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10.  Swami Vivekanand in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts

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10. Swami Vivekanand in 

AuthorRaj Shrivastava
स्वामी विवेकानंद की अमरगाथा.... Swami Vivekanand | स्वामी विवेकानन्द Producer : Kuku FM Voiceover Artist : Raj Shrivastava
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चैप्टर नहीं विधान बनाम ऐतिहासिक भौतिकवाद हमने एक विषय में मुख्य वस्तु को भूलकर से छिलके ही लेकर बहुत कुछ उछल कूद मचाते हैं । विवेक आना । विवेकानंद ने इस बात पर बार बार जोर दिया है कि हमारे राष्ट्र का मेरूदंड रीड की हड्डी धर्म है । दरअसल धर्म किसी प्राची अथवा पार शाह की राष्ट्र का मेरूदंड नहीं, हमारा भी नहीं और नाइस पर हमारा कोई विशेष अधिकार है । इस विषय संबंधी मार्क्स की व्याख्या ये है तथ्यों की मित्तियां व्याख्या का नाम धर्म है । हम देख चुके हैं कि मनीष ने प्रत्येक देश में प्रकृति की वृद्ध अपने संघर्ष में जहाँ प्रकृति को अपने कर्म द्वारा बदला है, वहाँ कल्पना से भी कम लिया अपनी अल्पज्ञान के कारण तक क्यों कि मित्तियां व्याख्या की है । जैसे जैसे समाज का विकास हुआ और जैसे जैसे उत्पादन, संघर्ष वर्ग संघर्ष और वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मनुष्य ने तथ्यों को जितना समझा उसके वास्तुविज्ञान की मात्रा उतनी ही बढती गई और वृद्धि की इसी मात्रा के अनुपात से मिथ्या धारण अर्थात धर्म से अनुसार हटता गया और उसमें सारतत्व जुडता चला गया आती है । जैसे जैसे समाज का विकास होता रहा, उत्पादन संबंध तथा आवश्यकताएं बदलती रही, धर्म का भी यथार्थ इकरन होता चला गया और उसका व्यवहारिक रूप निरंतर बदलता रहा । ऐतिहासिक भौतिकवाद का यहाँ नियम जैसे सब देशों पर लागू हुआ, वैसे ही हमारे देश पर भी लागू हुआ । यह एक निरपेक्ष सकते हैं जो किसी भी देश की विशिष्ट परिस्थितियों पर लागू होते समय साहब पे तो बन जाता है पर कोई भी देश इसका अपवाद और हमारा नहीं । इसलिए धर्म किसी भी प्राची या पातशाह राष्ट्र का विशेषाधिकार नहीं । हमारा नहीं और होना भी नहीं चाहिए क्योंकि मितिया पर विशेषाधिकार जताना नीरी मूर्खता है । मूर्खता के सिवाय कुछ नहीं । इसी मोर्चा के फलस्वरूप हमारा देश गुलाम बना और जिस धर्म पर हम इतना गर्व करते हैं, वहाँ भी गुलाम बना । बुद्धिमता की बात अब ये देखना है कि हमारे हजारों साल के इतिहास में वेदांत का विभाग करू क्या रहा और उसमें हमें जो कुछ विरासत में मिला उसमें सारतत्व क्या है? आसार क्या है? छिलका किया है जिससे हमें फेंकना है और मुख्य वस्तु किया है जिससे हमें रखना और आगे विकसित करना है । तभी हम अपनी राष्ट्रीय समस्याओं को यथार्थ रूप में समझ पाएंगे । कभी भविष्य का कार्य और विकास की दिशा निर्धारित होगी । विवेकानंद का महत्व उनके धर्म प्रचार में नहीं बल्कि उनका महत्व इस बात में है कि वे हमारी इस राष्ट्रीय विरासत को समझने अपनाने में और समस्याओं के समाधान में हमारी मदद करते हैं । हम वरुण का एहसास ये है कि उन्होंने आज से पौन सभी पहले छिलके को अलग कर के मुख्य वस्तु पर राष्ट्र का ध्यान केंद्रित किया । देश का दुर्भाग्य ये हैं कि उन के बाद हमने मुख्य वस्तु से ध्यान हटाकर छिलके पर केंद्रित किया । धर्म को राष्ट्र का मेरूदंड बताने में उनका जो आशय था, राष्ट्रविरोधी तत्वों ने उसे भ्रष्ट करने, धूमिल बनाने और हमारी दृष्टि से ओझल रखने का षडयंत्र रचा और हम मंजिल से भटक गए । लेकिन कहावत है कि सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो भूला नहीं कहना था । पांचवी हमारे इस महान राष्ट्र के जीवन में क्षण के बराबर है । आइए हम विवेकानंद के चिंतन से अपने चिंतन का सूत्र जोडे और जिस रास्ते से हम भटक गये हैं उस पर वापस हम कह चुके हैं कि कर्मवाद और मायावाद वेदांत दर्शन के आधारिक स्तम्भय । अब देखना यह है कि सामाजिक जीवन में उनका व्यवहारिक रूप क्या है और देश की भौतिक तथा आर्थिक स्थिति से उनका द्वंद्वात्मक संबंध क्या है? गीता तथा मैदान के दूसरे ग्रंथों में पुनर्जन्म अथवा करमाबाद की कुछ भी व्याख्या की गई हो पर इसकी उत्पत्ति का भौतिक आधार यह है कि व्यक्तिगत संपत्ति के साथ साथ भारतीय समाज वर्गों में ही नहीं वर्णों, जातियों में भी विभाजित हुआ ब्राह्मण, क्षत्रिय, सवर्ण तथा श्रेष्ठ माने जाते थे और उन्हें ही जीवन की सुख सुविधाएं प्राप्त थी । शेषराम करने वाले सभी बढ रही नत्वा शूद्र माने जाते थे और सब कुछ पैदा करने के बावजूद भी भूख और दरिद्रता का जीवन जी रहे हैं । कर्मवाद के सिद्धांत ने शोषक और शोषित दोनों को संतुष्ट किया । सवर्णों ने ये मान लिया कि उन्होंने पिछले जन्म में जब पुण्यकर्म किए थे उन के फलस्वरूप में उच्चवर्णीय श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुए हैं और इसी से उन्हें दूसरों के श्रम पर्ची ने का अधिकार प्राप्त हैं । शोज तो अर्थात शूद्रों को ये आश्वासन दिया गया कि सारे दुख और कष्ट तुम्हारे पिछले जन्म के बुरे कर्मों का फल है । अगर जमे जिनमें में आपने वर्ल्ड धर्म का पालन करते हुए हमारी निष्काम भाव से सेवा करोगे तो तुम भी अगले जन्म में उच्चवर्णीय अथवा श्रेष्ठ कोई में उत्पन्न होंगे और कठोर श्रम से छूट जाओगे । वर्णव्यवस्था हमारे समाज संगठन का विशेष रूप है इसलिए कर्मवाद का सिद्धांत भी हमारे ही देश में विकसित हुआ । दूसरे देशों की धार्मिक विचार उनकी विशेष भौतिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित हुए लिखा है आत्मा की प्राचीनतम कल्पनाएं स्कूल शरीर में एक सूक्ष्म शरीर की भी स्कूल के अगोचर हो जाने पर सूक्ष्म कोचर हो जाता है । मिस्टर देश में सूक्ष्म शरीर का भी निधन हो जाता है । स्कूल शरीर के बिखर जाने पर सूक्ष्म शरीर भी बिखर जाता है । यही कारण है कि उन्होंने पिरामिडों का निर्माण किया और अपने पुरखों के मृत शरीर को आली प्रवेश ममीफिकेशन किया और ये आशा की की मरे हुए लोग इस क्रिया से अमरत्व प्राप्त करेंगे । मुसलमान और इसाई अपने मृत शरीर को दफनाते हैं क्योंकि उनका विश्वास है कि वे कयामत के दिन उठेंगे और तब अपने अच्छे बुरे कर्मों के हिसाब से स्वर्ग तथा नरक में जाएंगे । स्वर्ग नरक का विचार हिंदुओं में भी मनाया जाता है और इसके अलावा चंद्र लोग आदि कितने ही सीनों की कल्पना की गई है जिनमें आत्मा को अपने कर्मों के अनुसार रहना पडता है लेकिन यहाँ महत्वा दियो की कल्पना है विवेकानंद का इसमें विश्वास नहीं है । वे लिखते हैं स्वर्ग तथा अन्य सीनों से संबंधित धारणाएँ भी है किंतु उन्हें द्वितीय श्रेणी का माना जाता है । स्वर्ग की धारणा को निम्नस्तर ये माना जाता है उन का उद्भव भोग की एक स्थिति पानी की इच्छा से होता है । हम मूर्खतापूर्ण समग्र विश्व को अपने वर्तमान अनुभव से सीमित कर देना चाहते हैं । बच्चे सोचते हैं कि सारा विश्व बच्चों से ही भरा है । पागल समझते हैं कि सारा विश्व एक पागल खाना है । इसी तरह अन्य लोग इसी प्रकार जिनके लिए यह जगह केंद्रीय संबंधी भूख मात्र है । खाना और मौज उडाना ही दिन का समग्र जीवन है । उनमें तथा नृशंस पशुओं में बहुत कम अंतर है । ऐसे लोगों के लिए किसी ऐसे स्थान की कल्पना करना स्वाभाविक है जहाँ उन्हें और अधिक भूख प्राप्त होंगे क्योंकि यहाँ जीवन छोटा है, भूख के लिए उनकी इच्छा सीम है । आते वे ऐसे तीनों की कल्पना करने के लिए विवश है जहाँ उन्हें इंद्रियों का आबाद भोक प्राप्त हो सकेगा । फिर जैसे हम और आगे बढते हैं । हम देखते हैं कि जो ऐसे सीनों को जानना चाहते हैं, उसका स्वप्न देखेंगे और जब स्वपन कांत होगा तो एक दूसरे स्थान का स्वप्न देखेंगे जिसमें भोग प्रचुर मात्रा में होगा और जब वहाँ स्वप्ने टूटेगा तुम्हें किसी अन्य वस्तु की बात सोचनी पडेगी । इस प्रकार से ज्यादा एक स्वप्ने से दूसरे स्वप्न की ओर भागते रहेंगे । मतलब ये कि मनुष्य की चेतना उसकी सामाजिक स्थिति से निर्धारित होती है, जिन्हें इस लोग में सुख भोग के साथ प्राप्त थे । उन्ही लोगों ने अपने लिए पर लोग में भी स्वर्ग की कल्पना की और जो लोग इन साधनों से वंचित थे, ताकि वे उनके सुख भोग में बाधा ना डाले । व्यक्तिगत संपत्ति को हानि पहुंचाने वाले सभी कर चोरी, बईमानी को अशोक बताकर उन्हें नरक के भाई से डराया । पुनर्जन्म का सिद्धांत भी ऐसी ही कल्पना है । पर वेदांत का आधार स्तंभ होने के कारण विवेकानंद उसे यहाँ स्वीकारते नहीं । फिर भी चिंतन वैज्ञानिक होने के कारण उनका विश्वास यहाँ भी डगमगा जाता है । पुनर्जन्म के पक्ष और विपक्ष में दिए जाने वाले मतों का विवेचन करने के बाद इसी शीर्षक के अपने लिख के अंत में मैं जो कहते हैं, इस प्रकार हमारे लिए पुनर्जन्म का सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण बन जाता है, क्योंकि पुनर जनम और कोशिकाओं द्वारा आनुवंशिक संक्रमण के मध्य जो विवाद है, वहाँ यथार्थ में अध्यात्मिकता और भौतिकता का विवाद है । यदि कोशिकाओं द्वारा आनुवांशिक संक्रमण समस्या को हल करने के लिए पूर्ण था, पर्याप्त है, तब तो बहुत टिकता ही अपरिहार्य हैं और आत्मा के सिद्धांत की कोई आवश्यकता ही नहीं । यदि वहाँ पर्याप्त नहीं है तो प्रत्येक आत्मा अपने सात जन्म में भूत कालिक अनुभवों को लेकर आती है । यह सिद्धांत पूर्णतः आ सकते हैं पुनर्जनन में । अब भौतिकता इन दोनों में किसी को मानने के सिवा और कोई गलती नहीं है । प्रश्न यह है कि हम किसे मानें? इस प्रश्न सुनने पर विचार कीजिए । क्या एक सन्यासी एक धर्म प्रचार के लिए ये साहस की बात नहीं है? मार्च उन्नीस हो सानफ्रांसिस्को में जीवात्मा एवं परमात्मा शीर्षक भाषण में उन्होंने कहा, दो प्रकार की जाती हैं देवी सम पदावली और आसुरी संपदा वाली । पहले का बच्चा है कि वे स्वयं जीवात्मा तथा परमात्मा के स्वरूप है । दूसरी का विचार है कि वे शरीर मात्र है । प्राचीन भारतीय तक चिंतकों ने जोर देकर कहा है कि शरीर नश्वर हैं । जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर अन्य नवीन वस्त्र को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को छोडकर अन्य अन्य नवीन शरीरों को प्राप्त करती है । जहाँ तक मेरा सवाल है, वातावरण एवं शिक्षा दीक्षा के परिणाम से मैं कुछ विपरीत ही सोचने को विवश हुआ था । मेरा अधिक संपर्क ईसाई मुसलमानों से रहा, जो विषेशकर शरीर से भी होते हैं । विवेकानंद के पिता होगा दी थी । धर्म उनके लिए गौण वस्तु थी । इसलिए चाहे उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को गुरु बनाकर दूसरा जन्म धारण किया, पर इसके बावजूद पिता की विरासत को वो झटक नहीं पाए । क्षेत्रीय खुल के चंचल नरेंद्र ही बने रहे । बुद्ध के बारे में कहानी है कि बुद्ध ने मानव जाति के पर इतराता के रूप में जिनमें लिया हिंदू जब वह राज प्रसाद की विलासिता में अपने को भूल गया तब उसे जगाने के लिए देवदूत ने की दिखाया जिसका मार मार इस प्रकार है हमें एक प्रवाह में बहते चले जा रहे हैं । हम अविरत रूप से परिवर्तित हो रहे हैं, कहीं निवृत्ति नहीं है, वही विराम नहीं है बुद्ध ही को जो एक राजकुमार था, मृत्यु के भय ने विचलित किया और बुद्ध ही ने घर त्याग करने के बाद इस छनछन परिवर्तित हो रहे संसार में अमृत्व की झाव का दामन करके निर्माण हासिल करने की बात सूची आत्मा परमात्मा में आज था ना होने के बावजूद बुद्ध में भी पुनर्जनन को मना । गीता के अनुसार आत्मा की बाद एक जनमत धारण करती है । लेकिन बहुत मत के अनुसार एक जन्म के संस्कार दूसरे जन्म में जाते हैं और दूसरा जन्म पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार होता है । नाक सीधे हाथ से पकडो या उल्टी से बाद तो एक ही है । वैदिक समाज व्यवस्था में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ के बाद अंतिम आयु में सन्यास धारण करने की प्रथा थी । युवास्था में संन्यास लेने की प्रथा मुद्दे ने चलाई अतेम और सब बातें गौण मोक्ष प्राप्ति ही चीज का मुख्य छह बन गई । इससे जोहानी हुई इतिहास उसका साक्षी है । हाँ, विवेकानन्द कहते हैं बुद्ध ने हमारा सर्वनाश किया और ईसा ने ग्रीस और रोका । विवेकानंद ने बडी विनम्रता से अपने को बुद्ध का दास अनुदान भी कहा है । उसे विशाल उदार तार मना है । लेकिन जब उनका चिंतन अधिक वैज्ञानिक अधिक वस्तु पर हुआ तब उन्होंने बुद्ध के द्वारा देश के सर्वनाश की बात कही और इसकी व्याख्या क्योंकि जिस समय बहुत राज्य में एक एक मठ में एक एक लाख साधु हो गए थे, उस समय देश ठीक नाश होने की ओर अग्रसर हुआ था । बहुत इसाई, मुसलमान, जैन सभी का ये भ्रम है कि सभी के लिए कानून और एक नियम है । ये बिल्कुल गलत हैं जाती और व्यक्ति की प्रकृति भेज से शिक्षा व्यवहार के नियम सभी अलग अलग हैं । बलपूर्वक उन्हें एक करने से क्या होगा? बौद्ध कहते हैं मोक्ष के सदृश्य और क्या है सब दुनिया मुक्ति प्राप्ति करें तो क्या कभी ऐसा हो सकता है तुम रहते हो तुम्हारे लिए? ये सब बातें बहुत आवश्यक नहीं है तो मैं अपने धर्म का आचरण करो । हिन्दू शास्त्र यही कहते हैं । हिंदू शास्त्र कहते हैं कि धर्म की अपेक्षा मूंग अवश्य ही बहुत बडा है किंतु पहले धर्म करना होगा । बहुत होने, इसी स्थान पर भ्रम में पडकर अनेक उत्पाद खडे कर दिए । अहिंसा ठीक है । निश्चय ही बडी बात है । कहने में बात अच्छी है । पर शास्त्र कहते हैं तो गृहस्त बहुत भारी काल परियारी को ये ठप पड जाएं और यदि तो उसका जवाब दस थप्पडों से ना हो तो तुम बात करते हैं विस्तार में जाने की । गुंजाइश नहीं । इतना ही कह देना काफी है कि बुद्ध क्रांति से भर भी पुनरुत्थानवादी था । उसकी ऐतिहासिक भूमिका प्रगतिशील नहीं, प्रतिक्रियावादी है । जनमत का श्रृषि करता । ईश्वर में विश्वास नहीं लेकिन उनका विश्वास है कि शुभकार्य प्रत्येक आत्मा ईश्वरत्व को प्राप्त कर सकती है । महावीर स्वामी सी है । धोनी से सीधी मनुष्य योनि में आए थे । जैनी हिंसा और संग्रह के बजाय अपरिग्रह पर सबसे अधिक जोर देते हैं । लेकिन व्यवहार में जैनी की सबसे अधिक संग्रह करते हैं और चीटियों को आटा खिलाने और पानी छानकर पीने वाले चैन ही सुखोर्इ, मुनाफाखोरी इत्यादि घृणित कर्मणि संकोच करते हैं । मतलब ये है कि सिद्धांत और व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर है । शोषक और शासक वर्ग ने एक बुद्ध, एक महावीर और एक भृर्तहरि अपने उच्च वर्ग के पांच दस व्यक्तियों को त्यागकर बैराक के आदर्श बनाकर प्रस्तुत किया । पूजा कराई और व्यवहार जो था उसके बारे में विवेकानंद लिखते हैं राज्य रक्षा आपने भोगविलास, अपने परिवार की पृष्टि और सबसे बढकर पुरोहितों की तुष्टि के लिए राजा लोग सूर्य की भांति अपनी प्रजा का धन शोक लिया करते थे । बिचारे वैश्य लोग ही उनकी रसद और सुधार हो गए । बुद्ध का कथन है यदि यहाँ दृश्य जगत न हो तो हमारी माँ करो ना, किसके लिए सक्रिय हो । लेकिन इस महा करुणा के महान आदर्श ने मेहनत कर जनता को जिस दयनीय अवस्था को पहुंचा दिया है । हाँ, विवेकानन्द ने यूरोप से लौटकर कुंभकरण के भाषण में उनका योगदान किया । भाइयों मैं तुम लोगों को दो चार कठोर शक्तियों से अवगत कराना चाहता हूँ । समाचार पत्रों में पढने में आया की हमारे यहाँ एक व्यक्ति को किसी अंग्रेज ने मार डाला है अथवा उसके साथ बुरा बर्ताव किया है । बस ये सब पढते ही सारे देश में हो हल्ला मच गया । इस समाचार को पढकर मैंने भी आज सुबह पर थोडी देर बाद मेरे मन में ये सवाल पैदा हुआ कि इस प्रकार की घटना के लिए उत्तरदायी कौन हैं? क्यूकि में वेदांत वाली हूँ में स्वयं अपने से ये प्रश्न किए बिना नहीं रह सका । हिंदू सजा से अंतर्दृष्टि पर आ रहा है । वहाँ अपने अंदर ही उसी के द्वारा सब विषयों का कारण ढूंढा करता है । जब कभी मैं अपने मन से ये प्रश्न करता होगी उसके लिए कौन उत्तरदायी है? तभी मेरा मान बार बार ये जवाब देता है कि इसके लिए अंग्रेज तरदायी नहीं बल्कि अपनी दुर्व्यवस्था के लिए अपनी अवनति और इन सारे दुःख कष्टों के लिए एकमात्र हमें उत्तरदाई हमारे सिवा इन बातों के लिए और कोई जिम्मेदार हो ही नहीं सकता । हमारे अभिजात पूर्वक साधारण जनसमुदाय को जमाने से पैरों तले कुचलते रहे । इसके फलस्वरूप विचार एकदम असहाय हो गए । यहाँ तक कि अपने आपको मनुष्य मानना भी भूल गए । सदियों तक विधवानी महारानियों की आज्ञा सिर आंखों पर रख कर केवल लकडी काटते और पानी भर दे रहे हैं । उनकी यह धारणा बन गई की मानो उन्होंने गुलाम के रूप में ही जन्म लिया और यदि कोई व्यक्ति उनके प्रति सहानुभूति का शब्द कहता है तो मैं प्रायः देखता हूँ कि आधुनिक शिक्षा की टीम हांकने के बावजूद हमारे देश के लोग इन पददलित निर्धन लोगों के उन्नयन के दायित्व से तुरंत पीछे हट जाते हैं । यही नहीं, मैं भी देखता हूँ यहाँ के धनी मानी और नव शिक्षित लोग पाश्चात्य देशों के अनुवांशिक संक्रमण, वाद ऍम आदि अंड बंद कमजोर मतों को लेकर ऐसी दानवीय और निर्दयतापूर्ण युक्तियां पेश करते हैं कि यह पददलित लोग किसी तरह उन्नति ना कर सके और उन पर उत्पीडन एवं अत्याचार करने का काफी सुबह का मिलेगा । गीता में कहा गया है विषयासक्त अज्ञानी मनुष्यों को ज्ञान की शिक्षा देकर उनमें भ्रम ना उत्पन्न करना चाहिए । बुद्धिमान मनुष्य को स्वयं कर मन में लगे रहकर अज्ञानी लोगों को सभी कार्यों में लगाए रखना चाहिए । विवेकानंद अपने अधिकार वाज के दोष भाषण में गीता केशिश लोग का हवाला देते हुए कहते हैं, पुरातनकाल कि ऋषियों के प्रति मेरी असीम श्रद्धा होते हुए भी मैं उनकी लोग शिक्षा पद्धति की आलोचना किए बिना नहीं रह सकता । उन्होंने सर्वदा ही लोगों को कुछ नियमों का पालन करने के लिए आदेश दिए और उन्होंने जानबूझकर उनका कारण ना बतलाया था । ये पद्धति नितांत दोषपूर्ण थी और इससे उद्देश्य की पूर्ति हुई नहीं । केवल लोगों के सिर पर निरर्थक बातों का बोझ साल लग गया । लोगों से उद्देश्य को छिपा रखने का उन का कारण ये था कि यदि उन लोगों को उसका अर्थ समझा भी दिया जाता तो भी वहाँ समझ नहीं सकते क्योंकि वे उसके अधिकारी नहीं अधिकारवादी । इन समर्थकों ने इस महान सकती की उपेक्षा कर दी की मनवा आत्मा की शमता सीम है । प्रत्येक मनुष्य ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हैं । यदि शिक्षा उसे उसकी ग्रहण शक्ति के अनुसार शिक्षा दी जाएगी । यदि कोई शिक्षा किसी को कुछ समझा नहीं सकता तो उसको स्वयं अपनी ही योगिता पर होना चाहिए कि वह लोगों को उनकी ग्रहण शक्ति के अनुसार शिक्षा नहीं दे पाता, बजाय इसके कि वहाँ उन लोगों को कैसे को से और कहीं की तुम लोग अज्ञान और कुसंस्कार के बीच पडे सडते रहो । क्योंकि उच्चतर ज्ञान तुम लोगों के लिए नहीं है । निर्भयता पूर्ण सत्य की घोषणा करो, ये ना हो कि इससे कमजोर भी वाले भ्रम में पड जाएंगे । सवर्ण चाहते ही नहीं देखी शूद्र वर्ण व्यवस्था में होंगी, जमा ही नहीं । नहीं धोबी, लोहार, तरखान सभी मेहनतकश अछूत थे । आज भी है । शास्त्र की विद्या प्राप्त करें एक लडकी ने अपने ही प्रयास से धनुष विद्या सीख ली थी तो द्रोणाचार्य ने गुरूदक्षिणा के नाम पर उसके दाहिने हाथ का अंगूठा कटवानी । वे तो चाहते थे कि मेहनत कर जनता ब्रह्म भ्रांतियों और आदिम कुसंस्कारों में बडी देवी देवताओं की पूजा करती रहे । श्री कृष्णा फिर कहते हैं यानि तुम ग्यानी भी हो तब भी अज्ञानियों के बाद सुलभ विश्वास को मध्य दिखाओ । जो लोग अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वस्तुतः मेरी पूजा करते हैं । शूद्रों के लिए पश्चिम तू लिया बिना सोचे समझे कर्म करते रहने का ही उद्देश्य । हालांकि सवर्णों के अपने सब कम से कम होते थे । उठो और युद्ध कर कहने के साथ ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन के दोनों हाथों में लड्डू थमा दिए । जीतेजी राज और मरने पर स्वर्ग लेकिन शूद्रों के लिए निष्काम कर्म सिर्फ काम कर जो करते हुए कि निर्मित करते थे, के रूप में क्या जाता है, वहीं कर्म के बंधनों का नाश कर सकता है । शूद्रों से कहा जाता है कर्म करने ही का अधिकार तुम्हें है उसके फल का नहीं । दरअसल कर्म का फल उनके लिए था ही नहीं तो संसार के दुख सुख की परवाह न करके निष्काम भाव से कर्म करें । उनकी तो भक्ति भी निष्काम होनी चाहिए । दुख इस जगत में अवश्य है किन्तु इस कारण में ईश्वर को प्रेम करना नहीं छोड सकता । मैं उसकी उपासना इसलिए नहीं करता कि वहाँ मेरे दुख को हर्ले । मैं उसको इसलिए प्रेम करता हूँ कि वहां साक्षात प्रेम प्रेम को भी तर्कबुद्धि से परेश्वर की तरह मूर्ति बना दिया । दुख और कष्ट तो मनुष्य के पिछले कर्मों का दंड है । मोहमाया से कर्म और दुख से मुक्त हो जाने के लिए वहाँ कर भी निष्काम भाव से करें और प्रभु भक्ति विदेश कम भाव, उसे ज्ञान की अपने कर्म और उसके फल को समझने की जरूरत ही क्या है? अमेरिका पहुंचने के बाद विवेकानंद ने बीस अगस्त अठारह सौ को हाला सिंगा पेरूमल के नाम पत्र में लिखा था, पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं जो हिन्दू धर्म के समान इतने उच्च स्वर में मानवता की गौरव का उपदेश करता हूँ और पृथ्वी पर ऐसा कोई घर में नहीं है जो हिन्दू धर्म के समान गरीबों और नित जाती वालों का गला ऐसी क्रूरता से खोलता हूँ । प्रभु ने मुझे दिखा दिया है कि इसमें धर्म का कोई दोष नहीं, पर हम दोष उनका हैं । जुट होंगी और दम भी है, जो परमार्थिक और व्यवहारिक सिद्धांतों के रूप में अनेक प्रकार से अत्याचार के अस्त्रों का निर्माण करते हैं । ये अत्याचार के स्तरों का निर्माण करने वाले विदेशी शासकों से मिलकर भारत की उस श्रमजीवी जनता को चूस रहे थे, जिसे विवेकानंद ने अपने देश भ्रमण के दौरान जिंदगी का एक एक दिन भूमियों पर गिनते देखा था । अमेरिका में भी यह भयंकर दृश्य उनकी दृष्टि में था और वे इस लंबे पत्र को जारी रखते हुए आगे लिखते हैं, उसकी नींद किसी तरह से टूटती ही नहीं । साडियों के अत्याचार के फलस्वरूप जो पीडा, दुख हीनता, दरिद्रता की आप भारत गगन में पूछ रही है, उससे उनके सुक्कड जीवन को कोई जबरदस्त आघात नहीं लगता । युगों की जिस मानसिक, नैतिक और शारीरिक अत्याचार ने ईश्वर की प्रतिमा रूपी मनुष्य को भारवाही पशु भगवती की प्रतिमा रूपी नी, रमणी को संतान पैदा करने वाली दासी और जीवन को अभिशाप बना दिया है, उसकी वे कल्पना भी नहीं कर पाते । आम लोगों में वेदांत दर्शन को उपनिषद्, महाभारत तथा पुराणों की कथाओं द्वारा प्रचारित प्रसारित किया गया । नमूने की कथा देखिए, जिसका विवेकानंद ने ज्ञानयोग पर प्रवचन में प्रयोग किया । एक समय एक संन्यासी किसी पेड के नीचे बैठता था और लोगों को पढाया करता था । वहाँ केवल दूध पीता, ओवर फल खाता और संघीय प्राणायाम क्या करता है था । अपने को बहुत पवित्र समझता था । उसी गांव में एक कुलटा स्त्री रहती थी । प्रतिदिन सन्यासी उस तरी के पास ज्यादा और उसे चेतावनी नेता की उसकी दृष्टता उसे नरक में ले जाएगी । विचार इस्त्री अपने जीवन का ढंग नहीं बदल पाती थी क्योंकि वही उसकी जीविका का एकमात्र उपाय था । फिर भी वहाँ भयंकर भविष्य की कल्पना से सहम जाती थी । जिसे सन्यासी ने उनके समक्ष चित्रित किया था, वो हर होती थी और प्रभु से प्रार्थना करती थी कि वह उसे शमा करें । आखिर एक दिन मस्ती और सन्यासी दोनों ही मारे, स्वर्गदूत आएँ और स्त्री को स्वर्ग ले गए । जबकि सन्यासी को यमदूतों ने पकडा । वहाँ लाया ऐसा क्यों? क्या मैंने पवित्र जीवन नहीं बताया और लोगों को पवित्र होने की शिक्षा नहीं दी । मैं नरक में क्यों ले जाया जा हूँ? जबकि यह कुलटा स्त्री स्वर्ग में ले जाई जा रही है । हमने उत्तर दिया वहाँ पवित्र कार्य करने के लिए विवस थी, पर उसका मन सदैव ईश्वर में लगा रहता था और वह मुक्ति मांग की थी । जब उसे मिली है किन्तु इसके विपरीत तुम यद्यपि पवित्र कार्य ही करते थे और केवल आपका विचार करते थे और अब तुम्हें उसी स्थान को जाना पड रहा है जहाँ केवल पाप ही पाप है । अब इस कथा का विश्लेषण कीजिए । पहली बार यह थक मानवता का गौरव गान करने वाले समाज में कोई भी स्त्री शरीर बेचने, ऐसा घृणित कार्य करने के लिए विवश क्यों? दूसरे वैश्यावृत्ति शोषण की व्यवस्था का अभिन्न अंग है । इसलिए उसे हटाने का प्रयास करने के बजाय शरीर भेजने वाली विवश कुलटा स्त्री को उसे ही क्या, सभी उत्पीडित तथा शोषित श्रमजीवियों को सांत्वना दी गई कि तुम्हारा कार्य कितना ही ग्रंाट और कष्टदायक हो, तुम उसे निष्काम भाव से करते रहो और प्रभु में मन लगाए रहो तो तुम स्वर्ग में जियो । तीसरे नाशिक देखो ना शुभ सुनो ना शुरू बोलो अर्थात बडे आदमियों की दृष्टता पर ध्यान मत दो वरना तुम दूध पीने और फल खाने और पवित्र कहलानेवाले संन्यासी की तरह नरक में जाओगी, जहाँ सिर्फ पाप ही पाप है । चौथे हाँ विवेकानन्द स्वर्ग नरक को सुख सुविधा प्राप्त धनी वर्ग की कल्पना मात्र मानते हैं । इसका प्रयोजन यह है कि एक तरफ चरित्र जन को ये आश्वासन दिया जाता है कि पवित्र बनाया हूँ तब तक जन्म मरण के बंधन से मुक्त होकर स्वर्ग जाओ और दूसरी तरफ कहीं असंतुष्ट होकर उपद्रव या विद्रोह ना करें । इसलिए नरक का भय दिखाया जाता है । देख पराई चोपडी मत । तार साओजी रूखी सूखी खाये की ठंडा पानी पी अपने लिए और निम्न वर्ग के लिए नैतिकता के मापदंड अलग अलग थी । महाभारत और रामायण की बडी महिमा है । निश्चित रूप से न सिर्फ भाषा और साहित्य के विकास में बल्कि समाज गठन में उन का बहुत बडा योगदान है और ये दोनों वहाँ का भी हमारी अमूल्य संस्कृति है । लेकिन इनका आधार विधान प्रदर्शन है और इनके द्वारा वहीं दोहरी नैतिकता प्रचारित प्रसारित हुई है । विश्लेषण के लिए महाभारत के मुख्य बात धर्म पूछ रही दृष्टिहीनो लीजिए । कहते हैं कि उसने आजीवन कभी झूठ नहीं बोला । इसलिए वहाँ सिर्फ स्वयं शरीर स्वर्ग में गया बल्कि अपने भाइयों और कुत्ते तक को साथ ले गया । लेकिन जब कुरुक्षेत्र में पांडवों पर संकट आया था और झूठ बोले बिना द्रोणाचार्य की हत्या संभव नहीं थी तब श्रीकृष्ण षड्यंत्र रचा । धर्मपुत्र युधिष्टिर से कहलवाया था अश्वशक्ति महातेजा नरोवल कंजरूर अर्थात् अश्वत्थामा मारा गया । जब मिनिस्टर ने इतना कहा तो शेष भाग मैं नहीं जानता कि वहाँ नर था या पशु शंकर घडियाल बजाकर कोलाहल में दबा दिया गया । जब युधिष्ठिर को मालूम था कि अश्वत्थामा नाम के हाथ की हत्या, षड्यंत्र को सफल बनाने की नियति ही से की गई तो क्या धर्मपुत्र इसमें सहयोगी नहीं बना? श्रीकृष्ण द्वारा इस्तेमाल नहीं हुआ । फिर कौन सी नैतिकता है? कौन सा असत्याचरण हैं वही इनके महाकवि तुलसी की बात समझत को नहीं । दोष गुसाई अब लीजिए रामायण की बात । कहते हैं कि दशरथ ने राम का राज्याभिषेक करने के लिए प्रजा से अनुमति प्राप्त की थी । अगर प्रजा की बात का इतना ही सम्मान था तो उसे एक के कई के विरोध पर रद्द क्यों कर दिया गया? दूसरे आदर्श चरित्र राम ने बडा त्याग किया । पिता की बात रखने के लिए गड्डी ठुकरा दी । भारत ने भी बडा त्याग किया कि उस पर खुद बैठने के बजाय बडे भाई की खडा रख दी । सवाल यह हैं त्याग किसने किस के लिए? क्या गड्डी किसी धोबी या तार खान के पास चली नहीं गई? दशरत के बेटों में ही रही प्रजा पर उन्हीं का दुशासन रहा । तीसरे दशरथ ने जब राम को राजा बनाने के लिए प्रजा की राय पूछी थी । अगर प्रजा राम के नाम की मंजूरी ना देकर अपने में से किसी सुबह और सुयोग्य व्यक्ति का नाम लेती तो क्या उसे राजा बना दिया जाएगा? विवेकानंद लिखते हैं, प्रजा को करुंगा हनी राजेगार में मतदान मत प्रकट करने का अधिकार ना हिंदू राजाओं के समय में था ना बहुत शासकों के समय । यद्यपि महाराजा युधिष्ठिर वारणावत में वैश्विक और शुद्रों के घर गए थे । अयोध्या की प्रजा ने श्रीरामचंद्र को युवराज बनाने के लिए प्रार्थना की थी । सीधा के वनवास तक के लिए छिप छिपाकर सलाह भी की थी तो भी प्रत्यक्ष रूप से किसी स्वीकृत राज्य नियम के अनुसार प्रजा किसी विषय में नहीं खोल सकती थी । वो अपने सामर्थ्य को अप्रत्यक्ष और अव्यवस्थित रूप से प्रकट किया करती नहीं । शक्ति का ज्ञान उस समय भी उसे नहीं था जिस कौशल से छोटी छोटी शक्तियां आपस में मिलकर प्रचंड बाल संग्रह करती है । उनका भी पूरा अभाव था और लिखा है इसमें कोई संदेह नहीं कि ग्रामपंचायतों में गणतांत्रिक शासन पद्धति का बीज अवश्य था और अब भी अनेक सीनों में हैं । पर वहाँ भी जहाँ बोया गया वहाँ अंकुरित नहीं हुआ । यह भाग गांव की पंचायत को छोडकर समाज तक बढ ही नहीं सका । वर्तमान भारत नाम की जिस लीक्स योद्वा रन लिए गए हैं वहाँ विवेकानंद ने अठारह सौ में लिखा था और उत्कृष्ट बांग्ला साहित्य में इसका प्रमुख स्थान है । पहले में आदर्शवादी दृष्टि से बुद्ध और इसका सही के व्यक्तियों को इतिहास बनाने वाले मानते थे, पर इस लेख में वह कितना बदल गए, उसका प्रमाण लीजिए लिखा है । समाज का नेतृत्व चाहे विद्या बाल से प्राप्त हुआ हो, चाहे बाहुबल से या धनबल से, पर शक्ति का आधार प्रजा ही है । शासक समाज इतना ही शक्ति के आधार से अलग रहेगा, उतना ही वहाँ दुर्बल होगा । परन्तु माया की ऐसी विचित्र लिया है, जिनसे परोक्ष रीति से छलबल कौशल के प्रयोग से अथवा प्रतिग्रह द्वारा शक्ति प्राप्त की जाती है । उन्हीं की गणना शासकों के निकट शीघ्र समाप्त हो जाती है । जब पुरोहित शक्ति ने अपनी शक्ति के आधार प्रजा वर्ग जैसे अपने को संपूर्ण अलग किया, तब प्रजा की सहायता पाने वाली उस समय की राजशक्ति ने उसे पराजित किया । फिर जब राजशक्ति ने अपने को संपूर्ण स्वाधीन समझकर अपने और अपनी प्रजा के बीच में गहरी खाई खोद डाली, तब साधारण प्रचार की कुछ अधिक सहायता पाने वाले वैश्विक खुलने राजाओं को या तो नष्ट कर डाला या अपने हाथ की कठपुतलियां बनाया । इस समय वैश्विक कुल अपनी स्वार्थ सिद्धि कर चुका है, इसलिए प्रजा की सहायता को अनावश्यक समझ वहाँ अपने को प्रजा वर्ग से अलग करना चाहता है । यहाँ शक्ति की भी मृत्यु का बीज बोया जा चुका है । ऐतिहासिक भौतिकवाद की दृष्टि से जनसाधारण ही इतिहास के निर्माता है । सभी क्रांतियों के पीछे मूल शक्ति वही रही है, लेकिन क्रांति के फल को एक के बाद दूसरी शोषक वर्ग ने हथिया लिया । विवेकानंद ने भी यही लिखा है और प्रारंभिक साम्यवाद के बाद वर्ग विभाजित समाज के दासियों, सामग्रियों और पूंजीपति युग को विद्याभवन, बाहुबल तथा धनबल के युग कहकर कितनी सम्मेत व्याख्या की है कि वैश्विक मिलने भी अपने को प्रजा वर्ग से अलग कर लिया है और परिणाम ये हैं की शक्ति की भी मृत्यु का बीज बोया जा चुका है । पूंजीवाद अपनी प्रगतिशील भूमिका अदा कर के साम्राज्यवाद में बदल चुका था । लेनिन ने साम्राज्यवाद पूंजीवाद का अंतिम चरण ऍम उन्नीस सौ सोलह में लिखा था, जिसमें उन्होंने जेईई हॉप सिंह की अंग्रेजी पुस्तक साम्राज्यवाद से मदद ली थी और उच्चतम चरण को पूंजीवाद की मृतप्राय अवस्था बताया था । क्या विवेकानंद ने हॉप्स इन और लेने से पहले ही अठारह सौ में साम्राज्यवाद के बारे में सही भविष्यवाणी नहीं की थी? क्या उन के प्रथम कोटि का भविष्य वह रस्ता विचार खोनी में कुछ संदेह है । क्या किसी धर्म प्रचारक द्वारा यह भविष्यवाणी संभव है? विवेकानंद आगे लिखते हैं, साधारण प्रजा सारी शक्ति का आधार होने पर भी उसने आपस में इतना भेद कर रखा है कि वहाँ में सब अधिकारों से वंचित है और जब तक ऐसा भाव रहेगा तब तक उसकी यही दशा रहेगी । साधारण कष्ट घृणा या प्रति आपस में सहानुभूति का कारण होती है । जिन नियम से हिंसक पशु दल बंद हो, शिकार करते करते हैं, उसी नियम से मनुष्य भी मिलकर रहते हैं तथा जाती या राष्ट्र का संगठन करते हैं । स्वार्थी स्वार्थ त्याग का पहला शिक्षक व्यक्ति के स्वार्थ की रक्षा के लिए ही समझती के कल्याण की ओर लोगों का ध्यान जाता है । स्वजाति के स्वार्थ में अपना स्वार्थ है और स्वजाति के हित में अपना है । बहुत से काम कुछ लोगों की सहायता के बिना किसी प्रकार नहीं चल सकते, आत्मरक्षा तक नहीं हो सकती । स्वार्थ रक्षा के लिए यह सहकारिता सब देशों और जातियों में पाई जाती है पर इस स्वार्थ की सीमा में खेलते हैं । भारत की वर्तमान प्रणाली में कई दोस्त हैं पर साथ ही कहीं बडे गुड भी है । सबसे बडा गुण तो ये है कि सारे भारत पर एक ऐसे शासक यंत्र का प्रभाव है, जैसा इस देश में पाटलिपुत्र साम्राज्य के पतन की बात कभी नहीं हुआ । वैश्य अधिकार की जिस चीज ना से एक देश का माल दूसरे देश में लाया जाता है, उसी चीज का के फलस्वरूप विदेशी भाव भी भारत की अस्थि मज्जा में बलपूर्वक प्रवेश पा रहे हैं । इन भावों में कुछ तो बहुत लाभदायक है । कुछ हानिकारक और कुछ इस बात के परिचायक है कि विदेशी लोग इस देश का यथार्थ कल्याण करने में आगे विदेशी साम्राज्यवादी शासन के गुण, दोषियों का कितना समय तथा सुंदर विवेचन । यह विवेचन वेदान्त दर्शन द्वारा नहीं, ऐतिहासिक भौतिकवाद द्वारा ही संभव है । रामकृष्ण परमहंस ने जिन अंग्रेजी शासकों को सिर्फ गोरी जाति के रूप में देखा था, विवेकानंद ने इंग्लैंड में रहकर उनके साम्राज्यवादी चरित्र को और भारत में उनकी भूमिका को भलीभांति समझ लिया जाए और लिखा है, परन्तु अंग्रेजों की मन में यह धारणा होने लगी है कि भारत साम्राज्य यदि उनके हाथों से निकल जाए तो अंग्रेज जाति का विनाश हो जाएगा । इसलिए भारत में इंग्लैंड का अधिकार किसी किसी प्रकार जमाए रखना होगा और इसका प्रधान उपाय अंग्रेज जाति का गौरव भारतवासियों के हृदय में सादा जागृत रखना समझा गया है । इस वृद्धि की प्रबलता और उसके अनुसार चेष्टा की अधिकारिक वृद्धि देखकर हर्ष और खेल दोनों होते हैं । मैकाले की शिक्षा प्रणाली इसाई मिशनरियों और रूडयार्ड किपलिंग सरीके कवियों तथा लिख को द्वारा अंग्रेज जाति के इसी गौरव को भारतवासियों के हृदय पर अंकित करने, उन्हें कालिदास और कबीर की परंपरा से तोडकर मेल्टन और शेक्सपियर की परंपरा से जोडने का और यहाँ बचाने का भरसक प्रयास किया गया कि गोरे प्रभु हम काले जंगलियों को सभ्य बनाने के पवित्र मिशन पर सात समुद्र पार से आए हैं । अंग्रेज अपने इस प्रयास में काफी हद तक सफल हुए और परिणाम यह निकला कि हम उसका दंड उनके चले जाने के तीस बरस बाद भी भुगत रहे हैं और उनकी औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली द्वारा हमारा अब भी बराबर भारतीयकरण हो रहा है । विवेकानंद उसी वर्तमान भारत लेख में आगे लिखते हैं, ऊपर कहा जा चुका है कि परदेशियों के संपर्क से भारत धीरे धीरे जाग रहा है । थोडी सी जागृति के फलस्वरूप स्वतंत्र विचार का थोडा बहुत उदय भी होने लगा है । एक और आधुनिक बादशाह के विज्ञान है जिसका शक्ति संग्रह सबकी आंखों के सामने उसे प्रमाणित कर रहा है और जिसकी चमक सैकडों सूर्यों की ज्योति की तरह आंखों में चकाचौंध पैदा कर देती है । दूसरी ओर हमारे पूर्वजों का पूर्व वीरे असाधारण प्रतिभा और देवदुर्लभ अध्यात्म तत्व कि वे कथाए हैं, जिन्हें अनेक स्वदेशी और विदेशी ने प्रकट किया है । जो युग युगांतर की सहानुभूति के कार्य समस्त समाज, शरीर में जल्दी दौड जाती है और बाल तथा आशा प्रदान करती है । हमारे अतीत में दोष नहीं, गुण भी हैं बल्कि गुण अधिक हैं । कोई व्यक्ति सिर्फ गुणों से ही नहीं, अपने दोस्तों से भी महान बनता है । इसी प्रकार राष्ट्रपति कौन है और दोनों दोनों से महान बनता है । हमें अपने पुरखों के गुणों से तो सीखना ही सीखना है, दोषियों से भी सीखना है । वर्ग विभाजन के बाद यहाँ व्यक्तिगत संपत्ति द्वारा अध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक समृद्धि भी आई । हमारी तेज माला हमारी विलक्षण कल्पनाशक्ति का प्रमाण है । वास्तु करा चित्रकला, साहित्य, संगीत, नृत्य, त्यागी सभी ललित तलाव का बहुत विकास हुआ । वेद, उपनिषद, कपिल का सांख्य शास्त्र, गौतम का न्यायशास्त्र, व्यास का मिमांसा, रामायण, महाभारत, चाणक्य नीति, शुक्रनीति, मनस्मृति, पंचतंत्र, कथा, सरित्सागर, अजंता एलोरा और ताजमहल इत्यादि हमारे हजारों साल के वर्ग विभाजित समाज की देन है । कल्पना कीजिए ये सब कितनी बडी साधना का फल है । विवेकानंद भारत का ऐतिहासिक क्रमविकास लेख में अपने इस महान ईद पर गर्व करते हुए लिखते हैं विश्लेषणात्मक शक्ति एवं काव्य दृष्टि की निर्भरता ये ही हिन्दू जाति के निर्माण की दो अंतरवर्ती शक्तियां है जिन्होंने इस जाती को आगे बढने की प्रेरणा दी है । ये दोनों मिलकर मानव राष्ट्रीय चरित्र के मुख्य स्वर्ग हो गए । इनका सहयोग इस जाती को सदा इंद्रियों से परे ले जाने के लिए प्रेरित करता है । वहाँ उनके उस गंभीर चिंतन का रहते है जो उनके श्री पीओ द्वारा निर्मित इस्पात की उस छोरी की भर्ती है जो लोहे का छड काट सकती थी । हिंदू यहाँ इतनी लचीली थी कि उसे वृत्ताकार मोडा जा सकता था । सोने चांदी में भी उन्होंने कविता डाली मणियों का कुछ संयोजन संगमर्मर में चमत्कारपूर्ण कौशल, रंगों में रागिनी महीन पर जो वास्तविक संसार की अपेक्षा स्वप्न लोग का अधिक प्रतीत होता है । इन सब के पीछे किसी राष्ट्रीय चरित्र की अभिव्यक्ति के सहस्त्रों वर्षों की साधना निहित है । कला एवं विज्ञान यहाँ तक कि पारिवारिक जीवन के तथ्य भी काव्यात्मक भावों से परिवेश ठीक है जो सीमा तक आगे बढ जाते हैं कि ेंद्रीय अतीन्द्रिय का स्पर्श करले स्कूल यथार्थता भी अयथार्थ ताकि गुलाबी आभार से अनुगूंजित हो जाये । अंग्रेज शासकों द्वारा हमें अपनी इस महान सांस्कृतिक परंपरा से तोडने का हमारे भारतीय करन का जो प्रयास किया गया, उस पर विवेकानन्द ने भारत का भविष्य में योग प्रकाश डाला है । यह शिक्षा केवल तथा संपूर्ण तथा निषेधात्मक है । निषेधात्मक शिक्षा या निषेध की बुनियाद पर आधारित शिक्षा मृत्यु से भी भयानक है । कोमल मति बालक पाठशाला में भर्ती होता है और सबसे पहली बात जो से सिखाई जाती है वहाँ यहाँ कि तुम्हारा बात मूर्ख है । दूसरी बार जो सीखता है वह यह है कि तुम्हारा दादा पागल है । तीसरी बात यह है कि तुम्हारे जितने शिक्षक और आचार्य है, पाखंडी है । और चौथी बात ये कि तुम्हारी जितने पवित्र धार्मिक ग्रंथ है, उनमें छूटी और कपूल कल्पित बातें भरी है । इस प्रकार वहाँ निषेध हो कि खान बन जाता है, उनमें न जान रहती है और नागरिक शिक्षा का मतलब ये नहीं कि तुम्हारे दिमाग में ऐसी बहुत सी बातें इस तरह ठूस दी जाए कि अंदर बंद होने लगे और तुम्हारा दिमाग उन्हें जीवन भर पचाना । तीन जनवरी अठारह सौ को विवेकानंद ने शिकागो से जस्ट सुब्रमण्यम के नाम पत्र लिखा था । भारत की शिक्षित समाज से मैं इस बात पर सहमत हूँ कि समाज का मूल परिवर्तन करना आवश्यक है । पर ये किस तरह किया जाए? सुधारकों की सब कुछ नष्ट डालने की रीति व्यर्थ सिद्ध हो चुकी है । मेरी योजना ये है । हमने अतीत काल में कुछ बुरा नहीं किया । निश्चय ही नहीं क्या हमारा समाज खराब नहीं बल्कि अच्छा है । मैं केवल चाहता हूँ कि अब तक जो तुमने किया तो अच्छा ही किया । अब इस समय और भी अच्छा करने का मौका आ गया है । खत्म लंबा है । इसमें आपने वेदांत दर्शन द्वारा वर्ण व्यवस्था की व्याख्या उन्होंने योगी है । जात पात की ही बात लीजिए । संस्कृत में जाती का अर्थ है वर्ग या श्रेणी विशेष । यह सृष्टि के मूल ही में विद्यमान हैं । विभिन्न वेदों में इस प्रकार की बात पाई जाती है । सृष्टि के पूर्व में एकत्व रहता है अर्थात जाती का है । श्रृष्टि सृष्टि हुई कि वैविध्य शुरू हुआ । यदि यहाँ विविधता समाप्त हो जाए तो सृष्टि ही का लोग हो जाएगा । जब तक कोई जाती शक्तिशाली और क्रियाशील रहेगी तब तक वहां विविधता अवश्य पैदा करेगी । जो ही उसकी ऐसी विविधता का उत्पादन करना बंद कर दिया जाता है, क्यों ही वहाँ जाती नष्ट हो जाती है । जाती का मूल अर्थ था प्रत्येक व्यक्ति की अपनी प्रकृति को अपने विशेषत को प्रकाशित करने की स्वाधीनता और यही और हजारों वर्ष तक प्रचलन भी रहा । आधुनिक शास्त्र ग्रंथों में भी जाती होगा । आपस में खाना पीना निषेद नहीं हुआ है और न किसी प्राचीन ग्रन्थ में उनका ब्याह शादी करना मना है । तो फिर भारत के आधा पतन का कारण क्या था? जाति संबंधी इस भाव का त्याग जैसे गीता कहती है, जाती नष्ट हुई कि संसार भी नहीं हुआ । अब क्या यह सत्य प्रतीत होता है? किस विविधता का नाश होते ही जगत का भी नाश हो जाएगा? आजकल का वर्ग विभाग यथार्थ में जाती नहीं है, बल्कि जाती की प्रगति में वहाँ एक रुकावट है । वास्तव में उसने सच्ची जाती अथवा विविधता की स्वच्छता को रोक दिया है । मतलब ये हैं कि जब तक हमारा राष्ट्र प्रगति के पथ पर अग्रसर रहा जाती, गुडगाँव बनी रही और प्रत्येक व्यक्ति की अपनी प्रकृति के प्रकाशित होने की विकास प्रक्रिया भी निरंतर जारी रही, पर जब विदेशी आक्रमणकारियों के हस्तक्षेप से राष्ट्र की प्रगति वृद्ध हुई तो जाती गुड घटना रहे कर जन्मगत अथवा वंशगत बन गई । उसने रूट वर्ण व्यवस्था का रूप धारण किया और यही बात हमारे अधःपतन का कारण बनी । अत्यंत आगे लिखा है, हमारा जातीय प्रासाद अभी अधूरा ही है । इसलिए सबकुछ भद्दा दिख पड रहा है । साडियों के अत्याचार के कारण हमें प्रासाद निर्माण का कार्य छोड देना पडा था । अब निर्माण कार्य पूरा कर लीजिए । सब कुछ अपनी अपनी जगह पर सजा हुआ सुंदर दिखाई देगा । यही मेरी समस्त कार्य योजना है । मैं इसका पूरा कायल हूँ । अब देखिए तीस मई अठारह सौ को अर्थात दो बरस बाद उन्होंने परमदास मित्र के नाम अल्मोडा से लिखे पत्र में अपनी इस कार्ययोजना और वेदांत दर्शन की व्याख्या इस प्रकार की है इसके अतिरिक्त मेरी विचारधारा में बहुत विकृति आ गई । स्वीकृति में व्यंग्य ध्वनि है क्योंकि विकृति प्रमदा दास मित्र के ख्याल से थी । वास्तव में यहाँ विकास था । मैं निर्गुण पूर्ण ब्रह्मा को देखता हूँ । यदि वे ही व्यक्ति ईश्वर के नाम से पुकारे जाए तो मैं इस विचार को ग्रहण कर सकता हूँ परन्तु बौद्धिक सिद्धांतों द्वारा परिकल्पित विधाता आदि की ओर मन आकर्षित नहीं होता । ऐसा ही ईश्वर मैंने अपने जीवन में देखा है और उनके आदर्शों का पालन करने के लिए जीवित हो । अभिप्राय रामकृष्ण परमहंस से है । स्मृति और पुराण सीमित बुद्धि वाले व्यक्तियों की रचनाएं हैं और भ्रम, त्रृटि, प्रमाण भेज तथा द्वेष वृद्धिमान हैं । ग्रहण करने योग्य है । शेष सब कत्या कर देना चाहिए । उपनिषद और गीता सच्चे शास्त्र है और राम, कृष्ण, बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर आदि सच्चे अवतार हैं क्योंकि उनके हृदय आकाश के समान विशाल थे और इन सब में श्रेष्ठ है रामकृष्णा, रामानुजन, शंकर इत्यादि । संकीर्ण हृदय वाले केवल पंडित मालूम होते हैं । वहाँ प्रेम कहा है । वहाँ विजय जो दूसरों का दुख देखकर प्रवित, पंडितों का शिष्ट विद्या विमान और जैसे जैसे केवल अपने आप को मुक्त करने की इच्छा परन्तु महाशय क्या यह संभव है? क्या इसकी कभी संभावना थी या हो सकती है? क्या है भाव? कल पांच भी रहने से इसी चीज की प्राप्ति हो सकती है । मुझे बडा विभेद और दिखाई देता है । मेरे मन में दिनों दिन विश्वास बढता जा रहा है कि जाती भाव सबसे अधिक भेद उत्पन्न करने वाला और माया का मूल है । सब प्रकार का जाती भेज चाहे वह जन्मगत को या गुड गठ बंधन नहीं है । कुछ मित्र ये सुझाव देते हैं । सच है मन में ऐसा ही समझो परंतु बाहर व्यवहारिक जगत में जाती जैसे भेजो को बनाए रखना उचित है । विवेकानंद समझौते की कायल नहीं थे । जब तक जाती कि गुंजत आधार को सही समझा, तब तक उसकी व्याख्या उसी दृष्टि से की और जब ये समझ लिया की गुणवत् मान लेने में भी दोष है तब जाती मनुष्य मनुष्य में भेड का कारण है । तब वे उपनिषदों और गीता की बात भी भूल गए । उन्हें किसी शास्त्र का प्रमाण प्रिया ना था । राष्ट्रीय एकता प्रिया थी । अतोएव लिखा है मन में एकता का भाव कहने के लिए उसे स्थापित करने की कातर, निर्वाह, चेष्टा और ड्रामा जगत में राक्षसों का नरक मृत्य अत्याचार और उत्पीडन, निर्धनों के लिए साक्षा की हमराज परन्तु यदि वही अछूत काफी धनी हो जाए तो अरे! वहाँ तो धर्म का रक्षा धर्म के ठेकेदारों, जांच पांच के समर्थकों की पाखंड व्यक्ति को विवेकानंद ने अब बखूबी समझ लिया था । धर्म के विधि निशेल में अपनी को लीनता की रक्षा और भक्ति मुक्ति में उनके वर्ग स्वार्थ को भी भलीभांति देख लिया था । इन्हीं लोगों ने विवेकानंद पर विदेश में मालिक शो का खान पान अपनाने का आरोप लगाया था । वे उनके इस छिछले आरोप का उत्तर देते हुए लिखते हैं, सबसे अधिक अपने अध्ययन से मैंने यह जाना कि धर्म के विधि निषेध आदि नियम शुक्र के लिए नहीं है । यदि वहाँ भोजन में या विदेश जाने के कुछ विचार दिखाए तो उसके लिए वहाँ सब व्यर्थ है । केवल निरर्थक परीक्षण । मैं शूद्र हूँ, मलेच्छ हूँ इसलिए मेरा इस सब झंझटों से क्या संबंध? मेरे लिए मालिक का भोजन हुआ तो क्या और शूद्र का हुआ तो क्या पुरोहितों की लिखी हुई पुस्तकों में नहीं, अपने पूर्वजों की कार्य का फल पुरोहित को भोगने दो । मैं तो भगवान की वाणी का अनुसरण करूंगा, क्योंकि मेरा कल्याण उसी में हैं । एक और शक्ति जिसका मैंने अनुभव किया है, वो ये है की नि स्वार्थ सेवा ही धर्म है और ब्रह्मा विधि अनुष्ठानादि केवल पागलपन है । यहाँ तक कि अपनी मुक्ति अभिलाषा करना भी अनुचित हैं । मुक्ति केवल उसके लिए एज दूसरों के लिए सर्वस्व त्याग देता है, परंतु वे लोग जमीन मुक्ति की अहर्निश रट लगाए रहते हैं । वहाँ अपना वर्तमान और भावी वास्तविकता कल्याण नष्ट कर इधर उधर भटकते रह जाते हैं । ऐसा होते मैंने कई बार प्रत्यक्ष देखा है । विविध विषयों पर विचार करते हुए आपको पत्र लिखने का मेरा मन नहीं था । इन सब मतभेदों के होते हुए भी यदि आपका प्रेम मेरे प्रति पहले ही जैसा होता तो इससे बडे आनंद का विषय समझूंगा । अठारह सौ छियानवे में इन्हीं ब्रहमदास मित्र को विवेकानन् ने पूछे पास से संबोधित किया था और इस संबोधन की व्याख्या करते हुए उनकी विद्वता को श्रद्धांजलि अर्पित की थी, लेकिन अठारह सौ में ही प्रेमदास मित्र को विवेकानंद ने प्रिया महाशय से संबोधित किया और उनकी विद्वता पर व्यंग्यात्मक भाषा में कडा प्रहार किया । कारण ये कि शास्त्र वाकी के्रट लगाने और अपनी ही मुक्ति की चिंता करने वाले विद्वान तथा पूरोहित लोग अपने को होंगे की तरह विद्वता के खोल में बंद कर लेते हैं, बल्कि यहाँ कहीं की विकास क्रम की उल्टी प्रक्रिया द्वारा मनुष्य से कुछ मंडप में परिणत हो जाते हैं । लेकिन विवेकानंद ने जीवन सेवा और जीवों में भी देश की शोषित उत्पीडित जनता को जगाने, उठाने और आगे बढाने का प्राणांत प्रण ले रखा था । उनके लिए ज्ञान का अर्थ निर्जीव तथा शुष्क विद्वता बगाना नहीं, बल्कि राष्ट्र की तत्कालीन ज्वलंत समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना था । उनके समुख जंजीरों में जकडी भारत माता थी और था राष्ट्र का आधा पतन, जिसे देख उन्होंने आठ आठ आंसू बनाए थे । राष्ट्र से जुडकर विवेकानंद इतिहास से जुड गए थे । इससे उनकी विचारधारा एक और व्यक्तित्व का निरंतर विकास तेजी से हुआ था । छब्बीस सितंबर अठारह सौ अट्ठानबे को समाज के गुण दोषों को विस्तार से विश्लेषण करते हुए श्रीमती मृणालिनी बसु को एक लंबे पत्र में लिखा है, शिक्षा किसे कहते हैं? क्या वहाँ बटन मात्र हैं? क्या वहाँ नाना प्रकार का ज्ञानार्जन हैं? नहीं, ये भी नहीं । जिस संयम के द्वारा इच्छा शक्ति का प्रवाह और विकास वर्ष में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वहां शिक्षा कहलाती है । अब सोचो की शिक्षा क्या वह है जिसने निरंतर इच्छा शक्ति को बलपूर्वक पीढी दर पीढी रोककर नष्ट कर दिया है, जिसके प्रभाव से नए विचारों की बात ही जाने दो । पुराने विचार भी एक एक करके लोग होते चले जा रहे हैं । क्या वहाँ शिक्षा है जो मनुष्य को धीरे धीरे यंत्र बना रही है, जो स्वयं चालित यंत्र के समान सुकर्म करता है, जो उस की अपेक्षा अपनी स्वतंत्र इच्छा शक्ति और बुड्ढी के बाल से अनुचित कर्म करने वाला मेरे विचार से श्रेयस्कर हैं । जो मनुष्य मिट्टी के पुतले, निर्जीव यंत्र या पत्थरों के ढेर के सत्र खुश हो, क्या उनका समूह समाज के हिला सकता है? इस प्रकार का समाज कैसे उन्नत हो सकता है? यदि इस प्रकार कल्याण संभव होता तो सैकडों वर्षों से दास होने के बदले हम पृथ्वी का सबसे प्रतापी राष्ट्र होते और ये भारत मूर्खता की शान होने के बदले विद्या के अनंत स्रोत का उत्पत्ति स्थान होता तब के आत्मत्याग गुड नहीं है । बहुतों की सुख के लिए बलिदान करना क्या सर्वश्रेष्ठ पूर्ण कर्म नहीं है, अवश्य है । परन्तु बंगला कहावत के अनुसार क्या जिसने मांगने से रूप उत्पन्न हो सकता है, क्या धरने बांधने से प्रति होती है? जो सादा ही भिकारी है उसके त्याग से क्या गौरव जिसमें केंद्रीय बाल ना हो, उस केंद्रीय संयम में क्या गुण है जिसमें विचार का अभाव हृदय का भाव हो, उच्च अभिलाषा का भाव हो जिसमें समाज कैसे बनता है? इस कल्पना का भी अभाव हो उसका आत्मत्याग ही क्या हो सकता है? विधवा को बलपूर्वक सती करवाने में किस प्रकार से सतीत्व का विकास दिखाई पडता है? कुसंस्कारों की शिक्षा देकर लोगों से पूण्य कर्म क्यों कराते हो? मैं कहता हूँ मुक्त कर जहाँ तक हो सके लोगों के बंधन खोल दिए जाए क्या खीचड से कीचर धोया जा सकता है? क्या बंधन को बंधन से हटा सकते हो? ऐसा उदाहरण कहा । फिर वेदांत दर्शन की चर्चा के बाद अंत में लिखा है सप्रेम से कम उपासना पहले आती है । छोटे की उपासना से आरंभ करो, बडे की उपासना स्वयं आ जाएगी । मातम चिंतित मत हो, प्रबल वायु बडे वृक्ष से ही टकराती है । अग्नि को कुरेदने से वहाँ अधिक प्रज्वलित होती है । साफ मारने से पन उठाता है । यानि जब हृदय में पीडा उठती है जब शुरु की आंधी चारों ओर से घेर लेती है । जब मालूम होता है कि प्रकाश फिर कभी ना होगा । जब आशा और साहस कप रायन लूट हो जाता है तब इस भयंकर आध्यात्मिक तूफान में ब्रह्मा की अंतरज्योति चमक होती हैं । वैभव की गोद में पाला हुआ फूलों में पूछा हुआ जिसने कभी एक आंसू भी नहीं बढाया । ऐसा कोई व्यक्ति कभी बढा हुआ है, उसका अंतर नहीं । ब्रह्मा भाव कभी हुआ है, तुम होने से क्यों डरते हैं रोना ना छोडो रोने से नेत्रों में निर्मलता आती है और अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है । उस समय भील की दृष्टि मनुष्य, पश्चिम वृक्ष आदि धीरे धीरे लोग होने लगते हैं और सब सीनों में सब वस्तुओं में अनंत ब्रह्मा की अनुभूति होने लगती है । तब सामान पश्चिम ही सर्वत्र समाप्त स्थित मलेश्वरम ना ऍम अनाथ नाम ततो याति परांगत थी । सर्वत्र ही ईश्वर को संभाव से उपस् थित देखकर आत्मा को आत्म से हानि ना पहुंचाकर परमगति को प्राप्त करता है । विवेकानंद ने राष्ट्र के आधा पतन पर भारत माता को गुलामी की जंजीर में जकडी देखकर हमेशा आठ आठ आंसू बहाए । इस सेवन के नेत्रों में निर्मलता आई और वे सचमुच दूरदर्शी बन्दे चले । उन्नीस में जब मैं दोबारा विदेश यात्रा पर गए तो उन्होंने यूरोप यात्रा संस्मरण में भारत के उच्च वर्गों को संबोधित करते हुए लिखा, आर्य बाबा का दम भरते हुए चाहे प्राचीन भारत का गौरव गान दिन रात करते रहो और कितना भी डम डम कहकर गाल बचाओ तो मुझे भी जाती वाले क्या जीवित हो तुम लोग हो दस हजार वर्ष पीछे के मम्मी जिन्हें सचल शमशान कहकर तुम्हारे पूर्व पुरुषों ने घृणा की है । भारत में जो कुछ वर्तमान जीवन है, वहाँ उन्हीं में है और सचिन शमशान हो तुम लोग तुम्हारे घर द्वार म्यूजियम है तुम्हारे आचार व्यवहार, चाल चलन देखने से जान पडता है । बडी बीवी के मुझसे कहानियाँ सुन रहा हूँ तुम्हारे साथ प्रत्यक्ष वार्ता करके घर लौटा हो तो जान पडता है चित्रशाला में तस्वीर दिखाया भविष्य के तुम लोग शून्य एक लोग लू भूत भारत शरीर के रक्त मास हीन कंकाल कोई तुम लोग क्यों नहीं जल्दी थूली में परिणत हो, वायु में मिल जाते । तुम लोग शून्य में विलीन हो जाओ और फिर एक नवीन भारत निकल पडे । निकले हल्की मुठिया पकडे किसानों के झोपडे जाली मोझी महत्व रोकी झोपडियों निकल पडे बनियों की दुकानों से भुजवा के बाढ के पास से, कारखाने से हाथ से बाजार से निकले झाडियों, जंगलो, पहाडों, पर्वतों से इन लोगों ने सहस्त्र सहस्त्र वर्षों तक नीरव अत्याचार सहन किया है उससे पाई है पूर्व सहिष्णुता सिंहासन दुख उठाया उसने पाई है अटल जी वनशक्ति कठिन ये लोग मुट्ठी भर सकते खाकर दुनिया उलट दे सकेंगे आधी रोटी मिली तो तीनों लोग में इनका तेज नाते गा ये रक्तबीज के प्राणों से मुक्त है और पाया है सादा चार बजे जो तीनों लोगों में नहीं है इतनी शांति, इतनी फ्री पी इतना प्यार मेजबान रहकर इतना घटना और काम के वक्त सीख का विक्रम प्रतीत के काम काज समूह यही है तुम्हारे साल में तो महाराणा भूटिया फेंक दो इनके बीच जाओ सिर्फ कान खडे रहो तुम जोडी मिलियन होगे उसी वक्त सुनोगे कोट ईजी भूत बंदिनी ट्रैन लो क्या कम्पन कारिणी भावी भारत के उद्बोधन बनी वाह गुरु की पता है पर फिर दूर सदियों दूर इतिहास में झांकते हुए आगे लिखा है सोच कर देखो बात क्या है वे जो लोग किसान है वे कोरी जुला है, जो भारत के नगण्य मनीष है वी जाती विजीत स्वजाति निंदित छोटी छोटी चाह दिया है । वहीं लगातार चुपचाप कम कर दी जा रही है । अपने परिश्रम का फल भी नहीं पढ रही है । परन्तु धीरे धीरे प्राकृतिक नियम से दुनिया में कितने परिवर्तन होते जा रहे हैं । देश, सभ्यता तथा सत्ता उलट पुलट ते जा रहे हैं । ये भारत के श्रमजीवी हो तुम्हारे नीरव सादा ही निंदित हुए परिश्रम के फलस्वरूप पा बिल ईरान ऍम रिया ग्रीस रोम वेनिस जिनेवा बगदाद समरकंद स्पेंड पुर्तगाल फ्रांसीसी दिन एम आर डॉक्टर अंग्रेजी का क्रम मानवीय से अधिक बात हुआ और ऐश्वर्या मिला है और दो कौन सोचता है इस बात को स्वामी जी तुम्हारे पितृपुरुष दो दर्शन लिख गए दस का भी तैयार कर गए हैं । इस मंदिर आ गए हैं और तुम्हारी बुलंद आवाज से आकाश पड रहा है । अर्जुन की रणधीर स्त्राव से मनीष जाती कि यह जो कुछ उन्नति हुई है, उनके गुणों का गान कौन करता है? लोग गए धर्मबीर, रणवीर, काव्य वीर सबकी आंखों पर सबके पूछे हैं परन्तु यहाँ कोई नहीं देखता यहाँ कोई एक वह वहाँ भी नहीं करता । जहाँ सब लोग घृणा करते हैं, वहाँ वास करती है । अपार सहिष्णुता, अन्य प्रीति और निर्भिक कार्यकरी ता हमारे गरीब घर द्वार पर दिन रात में बनकर कर्तव्य करते जा रहे हैं, उनमें क्या वीरत्व नहीं है? बडा का पुरुष भी सहज में प्राण दे देता है । घोर स्वार्थ पर कभी निष्काम हो जाता है, परन्तु अत्यंत छोटे से कार्य में भी सब के अज्ञात भाव से जो वैसी ही निस्वार्थता, कर्तव्य परायणता खाते हैं, वे ही धन्य है । तुम लोग हो भारत के हमेशा के पैर तले कुछ ले हुए श्रमजीवी हो तुम लोगों को मैं प्रणाम करता हूँ । यहाँ वेदान्त नहीं, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद है । श्रमजीवियों को वेदांत ने कब इतिहास के निर्माता तथा पूजा मना । उसने तो उन्हें नीजर शूद्र ठहराया । वेदांत ने कब आपने परीक्षण का फल ना पाने वाले के लिए आंसू बहाए । उसने तो उन्हें निष्काम भाव से पशुवत भारत होने ही की शिक्षा की । विवेकानंद के इतना कहने पर भारत के श्रमजीवियों तुम लोगों को मैं प्रणाम करता हूँ । लकीर के फकीर मैदान की ओर तथाकथित सुधारकों ने उन्हें उलहाना दिया कि तुम नी जातियों कि ग्रेनेड शुद्रों की खामखाह खुशामद करते हो । विवेकानंद ने इस उन्हाने का उत्तर यहाँ दिया । इन लोगों से मैं एक बात पूछना चाहता हूँ की इस देश के लोगों की खुशामद करके मुझे क्या लाभ होगा । यदि भू को मार जाऊ तो देश के लिए एक मुट्ठी अन्य भी नहीं देंगे । उल्टे विदेशों से अकाल पीडितों और अनाथ को खिलाने के लिए मैं जो माँ जांच कर लाया हूँ, उसे भी वे हडपने का प्रयत्न करते हैं । पागलों को जो दवा खिलाने जाएगा, उसे वे दो चार लप्पड थप्पड देंगे । पर उन्हें सहकर बीजों ने दवा खिलाता है, वहीं उनका सच्चा मित्र कहलाता है । अच्छा, फिर अठारह सौ को भारती की संपादिका श्रीमती सरला घोषाल के नाम पत्र लिखा था । मैंने जापान में सुना कि वहाँ की लडकियों को ये विश्वास है कि यदि उनकी गुडियो को हृदय से प्यार किया जाए तो वे जीवित हो जाएंगे । जापानी बालिका अपनी गुड्डियों को कभी नहीं तोडती । हे महाभागे! मेरा भी विश्वास है कि यदि हत श्री अभागी निरुद्धि, पददलित चीज, मुख्य झगडालू और शालू भारतवासियों को भी कोई विजय से प्यार करने लगे तो भारत पुनर्जाग्रत हो उठेगा । भारत तभी जागेगा जो विशाल हृदय वाले फॅमिली पुरुष भोगविलास और सुख की सभी इच्छाओ को विसर्जन कर मन, वचन और शरीर से उन करोडों भारतीयों के कल्याण के लिए सचेष्ट होंगे, जो दरिद्रता तथा मूर्खता के अगाध सागर में निरंतर नीचे रुकते जा रहे हैं । देश से और देशवासियों से प्यार करना । कोई विवेकानंद से किसी प्यार के कारण उन्होंने सैद्धांतिक रूप से वेदांत दर्शन की चरम सीमा को पार किया और इसी प्यार के कारण व्यवहारिक रूप से वे धर्म के विराम चिन्ह को लांघकर कई कदम आगे बढ गए और कहा कि मैं सोचा लिस्ट हूँ क्योंकि भूखे रहने से आधी पेट खा लेना बेहतर है । उन्होंने वर्ग चेतना और वर्ग संघर्ष की बात चाहे नहीं की पर अपने इस प्यार के कारण उन्हें वे अंतर्दृष्टि मिली जिसने पांच जा के पूंजीवादी समाज के सारे प्रपंचों को छेद कर या भलीभांति देख लिया की लोकतंत्र अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए थैलीशाह होगी, तानाशाही है और ये ही लोग अपन स्वार्थ सिद्धि के लिए अपनी मंडियों और मुनाफों के लिए युद्ध छेडते और गरीब लोगों को उसमें ईंधन की धारा छोड देते हैं । राज्य और पांच चार लेख में में लिखते हैं ये ठीक है कि वो बैनेट आदि द्वारा प्रचारको एक प्रकार की जो शिक्षा मिलती है उसे हम नहीं बातें किंतु राजनीति के नाम पर चोरों का दल देशवासियों का रक्त छूटकर समस्या यूरोपीय देशों का नाश करता है और स्वयं मोटा ताजा बनता है । वहाँ दल भी हमारे देश में नहीं हैं । घूस की बहुत हूँ । वहाँ दिन दहाडे लूट जो पांच लाख के देशों में होती है । यदि भारत में दिखाई पडे तो हताश होना पडेगा । घर की जो रूम बर्तन मांझी, गणिका लड्डू खाए गली गली है, कोरस फिरता मदिरा बैठ दिखाए । जिनके आज में रुपया है, राज्य शासन को अपनी मुट्ठी में रखते हैं, प्रजा को लूटते हैं और उसको छूटते हैं उसके बाद है । सिपाही बनाकर देश देशांतरों में मरने के लिए भेज देते हैं । जीत होने पर उन्हीं का घर धन धान्य से भर जाएगा किन्तु प्रचार तो उसी जगह मार डाली गई तुम घबराओ नहीं । आज शेयर भी मत प्रकट कर एक बात पर विचार कर देखो मनुष्य नियमों को बनाता है या नियम मनुष्य को बनाते हैं । मनुष्य रुपया पैदा करता है या रुपया मनुष्य पैदा करता है । मनुष्य कीर्ति और नाम पैदा करता है या कीर्ति और नाम मनुष्य पैदा करता है । सदी में विज्ञान का दबाव बढ जाने से जब धर्म को अपना अस्तित्व बनाए रखना कठिन हो गया तब हेगल ने आदर्शवाद से धन्यवाद का सिद्धांत जोड कर उसे तेजी से बदल रहे समाज की नई परिस्थिति के अनुरूप बनाया है । एक का मत था कि समाज विचार का प्रतिबिंब है । जो जो विचार का विकास हो रहा है उसमें से आयुक्त फॅमिली झड रहा है । जब समस्या आयुक्त झगडे के बाद विचार का चरम विकास निरपेक्ष सत्य से उसका एक कांकर होगा तो समाज भी उन्नति कि उच्चतम शाश्वत स्थिति को प्राप्त कर लेगा । हेगल ने यह भी कहा कि जर्मनी की तत्कालीन सामंती रशियन सरकार नदी की उच्चतम शाश्वत स्थिति है । उसमें अब कोई परिवर्तन संभव नहीं । क्रूशियल सरकार को उन्नति कि उच्चतम शाश्वत स्थिति बनाने के कारण ही जर्मनी के बाम पक्षियों ने हेगल को सरकारी चिंतक कहा और उसके समूचे दर्शन को रद्द कर दिया । लेकिन मार्क्स ने उन्हें समझाया कि खोल के साथ गुलाबी फेंक देना उचित नहीं । आदर्शवाद में धन्यवाद जोडना हेगल की बहुत बडी उपलब्धि है । केरल का सिद्धांत सिर के बल खडा है । उसे पैरों के बल खडा करने की जरूरत है । मार्क्स का कहना था कि समाज विचार का प्रतिबिंब नहीं बल्कि विचार समाज का भौतिक परिस्थिति का प्रतिबिंब है । समाज क्यों? नदी के साथ साथ विचार का भी विकास होता आया है । कोई सामाजिक स्थिति शाश्वत नहीं और विचार के विकास की भी कोई निरपेक्ष सीमा नहीं । यो मार्क्स ने ही गल के द्वंद्वात्मक आदर्शवाद को द्वंद्वात्मक भौतिकवाद बनाया अर्थात उसे पैरों पर खडा किया और भविष्यवाणी की कि जिस प्रकार सामंत बाद से पूंजीवाद का जन्म हुआ है, पूंजी बात से समाजवाद का जन्म होगा । मार्क्स यहाँ भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई । मानव व्यवहार ही किसी सिद्धांत को परखने की एकमात्र कसौटी हैं । विवेकानंद की उपलब्धि यह है कि उन्होंने वेदांत दर्शन में क्रमविकास का सिद्धांत जोड । उनका भी यही मत है कि पहले विचार का विकास होता है और फिर उसके अनुसार समाज और उसकी विभिन्न संस्थाओं का विकास होता है । अमेरिका की ब्रुकलीन नैतिक सभा में एक प्रश्न के उत्तर में कहते हैं, मेरे मत में ब्रह्मा जगत की आवश्यक सत्ता है । हमारे मन के विचार के बाहर भी उसका यह समग्र विश्व उन्नति के पथ पर अग्रसर हो रहा है । चैतन्य का यहाँ ग्रामविकास लडके क्रमविकास से पृथक है । जड का ग्रामविकास जय करने की विकास प्रणाली का सूचक या प्रतीक स्वरूप है किन्तु उसके द्वारा इस प्रणाली की व्याख्या नहीं हो सकता । वर्तमान पार्थिव परिस्थिति में वहम रहने के कारण हम अभी तक व्यक्तित्व प्राप्त नहीं कर सकते । जब तक हम उस उच्चतर भूमि में नहीं पहुंच जाते हैं । जहाँ हम अपनी अंतरात्मा के परम लक्षणों को प्रकट करने के उपयुक्त यंत्र बन जाते हैं, तब तक हम प्रकृति व्यक्तित्व की प्राप्ति नहीं कर सकते । यह भी द्वंद्वात्मक आदर्शवाद है और पैरों के बल खडा होने के बजाय सिर के बल खडा है । जिस तरह मार्क्स ने हेगल के सिद्धांत को पैरों के बल खडा किया था और दर्शन को विज्ञान बना दिया था उसी तरह हमारे देश में भी विवेकानंद के द्वंद्वात्मक आदर्शवाद को पैरों के बल खडे करके आतंकवाद मत भौतिकवाद में बदलने की जरूरत थी जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया । परिणाम हमारे सामने । वैसे हम देख चुके हैं कि विवेकानंद सैद्धांतिक तथा व्यवहारिक रूप से हेगल और फिर बाइक से आगे जाते हैं । कारण ये कि हेगल और फिर बाक ने अपने को राजनीति से अलग रखा जबकि विवेकानंद ने धर्म के माध्यम से राजनीतिक लडाई लडी । दूसरे उन्नीसवी सदी अंत तक मार्क्सवाद युग की प्रबल विचारधारा बन चुका था । चाहे विवेकानंद ने मार्क्स और एंगेल्स के नामों का उल्लेख नहीं किया पर ये संभव नहीं था की उन सरीके चिंतक में इस विचारधारा के बारे में कुछ पडा और समझा । सोचा ना उन्होंने समाज का ऐतिहासिक भौतिकवादी विवेचन किया है और उनकी दृष्टि ना सिर्फ छोटे से छोटे सूक्ष्म परिवर्तन पर रहती थी बल्कि उन्होंने भविष्यवाणी भी है । श्रमबल की व्यवस्था की भविष्यवाणी भी इन शब्दों में ही है तो भी ऐसा समय आएगा जब शूद्र तत्व सहित शूद्रों का प्राधान्य होगा । अर्थात आजकल जिस प्रकार शुद्र जाती वैवश्वत क्षत्रियत्व आप कर अपना बाल दिखा रही है, उस प्रकार नहीं, बल्कि आपने शुद्ध रोचक धर्मकर्म सहित और समाज में आधी पद के प्राप्त करेगी । पांच जाती जगत में इसकी लालिमा भी आकाश में दिखने लगी है और इसका फलाफल विचार कर सब लोग घबराए हुए हैं । सोशल आॅस्टिन आदि साम्प्रदाय इस विप्लब की आगे चलने वाली बचाये हैं । युगों से प्रचाकर शूद्र मात्र या तो कुत्तों की तरह बडों के चरण चाहने वाले या हिंसक पशुओं की तरह निर्दय हो गए हैं । फिर सदासिवन की अभिलाषाएं निष्फल होती आ रही है । इसलिए दृढता और अध्यवसाय उनमें बिल्कुल नहीं । श्रमिकों में दृढता और अध्यवसाय पंद्रह आत्मक भौतिकवाद की विचारधारा से जुडकर उसे आत्मसात कर लेने के बाद ही आता है । उधर, ठीक

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स्वामी विवेकानंद की अमरगाथा.... Swami Vivekanand | स्वामी विवेकानन्द Producer : Kuku FM Voiceover Artist : Raj Shrivastava