00:00
00:00

Premium
7.  Swami Vivekanand in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts

Audio Book | 9mins

7. Swami Vivekanand in 

AuthorRaj Shrivastava
स्वामी विवेकानंद की अमरगाथा.... Swami Vivekanand | स्वामी विवेकानन्द Producer : Kuku FM Voiceover Artist : Raj Shrivastava
Read More
Listens29,562
Transcript
View transcript

चैप्टर, सिंह, धर्म महासभा बाधा जितनी होगी उतना ही अच्छा है । बाधा बिना पाए कभी नदी का एक बढता है । जो वस्तु जितनी नहीं होगी, जितनी अच्छी हूँ वो वस्तु पहने, पहले उतनी ही ज्यादा पाए । बाद आॅटो सिद्दीका पूरे लक्षण हैं । जहाँ बाधा नहीं, वहाँ से भी नहीं । विवेकानंद स्वामी विवेकानंद मद्रास से अमेरिका गए जाने से पहले उन्होंने वहाँ की सहायता समिति ट्रिप्लीकेन के सदस्यों के साथ अनेक विषयों पर चर्चा की । सदस्य उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुए थे और अंत में इन सज्जनों की विशेष आग्रह और प्रेत नहीं सेवे । शिकागो धर्मसभा में हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में भेजे गए । चार साल बाद जब स्वदेश लौटे तो इसी साहित्य समिति में उन्होंने भाषण दिया था, जो विवेकानंद चाहिए । क्या पंचम खंड में हमारा प्रस्तुत कार्य शीर्षक संतुलित हैं? इसमें वह कहते हैं, बहुत धर्म की उदय के पहले ही चीन फारेस्ट और पूर्वी समूहों में मैदान का प्रवेश हो चुका था । फिर जब यूनान की प्रबल शक्ति ने पूर्वी भूखंडों को एक ही सूत्र में बांधा था, तब वहाँ भारत की विचारधारा प्रवाहित और इसाई धर्मावलंबी सभ्यता के डीन भाग रहे हैं । अभी भारतीय विचारों कि छोटे छोटे कणों के संग्रह के सिवा और कुछ नहीं । बहुत धर्म अपनी समस्त महानता के साथ जिसकी विद्रोही संतान है और इसाई धर्म जिसकी नगण्य नकल मात्र है, वहीं हमारा धर्म, युग चक्र फिर हुआ, वैसा ही समय फिर आया है । इंग्लैंड की प्रबल शक्ति ने भूमंडल के भिन्न भिन्न भागों, फिर एक दूसरे से जोर दिया । अंग्रेजों के मार्ग रोमन जाती कि मार्गों की तरह केवल स्थल भाग में ही नहीं, अटल महासागरों के सब भागों में भी दौड रहे हैं । संचार के सभी भाग दूसरे से जुड गए हैं और विद्युतशक्ति नव संदेशवाहक की भर्ती ही अपना अद्भुत नाटक खेल रही है । इन अनुकूल अवस्थाओं को प्राप्त कर भारत फिर जाग रहा है और संसार की उन्नति तथा सारी सभ्यता को अपना योगदान देने के लिए वह तैयार हैं । इसी के फलस्वरूप प्रकृति ने मानो जबरदस्ती मुझे धर्म का प्रचार करने के लिए इंग्लैंड और अमेरिका भेजा । हम में से हर एक कोई अनुभव करना चाहिए था कि प्रचार का समय आ गया है । चारों ओर शुभ लक्षण दिख रहे हैं और भारतीय आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों की फिर से सारे संसार पर विजय अतिरिक्त हमारे सामने समस्या दिन दिन बेहतर धारण कर रही है । क्या हमें केवल अब नहीं देश को जगाना होगा? नहीं ये भी कुछ बात है । मैं कल्पनाशील मनुष्य हूँ । मैं ये भावना है कि हिंदू जाती सारे संसार पर विजय प्राप्त करेगी । चार साल प्रवास काल में उन्होंने जो देखा, जो सीखा, धर्म महासभा में उन्हें जो असाधारण सफलता प्राप्त हुई । फिर उनकी जो विचार बने, ये भाषण उस सब का एक स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करता है । जाते समय उन्होंने जो ये घोषणा की थी कि वे पाश्चात्य देशों से भारत की भूखी जनता के लिए आर्थिक सहायता मांगने जा रहे हैं । वो तीन उद्देश्य अस्पष्ट चेतना का विकृत बिंब एक ब्रह्मांड था । अच्छा हुआ कि धर्म महासभा उनके अमेरिका पहुंचने के एक महीने बाद शुरू हुई थी । एसपी उन्होंने पास शादी, जीवन और उनकी अर्थ लालसा को भलीभांति समझ लिया और उनका समय फैला । स्वप्ना अर्थात भ्रम टूट गया, विदेश जाएगा । उनका वास्तविक उद्देश्य उन इसाई मिशनरियों से लोहा लेना था, जिनके द्वारा विदेशी साम्राज्यवाद ने अपनी राजनीतिक विजय को तरह बनाने के लिए हम पर सांस्कृतिक आक्रमण शुरू किया । उन्नीसवी सदी में पुनर्जागरण की जो लहर उठी, जिस पर हम आगे चलकर विचार करेंगे । सी आक्रमण की प्रतिक्रिया यहाँ सिर्फ इतना ही कह देना काफी है कि विवेकानंद हमारे इस नवजागरण की चेतना की प्रवक्ता के रूप में ईसाई मिशनरियों से लोहा लेने शिकागो गए । ग्यारह सितंबर अठारह सौ छियानवे जब भी धर्म महासभा के मंच पर बोलने के लिए खडे हुए उनके मस्तिष्क में अपना ये उद्देश्य स्पष्ट था और हम देखेंगे कि उन्होंने इसाई मिशनरियों को अपने गढ में न सिर्फ मुंहतोड जवाब दिया बल्कि उनके दाद खट्टे की । महासभा के स्वागत अधिवेशन का चित्र और इसमें अपनी भूमिका आला सिंह और पेरूमल के नाम एक पत्र में स्वामी जी इन शब्दों में व्यक्त जिस दिन महासभा का उद्घाटन होने वाला था उस दिन सुबह हम लोग आठ पैलेस नाम एक भवन में एकत्र हुए जिसमें एक बडा और कुछ छोटे छोटे हॉल अधिवेशन के लिए अस्थाई रूप से निर्मित किए गए सभी राष्ट्र के लोग वहाँ पे भारत में ब्रह्मा समाज के प्रतिनिधि प्रताप चन्द्र मजूमदार महाशय है । बम्बई से नागर कराए थे जैन धर्म के लिए प्रतिनिधि ये चंद गांधी और थियोसॉफी की प्रतिनिधि श्रीमती एनी बेसेंट तथा चक्रवर्ती । इन सब में मजूमदार मेरे पुराने मित्र थे और चक्रवर्ती मेरे नाम से परिचित । चांदा जुलूस के बाद हम सब लोग मंच पर बैठाए गए । कल बना करूँ निजी बडा हॉल और ऊपर एक बहुत बडी गैजी । दोनों में छह हजार आदमी इस देश के चुने हुए सुसंस्कृत स्त्रीपुरुष हैं, खचाखच भरे हैं तथा मंच पर संसार की सभी जातियों के बडे बडे विद्वान नहीं कर रहे हैं । और मुझे जिसने अभी तक कभी सार्वजनिक सभा में भाषण नहीं दिया इस विराट समुदाय के समक्ष भाषण देना होगा । उसका उद्घाटन बडी समारोह से संगीत और भाषणों द्वारा हुआ । तदुपरांत आए हुए प्रतिनिधियों का एक एक करके परिचय दिया गया और वे सामने आकर अपना भाषण देने लगे । निसंदेह मेरा है धडक रहा था और जुबान प्रायास ऊब गयी थी । मैं इतना घबराया हुआ साथ ही सवेरे बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई । मजूमदार की वक्तृता सुंदर रही चक्रवर्ती की तो उससे भी सुन्दर दोनों के भाषणों के समय खूब करते बनी । ये सब अपने भाषण तैयार करके आएंगे । मैं बोल था और बिना किसी प्रकार की तैयारी के बैठा था किंतु में देवी सरस्वती को प्रणाम करके सामने आया और डॉक्टर पे रोज ने मेरा नाम परिचय दिया । मैंने एक छोटा सा भाषण दिया मैंने इस प्रकार संबोधन क्या अमेरिका निवासी बहनों और भाइयों इसके साथ ही दो मिनट एक ऐसी घोर करकल बनी हुई कि कान में अंगुली देते ही नहीं । फिर मैंने आरंभ किया जब अपना भाषण समाप्त कर बैठा तो भावावेग सीमा रो में अवश्य हो गया था । दूसरे दिन सारे समाचार पत्रों में छपा की मेरी ही वक्त बताओ । जिन सबसे अधिक प्रदेश पर्शी मैं अवश्य हो गया था । पूरा अमेरिका मुझे जान गया । उस दिन से मैं विख्यात हो गया और जिस दिन मैंने हिन्दू धर्म पर अपनी वक्तृता पडी उसी दिन तो हॉल में इतनी अधिक भीड थी । इतनी पहले कभी नहीं एक समाचारपत्र का कुछ अंश उध्वस्त करता हूँ केवल महिलाएं ही महिलाएं कोने कोने में जहाँ देखो वहाँ ठसाठस भरी हुई दिखाई दे दी थी । अन्य सब सक्रियताओं के समाप्त होने तक में किसी प्रकार धैर्य धारण कर विवेकानंद की वक्तृता की बात चौथी रही इत्यादि । भारत के सन्यासी ने भद्र नारियों तथा पुरुषों लीडी जिन जेंटलमैन से संबोधित करने की लीग थोडी थी, बहनों और भाइयों फॅस में जो अपना था, सतत तालियों से उसी का स्वागत हुआ तो फिर ये शब्द मात्र नहीं । इनके पीछे सर्व संभावना का सिद्धांत विजय की उदारता और विश्वास की गरिमा थी और फिर संगीतमय स्वर में भाषण का आरंभ हुआ । आपने जिस सौहार्द्र वर्स नहीं के साथ हम लोगों को स्वागत किया है, उसके प्रति आभार प्रकट करने की नियमित खडे होते समय मेरा हे गए अवर्णनीय हर्ष से पूरा नहीं हो रहा है । संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं । धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ । अमेरिका जाने से पहले विवेकानंद ने समूचे देश का भ्रमण किया था । विद्वानों से बातचीत और शास्त्रीय बम इतिहास के अध्ययन द्वारा उसके महान अतीत और मानव सभ्यता में उसके योगदान को भलीभांति समझ लिया था । आते उनके स्वर में परंपरा का बाल और राष्ट्रीय गौरव छनकर हो । मैं ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की शिक्षा दी है । मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीडितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है । और फिर इतिहास मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट अंश को स्थान दिया जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, जिस वर्ष उसका पवित्र मंदिर रोहन जाती के ऐसे चार से धूल में मिल गया । ऐसे धर्म का अनुयायी होने से मैं कर का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट आंश को शरण भी और जिसका पालन वो अब तक कर रहा है । डेढ दृष्टि की संक्षिप्त भाषण के अंतिम शब्द से सांप्रदायिक्ता हटधर्मिता और उनकी विभत्स वंशधर धर्मान्धता सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है । वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है, उसको बारंबार मानवता की रख से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती और पूरे पूरे देशों को निराशा के गर्त में डाल दे रही है । ये दिए विमत सिद्धांत भी नहीं होते तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं उन्नत हो गया होता । पर अब उन का समय आ गया है और मैं आंतरिक रूप से आशा करता हूँ की आज सुबह इसी सभा के सम्मान में जो घंटाध्वनि हुई है वो समस्त धर्मान्धता का तलवार या लिखने के द्वारा होने वाले सभी उत्पीडनों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्परिक कट्टरताओं का मृत्यु निनाद सिद्ध हो । एक दूर देश में विवेकानंद ने साहस और प्रतिभा का परिचय दिया । सुंदर शरीर, बहुत आकृति और आंखों में असाधारण चक्र । इस भारतीय सन्यासी की शान समय देखते ही बनती है । उन्नीस सितंबर को स्वामी जी का हिंदू धर्म का भाषण उस सभा के सब भाषणों में बेजोड उसमें उन्होंने जहाँ वेदांत दर्शन की तात्विक व्याख्या की, वहाँ पे ईसाई धर्म के मूलाधार पर प्रकार करने से नहीं चूके । ईसाई धर्म का मूलाधार है पापा को उसकी मान्यता है कि आदमी ने वर्जित फल खाने का जो पाप किया, उसके फलस्वरूप उसे हवा समेत स्वर्ग से धरती पर आना और इसी दृष्टि का हुआ । इसलिए बात मनुष्य का सहज स्वभाव है । वहाँ जब तक जियेगा पाप करेगा, पाप का प्रायश्चित करने के लिए ही से हिस्सा को मध्यस्थ बनाने तथा गिरजा जाने की जरूरत है । स्वामी जी ने अमृत के पुत्रों के मधुर संबोधन के प्रयोग की आज्ञा मांगते हुए कहा, निश्चय ही इंदु आपको पापी कहना स्वीकार करता है । आपको ईश्वर की संतान हैं । अमर आनंद के भागी है पवित्रा और पूर्ण आत्मा है आपस, मृत्यु भूमि पर देवता अब भला पार्टी मनुष्य को पाप भी कहना ही पास है वो मानव स्वरूप पर घोर लांछन आप उठे ऐसी हूँ टाइम और इस मिथ्या धारण को झटककर दूर से बेन क्या फेर हैं आप है आत्मा हमारे आत्मा मुक्त आनंद । मैं और नीतियां आप जड नहीं है, आप शरीर नहीं है, जड तो आपका दास है ना कि आप है दास चढेंगे इस साइड बादरी हमें मूर्तिपूजक बताकर हमें जंगली और ऐसा भी लेकर हमारी निंदा करते थे । वे कारण मैंने विनोद, उपहास, मेस निंदा का जो कर दिया वो सुनने लायक बचपन की एक बात मुझे याद आती है । एक इसाई पादरी कुछ मनीषियों की भीड जमा कर के धर्मोपदेश कर रहा था । बहुत तेरी मजेदार बातों के साथ को पादरी ये भी कह गया, अगर मैं तुम्हारी दीन मूर्ति को एक डंडा लगाओ तो मेरा क्या कर सकती है? एक श्रोता नेचर चुकता सा जवाब दे रहा हूँ, अगर मैं तुम्हारी ईश्वर को गाली नहीं तो मेरा क्या कर सकता है? पादरी बोला मरने के बाद उसमें सजा देगा हिंदू विजनगर बोल उठा तो मरोगे, तब ठीक उसी तरह हमारी देवमूर्ति भी तुम्हें दंड देगी । इसी प्रकार की बातों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत सामजी भी दोनों बाये विशेष ढंग से वक्ष पर कैसे तनकर भेल रहे थे । दूसरे वक्तव्य जरा ईसाई धर्म और पास जाती । सभ्यता ने हमें बहुत कुछ सिखाया इत्यादि । भद्र चापलूसी की बातें कहने वहाँ नहीं गए थे और नावे मूर्ति पूजा के लिए किसी तरह लज्जित बल्कि इसी बात को लेकर प्रहार पर प्रहार करते चले गए । मूर्ति पूजा की नैतिकता, आध्यात्मिक और प्रेम कुल आसानी बताते हुए उन्होंने कहा अंधविश्वास मनुष्य का महान शत्रु पर धर्मांधता उससे भी मैं ईसाई गिरजाघर क्यों ज्यादा है? क्रूस क्यू पवित्र हैं, प्रार्थना के समय आकाश की ओर यूज किया जाता है । कैथलिक ईसाइयों के गिरजाघरों में इतनी मूर्तियां क्यू हो रही है । मेरे भाइयों मन में किसी मोदी के बिना कुछ सोच सकना उतना ही असंभव है जितना श्वास लिए बिना जीवित रहेंगे । सहजधारी नियमानुसार भौतिक मूर्ति से मानसिक भाव विशेष का उद्दीपन हो जाता है अथवा मन में भाग विशेष का उद्दीपन होने से तत्र मूर्ति विशेष का भी अमीर होता है । इसलिए तो हिन्दू आराधना के समय प्रमा प्रतीक का उसके मन को आपने ध्यान के विषय परमेश्वर में एकाग्रता से स्थिर रहने में सहायता देता है । वो भी बात उतनी अच्छी तरह से जानता है जितना आप जानते हैं कि वो मूर्ति ना तो ईश्वर है और ना सर्वव्याप्त । और सच पूछिए तो दुनिया के लोग सिर्फ व्यापक व का क्या अर्थ समझते हैं । वह तो केवल शब्द प्रतीक मान रहे क्या परमेश्वर का भी कोई क्षेत्रफल हैं? यदि नहीं जिस समय हम सर्वव्यापी शब्द का उच्चारण करते हैं, उस समय विस्तृत ता का आशय देश की ही कल्पना करने के सिवा हम और क्या करते हैं? ये भाषण क्या दिया स्वामी जी ने भीड ओके छत्ती को छेड दिया । धर्म सभा के कुछ प्रतिनिधि पंजी झाडकर उनके पीछे पड गए । उनका कहना था विवेकानंद ने जिस प्रकार आत्मा की महिमा घोषित है उसके संबंध में अधिकांश हिन्दुओं को जानकारी नहीं है । सूक्ष्मतर को युक्ति के द्वारा मूर्ति पूजा की दार्शनिक व्याख्या कर के पास जाती जगत की आंखों में धूल झोंक रहे हैं क्योंकि जड के उपासक बहुत तैलिक हिंदू इस प्रकार की व्याख्या स्वप्न में भी सोच सकते हैं । साथ ही उन्होंने ये प्रचार भी किया कि विवेकानंद नीच वर्ष में पैदा हुए हैं । जाती से निकले हुए नगण्य व्यक्ति है और धर्म की चर्चा उनके लिए अनाधिकार शेष कमाते हैं । हिंदुस्तान से आए किसी रेवेरेंड महोदय ने धर्मसभा के अधिकारियों से ये भी कहा कि उच्च श्रृंखल चरित्रहीन युवक को सभा से निकाल दिया जाए । निकाल देने की बात तो अधिकारियों ने नहीं मानी अलबत्ता विवेकानंद से कहा गया कि वे प्रतिवादियों द्वारा उठाई गई आपत्तियों मिल गए इसके लिए तो वो पहले से ही तैयार है । अरे बाईस सितंबर को उन्होंने भारत के वर्तमान धर्म समूह की आलोचना सभा में विरोधियों की विद्वेषपूर्ण युक्तियों का दृढता से उठ कर दिया । इसके बाद पच्चीस तारीख को हिन्दू धर्म का सार नामक भाषण देते समय बीच में रुककर उन्होंने श्रोताओं से पूछा । इस सभा में जो हिंदू धर्मशास्त्र के साथ प्रत्यक्ष रूप से परिचित है वो हाथ तो प्रायास सात हजार व्यक्तियों में से सिर्फ तीन चार आते थे । योद्धा संन्यासी विवेकानन् मस्तक ऊंचा करके विद्रुप भाषा मुस्कुराते हुए बोले तो फिर बताइए आप किस बांटे थे? हमारे धर्म की आलोचना करेंगे? विवेकानंद धर्म महासभा में भारत कि निर्धन तथा उत्पीडन जनता के प्रतिनिधि थी उस जनता के लिए जिससे पादरी लोग तरह तरह के लोग लालच सिखा करे । साई बनाने का प्रयत्न कर रहे बीस नंबर के ढाई तीन मिनट के भाषण में इन्ही पादरियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा इसाइयों को सत आलोचना सुनने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए और मुझे विश्वास है कि यदि मैं आप लोगों की कुछ आलोचना करूँ तो बुरा ना मानेंगे । इसाई लोग मूर्तिपूजकों की आत्मा का उम्मीदवार करने के नियमित अपने धर्म प्रचारकों को भेजने के लिए इतने सुख रहते हैं । उनकी शरीर को भी भूख से बचाने के लिए कुछ क्यों नहीं करते? भारत वर्ष में जब भयानक अकाल पडा था तो उसे ॅ और लाखों हिंदू छुधा से पीडित होकर मर गए पर आप कसाइयों ने उनके लिए कुछ नहीं है । आप लोग सारे हिंदुस्तान में जैसे बनाते हैं पर पूर्व का महान भाभर में नहीं, उसके पास प्रयाप्त है । जल्दी हुए हिंदुस्तान के लाखों बुखार के लोग क्यूँकि दिल्ली से रोटी के लिए चला रहे हैं । वे हमसे रोटी मानते हैं और हमने देती है पत्थर चुभ । छात्रों को धर्म का उपदेश देना उनका अपमान करना है । भूख को दर्शन से खाना उनका अपमान करना है । भारत वर्ष में ये भी कोई पुरोहित दिनों की प्राप्ति के लिए धर्म को देश करें तो वह जाती से छूट कर दिया जाएगा और लोग उस पर देखेंगे । मैं यहाँ पर आपने वृत्र भाइयों की नियमित सहायता मांगने आया था पर मैं पूरी तरह समझ गए की मूर्ति पूछे को के लिए इसाई धर्मावलंबियों से और विशेष फिर उन्ही के देश में सहायता प्राप्त करना कठिन हिंदू कार है । नदी के इस और बसने वाले सभी मुझे ड्यूक आॅफ बीस सितंबर को लिखा था । अब धर्म महासभा स्थान पर पहुंची जहां तीव्र कटता उत्पन्न हो गयी । निसंदेह भ्रष्टाचार का पतला पर्दा बना रहा किन्तु उसके पीछे दुर्भावना विद्यमान रेवरेंड जोसेफ रुकने हिंदुओं की तीव्र आलोचना की और बदले में उन की भी आलोचना हुई । उन्होंने कहा बिना रचे गए विश्व की बात करना प्राया आश्रम में प्रलाप और एशिया वालों ने प्रत्युत्तर दिया कि ऐसा विश्व जिसका प्रारंभ है एक स्वयंसिद्ध बेतुकापन विषय जेपी न्यू माननी वो यू तट से दूर तक जाने वाली गोली चलाते हुए घोषणा की की पूर्व वालों ने मिशनरियों के प्रति भ्रांत कथन करके संयुक्त राष्ट्र के समस्त ईसाईयों का अपमान किया है और पूर्व वालों ने अपने त्तिजनक शांत और अति उद्यत मुस्कान के द्वारा उत्तर दिया ये केवल विषय का ज्ञान, ये उत्तेजित शांति और उद्योग मुस्कान विवेकानंद जी की विशेष तक पूर्व वालों के प्रमुख प्रवक्ता वही थे । वे पादरियों पिछले आरोपों का आचार्य की धीर गंभीर वाणी में उत्तर देते और साथ ही चुटकी भी लेते थे । सत्ताईस सितंबर के अंतिम अधिवेशन में उनका भाषण चाय स्वागत भाषण की तरह संक्षिप्त था । पर शैली यही भी इस प्रबुद्ध दृश्य होता । मंडल को मेरा धन्यवाद जिसने मुझ पर अभी कल के ऊपर ही है और जिसने मत मतदान शुरू के मनोमालिन्य को हल्का करने का प्रयत्न करने वाले प्रत्येक विचार का सरकार क्या है? इस समय सूरता में कुछ बेसुरी स्वर भी बीच बीच में सुने गए हैं । उन्हें मेरा विशेष धन्यवाद क्योंकि उन्होंने अपने स्वर्वेद आदित्य से इस समर्थता को और भी मदर बना दिया है । ये छिछले तथा निकृष्ठ पादरियों पर कटु था । फिर रामकृष्ण परमहंस का जितने मान उतने पद और तमाम धर्मों, सम्प्रदायों तथा मतवादों की एकता के सार्वभौम संदेश का । पश्चिम की वैज्ञानिक चेतना से सामंजस्य स्थापित करते हुए आचार्य के स्वर में विवेकानंद ने कहा बीरभूमि में बोल दिया गया और मिट्टी, जल तथा वायु उसके चारों रख दिए हैं तो क्या वो भी मिट्टी हो जाता है अथवा वायु या जल बन जाता है? नहीं, वहाँ तो वो ही रहता है । वहाँ अपनी वृद्धि के नियम के हिसाब से ही बढता है । वायु, जल और मिट्टी को अपने मैं बचाकर उनको बीज पदार्थ में परिवर्तित करके एक वृक्ष हो जाता है । ऐसा ही धर्म के संबंध में भी है । इसाई को हिन्दू या बौद्ध नहीं हो जाना चाहिए, ना हिंदू अथवा बहुत को एसाई पर हाँ, प्रत्येक को चाहिए कि वह दूसरों के सार भाग को आत्मसात करके पृष्टि लाभ करें और अपने वैशिष्ट्य की रक्षा करते हुए अपनी निजी बुद्धि का नियम के अनुसार वृद्धि को प्राप्त प्रबंध श्रोताओं ने विवेकानंद को धर्मसभा का सर्वश्रेष्ठ घोषित किया । अखबारों में उनकी भाषण पूरी पूरी प्रकाशित हुए और रणवीर प्रशंसात्मक टिप्पणियां लिखी गई । कोई एक साल बाद अर्थात पंद्रह नवंबर अठारह सौ चौरानवे को उन्होंने अपने पत्र में हरिदास देसाई को लिखा मैं धर्म महासभा में बोला था और उसका क्या परिणाम हुआ ये मैं कुछ समाचार पत्र और पत्रिकाआें मेरे पास है । उनसे उध्वस्त करके लिखता हूँ । मैं तीन नहीं आंकना चाहता परंतु आपके प्रेम के कारण आपने विश्वास करके मैं अवश्य कहूंगा की इसी हिंदू ने अमेरिका को ऐसा प्रभावित नहीं किया और मेरे आने से यदि कुछ भी ना हुआ तो इतना अवश्य हुआ है कि अमेरिका को ये मालूम हो गया कि भारत में आज भी ऐसे मनुष्य उत्पन्न हो रहे हैं जिनके चरणों में सब जैसे सभ्य राष्ट्र की नीति और धर्म का पाठ पढ सकते हैं । क्या नहीं समझते कि हिंदू राष्ट्र अपने संन्यास यहाँ भेजने के लिए पर्याप्त कर रहे हैं । कुछ पत्रिकाओं ऍम में नीचे उस बात करता हूँ । अधिकांश संक्षिप्त भाषण वा कप मत्वपूर्ण होते हुए भी किसी ने भी धर्म महासभा के तात्पर्य एवं उसकी सीमाओं का इतने अच्छे ढंग से वर्णन नहीं किया जैसा कि उस हिंदू संन्यासी नहीं । मैं उनका भाषण पूरा पूरा उध्वस्त करता हूँ परन्तु श्रोताओं पर सब क्या प्रभाव पडा इसके बारे में मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि वे देवी अधिकार से संपन्न सकता है और उनका शक्ति मान, तेजस्वी मुख तथा उनके पीली गेरुए वस्त्र उनके गंभीर तथा लयात्मक वासियों से कुछ कर आकर्षक नाथ न्यूयॉर्क । उन्होंने गिर जोर क्लबों में इतनी बार भाषण दिया है कि उनके धर्म से अब हम भी परिचित हो गए हैं । उनकी संस्कृति, उनकी वाकपटुता, उनकी आकर्षण एवं अद्भुत व्यक्तित्व ने हमें हिंदू सभ्यता का एक नया आलोक दिया है । उन के संदर्भ तेजस्वी मुखमण्डल तथा उनकी गंभीर सुन ललित वाणी में सबको आना ऐसा अपने वर्ष में कर लिया है । बिना किसी प्रकार की नोटसि सहायता के ही वे भाषण देते हैं । अपने तथ्य तथा निष्कर्ष को वे अपूर्वा ढंग से एवं आंतरिकता के साथ सम्मुख रखते हैं और उनकी स्वतःस्फूर्त प्रेरणा उनके भाषण को कई बार पूर्व वाकपटुता से युक्त कर देती है । न्यूयॉर्क हाँ विवेकानन्द नशे ही धर्म महासभा में महानतम व्यक्ति है । उनका भाषण सुनने के बाद ये मालूम होता है कि इस विज्ञ राष्ट्र को धर्मोपदेशक भेजना कितनी मूर्खता है । हेड यहाँ का सबसे बडा समाचार पर इतना उद्धृत करके अब मैं समाप्त करता हूँ, नहीं तो आप मुझे घमंडी समझ बैठेंगे, परंतु आपके लिए इतना आवश्यक था क्योंकि आप प्रायः कुक मंडूक बने हैं और दूसरे तीनों में संसार किस गति से चल रहा है ये देखना भी नहीं चाहिए । मेरे उदार मित्र मेरा मतलब आपसे व्यक्ति शक नहीं है । सामान्य रूप से हमारे संपूर्ण राष्ट्र से उनकी इस असाधारण ख्याति से लाभ उठाने के लिए व्याख्यान कंपनी ने उनके सम्मुख ये प्रस्ताव रखा कि वे अमेरिका का दौरा करें और कंपनी नगर नगर में उनके भाषणों का प्रबंध करेगी । बिल्ली के भागों छींका टूटा । वे विश्वधर्म के सर्वभौम आदर्श को प्रचारित प्रसारित करने विदेश आये या व्याख्यान कंपनी के लिए साधन जुटा रही । इसके अलावा भारत में अपनी योजना को कार्यरूप देने के यतिश धन मिल जाने की भी आ जाती है । उन्होंने इसे सुनहरे अवसर की तरह जाना और कंपनी के साथ व्याख्यान देने का अनुबंध कर लिया । इस योजना के अंतर्गत अमेरिका के सभी राज्यों के बडे बडे शहरों में विवेकानंद के भाषण होने लगे । जहाँ कई भी ले जाते हैं वहीं उनका आदर सत्कार होता था । कौतुहल प्रिया दर्शकों की भीड लग जाती थी और भारी टिकट के बावजूद व्याख्यान भवन श्रोताओं से खचाखच पर जाते थे । विवेकानंद दोहरी तलवार थे । एक तरफ से अपने धर्म के उदार व्याख्या करके मनुष्यमात्र की एकता का संदेश देते और इसकी तुलना में इसाई धर्म की चिंता और संकीर्णता को उजागर कर देते थे । दूसरी तरफ मिशनरियों कि भारत संबंधी मूर्खतापूर्ण प्रचार और धूर्तता का भांडाफोड करने से भी बात नहीं आते थे, लेकिन अब उन्हें दो प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड रहा था । एक ही है कि अमेरिकी नगरों का वातावरण भिन्न भिन्न था । धर्म महासभा का वातावरण कही ना था और श्रोताओं की प्रायर ऐसे सुली बुद्धि तथा अंधविश्वासी लोग अधिक होते थे, जो हुल्लडबाजी पर उतर आते थे । दूसरे ईसाई मिशनरी विवेकानंद की लोकप्रियता को छति पहुंचाने के लिए निकृष्ट तत्वों की कुल्लड बाजी को ना सिर्फ प्रोत्साहन देते थे, बल्कि उन्हें सिखा पढाकर दर्शकों तथा श्रोताओं में भेजते । विवेकानंद की तीव्र दृष्टि ने इन निकृष्ट तत्वों और मिशनरियों के षड्यंत्र को पहचान लिया और उसके पीछे इन्हें साम्राज्यवाद का हाथ दिखाई दिया, लेकिन वह घबराने वाले व्यक्ति में से नहीं । उन्होंने यहाँ भी स्वभावगत साहस तथा निर्भिकता का परिचय दिया । रो मामला लिखते हैं तरुण अमेरिकी गणतंत्र की दूर जनशक्ति के प्रति उनमें पहले पहले जो आकर्षण और आदर उपजा था, वहाँ मंद पड चुका था । उसकी क्रूरता, अमानुषिकता, छूट रता, कट््टरता, प्रकांड मूर्खता एवं लम्बी मूर्धा के लिए विवेकानंद के मन में सहसा घृणा जाग उठी थी, जो विचारशील है । आस्थावान है और जीवन को दृष्टि से नहीं देखते । इससे मानव जाति का अब तरसे राष्ट्र देखता है । उन के विषय में ये कितने निर्लज्ज आत्मविश्वास के साथ अपनी राय देता है । तब फिर उनका धैर्य छूट गया । उन्होंने कोई मैं नहीं दिखाया । वे हिंसा, लूट और विनाश के तत्वों से पूर्ण पश्चिमी सभ्यता के पापों और अपराधों की भर्त्सना करने लगी । एक बार उन्हें बॉस्टन में आपने अत्यंत प्रिय धार्मिक विषय पर बोलना था । जल्दी पूरे दुनिया पूर महाशिव का खोखला और बरवर श्रोता सम्मान सामने देख कर उन्हें इतनी वितृष्णा हुई कि अपनी आत्मा का साहस से उन्हें देने से इनकार करके हटा उन्होंने विषय आंतर कर दिया । ऐसे ऐसे ईडर और भी डी जिसका प्रतिनिधित्व करें सभ्यता को उन्होंने हन डाला, भयंकर हायतौबा मची, सैकडों अशांत शुरू हुआ, सभा भवन छोडकर चल दिए और अखबारों ने लाल पीली आंखें दिखाई दे । छोटी साइज और पाखंड से विशेष तैयार हमने आप जितनी चाहे शेखी बघारते पर तलवार के बिना ईसाइयत कहीं सफल हुई है । आपका धर्म ऐश्वर्या का लोग दिखाकर प्रचारित किया जाता है । इस देश में मैंने जो कुछ सुना, सब ढोंग हैं । ये सब समृद्धि यही सब क्या खींचती की देन हैं जो खींचते को पुकारते हैं कि आगे पैसे बटोरने के अतिरिक्त कुछ नहीं जानते हैं । हमारे घर में ईद भी तकिया लगाने योग्य नहीं पाएंगे तो मिसाइल नहीं हो खींचती की शरण मिलो । एक सार्वजनिक भाषण से विरोध का तूफान और भी तेज हो गया । इधर अमेरिका में मिशनरी और उनकी अखबार उन्हें ठग और कपटी बताकर बदनाम कर रहे थे । वे लोगों के घरों में जा जाकर कहते थे कि भारत में इसका पत्नियों का हरम हैं और बच्चों की आधी सेना बहुत यहाँ आकर खाम खा सन्यासी बन गया है । उधर भारत में ये पादरी, लोग और धर्म महासभा में ब्रह्मा समाज के प्रतिनिधि प्रताप चन्द्र मजूमदार जो विवेकानंद के असाधारण की आदमी के कारण द्वेष की आग में जल भुन रहे थे । ये मिथ्या प्रचार कर रहे थे कि स्वामी जी अमेरिका के बडे बडे होटलों में रहते हैं, सब चीज खाते पीते हैं और विलासिता का जीवन बता रहे हैं । रूढीवादी और कट्टरपंथी हिंदुओं ने भी स्मृतियां प्रचार को बढावा दिया । विवेकानंद के शिष्यों तथा गुरु भाइयों को वास्तविकता स्थिति मालूम नहीं थी । वो इस प्रकार से बडे सड्टाी । उन्होंने स्वामी जी को इस बारे में लिखा और उनके खिलाफ लिखने वाले अखबारों की कतरनें भेजी । चौबीस जनवरी अठारह सौ चौरानवे को उन्होंने अपने मद्रास के शिष्या हो लिखा, मुझे तुम्हारे पत्र मिले । मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मेरे संबंध में इतनी अधिक बातें तुम लोगों ने जो ले क्या है, उसे अमेरिकी जनता का रुख समझ बैठना । इस पत्रिका के विषय में यहाँ के लोगों को प्रायः कुछ मालूम नहीं और वे इसे नील नाक वाले प्रेस्बिटेरियन ओके पत्रिका कहते हैं, ये बहुत ही कट्टर संप्रदाय हैं, किंतु ये नील नाक वाले सभी लोग दुर्जन है, ऐसी बात नहीं है । अमेरिकी निवासीगण और बहुत से पादरी गन मेरा बहुत आदर करते हैं । जिनका सम्मान कर लोग आदर कर रहे हैं, उस पर कीचर उछालकर प्रसिद्धि प्राप्त करने के इरादे से ही इस पत्र ने ऐसा लिखा है । ऐसे छल को यहाँ के लोग खूब समझते हैं एवं यहाँ ऐसी कोई महत्व तक नहीं देगा । हिन्दू भारत के पादरी गन अवश्य ही इस आलोचना का लाभ उठाकर बदनाम करने का प्रयत्न करेंगे । यदि वे ऐसा करें तो उन्हें कहना यहूदी याद रखो, तुम पर ईश्वर का न्याय घोषित हुआ है । उन लोगों की पुरानी इमारत की नींव भी रह रही है, पागल के समान रोजगार रहे हैं । उन का नाश अवश्यंभावी है । उन पर मुझे दया आती है कि प्राची धार्मिक भावों के यहाँ अत्यधिक प्रदेश के कारण भारत में मौत से जीवन बिताने कि उनकी साधन नहीं हो जाए किंतु इनके प्रधान पादरियों में से एक भी मेरा विरोधी नहीं है । जो भी हो जब तलाक में उतरा हूँ, अच्छी तरह से स्नान करूंगा । हिंदू कट्टरपंथियों के लिए उन्होंने एक दूसरे पत्र में लिखा कि अगर उन्हें धर्म की इतनी चिंता है तो भारत से एक रसोई और खाने की सामग्री क्यों नहीं भेज देंगे? जब वे गार्ड्स एक पैसा खर्च करने को तैयार नहीं तो व्यर्थ की बातें बनाने से क्या ला? लेकिन विरोध कर तूफान दिन दिन ऊंचा उठता चला गया । ईसाई मिशनरी, हिन्दू, कटरपंथी, थियोसॉफी फर्स्ट सुधारवादी, ब्रह्मा समाजी और प्रतिक्रियावादी राजनीतिक तत्व इस विरोध में एक ही मंच पर इकट्ठे हो गए । अब विवेकानंद भी एक देशीय पति के व्यक्ति नहीं उन्होंने बखूबी समझ लिया की अब उपेक्षा मात्र से काम नहीं चलेगा । समय आ गया है कि मिथ्याप्रचार का उत्तर दिया जाए और इस विरोध को अपने उद्देश्य के प्रचार प्रसार के लिए प्रयोग में लाया तेल गर्म लोहे पर चोट करने, योजना स्थिर करके उन्होंने नौ अप्रैल अठारह सौ चौरानवे को हालत सिंह ना पेरूमल के नाम अपने पत्र में लिखा निसंदेह कट्टर पादरी मेरे विरुद्ध हैं और मुझसे मुठभेड करना कठिन जानकर हर प्रकार से भी मेरी निंदा करते हैं और मुझे बदनाम करनी मेरा विरोध करने में भी नहीं हिचकिचाते और इसमें मजूमदार उनकी सहायता कर रहे हैं । वहाँ दिवेश के मारे पागल हो गया है । लगता है उसने उन लोगों से कहा की मैं बहुत बडा, धोखेबाज और दूर हूँ और इधर वह कलकत्ता में कहता फिर रहा है कि मैं अमेरिका में अत्यंत आपको एवं लंपट जीवन व्यतीत कर रहा हूँ । भगवान उसका भाला मेरे भाई बिना रोज की कोई भी अच्छा काम नहीं हो सकता । क्या तुम मद्रास में रामनाथ की दीवान या अन्य किसी बडे आदमी की अध्यक्षता में एक ऐसी सभा आयोजित कर सकते हो जिसमें वहाँ मेरे हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करने के प्रति पूर्ण गया समर्थन एवं संतोष प्रकट किया जाए और फिर उस पारी प्रस्ताव को यहाँ के शिकागो वाॅशिंग तथा न्यूयॉर्क सिंह और डेट्रॉयड मिशिगन की कमर्शिल एडवटाइजर को भेज दिया जाए । शिकागो ऍम इसमें है । न्यूयॉर्क सिंह के लिए किसी विशेष विवरण की आवश्यकता नहीं डिट्रॉइट मिशिगन राज्य में हैं उसकी प्रतियां डॉक्टर में रोज को चेयरमैन धर्म महासभा शिकागो के पते पर भेजो । मैं उनका मकान नंबर भूल गया हूँ किन्तु मोहल्ले का नाम इंडियान एवेन्यू है उसकी एक प्रति श्रीमती जी जी बिजली डिट्रॉइट वाशिंगटन एवेन्यू के पते पर भी भेज इस सभा को जितना बडा बना सकते हो बनाओ धर्म एवं देश के नाम पर सभी बडे आदमियों को उसमें भाग लेने के लिए पकडो । मैसूर के महाराजा तथा दीवान से सभा और उसके उद्देश्यों का समर्थन करने वाला पत्र प्राप्त करने की चेष्टा । मतलब ये हैं कि जितनी बडी सभा और उसका शोर उठा सको उतना ही अच्छा प्रस्ताव कुछ इस आशय का होगा कि मद्रास कि हिंदू जनता में एक कामों के प्रति अपना पूर्ण संतोष व्यक्त करती है । मद्रास और कलकत्ता इत्यादि नगरों में विराट सभाएं हुई । इनमें ना सिर्फ विवेकानंद की काम को सराहा गया बल्कि इस काम पर गर्व व्यक्त करते हुए उन्हें अभिनंदित किया गया । इन सभाओं की कार्यवाही भारत तथा अमेरिका के अखबारों में छपी और इनमें पास किए गए प्रस्ताव उन लोगों को भेजे गए जिनके नाम विवेकानंद ले लेंगे । इससे पादरी गानों का झूठ उजागर हो गया । लेकिन विवेकानंद का उद्देश्य सिर्फ पादरियों का मूड बंद करना ही नहीं था । भारत की सोई हुई आत्मा को झकझोर ना जगाना अतेफ अभिनंदन के उत्तर में कलकत्ता की सभा के सभापति प्यारीमोहन मुखर्जी को विवेकानंद ने अठारह नवंबर अठारह सौ चौरानवे के पत्र में लिखा, लेन देन ही संसार का नियम है और यदि भारत कैसे उठना चाहे तो ये परम आवश्यक है कि वो अपने रत्नों को बाहर लाकर पृथ्वी की जातियों में बिखेर दी और इसके बदले में वो जो कुछ दे सके उसे सहर्ष ग्रहण करें । विस्तार ही जीवन है और संकोच मृत्यु प्रेम ही जीवन है और निवेश मृत्यु हमने उसी दिन से मारना शुरू कर दिया जब से हम अन्य जातियों से घृणा करने लगे और ये मृत्यु बिना इसके किसी दूसरे उपाय से रोक नहीं सकती कि हम फिर से विस्तार को अपनाएं जो जीवन का चिन्ह हैं । अतेफ हमें पृथ्वी की सभी जातियों से मिलना पडेगा और प्रत्येक हिंदू जो विदेश भ्रमण करने जाता है, उन सैकडों मनीषियों से अपने देश को अधिक लाभ पहुंचाता है जो केवल विश्वास तो एवं स्वार्थ बर्ताव कंट्री मात्र है और जिनकी जीवन का एकमात्र उद्देश्य ना खुद खाये, ना दूसरों को खाने देख कहावत के अनुसार अपना अपना हित करना है न बनाएगा । पांच जाती राष्ट्र ने राष्ट्रीय जीवन के जो आश्चर्यजनक प्रासाद बनाए हैं, वे चरित्र रूपी सुदृढ स्तंभ ऊपर खडे हैं और जब तक हम अधिक से अधिक संख्या में वैसे चरित्र नागर लेंगे, तब तक हमारे लिए किसी शक्ति विशेष के विरुद्ध अपना विशेष असंतोष व्यक्त करते रहना निरर्थक है । क्या वे लोग स्वाधीनता पानी योग्य है, जो दूसरों को स्वाधीनता देने के लिए प्रस्तुत नहीं? व्यर्थ का संतोष जताते हुए शक्ति शय करने के बदले हम चुप चाप वीरता के साथ काम करते चले जाए? मेरा त्वपूर्ण विश्वास है कि संसार की कोई भी शक्ति किसी से उस वस्तु को अलग नहीं रख सकती । इसके लिए वह वास्तव में योग्य हो । अतीत तो हमारा गौरव में था, पर मुझे हार्दिक विश्वास है कि भविष्य और भी गौरव में होगा । अपनी कमियों को समझे और दूसरों से सीखे । बिना आगे बढना संभव नहीं । लेकिन आत्मालोचना अपने जी के सम्मुख की जाती हैं । शत्रु के विरुद्ध संपूर्ण व्यक्तित्व के साथ लडना सिर्फ लडना होता है । विवेकानंद ने ठीक यही कार्यनीति अपनाई । शत्रु के सम्मुख उन्होंने मूर्ति पूजा तक की दार्शनिक व्याख्या की और अपनों की समूह कलेजा निकालकर रख दिया और खून के आंसू रो परिणाम ये की उदार बुर्जुआ और उनके बुद्धिजीवियों ने विवेकानंद को प्यार किया । सर आंखों पर बिठाया और ने अपना धार्मिक तथा सांस्कृतिक नेता मान लिया और आज तक माने हुए हैं । अध्ययन स्वदेश लौटने पर वे जहाँ भी गए, वहीं उनका भव्य स्वागत हुआ । आपने मद्रास के भाषण में अपनी ही देशवासियों के सम्मुख बोलते हुए उन्होंने दिल के फूल इस प्रकार को मैं समझता हूँ कि मुझे मैंने एक दोषियों के होते हुए थोडा साहस है । मैं भारत से पास जाते देशों में कुछ संदेश ले गया था और उस से मैंने निर्भिकता से अमेरिका और इंग्लैंड के सामने प्रकट किया । आज का विषय आरंभ करने के पूर्व में साहसपूर्वक तुम लोगों से कहना चाहता हूँ कुछ दिनों से मेरे चारों ओर कुछ ऐसी परिस्थितियां उपस् थित हो रही है । मेरी कार्य की उन्नति में, विशेष रूप से विघ्न डालने की चेष्टा कर रही । यहाँ तक कि यदि संभव हो सके तो वे मुझे एक बार ही कुछ लेकर मेरा अस्तित्व ही नष्ट करना है । मैं अगर तीन वर्षों से देख रहा हूँ कुछ लोग मेरी मेरी कार्यों के संबंध में, कुछ भ्रांत धारणाएं बनाए हुए जब तक मैं विदेश में था, मैं शुभ रहे । मैं स्पष्टीकरण करने के रूप में कुछ शब्द कहना चाहता हूँ । इन शब्दों का क्या फल होगा अथवा विश शब्द तुम लोगों के हृदय में किन किन भावों का उद्रेक करेंगे, इसकी मैं परवाह नहीं । मुझे बहुत कम चिंता है क्योंकि मैं वहीं सन्यासी हूँ जिसमें लगभग चार वर्ष पहले आपने दंड और कमंडलु के साथ तुम्हारे नगर में प्रवेश किया था और सारी दुनिया इस समय मेरे सामने पडी । देश विरोधी और राष्ट्रविरोधी तत्वों के लिए जब सी लिए तथा प्रत्यक्ष रूप से लडना संभव नहीं रहता तो मित्र का छद्म रूप धरकर हमारी पंक्तियों में घुस आते हैं । अभी तैसी रूप में हमारे चिंतन को गलत दिशा देकर विजय को पराजय में बदलने और हमारा स्थिति तक मिटा देने की चेष्टा करते हैं थी । उस ऑफिस जब सीधे आक्रमण में परास्त हुए और भारत के राष्ट्रीय तत्वों ने विवेकानंद को अपना धार्मिक नेता घोषित कर दिया तो इन लोगों ने यही हथकंडा उन्होंने ये कहना शुरू कर दिया कि उन्होंने विवेकानंद को हर तरह की सहायता दी और उनके कार्य को आगे बढाने के लिए रास्ता बनाया । विवेक बुद्धि वाले विवेकानंद शत्रु को मित्र भला कैसे समझ लेते हैं? उन्होंने भाषण जारी रखते हुए इस पाखंड का पर्दाफाश किया । बिना और किसी भूमिका की मैं अपने विषय को आरंभ करता हूँ । सबसे पहले मुझे थियोसॉफिकल सोसाइटी के संबंध में कुछ कहना है । शिकागो में होटल का दो हफ्ते का बिल चुकाने के बाद जब उन की हालत खस्ता हो गई थी, उसका उल्लेख करते हुए कहा, एक समय मेरे पास केवल कुछ ही डॉलर बच्चे थे । मैंने अपने मद्रास वासी मित्रों को तार की जाए । ये बात तो साफ सिस्टर को मालूम हो गई और उनमें से एक ने लिखा अब शैतान शीघ्र ही मर जाएगा । ईश्वर की कृपा से अच्छा ही हुआ । बना दूँ तो क्या यही मेरे लिए रास्ता बना देना था? मैं ये बात ही इस समय कहना नहीं चाहता था । हिंदू मेरे देशवासी ये सब जानने की छुट्टी इसलिए कहनी । पर ये बात यहीं पर खत्म नहीं हो जाएगा । मैंने धर्म महासभा में कई ऍम मैंने उनसे बातचीत करना और मिलने जुलने की चीज तक ही उन लोगों ने जिस अवज्ञा भरे दृष्टि से मेरी ओर देखा वो आज भी मेरी नजरों पर नाच रही मानवः कह रही थी ये कहाँ का छूट रखेडा यहाँ देवताओं के बीच में आ गया । मैं पूछता हूँ क्या यही मेरे लिए रास्ता बना देना? हाँ तो धर्म महासभा में मेरा बहुत नाम तथा यह हो गया और तब से मेरे ऊपर अत्यधिक कार्यभार आ गया । पर प्रत्येक स्थान पर इन लोगों ने मुझे दबाने की चेष्टा की । फॅमिली के सदस्यों को मेरे व्याख्यान सुनने की मना ही कर दी गई । यदि वे मेरी वक्तृता सुनने आते तो वहाँ सोसाइटी गुप्त विभाग ऍफ का यही नियम है कि जो मनुष्य उक्त विभाग का सदस्य होता है उसे केवल उधर में और मोरिया के पास ही से शिक्षा ग्रहण करनी पडती है अथवा इनके दृश्य प्रतिनिधि मिस्टर जज और मैसेज ऍसे मित्र भेज धारी देश शत्रुओं को स्वामी जी ने भलीभांति पहचान लिया था । इनके प्रति उनके मन में प्रचंड घृणा तथा आक्रोश था । इनके बाद पंद्रह मई अठारह सौ छियानवे के पत्र में लिखते हैं क्यों सौं लोगों ने मेरी चापलूसी और मिथ्या प्रशंसा करने का यह ना किया था क्योंकि भारत में अब मैं नेता माना जाता हूँ इसलिए मेरे लिए आवश्यक हो गया कि मैं कुछ बेधडक और निश्चित शब्दों में उनका खानदान करूँ मैंने ये क्या भी और मैं बहुत खुश । यदि मेरा स्वास्थ्य ठीक होता तो मैं इस समय तक इन नए उत्पन्न हुए पाखंडियों का भारत से सफाया कर देगा । कम से कम भरसक प्रयत्न तो करता ही है । इसी कडी फटकार और इस वक्त घृणा के बावजूद विवेकानंद को ख्याति से अपने को लाभान्वित करने के लिए तो ऑफिस सांप्रदायकि चालाक और मक्कार नेत्री एनी बेसेंट ने उनकी मृत्यु के बारह बरस बाद मार्च चौदह कि ब्रह्म आबादी पत्रिका में लिखा था महिमा में मूर्ति गैरिक से भूषित शिकागो नगर के धूम मलिन दूसरे रिक्शे पर भारतीय सूर्य की तरह नीतिमान उन्नत सिर मर्मभेदी दृष्टि पूर्ण आंखे चंचल वोट । मनोहरन भंगी धर्म महासभा के प्रतिनिधियों के लिए निर्दिष्ट कमरे में स्वामी विवेकानंद निर्यातको मैं प्रथम किसी रूपमें प्रतिमाह हुए थे । वे संन्यासी के नाम से विख्यात है परन्तु ये समर्थन है या नहीं है क्योंकि प्रथम दृष्टि में वे सन्यासी के बजाय यौद्धा ही समझे जाते थे और वास्तव में वो एक योद्धा संन्यासी भी थे । ये भारत गौरव राष्ट्र के मुख को उज्जवल करने वाले, सबसे पुराने धर्म के प्रतिनिधि, दूसरे उपस् थित प्रतिनिधियों में उम्र में सबसे छोटे होने पर भी प्राचीनतम् श्रेष्ठतम सतह जीती जाती मूर्ति रूपी दूसरे किसी से भी करना है । वृद्ध नतीश ई उध्वस्त पाश्चात्य जगत में दूध का काम करने के लिए अपनी जन्मभूमि की गौरवपूर्ण कथाओ को ना भूल कर भारत के संदेश की घोषणा की । शक्तिमान, दृढसंकल्प तथा उद्यमशील स्वामी जी में अपने मत का समर्थन करने के लिए काफी क्षमता थी । इस चापलूसी भरे शब्दजाल का यदि शुरू में विवेचन किया जाए तो साम्राज्यवाद कि धूर्त संधान ने धर्म महासभा में स्वामी जी की वास्तविक भूमिका राष्ट्रीय उद्देश्य उपेक्षा करके सबसे पुराने धर्म की गौरवपूर्ण कथाओ ही प्रमुखता प्रदान की है और इससे अलग पहले में जिसे यहाँ नकल करने की जरूरत नहीं, धर्म महासभा में उनके व्याख्यानों को अतुल्नीय धार्मिक वार्ता बताया है । इससे अधिक कुछ नहीं । क्या ये खोल को रखकर बंदे को नष्ट करने और विवेकानंद के अस्तित्व को मिटा देने की सोची समझी चेष्टा नहीं? क्या ये हमारे ध्यान को प्रमुख से हटाकर गौड पर केंद्रित करके हमारी राष्ट्रीय जीतना को कुंठित करनी एवं उसे गलत दिशा देने का ही बहुत ही षडयंत्र नहीं किया? इसे मित्र देश में क्षेत्रों की भूमिका के अतिरिक्त और कोई संज्ञा दी जा सकती है? हमें खेद है कि जो व्यक्ति एक ही वस्तु, एक ही प्रवृत्ति बधाई की सिद्धांत में बाद और प्रतिवाद के संघर्ष को नहीं समझती, वे षड्यंत्र को कभी नहीं समझ पाए । लेकिन विवेकानंद बाद और प्रतिवाद के एक दूसरे को कुछ डालने वाले संघर्ष को भलीभांति समझते थे और यही कारण है कि उन्होंने थियोसॉफी स्टोर तथा उन सरीखे रंगे सियारों छोटी प्रशंसा को घृणा से ठुकराया और भारतीय राष्ट्र के प्रति समूची मानवता के प्रति किए गए उनके गुनाहों को जीते जी कभी माफ नहीं । उन्होंने शाश्वत सत्य को पहचान लिया था कि इन विरोधी तत्वों को मिटा देने ही से अपने अस्तित्व की रक्षा संभव है । यही कारण था कि विरोध की इस प्रबल तूफान में वे चट्टान की तरह दृढ रहे । विरोधी समितियों और संप्रदायों ने उन्हें अपने साथ शामिल करने के लिए पहले प्रलोभन दिए और अंत में अनेक प्रकार के भय दिखाया । पर विवेकानन्द दस से मसला हुए और उन्होंने निर्भिक स्वर में घोषित किया । मैं सत्य का आग्रही और सत्य का उपासक हूँ । सत्य कभी किसी भी स्थिति में मित्तियां से समझौता नहीं करेगा । यदि सारी दुनिया भी आज एक मत होकर मेरे वृद्ध खडी हो जाए तो भी सत्य की ही जीत होगी । उस समय अमेरिका की आबादी छह करोड की करीब । इसमें साई एकतिहाई पर थियोसॉफी सिर छह सौ पचास या ईसाई भी कैथोलिक प्रोटेस्टेंट कॅरियर तथा क्रिश्चियन साइंस हत्यारी सांप्रदायों में पडे हुए थे । चलते पुर्जे दुनियादार लोगी प्राय का इनकी अनुयायी थे जिन्हें धर्म के सूक्ष्मता दार्शनिक तत्व से कुछ लेना देना नहीं । जो भोगविलास का जीवन बिता देते, जो नरक की आग में निरंतर चलने के भय से और स्वर्ग में अपनी सीट रिजर्व कराने के लिए धर्म को मानते हैं और यही वे लोग थे जो निकृष्टता, शुभ्रता, प्रकांड मूर्खता एवं दम भीम ऊर्जा को साकार बनाते थे और इन्हीं के प्रति विवेकानंद के मन में सहसा घृणा जाऊँ । ईसाइयों में भी जो विचारशील श्रेष्ठ तत्व के विवेकानंद का आदर करते थे, वो उनका भाषण सुनकर और उनसे विचारों का आदान प्रदान करके प्रसन्न होते थे । अमेरिका में अधिकांश लोग वेट के जो डार्विन के विकासवाद, हरबर्ट स्पेंसर के अज्ञ बाद तथा विज्ञान के नया अविष्कार से प्रभावित थी, जो सादा वादी, युग विवादी एवं नासिक थे और जो धर्म तथा धर्म के सभी कार्यों को कोठगी तथा कुसंस्कार कहकर निकालते थे, वे सब स्वाधीन चिंतन दल फ्री थिंकर सोसाइटी के सदस्य । ये लोग भी विवेकानंद का विरोध करते थे और मजाक उडाने में खूब सक्रिय ॅ कोई इनसे भले ही बाल मिला, पर इनका विरोध नहीं, इस बार निष्कपट और लोगों के विरोध से एक दम था । इन लोगों ने एक बार विवेकानंद को अपने समाज ग्रुप में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया । उनके भाषण और बाद में पूछे गए प्रश्नों की युक्ति । संगत उत्तरों से ये लोग इतने प्रभावित हुए । दल के अनेक सदस्य विवेकानंद के शिष्या मन है । लैनिंग की धर्म पर विचार पुस्तक की भूमिका में लिखा है हम ज्यादा ये बता देगी अनीश्वरवाद मार्क्सवाद के बिना पूर्ण तथा निश्चित है स्तर की की पुष्टि । पूंजीवादी स्वतंत्र विचारकों के आंदोलन की अब नदी से होती है । विज्ञान का भौतिक बाद जहाँ भी ऐतिहासिक भौतिकवाद अर्थात मार्क्सवाद में विकसित नहीं हो पाता, वही उसका अंत आदर्शवाद ऍम में होना । साहित्य प्रदर्शन में प्रवीन इस दल के नेता रॉबर्ट इंगरसोल धर्म विरोधी होने के बावजूद इतने लोकप्रिय वक्ता के कि सिर्फ भाषण देकर लाखों रुपया का मालिक है । उस भाषण के बाद बेबी विवेकानंद के मित्र बन गए । सन्यासी विवेकानंद और भूख बार इंगरसोल । ये मित्रता बडी बचित्र थी । पर कालिदास के शब्दों में यानी ने ज्ञानी को पहली वार्ता में पहचान लिया था । हाँ, विवेकानन्द को नहीं दुनिया की कृष्ण विचारशील तत्वों से आदर सरकार प्राप्त हुआ और धीरे धीरे विरोध शाम हो गया । इस बीच में उन्होंने ये भी अनुभव किया कि अनमेल भीड के समूह भाषण देते करना है और व्याख्यान कंपनी के लोग अधिक से अधिक धन बटोरने की नियत से उन्हें सर किसकी घोडे की तरह करना चाहते कर रहे हैं । उनका उद्देश्य धन कमाना कदाचित नहीं था । मित्रों द्वारा उन्होंने कंपनी का अनुबंध रद्द कर दिया और न्यूयॉर्क में वेदांत पर निशुल्क क्लासिस लेना आरंभ । इससे भले ही आर्थिक हानि उठानी पडी पर सबके सामने उनकी निस्वार्थता प्रमाणित हो गई । न्यूयॉर्क में राज्यों पर उनके भाषण इतने लोकप्रिय हुए की जिस दिन ही कार्यक्रम रहता था उस दिन उनका छोटा सा कमरा नगर के दार्शनिको वैज्ञानिकों और अध्यापकों से भर जाता था । नहीं अठारह सौ पंचानवे स्वामी जी ने राज्यों पर अपनी प्रसिद्ध टीका मिस टेस्टी बाल तो बाद में सिस्टर हरी दासी को बोल कर लिखाई और इसके साथ पातंजलि के दर्शन का भाषा भी जोड दिया । यह पुस्तक इतनी पसंद की गई की कुछ सप्ताहों में इसके तीन संस्करण प्रकाशित हुए । उन्होंने अपने इस कार्य द्वारा कितने ही शिष्य और सहायक मित्र प्राप्त किए । पिछले एक डेढ साल में उन्हें कठोर परिश्रम करना पडा । अतीव आपने कुछ चुने हुए शिष्यों को साथ लेकर उन्होंने कुछ दिन सहस्त्र उद्यान हाउसिंग आइलैंड पाक में बिताए । वहाँ साॅस नदी के बीच उनकी शिष्य की सुंदर कोडिया नहीं । वहाँ स्वामी जी अपने शिष्य शिष्याओं के लिए आपने आज से भारतीय खाने तैयार करते हैं और शाम को भोजन के बाद दो ढाई घंटे की क्लास लेते थे । इस संबंध में कुमारी ऍम ने लिखा है इस गंधर्व राज्य में हमने आचार्य देर के साथ साथ सप्ताह दीप्ति आनंद से उनके अतींद्रः राज्य के संदेशों युक्त अपूर्वा वजन सुनने में वे भी किए । उस समय हम भी जगत को भूल गए थे और जगह को बुला देने के लिए कल्पना चाहे जितनी उडाने भरे अंत में उसे भौतिक जगत कि में लौट आना पडता है । कुमारी बॉल जो आगे लिखती है स्वामी जीएनसीएपी की राशी व कौतुक प्रिया और लास्ट के साथ परिहास करने में और बाद का तुरंत जवाब देने में वो आप व्यस्त थे । दो भी कभी मूर्त के लिए भी अपने जीवन के मूलमंत्र से लक्ष्य भ्रष्ट होते थे । प्रतीक चीज से ही वे बोलने या उदाहरण देने का विषय पाले पिस के और एक्शन में ही बिहार में आकर्षक हिंदू पौराणिक कथाओं से एक दम गंभीर दर्शन के बीच ले जाते थे । स्वामी जी, पौराणिक कथाओं का आशीष भंडार और वास्तव में प्राचीन आरियों से बढकर अन्य किसी भी जाति में इतनी अधिक पौराणिक कथाएं भी नहीं । वहाँ हमें उनका आदमियों को सुनाकर प्रसन्न होते थे और हम भी सुनना चाहते थे क्योंकि वे कभी उनका अनुपयोगी आठ में जो सत्य नहीं है, उसे दिखा देना तथा उसमें से मूल्यवान धर्म विषय उद््देश्यों का आविष्कार करना नाम होते थे या मेरी की शिष्या गंज जीवन जी रहे थे । उसकी आयु तीन सौ वर्ष से अधिक लंबी नहीं । उनका ना अपना कोई मैं थक, ना गंभीर दार्शनिक चिंतिन और ना ही समृद्ध उत्कृष्ट सांस्कृतिक परंपरा । उन्हें लिए देकर मार्कोपोलो और कोलंबस की यात्रा वर्णन की विरासत में मिले थे या फिर यूरोप से जो आया ले लिया । यही कारण है कि अमेरिकी चिंतन उतना चला है, उसकी साहित्य और कला भी खास परिहास तथा कौन तू कोई प्रधानता प्राप्त है? और तो इस समय हमारे समूह दो खंडों में जो बरहद अमेरिकी इतिहास रखा है, उसमें काजू नहीं मिलेंगे और न किसी अन्य राष्ट्र में उन्हें कभी इतना महत्व दिया है । सर आज ये है कि नईदुनिया इंग्लैंड, जर्मनी, स्पेन, हथियार, यूरोपियन देशों की सब्जियाँ तथा अर्ध सब जातियों का सम्मिश्रण अमेरिकी निवासियों के जीवन में मानव जाति के शैशव काल की निरीह कल्पना का नितांत अभाव था । वेदो, उपनिषदों और प्राणों की कहानियाँ और बहुत विवेकानंद की काव्यमय शैली में शिष्य जनों के लिए कितनी मनोरंजक होगी और भौतिक सुख साधनों से उकताए उनके मन के लिए, जगत को कुछ क्षण के लिए कि भुला देना कितनी राहत भी होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं । विवेकानंद ने एक बार आपने शिव से कहा एक महान देश लेकिन मैं यहाँ रहना नहीं चाहूंगा । अमेरिकी लोग पैसे को बहुत महत्व देती है । यह सब चीजों से बढकर पैसे को मानते हैं । तुम लोगों को बहुत कुछ सीखना है । जब तुम्हारा देश भी हमारे भारत की तरह प्राचीन देश बनेगा तब तो मैं एक समझदार बनाओ । इस संबंध में एक और घटना का उल्लेख भी आवश्यक है । जब राजीव पुस्तक छपी तो उस समय का प्रसिद्ध दास ने विलियम जेम्स उस से इतना प्रभावित हुआ कि वह विवेकानंद से मिलने आया । विलियम जेम्स को व्यवहार बाद प्राग मार्टिंसन का सिद्धांत प्रतिपादित करने का श्रेय प्राप्त सिद्धां के अनुसार सत्य वातावरण से जूझने के कार्यों में तत्कालिक देश की प्राप्ति का साधन मात्र है । अर्धा सिद्धांत का सारा तो ये है कि सत्य उपयोगी होने के कारण ही सकते हैं । साम्राज्य तथा व्यापार के विस्तार के लिए सरपट दौड रहे नई दुनिया के शासक वर्ग का यही सिद्धांत था और अब भी हैं । इस शासक वर्ग द्वारा राज्यों भी शुद्ध व्यवहारिक उपयोगिता की दृष्टि से भौतिक सामर्थ्य के साधन के रूप में देखा गया । आकार में डकैती और बुड्ढी में बालक के समान मेरी की जनता उसी सूज में रूचि लेती है जो सब कोई लाभ कर सके । तत्व मिमांसा और धर्म को बिगाड कर झूठे वैज्ञानिक प्रयोगों का रूप दिया जाता है । उद्देश्य होता है सत्ता की धन बल संसार सुखी दी हाँ विवेकानन्द से ये कब सहन होता है? उन्होंने लूट खसोट तथा स्वार्थ से उत्पन्न प्रवृत्ति कि सार्वजनिक रूप से निंदा की । पादरियों को विरोध का एक और अवसर मिला और उन्होंने आरोप लगाया कि विवेकानंद धर्म की आड में राजनीति का प्रचार कर रही है । अगस्त से दिसंबर अठारह सौ तक का समय उन्होंने इंग्लैंड में बताया । उसके बाद अमेरिका लौट वहाँ उन्होंने कर्मयोग, भक्तियोग, क्लासिस लेने के अलावा न्यूयाॅर्क, डिट्रॉइट आदि में व्याख्यान दिए । फ्राॅड की अध्यक्षता में विधान समाज की स्थापना कि जो कुछ समय तक न्यूयॉर्क में वेदांत आंदोलन का केंद्र बना रहा । ये केंद्र तो क्या बचना था अमेरिका में उन्होंने अपनी जो बहुत शिष्य बनाये थे एक दो छोड कर ये सब खोटे सिक्के साबित हुए । अप्रैल अठारह सौ छियानवे में विवेकानंद फिर इंग्लैंड आए और साल के अंत में स्वदेश लौटने तक वही रहे । क्या भारत को समझने वाले मैक्स मूलर सरीके विद्वानों से उनकी भेंट हुई थी । मैक्समूलर ने उनसे भेंट के बाद रामकृष्ण परमहंस पर एक लीग और फिर पुस्तक ली थी । यहाँ मिशनरियों ने उनका विरोध नहीं किया । अलबत्ता लंदन में उनसे किसी ने प्रश्न किया आप के पूर्व जगह मानव समाज को धर्म मतदान के लिए इतने उत्सुक थे तो इस देश में धर्म प्रचार करने क्यों नहीं है? स्वामी जी ने मृदुल भालसे मुस्कुराते हुए चैट से उतर गया । उस समय तुम्हारे पूर्वस्तर चांदी बरबर थी । बच्चों की हरे रंग से आपने उल्लंघन शरीर को रंग गैर पर्वतों की गुफाओं में रहते थे पे कहा धर्म प्रचार करने वैसे इंग्लैंड वासियों से उन्हें कोई शिकायत नहीं । फ्रांसिस लैंगेट के नाम पत्र में लिखते हैं, इंग्लैंड में ये कार्य चुपचाप पर निश्चित रूप से बढ रहा है । यहाँ पर और दूसरी पुरूषत्व स्त्री ने मेरे पास आकर मेरे कार्य के संबंध में बातचीत की । मेरा विचार है कि मैं धीरे धीरे उस व्यवस्था की ओर बढ रहा हूँ । यहाँ अगर खुद शैतान भी हो तो भी मैं प्यार कर सकूंगा और वे श्रीमति ऑल बिल को लिखते हैं । अंग्रेज जाती अत्यंत उदार है । उस दिन करीब तीन मिनट के अन्दर ये आगामी सर्दी में कार्य संचालन, आर्थ नवीन मकान के लिए मेरी कक्षा से डेढ सौ पांच का चंदा मिला । यदि मांगा जाता तो तत्कालीन पांच सौ पौंड प्रदान करने में किंचित मात्र भी नहीं सकते । यहाँ पर इस कार्य का संचालन करने के लिए हमें अनेक व्यक्ति प्राप्त करने होंगे एवं वे लोग क्या की भावना से भी कुछ कुछ परिषद है । अंग्रेजों के चित्र की गहराई का पता नहीं मिलता है । स्वदेश लौटते समय चार शिष्य सेवियर दंपत्ति गुड और भगिनी निवेदिता, जिनके साथ आए भी इंग्लैंड से मिले सीबीआई दंपति धनी व्यक्ति अल्मोडा में मायावती आश्रम उन्हीं के प्रयासों से स्थापित हुआ । गुडविन आशुलिपि ने पढे थे उन्होंने निःशुल्क अपनी सेवाएं अर्पित हाँ विवेकानन्द के बहुत से भाषण उन्हीं के द्वारा लिपिबद्ध होकर हमारी अमूल्य भी बन सकते । भगिनी निवेदिता मैं मार्ग्रेट नोबेल का नाम तो विवेकानंद के साथ ऐसा जुड गया है जिससे गुरु नानक के साथ बाला और मर्दाना का वहाँ दृढ चरित्र कि विदेशी महिला हमारे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में उस की वही भूमिका है जो चीन की क्रांति में भी वो बंदी उसने क्रांतिकारी आंदोलन को संगठित करने में अपना जीवन अर्पित कर दिया । खेल है कि हम यू ऍम और रेडियो को तो जो मित्र के वेश में शत्रु थे, श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और जिस निवेदिता ने हमारी गुलामी की जंजीरे तोडने के लिए प्राण त्याग दिए, उसे हमने बना दिया । विवेकानन् को अमेरिका से जो मिल तम सहानुभूति प्राप्त हुई । कुमारी मेरी रेल, उसके सचिव प्रतिमा की विवेकानंद ने उसे बहन बनाकर हृदय का समस्त प्यार दिया । निवेदिता हमारे समूचे राष्ट्र की बहन है और उसकी पूर्ण स्मृति बसने तथा कृतज्ञता के फूल चढाते रहना हमारा राष्ट्रीय गौरव विवेकानंद ने अमेरिका और इंग्लैंड में चार बरस तक जो प्रचार कार्य किया, उससे उनके अपने व्यक्तित्व का जो निर्माण हुआ उस पर विचार कर लेना अत्यावश्यक है । पाश्चात श्रोताओं की समुख अपने विचार व्यक्त करने के लिए विवेकानंद ने अपने मस्तिष्क में जब कार्यपद्धति स्थिर की थी, फरवरी अठारह सौ छियानवे हो हाला सिंगा पेरूमल के नाम पत्र में उनका उल्लेख किस प्रकार क्या है? हिन्दू भागों को अंग्रेजी में व्यक्त करना फिर शुष्क दर्शन पेचीदी । पौराणिक कथाएं और अनूठे आश्चर्यजनक मनोविज्ञान से ऐसी धर्म का निर्माण करना जो सरल, सहज और लोकप्रिय हो और उसके साथ ही उन्नत मस्तिष्क वालों को संतुष्ट कर सके । इस कार्य की कठिनाइयों को वही समझ सकती है जिन्होंने इसके लिए प्रयत्न किया । अद्वैत के गुड सिद्धांतों में से नित्यप्रति के जीवन की ये कविता का रस और जीवनदायिनी शक्ति उत्पन्न करनी हैं । अत्यंत उलझी हुई पौराणिक कथाओं में से साकार नीति के नियम निकाल लें और बुद्धि को भ्रम में डालने वाली योगविद्या से अत्यंत वैज्ञानिक प्रक्रियात्मक मनोविज्ञान का विकास करना है । और इन सबको एक ऐसी रूप में लाना पडेगा कि बच्चा बच्चा इसे समस्या मेरे जीवन का यही कार्य है । ये कार्य सहज नहीं था । इंग्लैंड और अमेरिका के समुद्र श्रोताओं को अपनी बात समझाते समझाते ज्ञान का विकास और खोल का विस्तार निरंतर होता रहा । होना स्वाभाविक ही था । हाला सिंगारे रोमल जी के नाम एक और पत्र में में लिखते हैं, अब मैं तुम्हें अपने नूतन अविष्कार के विषय में बताऊंगा । समग्र धर्म वीरान ही में है । असाध् वेदांत दर्शन के विशिष्टाद्वैत और अद्वैत इन तीन सरोया भूमि गांव में है और ये एक के बाद एक आते हैं तथा म निश्चित ही आध्यात्मिक उन्नति की क्रमसे ये तीन भूमिकाएँ प्रतीक भूमिका आवश्यक है हिसार रूप से धर्म है भारत की नाना प्रकार की । जातीय आचार व्यवहार और धर्म मदों में वी दांत के प्रयोग का नाम है हिन्दू धर्म । यूरोप की जातियां विचारों में उसकी पहली भूमिका ऍफ का प्रयोग है । इसाई धर्म सेमेटिक जातियों में उसका प्रयोग इस्लाम धर्म अद्वैतवादी, अपनी योगा, अनुभूति के आकार में हुआ बहुत धर्म इत्यादि । अस्तियानी धर्म का अर्थ है बेदान उसका विभिन्न राष्ट्र के विभिन्न प्रयोजन, परिवेश, इवन, अन्याय व्यवस्थाओं के अनुसार विभिन्न रूपों में बदलता ही रहेगा । इससे मन में जो अच्छा उत्साह उत्पन्न हुआ था, उसे मेरी हेल्थ के नाम नहीं । अठारह सौ छियानवे के पत्र में लिखा है मैं सब कुछ नवीन देखना चाहता हूँ । पुराने ध्वंसावशेष के चारों ओर आलसी की तरह चक्कर लगाना, अतीत इतिहासों को लेकर सारा जीवन हाय आय करना था । प्राचीनकाल के लोगों की बातों का चिंतन कर निराशा की दिल विश्वास छोडने के लिए मैं कतई तैयार ना । मेरे खून में जो जोश है, उसके कारण ऐसा करना मेरे लिए संभव नहीं । समस्त भावनाओं को प्रकाश में लाने के लिए उपयुक्त स्थान, पात्र तथा सहयोग की सुविधाएं एकमात्र अमेरिका ही में है और मैं भी आमूलचूल नहीं देखना चाहता हूँ कि परिवर्तन विरोधी जेली मछली, किसी चिंता, उस विराट पूंछ के लिए मुझ से कुछ हो सकता है क्या नहीं? मैं उन प्राचीन संस्कार को दूर हटाकर नवीन रूप से प्रारंभ करना चाहता हूँ । एकदम संपूर्ण नवीन सरल किंतु साथ ही साथ सबल सर्दी आजाद शिशु की तरह नवीन तथा सकते हैं । मतलब ये हैं कि विवेकानंद अपने भीतर जो आग लेकर गए थे, पांच चार के विज्ञान के संपर्क में आकर हाँ प्रचंड से प्रचंडता होगी । उसने श्वेत शिखा का रूप धारण कर लिया । इस वे अग्निशिखा को हृदय में धारण किए इंग्लैंड से रोज होते हुए अठारह सौ के आरंभ में स्वदेश लौट आए ।

Details
स्वामी विवेकानंद की अमरगाथा.... Swami Vivekanand | स्वामी विवेकानन्द Producer : Kuku FM Voiceover Artist : Raj Shrivastava