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This book is a compilation of short stories studded with several morals, thoughts filled with immortality and experience that should be passed on to every generation. The book will be eagerly sought after for its literary value as this is really a paragon of virtue. The compilation of many ingredients makes the book worthful so let’s taste with great relish. The title implies a strong connection between the permanent knowledge and reader’s mind. Based on reason , fact and logic, a great synchronization of radiance of different gems will make one’s life valuable. Voiceover Artist : RJ Bhagyashree Author : RK Dogra
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ऍम ऍम किस ऍम डिग्री ऍम ऍम फ्लॅाप अप्रोज जाॅच ट्रॅफी और हर तेल मिस्र लेना सच सौ आॅर्ट आॅफ अंदर दरबान, मॉल आॅफ फॅमिली फॅमिली जब लाॅट और यूज डेवलॅप, स्माइलिंग की स्माइलिंग ऍम चक्कर बत्तीस हूँ । एक महात्मा की संपत्ति मात्र चार वस्तुएं थी एक कंबल, चिंता तुम भी और लंगोटी । कम्बल सबसे कीमती था जिसे किसी भक्त ने श्रद्धावश दिया था । एक रात कंबल चोरी हो गया । दूसरे दिन जब भक्तजन कुटिया में महात्मा जी के दर्शनों के लिए आए तो उन्हें ये जानकर बडा दुख हुआ । उन सभी ने महात्मा को दूसरा कम्बल लाकर देने की बात कही जिससे महात्मा ने अस्वीकार कर दिया । उन्होंने यानी महात्मा ने कहा मुझे मालूम है कि कम्बल कौन ले गया है, कहाँ है और कब मिलेगा । भारतीय समझे की महत्व त्रिकालदर्शी हैं और उन्होंने चोर का पता लगा लिया है । उन भक्तों ने महात्मा से प्रार्थना की कि वे उन्हें चोर के बारे में पूरी पूरी जानकारी दी ताकि चोर को पकडकर डंडा दिया जा सके । इतना सुना था कि महात्मा जी उठ खडे हुए और बाहर को भागने लगे । भक्तों ने पूछा कि कहाँ जा रहे हो? महत्व जी ने उत्तर दिया चोर को पकडने जा रहा हूँ । आप सभी मेरे पीछे पीछे चले आओ । सभी भक्तों को लेकर वे शमशान घाट में पहुंचे और धोनी रमाकर बैठ गए । भक्तों ने पूछा क्या चोर यहाँ और धोनी लगाकर बैठने से क्या वो अपने आप आ जाएगा? महात्मा ने उत्तर दिया, अंत में एक ना एक दिन वहाँ आएगा ही क्योंकि सारी दुनिया यही आती है । यही सभी के अंतिम मंजिल है । उनकी भी जिनके पास कम्बल है और उनकी भी जान के पास कम्बल नहीं है । और हाँ उसकी भी जिसका कंबल चोरी हुआ लेकिन कम्बल किसी के साथ नहीं जाएगा । सारांश अंतिम सत्य तो मृत्यु मानव जीवन को इसीलिए किसी भी वस्तु के प्रति लोग नहीं रखना चाहिए क्योंकि वो अंतर दुखों का कारण बनता है । सूझबूझ एक दुर्घटना में एक गर्भवती स्त्री के पेट से उसके बच्चे का थोडा सा हाथ बाहर आ गया । अस्पताल में ले जाया गया डॉक्टर विशेषज्ञ डॉक्टर मंत्रणा करने लगे कि हाथ को वापस कैसे करें । हर एक के अपने अपने विचार थे । इतने में एक डॉक्टर जो सिगरेट पी रहा था, उठा और गर्व तीसरी की ओर चला बाकि के डॉक्टर भी साथ हो लिए । देखते ही देखते डॉक्टर ने जलता हुआ सिगरेट बच्चे के हाथ की उंगली पर लगा दिया । बच्चे ने हाथ स्वत ही अंदर खींच लिया और वह औरत एक बहुत बडी चीरफाड से बच गई और सौ तीन को वाॅक चैप्टर तैंतीस लाड प्यार दमयंती देने की घर लडकी का जन्म हुआ । बडी धूमधाम से जश्न मनाया गया । समय के साथ चंद्रमा की तरह वह भी उसी लाड प्यार में बडा होता गया । जैसा कि स्वाभाविक होता है कि ऐसे बच्चे बिगड जाते हैं । कृष्णा भी कुछ हटकर नहीं था । बुरी संगत में बडे होने के साथ बुरी आदिती भी बढेगी तथा भयंकर होती गई । मांग के आंखों पर महाभारत की कंधारी की तरह पुत्रमोह की पट्टी बंधी हुई थी । समय के साथ बुरी आदतें रंग लाई तथा वो एक डकैत बन चुका था । एक दिन वो कृष्णा एक खून के संबंध में पकडा गया, मुकदमा चला तथा उसे फांसी की सजा हो गयी । फांसी से पहले जेलर ने उससे अंतिम इच्छा जानी चाहिए तो उसने कहा मैं अपनी माँ के कान में गोपनीय बात करना चाहता है । माँ को बुलावा भेजा, विलाप करती माँ आई पाए । मेरे लाडले बेटे मेरे जिगर में मेरे बुरा बेकिंग सारे इंसान को तो ही मिला । खांसी के लिए जो टी । वी लगती । माँ बेटे के पास पहुंचकर उसे छाती से लगा अपना कान उसके मुंह के साथ लगाकर कहती है आप बताओ क्या कहना चाहता है इसी उम्मीद से कि धान कहाँ कहाँ छुपा रखा है । लेकिन ये क्या? माँ की एकदम चीख निकल गई और बेटे पर जोर जोर से चिल्लाने लगेंगे । ऍम लेता क्यों नहीं मर गया? मेरी को क्यों बदनाम की और न जाने क्या क्या बोलती रही । जिले ने हैरान होकर कृषि से पूछा जी क्या की अपने माँ को? कृष्ण बोला सर, मैंने अपनी माँ का कान काट खाया क्योंकि बचपन में मेरी गलत कामों के लिए मेरे काम नहीं मरोडे । मुझे दंडित नहीं किया बल्कि प्यार से मेरी गलतियों को छुपाया और सींचा । यदि मेरे कान खींचे होते तो मैं फांसी न देखता । पढना ही मार के कान को काटता । अभी तो एक अच्छा इंसान होता हूँ, औरों को भी सबक लेने दो ताकि वे फांसी से बच सकें । सारा ज्यादा लाड प्यार बच्चों को बिगाडता है । स्पॅाट पंक्ति में आओ एक सेट अपनी आमदनी का आधा हिस्सा भर रोज गरीबों में बांटा था । एक दिन सेठानी बोली अपने बच्चों को भी कुछ दे दिया करो तो सीट बोला । आप भी अपने बच्चों को और उनकी तरह पंक्ति में खडे होकर मांगने के लिए कहूँ उन्हें भी मिल जाएगा । चाॅस ढोल रामनरेश अपने साथ ही के लिए प्रसिद्ध था । अतः लोग भी उसे आदर से देखते थे । उसके तीन बेटे थे । बडी बेटी को मास्टर, मंजिली को खेती बाडी तथा छोटे को गांव में ही दुकान डाल दी । परिवार और संपन्न हो गया तथा रामनरेश का सीना और टन गया । सब खुशहाल थे । समय बीतता गया । रामनरेश के घर बहुत पोते पोतियां गए । बढती उम्र की जल्दी उसका शरीर साथ नहीं दे रहा था । फांसी रहने लगी थी । हर समय खास ने से बच्चों की पढाई में तथा बहु के आराम में खलल पडता था । अच्छा फैसला लिया गया की पिताजी के लिए थोडा हटकर एक कुटिया बना देते हैं । वहाँ से भी जरूरत की चीजें भी रख देते हैं । समय पर खाना भी पहुंच जाएगा । फिर भी किसी आपातकालीन जरूरत के लिए धोल भी रख दिया । रामनरेश हो कुटिया में पहुंचा दिया उसे जब भी किसी को बुलाना होता वो ढोल बजा देता । इतने में बडे परिवार से कोई न कोई उपस् थित हो जाता । इस तरह का समय भी बीतता गया । परन्तु एक दिन किसी को खयाल आया कि ढोल नहीं सुना लेकिन कब से सभी भागे भागे कुटिया में पहुंचे तो देखा कि रामनरेश के प्राण पखेरू छोड चुके थे । अब अगला प्रबंध शुरू हुआ । दाह संस्कार का दाहसंस्कार के बाद कुटिया में सामान इकट्ठा करने लगे तो वह ढोल नहीं मिला । सभी परेशान थी की शायद डोल के कारण पिताजी की जान चली गई । इसी बात पर चर्चा चल रही थी कि बडा पोता आ गया तथा बताया कि ढोल उसने संभाल लिया है । पिता ने पूछा कि तू ऐसा क्यों किया बेटा? पिता जी, आपने भी तो बूढे होना है । वो दो लाख के लिए ही आज से ही संभाल रखा है । टाॅय जैसा करोगे वैसा ही उससे भी खराब भरोगे । डाॅ । डेवलॅप चाॅस सूझबूझ एक समय की बात है । एक कवि का कठिन समय चल रहा था । वो अपने परिवार के भरण पोषण में समर्थ नहीं था । जब उसने यह सुना कि राजा प्रतिभा को प्रोत्साहित करता है तथा अपने उदारता के लिए प्रसिद्ध है तो कभी राजभवन के लिए चल पडा । जब उसे राजा के समक्ष लाया गया तो उस ने नीचे झुककर प्रार्थना की कि वह कविता सुनाना चाहता है । उसकी कविता सुनकर राज्य बहुत प्रसन्न हुआ और उससे इनाम मांगने को कहा । कभी ने राजा के सामने रखे एक सुंदर से गडे हुए शतरंज के बोर्ड की ओर इशारा करते हुए कहा, महाराज, यदि आप शतरंज के पहले वर्ग पर चावल के केवल एक दाने को रखी और प्रत्येक वर्ग पर मुझे और प्रत्येक वर्ग पर इसे दुगुना करें तो मैं स्वयं को अच्छी प्रकार से पुरस्कृत समझूंगा । क्या तुम्हें विश्वास है? अश्चर्यचकित राजा ने पूछा मात्र चावल का एक दाना स्वर्ण नहीं कभी हमारा, आज चावल, कहीं दाना? राजा ने आदेश दिया ऐसा ही हो उसके दरबारियों ने शतरंज के बोर्ड पर चावल रखने आरंभ कर दी । प्रथम वर्ग पर एक जाना, दूसरे पर दो, तीसरे पर तीन चौथे पराठे । जब वे दसवीं वर्ग पर पहुंचे तो चावल के पांच सौ बारह गाने रखने पडे । तीसरे वर्ग पर संख्या पांच चौबीस दो सौ तक बढ गई जब ये आधे रास्ते के निशान पर पहुंची । बत्तीस वर्ष तक चावलों की गिनती दो सौ चौदह करोड लाख हजार छह सौ अडतालीस अर्थात दो सौ चौदह करोड से अधिक शीघ्र ही गिनती लाख करोड तक बढ गई और अंत में उस राजा को अपना पूरा राज्य चाला कभी को सौंपना पडा । और ये सब आरंभ हुआ मात्र चावल के एक दाने के साथ । सारांश मातृक डायना चावल से आरंभ करें सारा राजपाट अपना हो गया । मात्र वर्णमाला का खाका से आरंभ होती है । बडे बडे ग्रंथ लिखने के लिए चक्रवृद्धि बढत को कभी भी कम नहीं आंकना चाहिए । चाहे रकम दी है क्या ली है जीवन के आरंभ में निवेश की गयी छोटी सी राशि आपकी सेवानिवृत्ति के समय जब आज की सेवानिवृत्ति के समय तक एक प्रभावशाली राशि बन सकती है जो छोटे छोटे कार्य अच्छे ढंग से संपन्न करते हैं वहीं बडे कार्य कर सकते हैं । जीवन बीमा बीमा वाले भी क्या गजब उठाते हैं । लोगों की बीवियों के पास बैठ कर पति के मरने के फायदे समझाते हैं । चक्कर छत्तीस शिक्षा एक महात्मा जी दरिया में नहीं आ रहे थे । नहाते रहते क्या देखते हैं कि बिच्छू लगाते रहती क्या देखते हैं कि वो बिच्छू पानी में बेहतर चला रहा है । बचने का प्रयत्न करते हुए बचाव नहीं कर पा रहा था । महात्मा का स्वभाव ही होता है दया करोड । अतः बिच्छू को पाने के बाहर देखने बिच्छू को बचाने के लिए हाथ बढाया और हाथ में उठा लिया । बिच्छू ने नया खतरा भागकर महात्मा के हाथ को डंक मार दिया । हाथ का पा तथा बिच्छू पानी में गिर बडा महात्मा से राहना गया । उन्होंने फिर इच्छुक उठाया । उन्होंने फिर बिच्छू को उठाया जैसे ही पानी से बाहर देखने लगे, बिच्छू ने फिर डांग मार दिया । बिच्छू हाथ की का अपनी से फिर पानी में गिर पडा । महत्व से रहा नहीं गया । उधर हाथ भी दर्ज के कारण सुन हो गया था । अतः तीसरी बार कोशिश में विभिन्न क्यों को पानी से बाहर फेंकने में सफल हो गए । नदी के किनारे खडा एक आदमी ये सब कुछ देख रहा था । वो बोला महात्मन, इस बीच को क्यों बचाया? इसे तो और गहरे पानी में भीगा होता । आप इसे बचाने का प्रयत्न कर रहे थे, परंतु ये दुष्ट आपको तंग आ रहा था । महात्मा जी बोले देख भवन या बिच्छू यारी डेंगू है, इसका कम ही डंक मारना है । विपरीत परिस्थितियों में एक तो पानी में दूसरे जान का खतरा होने पर भी ये अपना धर्म कर्म नहीं छोड रहा है । अभी तो मुझे शिक्षा दे रहा है, जबकि मैं तो साधुओं और परिस्थितियां भी अनुकूल हैं । फिर भी मैं दया करुणा से दूर हूँ तो मैं घोर ढोंगी वह पापी हुआ ना सारांश हम सबको अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों की चिंता किए बगैर शुभकर्म करते रहना चाहिए । यही इंसानियत है । ढंग का बदला ढंग से नहीं अपितु दया, करुणा, प्रेम वो भला करने में है । लाख लाख अंडरवर्ल्ड लाख कृति वी पॅाल ओन डाॅ । फॅस डेविल पास यू बाय तीस अंगेस् डेवलॅप तेल देवले क्यों जाए? चाॅस गुड और बैड कांड से आई नो यू आॅथोरिटी बडा शहर है । जस्ट लाइक ॅ नाउ रीड और वो स्टोरीज ऑफ कार्टून्स और वाॅश सके ऍम वायॅस ऍम ऍसे मनसा गुड और बैड हाँ से डाॅलर जंगल ऑॅफ जंगल ऍम जंगल ॅ कॅालिंग शॉर्ट डॅालर्स वाइस कोर्ट गुड और दाड हाँ टू से इसी हाॅल बाॅक्सिंग अमेजॅन ऍफ कोट गुड और बैड हट से मॅन फॅमिली वाइॅन् ऍम ऍम यू हाॅट फॅालो रिस्पांसिबिलिटी फॅमिली और सोसाइटी आठ लांच । अब डिजायर टोमॅटो ऍम चाॅइस विचार एक भूला भटका शिकारी जंगल में रास्ता खोजता हुआ घने जंगल में पहुंच गया । ठक्कर वो एक वृक्ष के नीचे बैठकर विश्राम करने लगा । उसे ये ज्ञान नहीं था कि जिस वृक्ष के नीचे वो बैठा है वो कल्पवृक्ष है । वो सिर्फ थका हारा ही नहीं बल्कि भूका भी था । बैठे बैठे उसके मन में विचार आया कि काश इस वक्त खाना मिल जाता तो मजा आ जाता । उसने इतना सोचा ही था के सामने भोजन की थाली उपस् थित हो गयी । भोजन की थाली देखकर वह हैरान हुआ कि अचानक थाली कहाँ से अटक की । वहाँ खाने में जुड गया । खाना खाते खाते हैं । उसे विचार आया कि आखिर ये खाना आया कहाँ से दूर दूर तक कोई भी दिखाई नहीं दिया तो क्या या भूत प्रेतों की माया तो नहीं है । उसका ये सोचना था कि सामने भूत प्रेत उपस् थित हो गए । उन को देखते ही वह घबरा गया । हमारे डर के बोल उठा । मारे गए तो सब भूत प्रेत उसे मारने लगे । ऍम पिक्चर देखते विचार आया । ये मुझे जिंदा नहीं छोडेंगे तो बहुतों ने उसे मार डाला । सारा हमारा मन ही है, जो हमें विचारों द्वारा शक्तिशाली या शक्तिहीन बनाता है । यही विचार जिंदा आदमी को मार देते हैं और मरे हुए को जीवित कर देते हैं । इन विचारों से भगवान मिलता है और इन्हीं से प्रेतात्मा । अतः हमें अपना ज्ञान बढाकर अपने मन के अंधेरे को प्रकाश में बदलना है । चक्कर उनचालीस अनूठा ने आए दो और बच्चे को लेकर झगडा कर रही थी । प्रत्येक कहती कि वहाँ बच्चा उसका है । झगडा काजी तक जा पहुंचा । काजी ने बारी बारी से दोनों के पक्ष सुने । बहुत सोच विचार के पश्चात फैसला सुनाया । इस बच्चे के दो टुकडे करके आधा आधा दोनों ओरतों को दे दिया जाएगा । एक औरत बोली ठीक है तथा मंजूर है परंतु दूसरी औरत रोपडी तथा कहने लगी कि बच्चे को तथा कहने लगे कि बच्चे को मत काटो तथा पहली वाली औरत को ही दे दो कम से कम बच्चा जिंदा तो रहेगा ही । काजी ने इतना सुना तो बच्चे को रोती हुई दूसरी औरत को दे दिया तथा कहा की माँ बच्चे को काटना तो दूर दुखी तक नहीं देख सकती । माँ तो महान है । सारांश मानव रचना के साथ सच झूठ बोलने का प्रयत्न सादा ये रहा है । फिर भी सच को सादा ही सर्वोपरि ही माना गया है तथा सच को उजागर करने के लिए सादा ही प्रयत्न होते रहे हैं तथा होते रहेंगे । हम सब ने बचपन झूठ को सच साबित करने के लिए झूठी कसमें भी खाई होंगी तथा झूठ पकडा भी गया होगा । यहाँ काजी ने सूझबूझ से दूध का दूध पानी का पानी दिखाया । हम भी शिक्षा ले कि झूठ का साथ कभी वीणा ने नहीं दी । लकडहारा लकडहारे की लोहे की गुल्हाडी तालाब में गिर गई । पानी के देखता ने उसे सोने की फिर चांदी की प्रथा अंत में लोहे की कुल्हाडी दी । लकडहारे ने रोहित की गुलाडी को ही अपनी कहा । देवता ने खुश होकर उसे तीनों कुल्हाडियां दे दी । अब एक आदमी एक सुंदर पत्नी पानी में डूब गई । वो रोते रोते भगवान से प्रार्थना कर रहा था की लकडहारे की तरह भगवान मुझे भी पत्नी निकाल कर दें । भगवान ने डुबकी लगाई और एक रूप से औरत को बाहर लाया । भगवान ने पूछा कि यही तुम्हारी पत्नी वो आदमी एकदम बोल पडा हाँ भगवान, यही मेरी पत्नी है, यही है, यही है इसे मुझे दे दो । आप का धन्यवाद । अंतर्यामी भगवान मुस्कुराए तथा कहा कि तुम्हारी पत्नी तो सुंदर है परंतु आपने एक गुरु को ही पत्नी मान लिया तो बाद में बोला भगवान शमा करना । मैं डर गया था कि उस लकडहारे की तरह आप मुझे भी तीन औरते दिखाकर तीनों ही मुझे सौंप होगे अगर पहली को न करने की मैं मत न कर सका । चैप्टर चालीस समझ अचानक दो पक्षी लडते लडते एक लेते हुए मनुष्य की छाती पर आगे उनमें से एक उसके हाथ में आ गया । इस पक्षी ने बहुत अनुरोध कानूनी विनय क्या अपने बच्चों तथा मनुष्य के बच्चों का हवाला भी दिया ताकि वह उसे छोड दें परंतु वो मनुष्य तस से मस नहीं हुआ । अंत में पक्षी ने कहा मैं आपको तीन उपयोगी बातें बताओ तब तो मुझे छोड दोगे । इस पर वो मनुष्य मान गया तथा कहा कि अच्छा बताओ पक्षी बोला पहली बात हाथापाई वस्तु को कभी नहीं छोडना चाहिए । इस पर मनुष्य ने कहा अच्छा अच्छा । दूसरी बात बताओ । पक्षी बोला किसी से विश्वासघात नहीं करना चाहिए । अच्छा अच्छा तीसरी बात बताओ । इस पर पक्षी ने कहा तीसरी बात मैं तब बताऊंगा यदि आप मुझे छोड दोगे । मनीष ने अपनी शंका बताई यदि छोडने पर बिना बताए तो इस पर पक्षी ने समाधान क्या? वह दूसरी बात मैं कह चुका है कि किसी से विश्वास घर नहीं करना चाहिए । इतना सुनकर वह सोच कर मनुष्य से छोड दिया तथा कहा लोवा बताओ पक्षी उसकी पहुंच से दूर बैठ गया तथा कहा अब तीसरी बात नहीं बताएगा । मनीष ने उसे दूसरी बात याद दिलाई तो पक्षी बोल उठा कि आपने पहली बात तो याद नहीं रखी । सारांश हमें दूसरों पर दोष मरने से बचना चाहिए । दूसरों की आंख में पडा हुआ तिनका तो दिखाई देता है परन्तु अपनी आंख में पडा हुआ शहतीर दिखाई नहीं देता हूँ । वो लोग शरीर द्वारा से मुक्ति पाने की शरीर की चेष्टा को रोक कहते हैं जैसे जुकाम, सिरदर्द, थोडा फेंसी वगैरह वगैरह । विकास क्यों एकत्रित होते हैं । गलत खानपान शरीर के टिशू टूटते रहते हैं । मानसिक दृष्टिकोण उमर के बढने के साथ शरीर में शितल था । पहले की बीमारियों का दबा देने से रोक तीन प्रकार के होते हैं एक क्यूट यानी तीव्र रोग क्रॉनिक यानी जीरो रोग डिजेनरेटिव यानी मारक रोग । कहावत है प्रिवेंशन । इस बैठक ठंड की ओर अंतिम विकारों को संचित लाभ होने दे, रोक पास नहीं आएंगे । इसके लिए योग से बढकर कोई उपाय नहीं । पथ्य करो तो दवाई की जरूरत नहीं और पथरी न करो तो भी दवाई की जरूरत नहीं ।

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