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जिम्मेदारी किसकी? Voiceover Artist : Maya Author : Balistar Singh Gurjar Producer : Kuku FM Voiceover Artist : Maya S Bankar
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आप सुन रहे हैं कुक ऍम आरजेएम आया के साथ सुनी जम्मन चाहिए जिम्मेदारी किसकी लेखक बाली स्तर सी गुज्जर दिन प्रतिदिन बढती गरीबी और अमीरी लगातार बढती हुई गरीबी और अमीरी यही दर्शाती है कि दोनों चीजों में से अमेरिका पडा ज्यादा भारी है । वह समय बडा ही भाग्यशाली था जब भारत को सोने की चिडिया के नाम से पुकारा जाता था । वो इसलिए कि भारत में सबसे ज्यादा धन पाया जाता था । उस समय हर भारतीय के पास इतनी संपत्ति हुआ करती थी कि परिवार का भरण पोषण सभी सुख सुविधाओं के साथ आसानी पूर्वक हो जाया करता था तथा हर किसी का जीवन खुशहाली से भरा पूरा हुआ करता था । ना तो किसी को गरीब कहकर बेइज्जत किया जाता था और ना ही किसी को अमीर कहकर श्रीमान का दर्जा दिया जाता था । इसकी वजह यही थी कि उस समय इंसान को दर्जा उसकी बुद्धिमानी के लिए चार से प्राप्त हुआ करता था । जैसे कोई पंडित किसी से धन संपत्ति के मामले में थोडा कम है और यदि वह बुद्धिमान है तो उसको सभी ज्ञानी पंडित जी कहकर पुकारते थे । भारत देश की ये शुरू से ही परंपरा रही है कि हर इंसान को उसके जन्म के आधार पर नहीं बल्कि उसके कर्म के आधार पर सम्मान दिया जाता था । प्राचीन समय में भारतवासियों के पास इतना धन होने के बावजूद भी जिस सम्मान हमें देखने को मिलता था, वास्तव में एक प्रकार से हमें गौरवान्वित करने वाला कार्य हुआ करता था । हर किसी को बिल्कुल उचित महत्व देना यही प्रदर्शित करता है कि हमारे गुड हमारी सभ्यता को दर्शाते हैं । सोने की चिडिया कहलाने वाले भारत में अगर किसी के पास किसी चीज का अभाव हुआ करता था तो उसके आस पास रहने वाले लोग उस व्यक्ति की जरूर ही सहायता करते थे और उस समय हमें ये भी देखने को मिलता था कि लोग जो भी उत्सव त्यौहार मनाया करते थे, वह सब मिलजुलकर मनाते थे । वहाँ अमीरी तथा गरीबी का कोई महत्व नहीं था । अब यदि हम सोने की चिडिया कहलाने वाले आधुनिक भारत पर नजर डालें तो हमारी आंखों में जरूर ही अश्रुधारा बहने लेगी । जिस भारत में एक समय में अमीरी और गरीबी को कोई महत्व नहीं दिया जाता था, आज उसी भारत की ये हालत है कि आमिर और भी ज्यादा अमीर होता जा रहा है तथा गरीब और भी ज्यादा गरीब । आज जिस तरीके से अमीर और गरीब में जो भेदभाव वर्तमान में हमें दिखाई देता है । शायद ही इस तरीके का भेदभाव हमने पहले कभी देखा होगा । आज भी किसी गरीब घर में पैदा होने वाला विद्यार्थी किसी स्कूल या कॉलेज की फीस भरने में असमर्थ है । लाखों करोडों सालाना कमाने वाले शिक्षक उसे शिक्षा देने से इंकार कर देते हैं । वैसे भी हमारे लिए ये कोई नई बात नहीं है कि कई विद्यार्थी ऐसे होते हैं जो पढने में तो अमीर वर्ग के विद्यार्थियों से भी बुद्धिमान होते हैं किन्तु धन के अभाव में शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते हैं तथा अपनी गरीबी के कारण अपने आप पर पछतावा करते रहते हैं । आज के समय में जो आमिर अपने आपको अमीर मानते हैं वो शायद ये भूल जाते हैं कि गरीबों की मेहरबानी के कारण ही कोई अमीर बन पाता है । अन्यथा यदि गरीब लोग सहयोग नहीं करें तो कोई भी अमीर गरीब बन सकता है । चाहे बडे से बडे उद्योग धंधे हो, चाहे बडे से बडा व्यापार हो या फिर ऐसा कोई भी काम जहाँ मजदूर वर्ग के लोग काम करते हैं, हर का मजदूरों की वजह से चल पडता है । इसीलिए सोचना चाहिए कि इन मजदूरों की खून पसीने का ही परिणाम है कि आज हमारे पास उचित मात्रा में धन आता है और हम सर्वसुविधायुक्त जीवन यापन कर सकते हैं । दुःख तो वहाँ अधिक होने लगता है जब कोई मालिक अपने यहाँ काम करने वाले व्यक्ति को कमजोर समझकर डरता है क्योंकि हमारे यहाँ जो मजदूर काम करता है वह किसी ना किसी मजबूरी में ही काम करता है । यदि उसके पास पर्याप्त मात्रा में धन होता तो क्या वो हमारी बेवजह कि डाट फटकार को सहन कर पाता? बिल्कुल नहीं । बाल मजदूरी नहीं आज के समय में कोई नई बात नहीं है । ऐसे कई छोटे छोटे बच्चे होते हैं जिनकी जो उम्र खेलने कूदने की तथा पढने लिखने की होती है वो उस उम्र में मजदूरी कर रहे होते हैं । और जिस किसी इंसान के यहाँ बच्चे मजदूरी करते हैं उस लखपति सेठ जी को उन पर इतनी भी दया नहीं आती हैं कि यदि कोई बच्चा अपनी पढाई लिखाई की खर्च के कारण मजदूरी कर रहा है तो वह उसे मानवता के हिसाब से पढने लिखने का खर्च देखकर उस पर अपनी कृपादृष्टि बनाये रखें । लेकिन वर्तमान में ऐसा होता ही कहाँ है कि यदि कोई बच्चा अपने पढाई की फीस भरने के चक्कर में मजदूरी कर रहा हो और हम उसे बिना मजदूरी के लिए पढाई की फीस दे रहें ऐसा कुछ नहीं कर सकता है जो शिक्षा को महत्व देता हूँ । गरीबी की मार आज जिस तरह से बेबस इंसान झेल रहा है उससे तो यही लगता है कि शायद अब मानवता बच्चे ही ना हो । उदाहरण के तौर पर अगर हम देखें तो पाएंगे कि ऐसे कई डॉक्टर होते हैं जो फीस देने के अभाव में किसी गरीब व्यक्ति का उपचार करने से इनकार कर देती हूँ । जिस डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया जाता है वो सिर्फ चंद पैसों की खाते रहे किसी गरीब व्यक्ति का मुफ्त में इलाज करने से इंकार कर देते हैं । क्या यही हमारी वो मानवता है जिसे की हर वर्ग का मानव चाहे अमीर हो, चाहे गरीब ईश्वर का दर्जा देता है और हम उन्ही लोगों के साथ में धान की खाते भेदभाव कर बैठते हैं और एक डॉक्टर होने के नाते किसी गरीब को न चाहते हुए भी मौत के मुंह में ढकेल देते हैं । ऐसी कई घटनाएं आज दिन प्रतिदिन घटित होती रहती हैं कि कई गरीब समुदाय के लोगों के साथ इतना अन्याय किया जाता है कि मानव मानव कहलाने के लायक नहीं रह जाता है । आज ही कोई नई बात नहीं है कि कई अपराधी ऐसे होते हैं जो गरीबों पर अत्याचार करने के बाद भी कोर्ट कचहरी, पुलिस थाना जेल आधे से पैसे के दम पर बिना सजा पाएं आजाद हो जाते हैं और उच्च पदस्थ अधिकारीवर्ग भी पैसों के लालच में एक अमीर को रिहा कर के अपने पद को अपमानित करने के साथ साथ गरीब फरियादी को दो हजार जख्म दे बैठते हैं । इस से तो यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज के समय में जब महत्व पैसे को दिया जा रहा है, उसकी तुलना में तो मानवता का कोई भी स्थान विशेष नहीं बचा । सीधी सी बात तो यही है कि अगर कोई व्यक्ति धन के लालच में अपने पद का दुरुपयोग करता है तो वहाँ मानवता तो स्वता ही नष्ट हो जाती हैं । चाहे फिर कोई व्यक्ति निजी सिंहासन पर बैठा हो या फिर सरकारी सिंहासन पर कर्तव्य तो सबका यही बनता है कि हम जिस जगह जिस सिंहासन पर विराजमान है, उसका सही तरीके से उपयोग किया जाए, ताकि उस पर विशेष की गरिमा बरकरार रहे । अन्यथा परिणाम यहीं देखने को मिलता है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी अमीर बनने के लालच में आम जनता से रिश्वत रूपी भीख मांगता हुआ पाया जाता है तो सब लोग उसकी खाकीवर्दी को रिश्वतखोर का नाम देकर बदनाम कर देते हैं । ऐसा करने से न केवल पूरे पुलिस वाले बन नाम हो जाते हैं बल्कि कुछ अच्छे पुलिस वालों को भी हमारी गलतियों की सजा भुगतनी पडती हैं । यानी कि इसको मद्देनजर रखते हुए हम यही कह सकते हैं कि अक्सर लोग ज्यादा से ज्यादा धन कमाने के चक्कर में अपने पद तक को अपमानिक कर बैठते हैं । ये इसी तरीके से अमीर बनने के लालच का कारण है कि हर तरफ भ्रष्टाचार पनप रहा है । कई व्यापारी मिलावट खोरी करते नजर आ रहे हैं । कहीं सरकारी रुपये गरीबों में न बाटकर सरकारी लोग आपस में ही बांध कर खा लेते हैं । इससे हो न हो, देश का विकास तो होने वाला नहीं, लेकिन आमिर लेकिन अमीरों का विकास तो जरूर हो रहा है । यह में जरूरी आश्चर्य में डालने वाली बात है कि आज के ऐसे माहौल में यदि हमने धन का लालच अपनी सोच से नहीं मिटाया तो आगे चलकर हमारे इस तरह की सोच हमें इतना शर्मसार कर देगी कि हम अपना सर ठीक से उठा भी नहीं पाएंगे । आवश्यकता से ज्यादा धन अर्जित करना न सिर्फ हमें घमंड पैदा करता है, बल्कि हमारे विनाश का कारण भी कभी कभी बंद ही जाता है । भारत की आज इसी सोच का परिणाम है कि विदेशियों द्वारा कई बार भारत पर आक्रमण किया गया है और कई गुना हमारा भारतीय धन विदेशी लोगों की तिजोरियों में हमेशा के लिए बंद हो गया है । इतना सब कुछ जानते हुए भी हम आज भी अपने स्वार्थ की खाते गरीब को और गरीब तथा गरीब के धन से अमीर को और भी ज्यादा अमीर बनाने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं । आज कालाधन का बढता संचालन यही दर्शाता है कि लोग अब कितनी बेईमानी पर उतारू है कि अपने देश का रुपया अन्य देशों के बैंकों में पहुंचा रहे हैं और अपने ही देश को कंगाली के उस मोड पर खडा करने में कोई कमी नहीं छोड रहे हैं जहाँ आने वाले समय में हमें धन के अभाव में दर दर की ठोकरे खानी पडे । इसीलिए यही कहना उचित होगा की अगर हम भारत को फिर से सोने की चिडिया बनाना चाहते हैं तो हमें अपना लाल की स्वभाव छोडना ही होगा । अगर हम अपना लाल किस वजह छोड देंगे तो फिर हम अमीर गरीब का भेद भाव की बिना हर किसी को समान महत्व देंगे । और फिर भारत का हर नागरिक शिक्षा से सराबोर होकर भारत जैसे महान देश को उसकी खोई हुई पहचान दिलाने में कोई कमी कोई कसर नहीं छोडेगा । फिर भारत तो सोने की चिडिया और विश्वगुरु जो होने का ही ठहरा । गरीबी, अमीरी और राजनीति अ मेरी एक और जहाँ एक राजनीतिज्ञ के लिए आज के समय अतिमहत्वपूर्ण मानी जाती है, वहीं दूसरी और गरीबी एक कुशल गरीब राजनीतिज्ञ के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है । आज हम देखते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान जितना धन एक राजनीति ये द्वारा खर्च किया जाता है उतना धन तो अन्य किसी भी चीज पर खर्च नहीं किया जाता । ऐसी स्थिति में चुनाव प्रचार के दौरान फिजूल खर्च करने वाले राजनीतिज्ञ को हम क्या कहेंगे? एक अमीर राजनीतिज्ञ या एक देशभक्त राजनीति? क्या ये निश्चित ही है कि जितना धन चुनाव प्रचार में खर्च किया जाता है उतने ही धन से कितनी ही गरीब बच्चों के लिए स्कूलों का निर्माण कराया जा सकता है । लेकिन ऐसा होता कहा है । यहाँ एक प्रश्न यह भी खडा होता है जब चुनाव उम्मीदवारों का संपत्ति के ब्यौरे का फॉर्म भरा जाता है । उस समय कई उम्मीदवारों की इतनी संपत्ति तो नहीं होती है जितनी संपत्ति उपचुनावों के दौरान खर्च करते हैं । फिर चुनावों में जो धन उम्मीदवारों द्वारा खर्च किया जाता है वह धन उनके पास आता कहाँ से हैं? वहीं दूसरी और आज यदि एक गरीब घर का कोई ईमानदार व्यक्ति चुनावी सभा में खडा हो भी जाता है, धन के अभाव में वह कहीं न कहीं पीछे ही रह जाता है । ऐसा होता ही इसलिए है कि उस गरीब उम्मीदवार के पास इतना धन नहीं होता है कि वह आज की जनता के सामने आधुनिक तरीके से अपना प्रचार प्रसार कर सकें । इसके साथ ही साथ उस गरीब के पास में इतना भी कुछ नहीं होता है कि वह चुनावी सलाह के दौरान जनता को लुभाने के लिए भरपेट खाना खिला सके । लोई और कम्बल बांट सके इसका अंततः यही परिणाम होता है कि कई कुशल उम्मीदवार अपनी गरीबी के अभाव में चुनाव हार जाते हैं और कई बेईमान अमीर उम्मीदवार जनता को पैसों के दम पर लुभाकर चुनाव जीत जाते हैं । ऐसी स्थिति में पूरी की पूरी गलती जनता की मानी जानी चाहिए कि हम एक कुशल उम्मीदवार की योग्यता का पता नहीं कर पाते हैं और थोडे से धन के लालच तथा लुभावने विज्ञापनों के चक्कर में पढकर अपना मत एक गलत जगह डाल कर अपना और अपने देश का भविष्य खतरे में डाल देते हैं । आज हम अमीरी और गरीबी की बरी भाषा से भलीभांति परिचित है कि अमीरी और गरीबी का भेदभाव एक और जहां मानवता को मिटा रहा है, वहीं दूसरी और हमारे देश की बदनामी का भी कारण बन रहा है । अगर हम वास्तविकता में भारत को फिर से विश्वगुरु तथा सोने की चिडिया बनाना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले जो जिम्मेदारी मिली हुई है, उसे उचित तरीके से मानवता के लिहाज से निभाना होगा तथा अमीरी गरीबी के लालच, रुपये दानों को अपने दिल और दिमाग से हमेशा के लिए मिटाना होगा । यदि हम ऐसा कर सकते हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत के तो शुरू से ही अच्छे दिल रहे हैं । अगर हम अपनी जिम्मेदारियों को ठीक ढंग से निभाएं तो

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