडा था । लेकिन इस समय घरों में रहने वालों के पास उस समय क्या उन दिनों के बारे में सोचने या याद करने का वक्त था ना इच्छा क्योंकि उन्होंने इस ऐतिहासिक अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया था । बस कभी कभार कोई वृद्ध व्यक्ति मिल जाता था जो अपनी धूमिल झिलमिलाती आंखों से सुनने में देखता रहता है । जैसे की खुद को अतीत के सारे से मुक्त करना चाहता हूँ लेकिन वो साया उसे छोडने को तैयार हूँ । आपको अपने ढाका के दिन याद है शादी मैंने पूछा जो कोने में स्थित एक छोटी सी दुकान के सामने अपने किसी परिचित से बात करने के लिए रुकी थी और फिर मेरे साथ चलने लगी थी । हाँ, कोई उन देने को कैसे भूल सकता है? वो हमारी जिंदगी थी, हमारे दुनिया थी ताकि में कुछ पल के मौन के बाद कहा । लेकिन उन्होंने इसके आगे कुछ का और ना कुछ कहने की छुट्टी कि वे अपनी नई दुनिया में अपने बच्चों की चिंता और एक काम गीन पति को लेकर लगभग खाली हाथ आई थी । उन्होंने बहुत लंबा संघर्ष किया था । लेकिन मेरे पिता और अपने कुछ हद तक उनके संघर्षों की पुष्टि और उनमें विश्वास के लिए खडे थे । अब ये अपने मंदिर में जा रही थी अपने व्यक्तिगत भगवान के निवास में, जिन्होंने उन कठिन बहुत निराशाजनक दिनों में उनका विश्वास बनाए रखा था तो विश्वास इसके अलावा उस समय उनके पास कुछ भी नहीं था । वो कोई पारंपरिक मंदिर नहीं था बल्कि साधु महाराज को समर्पित एक स्मारक था जो सालों पहले स्वर्ग सिधार चुके थे । लेकिन उनके विरासत उनके नियुक्त किए उत्तराधिकारियों और समर्पित शिष्यों के समूह द्वारा आज की सफलता पूर्वक चलाई जा रही है । ऐसे पवित्र लोग और उनके उपदेश भारत में हमेशा से प्रचालित रहे हैं । चौबीस घंटे के टेलीविजन चैनलों टीवी जनहित करूँ, वहाँ बाबा वों की भीड आने के बहुत पहले आ गए । जाकर महत्व मिला विभिन्न उम्र के समर्पित शिष्यों का एक समूह जिनमें अधिकांश पहला आए थे, फर्श पर एक माला चढी । तस्वीर के इर्द गिर्द गोलाकार घेरा बनाकर बैठा था । तस्वीर उन्हीं साधु महाराज की थी मेरी दादी के ठाकुर जिसका शाब्दिक अर्थ वास्तविक नहीं, भगवान था । मैंने उसका स्वीट का प्रेम लगा माला चढा लघुरूप दादी के शयन कक्ष में देखा था । उनको कीमती चीजों में से एक जो ढाका से अपने साथ लाने में कामयाब रही थी । अधिकांश भक्त जिनमें से कुछ भी आंखे श्रद्धा से बंद थीं, एक पवित्र गाने की धुन पर झूम रहे थे । एक कीर्तन की धुन पर जो केरला वस्त्र पहने व्यक्ति का रहा था और हारमोनियम पर एक अन्य व्यक्ति उसका साथ दे रहा था । हमने अपनी चप्पलें उतारी । जैसा के किसी भी हिंदू मंदिर में प्रवेश करने के पहले किया जाता है और उस गोलाकार घेरे की परिधि में पालथी मारकर चुपचाप बैठे हैं हैं । मंदिर के आसपास के आसमान आंगन में कुछ हाल ही में निर्मित बेहतर तीन से स्थित कमरे थे । कुछ कमरे अतिथि कक्ष अता काम करते थे, कुछ दफ्तरों के रूप में काम आते थे । एक में दवा के डिस्पेंसरी थी और एक में पुस्तकालय । हालांकि वहाँ के वातावरण से मेरे मन में कोई भक्ति भाव जागृत नहीं हुआ, लेकिन उत्सुकता आवश्यक जाती । धर्म और ईश्वर के प्रति मेरा दृष्टिकोण अभी अनिश्चित और आना था । मेरे विचार अभी किसी भी पक्ष में मजबूत नहीं हुए थे । बाद में नारे खेल दादू के घर के रास्ते में मेरी दादी ने बताया कि वे खुद को खुशकिस्मत मानती थी कि उनकी आपने ठाकुर से मुलाकात हुई और उनके जिंदा रहते हैं । उनसे दीक्षा ली दे । मुलाकात उनके मूल आश्रम में हुई थी, जो चिट्टा गोंग या चट ग्राम जा सके । हुए बहुत पहले कहती थी की तलहटी में था । आप एक युवा माँ के रूप में अपने पति और बच्चों के साथ उनके आश्रम आ गई थी । उन बच्चों में से एक बडी बडी आंखों वाला पाला, जिसके लिए ढाका से वहाँ तक भी लंबी यात्रा ही एक साहसिक कारनामा रही होगी । मेरे पिता जी थे और मेरी उत्साहित जाती नहीं, उनको भी नाममात्र की शिक्षा दिलाई थी । लेकिन बहुत दुरस्त । शिक्षा शायद इतने वर्षों की पांच छात्र शिक्षा और शहरी जीवन के प्रभाव से धूमिल पड गई होगी, क्योंकि मैंने अपने पिताजी को किसी संस्था का धर्म का पालन करते या उस पर विश्वास जताते नहीं देखा था । नारी खेल तब बंगला में अर्थ होता है नारियल और मुझे नहीं पता था की नारी खेल दादू को ये विचित्र नाम क्यों और कैसे मिला । मेरे दादा दादी के ढाका के दिनों के मित्र थे और परिवार के सदस्य से कुछ अधिक ही थे ये तथ्य की मैंने उनके बारे में अपने पिताजी से सब सुना था और मैं उन से कभी मिला नहीं था । उस स्टोरी को प्रतिबिंबित करता था जो मेरे और मेरे परिवार के बीच उत्पन्न हो गई थी । हम एक साधारण से इमारत की संकरी सीढियां चढकर नारे खेल दादू के कमरे में पहुंचे मेरी दादी का उन्हें पहले से मेरे आने के बारे में बताने का प्रश्न ही नहीं होता था लेकिन हमारे खुशकिस्मती से वे घर पर थे और उन्होंने तत्पर्ता से अपने कमरे का नीला लकडी का दरवाजा खोल दिया । ये बबलू का बेटा है । मैंने सोचा इससे आपसे मिला दूँ । दादी ने मेरी उपस् थिति का कारण बताया और लकडी के बडे से बक्से पर बैठ गई जिस पर एक कपडा बिछा था ताकि वह एक पेंच का काम कर सके । नारी कल दादू का कमरा एक कल और साधारण था लेकिन बहुत छोटा नहीं था । मैं वहाँ रख एकलौती लकडी की सीधी कुर्सी पर बैठ गया जो कपडे में रखे गिने चुने सामानों में से एक थी । नागरिक एल दादू स्वयं अपने बिस्तर पर पालथी मारकर बैठे थे । एक ओर की दीवार पर श्रीमद् भगवत की ताकत दृश्य दर्शाता एक टॅाक था जिसमें श्री कृष्ण अर्जुन को गीता का ज्ञान दे रहे थे और ये तो बिल्कुल अपने बाबा जैसा लगता है । मुझे बबलू की आप है तब वो इस उम्र का था । वो इसी कमरे में मुझे अपनी पहली नौकरी लगने की खुशी में मिठाई देने आया था । नारी खेल दादू ने कहा तो उनके होठों पर मुस्कान थी और आंखें दूर कहीं तक तकलीफ लगाकर देख रही थी । मैं कुछ नहीं बोला । मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ और कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ । मुझे लगा शायद मुझे भी उनके लिए मिठाई लेकर आना चाहिए था या कमरे में प्रवेश करने के बाद उनके पांव छूकर आशीर्वाद लेना चाहिए था । लेकिन उस समय मुझे खयाल नहीं आया था और अब बहुत देर हो चुकी थी । फिर भी मेरे मन में उस व्यक्ति को लेकर उत्सुकता थी । उनके आचरन मुद्रा और निगाहों में कुछ था जो मुझे आकर्षित कर रहा था । नाटिकल दादू ने कभी शादी नहीं की थी और ढाका में रहने के दौरान वे अनुमति सीलम समिति में शामिल हो गए थे । एक क्रांतिकारी संगठन जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन से भारत को आजाद करा होना था, आवश्यकता होने पर हिंसक साधनों का उपयोग करके भी उसके लिए उन्हें गिरफ्तार किया गया था । अपराधी ठहराया गया था और अंडमान की सेल्यूलर जेल में काला पानी की सजा भुगतने के लिए भेज दिया गया, जहाँ से वे कई वर्षों के बाद उन्नीस सौ सैंतालीस में छोटे आजादी और विभाजन के दिनों से नारी खेल दादू कलकत्ता में रहते थे । उन्होंने अनुशीलन समिति के दिनों के अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर उन पुराने क्रांतिकारियों के लिए एक इमारत बनवाई थी जिनका कोई और ठिकाना नहीं था । पिछले कुछ वर्षों में उनमें से अधिकांश वृद्ध और बीमार होकर स्वर्ग सिधार गए थे । अब नारे खेल दातू इस इमारत में निर्धन परिवारों से आए लडकों के हॉस्टल के चौबीस घंटे के केयर टेकर अभिरक्षक की जिम्मेदारी संभाल रहे थे तो तुम्हे अपने बाबा की तारा इंजीनियर हो । तुम जमशेदपुर में नौकरी करते हो, ना अच्छा है, मैं तुम्हारे लिए बहुत खुश हूँ । नारी खेल दादू ने दिल से कहा ये अच्छी बात है कि तुम समय निकालकर अपनी दादी से मिलने आए । कोशिश करते आगे भी आते रहना । उन्होंने कहा, वो मुझे उपदेश नहीं दे रहे थे और उन के स्वर में शिकायत या आरोप लगाने जैसा भाव भी नहीं था । हालांकि नीचे हॉस्टल के लडकों के लिए एक अच्छा खासा रसोई घर था । फिर भी नारे खेल दादू अपने कमरे से लगी रसोई में अपना खाना खुद पकाना पसंद करते थे । हमारे मना करने के बावजूद उन्होंने हम सबके लिए चाय बनाई और साथ में हमें चिवडे और गोडसे बनी । स्टेट बंगाली मिठाई मुझे खिलाई जो उन्होंने हॉर्लिक्स के पुरानी कांच की बोतल में रखी थी । मेरी अपेक्षाओं के विपरीत नारी खेलता हूँ । जीवन से निराश हो चुके एक व्यक्ति नहीं लग रहे थे और जहाँ तक उनका वर्ष चलता था, अपने अतीत के बारे में बात करना पसंद नहीं करते थे । पे धार्मिक व आध्यात्मिक हो चुके थे और अपना शेष जीवन एक सन्यासी की तरह बिता रहे थे । वे बैराबी नहीं थे लेकिन अकेले और संतुष्ट थे । इस चलायमान शहर और उसके शोर, गंदगी वक्त तनावों से धीरे होने के बावजूद उनसे अनछुए अपनी तन्हाई में मकर काजल और मिस्टर कुलकर्णी अपने किसी निकट के रिश्तेदार बल्कि काजल के चचेरे भाई की शादी में शामिल होने नासिक गए थे जो महाराष्ट्र के गढ में स्थित एक शहर है । भारत में शादियाँ अधिकतर दूर के शहरों में रहने वाले रिश्तेदारों के लिए बहुत बडे अवसर लेकर आती है । लंबे समय बाद आपस में मिलने का, परिवार के नए सदस्यों का परिचय कराने का भाई बहनों के लिए मिलने और एक दूसरे से अपने बच्चों को मिलने का । ये ऐसे अवसर भी होते हैं जब दूसरी शादियां तय होती है । संभावित वपूर्ण और दामादों का आकलन होता है और उनके घर वालों के पास प्रस्ताव भेजा जाता है । अधिकतर माताओं और चाची बुआ की उत्सुक नर्सों के नीचे काजल की माँ नहीं थी और मिस्टर कुलकर्णी इस तरह के प्रयोजनों के अनुकूल है या नहीं इस बात के प्रति मेरे मन में बहुत ज्यादा संदेह था । साथ ही काजल का एक दिन का होना भले ही इतने कम उम्र में इस प्रकार की तरह की हुई शादियों की दृष्टि से एक गंभीर दोस्त था । लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात ये थी कि मुझे मालूम था कि काजल एक अलग तरह की लडकी है और वो अपना निर्णय खुद लेगी और साथ ही अपने निर्णय के परिणामों की जिम्मेदारी भी लेगी । जैसा कि वह पहले एक बात ले चुकी थी । इतने दुखद रूप में हालांकि मेरी दोस्ती मिस्टर कुलकर्णी और काजल दोनों से थी और मुझे काजल के दोबारा शादी करके घर बचाने के विचार से खुशी होनी चाहिए थी । लेकिन पता नहीं मेरे मन का एक हिस्सा उसके किसी अंजान व्यक्ति से शादी करके दूर चले जाने के खयाल से बहुत खुश नहीं था । काजल के वहाँ होने के बावजूद मैं उस रविवार लाल दे गया । मैं अपनी जान पहचान बस में पहली बार अकेले यात्रा कर रहा था जो सडक के किनारे इससे छोटी छोटी बस्तियों और रास्ते में पडने वाले कद्दू का शहरों को पार करते हुए खाली झाडीदार जमीनों और कम आबादी वाले जंगलों के बीच से ऊपर खाबड रास्तों पर टकराते और झटके खाते हुए लाल जी की ओर चली जा रही थी । हालांकि मैं पहले भी कई बार उसे रास्ते से लाल जी आ चुका था । उस दिन मुझे कुछ अलग सा महसूस हो रहा था और बगल की सीट पर एक सहयात्री एक काला साथ में जो लगातार पत्नी बिल्लियाँ पहन के जा रहा था कि बैठे होने के बावजूद मुझे वो सीट खाली लग रही थी । मैं आसानी से उसका अकेले लाल गई । ज्यादा टाल सकता था । लेकिन मैं खुद को दिखाना चाहता था कि जीएसएस के गांवों में मेरी असंख्य यात्राओं के पीछे एकलौती वजह काजल नहीं और मेरे लिए मेरा काम निर्मल आती की संस्था और लालडी एवं अन्य गांवों की महिलाओं के साथ मेरी भागीदारी काजल से अधिक महत्वपूर्ण है ।

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