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Ep 2: ग्रामोफोन पिन का रहस्य - Part 3 in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts

Story | 22mins

Ep 2: ग्रामोफोन पिन का रहस्य - Part 3 in 

AuthorHarish Darshan Sharma
ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay
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क्या बात कर रहे हो तो बुलाओ । काफी रंगीन तबियत हैं । वह और भी है । आशु बाबू जिस तरीके पिछले बारह तेरह वर्षों से देखभाल कर रहे हैं, इसलिए उनकी वफादारी पर शक नहीं किया जा सकता और जाहिर है बदले में उन्हें भी वही वफादारी मिली है, क्योंकि और किसी संगीत का शौकीन को घर में घुसने की इजाजत नहीं है । दरवाजे पर सख्त पहला है, मैं उत्सुकता से भर गया था । तो क्या वास्तव में तुम संगीत प्रेमी बनकर उस घर में नहीं थे? क्या देखता है उस स्त्री को? कैसी थी देखने में ब्योमकेश बोला मैं एक झलक ही देख पाया, लेकिन मैं नहीं चाहता है कि मैं उसके रूप का वर्णन करके तो महारे जैसे तुम्हारे दोस्त की अनुमोल रातों की नींदे उडा दूँ । ये कि शब्द कहूंगा ला जवाब उसकी आयु संभव सत्ताईस अट्ठाईस बरस की होगी । जो भी हो, मैं आशु बाबू की पसंद का कायल हो गया हूँ । मैंने हस्कर कहा, मुझे यह लग रहा था कि तुम मैं एकाएक आशु बाबू के निजी जीवन में इतनी दिलचस्पी की हो गई है । ब्योमकेश बोला, नियंत्रित उत्सुकता मेरी कमियों में से एक है । दूसरे आशु बाबू का बारिश मुझे परेशान किए हुए था तो ये है आशु बाबू की बारिश यहाँ मेरा अनुमान है । मैंने वहाँ एक और व्यक्ति को देखा जिसकी आयु पैंतीस के लगभग होगी । देखने में काफी तडक भडक वाला लगा । वहाँ दरबान के पास तेजी से आया और उसके हाथ में एक पत्र देकर गायब हो गया । जो भी हो विषय चाहे जितना भी मजेदार हो और इस समय हमारे लिए इतना उपयोगी नहीं है । ब्योमकेश उठकर फर्श पर चक्कर लगाने लगा । मैं समझ गया कि ब्योमकेश नहीं चाहता की आशु बाबू के निजी जीवन की ये घटनाएं आशु बाबू को सुरक्षा प्रदान करने के उसके प्रयासों में और बडे ना आ जाए । मैं भी जानता था कि मानवीय मस्तिष्क कई बार ऐसी स्थितियों में अनजाने में केंद्र बिंदु से भटक जाता है । इसलिए मैंने भी विषय बदलते हुए कहा क्या तो मैं घडी की जांच करके कुछ मिला । ब्योमकेश चलते चलते मेरे सामने रुक गया और हल्की मुस्कान के साथ बोला, घडी को जांचने के बाद मुझे तीन जानकारियाँ मिली है । पहली ग्रामोफोन पिन साधारण ॅ है, दूसरी उसका भारत ठीक दो ग्राम है और तीसरी घडी अब ठीक नहीं हो सकती । उसकी मरम्मत संभव ही नहीं है । मैंने कहा इसका मतलब है कि तुम्हें कोई उपयोगी जानकारी हाथ नहीं लगी ब्यू उनके इसने चेयर खींच कर बैठते हुए कहा, लेकिन मैं तुम्हारी बात से सहमत नहीं हूँ क्योंकि इससे मुझे यहाँ पता चला कि जिस समय यह पेन वहाँ तक के रहने में दादा गया, उस समय मृतक और हत्यारे की दूरी सात आठ फीट से ज्यादा नहीं हो सकती । एक ग्रामोफोन बेन इतना हल्का होता है कि इससे अधिक दूरी से दादा जाए तो अपने निशाने पर नहीं लग सकता हूँ । और तुम जानते ही हो कि हत्यारे का निशाना कितना अचूक रहा है । प्रत्येक बार हथियार ने अपना काम बखूबी पूरा किया है । आश्चर्य मैंने भी प्रश्न किया । हत्यारे ने इतने नजदीक आकर हत्या की है फिर भी गायब हो गया । पकडा नहीं गया । ब्योमकेश बोला यही तो सबसे बडी पहली है । जरा सोचो हत्या कर देने के बाद वहाँ व्यक्ति भी भीड में खडा होगा । हो सकता है कि मृतक की लाश को हटाने में सहायक भी रहा हूँ । फिर भी कोई उसे पकडा नहीं पाया । कितनी सफाई से उसने अपने को छुपा रखा । मैंने कुछ देर सोचकर कहा मान लो कि हत्यारे के पॉकेट में एक ऐसा यंत्र है जो ग्रामोफोन पिन को दाग सकता हूँ । जैसे ही वह अपने शिकार के सामने आता है । वह अपने पॉकेट के अंदर से यंत्र को चला देता हूँ । अपना हाथ वो पॉकेट में ही रखता हूँ । किसी को शक भी नहीं होगा क्योंकि बहुत से लोग चलते समय अपने हाथ पॉकेट में रखते हैं । ब्योमकेश ने कहा, अगर ऐसा होता तो वहाँ अपना काम फुटपाथ पर भी कर सकता था । वहाँ अपने शिकार के सडक पार करने के लिए ही क्यों रुकेगा? दूसरे, मैं किसी ऐसे यंत्र को नहीं जानता जो बिना कोई आवाज किए तो अच्छा और महास पेशियों को चीरकर सीधे रद्द है, पर आजाद कर सकता हूँ । क्या? तुम ने सोचा कि इसके लिए यंत्र में कितनी शक्ति की जरूरत होगी? मैं चुपचाप सुनता रहा । ब्योमकेश बहुत देर तक आपने कोहनियों को घुटनों पर रखें । मूव हाथों में लिए गहन चिंतन में डूबा रहा । अंत में बोला, मुझे लग रहा है इसका बहुत ही साधारण हाल है, जो मेरे हाथों के निकट ही है, लेकिन सामने नहीं आ रहा । जितना मैं प्रयास कर रहा हूँ, उतना ही हाथों से फिसलता जा रहा है । उस रात हत्या के विषय पर और चर्चा नहीं हुई । जब तक ब्योमकेश सोया नहीं, तब तक वहाँ विचारों में उन जा रहा यह जान कर के रहस्य का हाल उसके हाथों के नजदीक पहुंच गया है, जो बार बार उसके हाथों से फिसला जा रहा है । मैंने भी उसके विचारों में व्यवधान पहुंचाना उचित नहीं समझा । दूसरे दिन सुबह भी उसका चेहरा परेशान दिखाई दिया । वह जल्दी उठ गया और एक कप चाय भी घर चला गया । तीन घंटे बाद जब आया तो मैंने पूछ लिया कहाँ गए थे? जूते के फीते खोलते हुए ब्योमकेश ने बडी व्यस्तता से उत्तर दिया । वकील के पास मैंने देखा कि वहाँ अभी विचारों में डूबा है तो और कोई बात नहीं । दोपहर भर वह कमरा बंद करके काम में लगा रहा हूँ । एक बार मैंने फोन पर बात करते भी सुना । लगभग साढे चार बजे उसने दरवाजा खोला और झांकर चिल्लाया, आ रहे भाई, कल की बात किया भूल गए । शरीर में काटे का रहस्य ढूंढने का समय हो रहा है । वाकई मेरे दिमाग से भी वहाँ बात एकदम निकल गई थी । ब्योमकेश ने हंसते हुए कहा तो आजा भाई, तुम्हारा ड्रेसिंग कर दूँ । हम लोग ऐसे ही तो जा नहीं सकते हैं । मैंने उसके कमरे में घुसते हुए पूछा क्यों हम ऐसे ही नहीं जा सकते हैं? ब्योमकेश ने एक लकडी की अलमारी खोलकर तीन का बॉक्स निकाला जिसमें से उसने क्रैक कर टुकडा, छोटी कैंची, गोंद वगैरह कुछ चीजें निकाल कर बाहर रख दी और मेरे गाल पर स्प्रिट तथा गोल्ड लगाते हुए बोला, लोगों में यहाँ कोई अनजानी बात नहीं रह गई कि अजीत बंदोपाध्याय ब्योमकेश बख्शी के परम मित्र है इसलिए थोडी सावधानी जरूरी है । लगभग सवा घंटे तक ब्योमकेश काम करता रहा । जब उसने अपना काम कर लिया तो मैंने शीशे में जाकर देखा तो चौक कर मेरे मुंह से निकल गया तो बाबा अजीत ने मुझे या फ्रेंचकट दाढी कभी नहीं रखी । जो व्यक्ति शीशे में दिख रहा था उसकी आयु करीब दस वर्ष अधिक होगी । गालों पर कुछ झाइयां थी और रंग भी कुछ दबा हुआ था । मैंने किंचित भाई से पूछा यदि पुलिस ने धर लिया तो ब्योमकेश बडे धैर्य से बोला डर नहीं काबिल काबिल पुलिस वाला भी तुम्हें पहचान नहीं पायेगा की तुमने भेज बदला है । यदि तुम्हें विश्वास न हो तो नीचे सडक पर जाओ और अपनी जान पहचान के किसी भी व्यक्ति से पूछ लो कि अजीत बाबू कहाँ रहते हैं । मेरा आतंक और भी बढ गया । मैंने कहा नहीं नहीं भाई, इस की जरूरत नहीं है । मैं जैसा हूँ वैसे ही जाऊंगा । मैं जब चलने के लिए तैयार हो गया तो ब्योमकेश बोला तो है मालूम है तो मैं क्या करना है । बस लौटते समय सावधान रहना हो सकता है । तुम्हारा पीछा किया जाए क्या इस की भी आशंका है? आशंका को निर्मूल नहीं किया जा सकता हूँ । मैं घर पर ही हूँ । प्रयास करना कि काम पूरा करके जल्दी से जल्दी लॉर्ड सको । घर के बाहर निकलकर पहले तो मैं घबराता रहा, लेकिन जब मैंने देखा कि मेरे बदले भेष से कोई भी आकर्षित नहीं हो रहा है तो मैं हो गया और मेरा आत्मविश्वास भी लॉर्ड आया । सडक के कोने में पान की दुकान से मैं पान खाया करता हूँ, पान वाला पश्चिम का है और मुझे देखकर हमेशा अभिवादन करके पान बना देता है । मैंने उस की दुकान पर जाकर पानी मांगा, उसमें पांच बनाकर मुझे दिया । मेरे पैसे देने पर उसने एक सरसरी निगाह से देखा और पैसे ले लिए । पांच बज गए थे और अधिक समय अब नहीं बचा था । मैं ड्राम पकडकर ऍम में उतरा और निर्धारित स्थल की तरफ बढने लगा । यद्यपि यहाँ कोई रोमांटिक मुलाकात नहीं थी और न ही मेरे मन में रुमानी सपने थे । फिर भी एक प्रकार की उत्सुकता और उत्तेजना का एहसास हो रहा था । लेकिन यह उत्तेजना जल्दी ही विलुप्त हो गई । भीड के रेले में खमनेई की तरह एक ही स्थल पर जमे रहना कोई मामूली काम तो था नहीं । अब तक मैं जाने कितने लोगों की कोहनी और घुटने टकरा चुके थे और मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा था । ऍम पोस्ट पर टिककर यु ही खडे रहने पर एक और भी डर पैदा हो गया क्योंकि सडक के उस पार क्रॉसिंग पर खडा सार्जेंट कई बार मुझे गुड चुका था । अगर वहाँ मेरे पास आए और पूछे कि मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ तो उस की नजरों से बचने के लिए मैंने सामने वाइट वाॅच के सजावटी शोरूमों पर अपनी द्रष्टि बना दी । जैसे कि मैं उनमें रखी सुन्दर वस्तुओं को निहार रहा हूँ । मैंने सोचा कि पॉकेटमार समझकर पकडा जाऊँ । इससे तो बेहतर है कि शहर देखने आया एक मोर और गवार बनकर ही खडा रहूँ । मैंने अपनी घडी देखी । छह बजने में सिर्फ दस मिनट शेष थे । दस मिनट बिताकर मैं झंझट से पार हो जाऊंगा । व्याकुलता बढती जा रही थी । मैं हमें से टिक्कर जरूर खडा था लेकिन बार बार कुर्ते की जेब टटोल रहा था । जेब तक खाली थी आखिर घर छै बजे और मैंने ऍम पोस्ट से अपना कांदा हटाया । एक बार और जेब टटोली पर निराशा ही हाथ लगी । निराशा के साथ साथ मन में खुशी भी हुई । अंततः मुझे एक उदाहरण मिला था जिसके आधार पर मैं ब्योमकेश को चिढा सकूंगा कि उसके सभी अनुमान सही रहे होते हैं । मन ही मन प्रसन्न होते हुए मैंने ऍम डीपो की तरफ कदम बढाए ही थे की फोटो चाहिए बाबू शब्दों ने मुझे चौंका दिया । मैंने मुडकर देखा । लुंगी पहने एक मुस्लिम नौजवान हाथ में एक लिफाफा लिए मेरी और देख रहा है । दुविधा में मैंने हाथ में लिखा वाले लिया और लेने के बाद जैसे ही उसमें से अश्लील फोटो निकाल कर जमीन में बिक्री मैं बनाया गया, मैं जानता था कि कलकत्ता की सडकों पर यह धंधा चलता है । मैंने अपने हाथ को उसकी ओर बढाते हुए घृणा से इंकार कर दिया । लेकिन इसके पूर्व ही वह आदमी गायब हो गया । मैंने दायें बायें चारों ओर देखा पर वहाँ लुंगी वाला युवक कहीं भी दिखाई नहीं दिया । मैं हैरानी में खडा हुआ था । समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ । एक का एक एक दबी हुई स्थिर आवाज ने मेरे विचारों को भंग कर दिया । मेरे बगल में एक उम्र वाला अंग्रेज व्यक्ति खडा था । मुझे न देखकर वहाँ सामने की और देख रहा था और शुद्ध बंगला में एक जानी पहचानी आवाज में बोल रहा था । मैं देख रहा हूँ तो मैं पत्र मिल गया है । इसलिए अब घर आ जाओ । सीधे नहीं बल्कि घूम कर रहा हूँ । आराम से पहले बहुत बाजार जाओ वहां उतरकर हावडा क्रॉसिंग तक । बस लोग फिर टैक्सी से घर । इतने में हमारे सामने सर्कुलर रोड पर जाने वाली ट्राॅला रुकी । वहाँ व्यक्ति उछलकर उसमें चढ गया । आधे कलकत्ता का चक्कर लगाने के बाद जब उन्हें थका हारा घर पहुंचा तो देखा कि ब्योमकेश आराम कुर्सी पर पैर फैलाये जरूर पी रहा है । मैंने कुर्सी खींच कर बैठते हुए पूछा तो सायब आप कब लौटे? ब्योमकेश ने धुआ उडाते हुए कहा, करीब बीस मिनट हुए हैं । मैंने कहा तो तुमने मेरा पीछा क्यों किया? इसलिए कि मैं कुछ ही मिनटो के लिए छूट गया था । जब तुम लैंप पोस्ट पर कंधा टिकाकर खडे थे । उस समय मैं लेट ला के अंदर रेशमी मोजे देख रहा था और आज के पारदर्शी दीवारों से तुम पर नजर रखे हुए था । उस समय शरीर में काटे का सरगना तुम्हें देखकर हिम्मत बना रहा था । उसका भी कारण था क्योंकि तुम हडबडी में बार बार पॉकेट देख रहे थे इसलिए वहाँ रुककर चांस ले रहा था । मुझे स्टोर से बाहर आने में कुछ मिनिट भी लगे होंगे लेकिन तब तक तुम वहाँ से हट गए थे और पत्रवाहक को तुम्हें लिफाफा देने का पर्याप्त समय मिल गया । जब तुम कुछ दूरी पर मुझे मिले तो तुम हाथों में लिफाफा लिए बहुत छक्के खडे हुए थे तो है वहाँ लिफाफा कैसे मिला? जब मैंने ले भावा बानेगा व्रतांत सुनाया तो ब्योमकेश ने पूछा तुमने ठीक से उस आदमी को देखा क्या तो उसका चेहरा याद कर सकते हो । मैंने कुछ देर सोचकर कहा नहीं । बस इतना ही याद है कि उसके नाक के पास एक बडा सा मसला था । निराश होकर ब्योमकेश सिर हिलाते हुए बोला वहाँ तो जाली था । असल नहीं । ठीक वैसे जैसे तुम्हारी दाढी और मुझे जो अभी है लाओ, देखो तो सही वहाँ पत्र गया है । तुम तब तक यहाँ मे का बता रहा हूँ । जब मैं अपना भेज उतारकर वापस आया तो देखा कि ब्योमकेश का व्यवहार एकदम बदल गया है । वहाँ उत्तेजना में दोनों हाथ पीछे किए तेज कदमों से चहलकदमी कर रहा है । उसके चेहरे पर एक चमक थे । मेरा रखा उम्मीद में धडकने लगा । मैंने उत्सुकता में पूछा क्या है उस पत्र में? क्या तुमने कुछ पा लिया है? एक नियंत्रित उल्लास से ब्योमकेश ने मेरी पीठ ठोकते हुए बोला अजीत एक बात बताओ, क्या तुमने हावडा ब्रिज को तब देखा है जब वो हर जहाज के आने पर खुलता है? मेरा मस्तिष्क भी ठीक वैसा था । दो छोड दो तरफ से आकर मिलते हैं । लेकिन एक छोटा सत्रह भाग खाली रह जाता है । छोटे से पुल के लिए आज वहाँ भाग भर गया है । यह कैसे हुआ? आखिर उस पत्र में क्या है? फॅसने वहाँ कागज मेरे हाथों में पकडा दिया । मैंने तब भी देखा था कि लिफाफे में उन अस्लील चित्रों के अलावा भी एक कागज है लेकिन मैं उसे पढ नहीं पाया था । अब पढ रहा हूँ । बडे अक्षरों में स्पष्ट रूप से लिखा था तो तुम्हारे शरीर का कांटा कौन हैं? उसका नाम और पता क्या है? तुम जो चाहते हो उसे कागज पर स्पष्ट अक्षरों में लिख दूँ । कुछ भी न छुपाओ अपना नाम लिखने की जरूरत नहीं है । कागज को लिफाफे में सील बंद करके रविवार दस मार्च की आधी रात को खिदरपुर रेसकोर्स पहुँचा हूँ और रेसकोर्स से साडी सडक पर पश्चिम की और चलना शुरू कर दो तो मैं दूसरी ओर से एक साइकिल सवार आता दिखाई देगा । तुम्हारी पहचान के लिए उसने धूप का चश्मा पहना होगा । जैसे ही तो मुझे देखो, अपने हाथ में लिफाफे को दिखाते हुए आगे बढते जाओ । वहाँ साइकल सवार तुम्हारे हाथ से लिखा ऑफर ले लेगा और फिर समय आने पर तुम से संपर्क किया जाएगा । कृपया अकेले और पैदल चलकर ही आओ । यदि तुम्हारे साथ किसी और को देखा गया तो हमारा मिलन रद्द कर दिया जाएगा । सावधानी से मैंने उसे दो या तीन बार पढा । इसमें संदेह नहीं कि यहाँ सब बहुत ही विचित्र तथा उतना ही रोमांचक भी था । इसलिए मैंने पूछ लिया । लेकिन यह तो बताओ कि आखिर यह सब क्या है? मेरा मतलब है मुझे कुछ दिखाई नहीं तो मैं कुछ भी नहीं दिखाई देता है । हाँ, इतना तो है कि जो कुछ तुमने कल भविष्यवाणी की थी, वहाँ सब कुछ सच निकली है । यहाँ भी दिखाई देता है कि उस व्यक्ति को अपने पहचान छिपाने में उसकी कोई मंशा रही होगी । लेकिन इसके बाद क्या है? आप सूरदास जी को कैसे दिखाया जाए? जो स्पष्ट दिखाई दे रहा है, वहाँ तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा । एक का एक ब्योमकेश रुक गया । सीढियों पर किसी के चढने की आवाज थी, एक्शन सुनता रहा । फिर बोला आशु बाबू हैं, उन्हें कुछ बताने की जरूरत नहीं है । उसने वहाँ कागज मेरे हाथ से लिया और अपनी पॉकेट में रख लिया । जब आशु बाबू अंदर आए तब उनकी शक्ल देखने लायक थी । मैं सोच भी नहीं सकता था कि एक ही दिन में उन का चेहरा यह बदल जाएगा । उनके कपडे अस्त व्यस्त थे । बाल उलझे हुए गालों में गड्ढे दिखाई दे रहे थे । आंखों के चारों ओर काले स्याह गोले । ऐसा प्रतीत होता था कि किसी गहरे आघात से उन्हें सिर से पांव तक हिला दिया है । कल जब वे लगभग मौत से बज कर आए थे, तब भी मैंने उनको इतना हैरान परेशान नहीं देखा था । उन्होंने अपने आपको सामने की कुर्सी पर लगभग फेंकते हुए कहा, बुरी खबर है भी । उनके इस बाबू, मेरे वकील विलास मालिक लापता हो गए हैं । सहानुभूति दिखाते हुए गंभीर स्वर्ग ब्योमकेश बोला, मुझे मालूम था आपको शायद यहाँ पता चल गया होगा कि जोडासांको का आपका मित्र भी उसके साथ मारा गया है । आशु बाबू आवाज होकर उसे देखते रह गए । कुछ क्षण बाद बोले तो मैं तो मैं मालूम है सब कुछ साहब । कोच ब्योमकेश शांत स्वर में बोला, मैं कल थोडा सा हो गया था । वहाँ मैंने विलास मालिक को भी देखा । काफी दिनों से विलाज बाबू और उस घर में रहने वाली महिला आपके विरुद्ध साजिश में लगे हुए थे और जाहिर है कि आपको इसकी जानकारी नहीं थी । आपकी वसीयत लिखने के बाद विलाज बाबू आपके वहाँ से मिलने गए थे । आरंभ में तो शायद यह उनकी केवल उत्सुकता रही हो । पर बाद में तो आप समझ सकते हैं । वे दोनों इन तमाम वर्षों में सही अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे । आशु बाबू आपको हिम्मत नहीं हारनी चाहिए । आप बहुत अच्छे हैं । एक दल आवाज और और और धोखेबाज वकील के चंगुल से बिल्कुल स्वतंत्र हो गए हैं । आपके जीवन को अब कोई खतरा नहीं है । अब आप सडक के बीचोंबीच निर्भय होकर चल सकते हैं । आशु बाबू ने चिंतित निगाहों से ब्योमकेश को देखा और पूछा, मतलब मतलब स्पष्ट है जैसे संशय से आप घिरे रहते थे और बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे । वहाँ एक सच्चाई थी । उन दोनों ने आप की हत्या का षड्यंत्र रचा था, लेकिन अपने हाथों से नहीं । इस शहर में एक आदमी रहता है । कोई नहीं जानता, वहाँ कौन है या कैसा लगता है । लेकिन उसके जालिम हथियार ने अब तक बडी खामोशी से पांच सीधे साधे मासूम लोगों का इस पृथ्वी से सफाया कर दिया है । यदि आपका भाग्य साथ नहीं देता तो आप भी उन्हीं के कदमों पर चलकर अपनी जान खो देते । कई मिंटो तक आशु बाबू अपने हाथों में मुझे बाहर बैठे रहे । अंत में उन्होंने एक उदास निश्वास छोडा और बोलना शुरू किया । मैं इस बुलाते में अपने पापों की सजा बोल रहा हूँ, इसलिए मैं किसी और को दोषी नहीं ठहरा सकता । अडतीस बरस तक मेरे चरित्र पर कोई राग नहीं था, लेकिन फिर एक का एक मेरा पैर फिसल गया । अतिशय सुंदरी को देख घर मेरा माथा घूम गया । शादी से मेरा शुरू से ही लगाओ नहीं रहा, लेकिन का एक मैं उससे विवाह करने के लिए पागल हो गया । अंत में एक दिन मुझे पता चला कि वहाँ एक नाचने वाली की बेटी है, इसलिए शादी तो हो नहीं सकती थी, पर मैं उसे छोडना भी नहीं चाहता था । मैं उसे ले आया और उसके लिए किराये पर मकान ले लिया । उसके बाद आज तक यानी बारह वर्षों से मैं उसकी देखभाल पत्नी के रूप में करता रहा हूँ । आप यहाँ जहाँ नहीं गए हैं कि मैंने अपनी सारी संपत्ति उसके नाम लिख दी और इस भ्रम में रहा कि वहाँ मुझे पति की तरह उतना ही प्यार करती है । मुझे कभी कोई संदेह नहीं हुआ । मैं इस सच्चाई को नहीं समझ पाया कि आप से जान मिस्त्री में निष्ठा या वफादारी संभव ही नहीं है । जो भी हो, बूढापे में मिले इस सबका का लाभ मैं दूसरे जन्म में ही ले पाऊंगा । एक अंतराल के बाद उन्होंने टूटती आवाज में पूछा ये दोनों क्या आपको मालूम है कि कहाँ गए हैं? ब्योमकेश ने कहा नहीं और इस जानकारी का कोई लाभ भी नहीं है । आप उन दोनों के पीछे उस रास्ते पर जा भी नहीं सकते हैं जहाँ उन का भय उन्हें खींचे ले जा रहा है । आशु बाबू आपका यहाँ सामाजिक उल्लंघन हो सकता है । समाज की दृष्टि में निंदनीय माना जा सकता है । किन्तु विश्वास कीजिए मेरी दृष्टि में आप हमेशा सम्मानित रहेंगे ।

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ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay