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6.  Swami Vivekanand in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts

Audio Book | 9mins

6. Swami Vivekanand in 

AuthorRaj Shrivastava
स्वामी विवेकानंद की अमरगाथा.... Swami Vivekanand | स्वामी विवेकानन्द Producer : Kuku FM Voiceover Artist : Raj Shrivastava
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ऍम विदेश यात्रा विस्तार जीवन है और संकोच मृत्यु । हाँ, विवेकानन्द भारत भ्रमण के दौरान विवेकानंद के पास सन्यासी होने के नाते दंड, कमंडलु तथा चंद्र पुस्तके रहती पर अब ट्रन, सूटकेस, बिस्तर, कपडे आदि काफी सामान था जिसे संभालने में काफी परेशानी उठानी पड रही थी । अपने स्वभाव के अनुसार जहाज कि यात्रियों से शीघ्र हल मिल गए और जहाज पर बनने वाले कई प्रकार के भोजन के भी बहुत धीरे धीरे आनी हो गए । मद्रास के अपने शिष्य आला सिंगा पेरूमल को लिखे पत्रों में इस यात्रा का वर्णन उन्होंने विस्तार से किया है । बेहतर होगा कि हम उसे उन्ही के शब्दों में उस वक्त करते । दस जुलाई अठारह सौ छियानवे याकोहामा जापान से लिखा है अपनी गतिविधि की सूचना तुम लोगों को बराबर ना देते रहने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ । यात्रा में जीवन बहुत व्यस्त रहता है और विशेष तथा बहुत साथ सामान सब आप अपने साथ रखना और उसकी देखभाल करना तो मेरे लिए एक नई बात है । इसी में मेरी काफी शक्ति लग रही है । बम्बई से कोलंबो पहुंचा हमारे सीमर वहाँ प्राया दिनभर ठहरा था । इस बीच सीएम मार से उतरकर मुझे शहर देखने का अवसर मिला । हम सडकों पर मोटर गाडी से गए । वहाँ की और सब वस्तुओं में बुद्धदेव के निर्माण के समय की लिपटी हुई मूर्ति याद मेरे मन में अभी तक ताजी है । दूसरा स्टेशन पर नाम था जो माल प्रायद्वीप में समुद्र किनारे एक छोटा सा टापू है । मलय निवासी सब मुसलमान । किसी जमाने में ये लोग मशहूर समुद्री डाकू थे और जहाजों में व्यापार करने वाले । इनके नाम से घबराते हिंदू । आजकल आधुनिक युद्धपोतों की चौकी मार करने वाली विशाल तोप के भय से ये लोग डकैती छोडकर शांतिप्रिय धंधों में लग गए । पिनांग से सिंगापुर जाते हुए हमें उच्च पर्वतमालाओं से युक्त सुमात्रा द्वीप दिखाई दिया । जहाज के कप्तान ने संकेत द्वारा मुझे समुद्री डाकुओं के बहुत सेट लिखा है । सिंगापुर स्टेट सेटलमेंट की राजधानी है । यहां सुंदर वनस्पति उद्यान है, जिसमें ताड जाती की तरह तरह की शानदार पेड लगाए गए हैं । यहाँ पंक्ति अनुमा पत्तों वाले ताड के पेड बहुतायात से पाए जाते हैं, जिन्हें यात्री तालवृक्ष कहा जाता है और ब्रेड सूट नामक पेड तो जहाँ देखो वहाँ मिलता है । मद्रास में जिस तरह आम कि पेड बहुतायात से होते हैं, उसी तरह यहाँ ॅ तीन नामक फल बहुत होता है, पर आम तो आना ही है । उसके साथ किस बल्कि तुलना हो सकती है । यद्यपि वहाँ स्थान भूमध्यरेखा से बहुत निकट है । फिर भी मद्रास के लोग जितने काले होते हैं, यहाँ के लोग उसके अर्धांग निकाली नहीं । सिंगापुर में बढिया अजायब घर भी है । इसके बाद हांगकांग हैं । यहाँ चीनी लोग इतनी अधिक संख्या में है कि ये भ्रम हो जाता है कि हम चीन ही पहुंच गए । ऐसा लगता है कि सभी श्रम, व्यापार आदि इन्ही के नातों में हैं और हांगकांग तो वास्तव में चीन ही हैं । जो भी जहाज वहाँ लंगर डालता है कि सैकडों चीनी होंगे या कुछ विचित्र सी लगती है । मांझी डोंगी पर ही से कुछ काम रहता है । पतवारों का संचालन प्रायः पत्नी ही करती है । एक पतवार दोनों हाथों से चलाती है और दूसरे को एक पैर से और उन में से फीसदी और जो की पीठ पर उनकी बच्चे इस प्रकार बंदे रहते हैं कि वे आसानी से हाथ पैर बुला सके । मजे की बात तो ये है कि ये नन्ने नन्ने चीनी बच्चे अपनी माताओं की पीठ पर आराम से झूमते रहते हैं और उनकी माता है । कभी अपनी सारी शक्ति लगाकर पतवार कुमार है, कभी भारी बोझ खेलती है या कभी बडी फूर्ति से डोंगी से दूसरी धोनी में जाती है और ये सब होता है लगातार इधर से उधर जाने वाली डोंगी हो और वाश नौकाओं भीड के बीच हर समय उन चीनी बाल गोपालों के शिखा युक्त मस्तिष्कों के चूर चूर हो जाने का डर रहता है । पर मैंने इसकी क्या परवाह उन्हें इन बाहर की हलचलों से कोई सरोकार नहीं । वे तो अपनी चावल की रोटी कुतर कुतर घर खाने में मस्त रहते हैं, जो काम के झंझटों में बौखलाई हुई माओ नहीं देती है । चीनी बच्चों को पूरा दार्शनिक की समझो । जिस उम्र में भारतीय बच्चे घुटनों के बल भी नहीं चल पाते, उस उम्र में वह स्थिर भाव से काम पर जाता है । आवश्यकता का दर्शन वो अच्छी तरह सी और समझ लेता है । चीनियों और भारतीयों की नितांत दरिद्रता ही ने उनकी सभ्यताओं को निर्जीव बना रखा है । साधारण हिंदू या चीनी के लिए उसकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति इतनी भयंकर लगती है कि उसे और कुछ सोचने की फुर्सत ही नहीं । सूची विवेकानंद क्या दिल और दिमाग लेकर यात्रा पर निकले थे ये पहनी और सूक्ष्म दृष्टि ये विशाल विराट से है । ये सौंदर्य प्री ये श्रम के प्रति आदर और यथार्थ विश्लेषण, उनकी यात्रा का वर्णन पढते हुए सबद्ध पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह चित्र के महासागर में कह रही हूँ । हांगकांग से स्वामी जी कैंटीन गए । वहाँ से अस्सी मील है । लिखा है जिस छोटे से भूभाग पर हम लोग उतरे वहाँ चीन सरकार की ओर से विदेशियों के रहने के लिए दी गई हैं । हमारे चारों ओर नदी के दोनों किनारों पर यहाँ नगर बसा हुआ है । एक विशाल जनसमूह जिसमें निरंतर कोलाहल, धक्कम, धक्का चहल पहल और परस्पर स्पर्धा ही का बोलबाला दिखाई पडता है । लेकिन चीनी महिलाएं बाहर दिखाई नहीं देती । उनमें उत्तर भारत की के समान पर्दे कहाँ रखा है? केवल मजदूर वर्ग की औरते बाहर दिखाई पडती है । उनमें से भी स्त्री ऐसी दिखाई पडेगी जिनमें पाँच बच्चों से भी छोटे हैं और वर्लड बनाती हुई चलती है । वे लौटकर हांगकांग है और फिर जापान के पहले बंदरगाह नागासाकी पहुंचे । नागासाकी से जहाज द्वारा खूबे और कौवे से जापान का मध्यभाग देखने स्थल मार्ग से को हम आ गए लिखा है इस मध्य भाग में मैंने तीन शहर देखिए । महान औद्योगिक अगर ओसाका, भूतपूर्व राजधानी, क्योटो और वर्तमान राजधानी क्योंकि टोक्यो कलकत्ता से प्रयाग दुगना बडा होगा और आबादी भी लगभग दुगुनी होगी । जापान उस समय जर्मनी की ही तरह उत्साह और शक्ति से भरपूर जवान पूंजीवादी देश था । वहाँ आशियाकी देशों से हर बात में होड ले रहा था । इससे ठीक बारह बरस बाद उसने जारशाही रूस को युद्ध में हराया । जापान की उभरती और पैर फैला रही शक्ति का विवेकानंद ने यहाँ वर्णन किया है । जान पडता है । जापानी लोग वर्तमान आवश्यकताओं की प्रति पूर्ण सचेत हो गए हैं । उनकी पूर्ण सुव्यवस्थित सेना है जिसमें यही के अवसर द्वारा आविष्कृत तो पे काम में लाई जाती हैं और जो अन्य देशों की तुलना में किसी से कम नहीं । वे लोग अपनी नौसेना बढाते जा रहे हैं । मैं जापान इंजीनियर की बनाई करीब एक मील लंबी सुरंग देखी है । दियासिलाई की कारखाने तो देखते ही बनते हैं । अपनी आवश्यकताओं की सभी चीजें अपने देश में बनाने के लिए लोग तुले हुए हैं । चीन और जापान की भी चलने वाली जापानी सीमर लाइन हैं जो कुछ दिनों में बम्बई और याकोहामा के बीच यात्री जहाज चलाना चाहती है और एक क्षेत्र उनके राष्ट्रीय जीवन का भी देखिए जापानी लोग ठीक ने गोरी और विचित्र वेशभूषा वाले हैं । उनकी चार धाल हावभाव, रंग ढंग सभी सुंदर है । जापान सौंदर्य भूमि है । प्रायः प्रत्येक घर के पिछवाडे जापानी ढंग का बढिया बगीचा रहता है । इन बगीचों कि छोटे छोटे लगा वृक्ष हरे भरे घास के मैदान, छोटे छोटे जलाशय और नालियों पर बने हुए छोटे छोटे पत्थर के पूल बडे से सामने लगती है । इधर जापान का ये वैभव और उधर जीर्णशीर्ण भारत और उसका आत्मकेंद्रित स्वार्थ । खान शिक्षित वर्ग कलम घूमने गए कि खून में डुबोकर लिखा जापानियों के विषय में जो कुछ मेरे मन में, वह सब में छोटे से पत्र में लिखने में असमर्थ हूँ । मेरी केवल ये इच्छा है कि प्रतिवर्ष यथेष्ठ संख्या में हमारे नवयुवकों को चीन और जापान में आना चाहिए । जब पानी लोगों के लिए आज भारत वर्ष उच्च और श्रेष्ठ वस्तुओं स्वस्थ नाराज है और तुम लोग क्या कर रहे हो? जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हूँ व्यर्थ बकवास करने वाले तुम लोग क्या हो आओ इन लोगों को देखो और उसके बाद जाकर लज्जा से मुझे पालों युगों की सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले भला बताओ तो सही तुम कौन हूँ और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? किताबें हाथ में लिए तुम सिर्फ समुद्र किनारे फिर यूरोपियन के मस्तिष्क से निकली हुई इधर उधर की बातों को लेकर बेसा मुझे दौरा रहे हो । अपनी इस लंबी यात्रा में देश को फॅमिली नहीं । अब भी अमेरिका जाने के लिए जहाज पर सवार हुए जो प्रशांत महासागर के उत्तरी भाग से होता हुआ बैंकूवर बंदरगाह पर्चा लगा । यहाँ से वे कनाडा के बीच में से तीन दिन की रेल यात्रा के बाद । शिकागो पहुंच आपने गेरुआ वस्त्र के कारण वे राह चलते लोगों के लिए तमाशा बन गए । वे ना सिर्फ उत्सुकता और कौतुहल में भरे देखते थे बल्कि घेर लेंगे और बताते थे बच्चे उनकी हंसी उडाते और शोर मचाते हुए उनके पीछे पीछे चलते थे । दूसरी मुसीबत ये कि बैंक हुए इसे धोखेबाजी और गिर सकती शुरू हो गई । जैसे जिसका दाव चलता था, वैसे उन्हें ठगने का प्रयत्न करता था । कुलियों की ही मूड भरना मुश्किल हो गया । होटल में ठहरे तो वहाँ भी यही परेशानी लिखा है मेरा और सिर्फ एक फोन हर रोज खर्च होता । यहाँ एक जुट ही का खर्च हमारे यहाँ की आई आने हैं । अमेरिका वाले धनी हैं कि वो पानी की तरह रुपया बहाते हैं और उन्होंने कानून बनाकर सब चीजों का दाम इतना अधिक रखा है कि दुनिया का और कोई राष्ट्र किसी तरह स्तर पर नहीं पहुंच सकता । साधारण कुली भी हर रोज छह से दस रुपया कमाता है और इतने ही खर्च करता है । अब मुझे असंभव स्थानों से संघर्ष करना पडता है । सैकडों बार इच्छा हुई कि मैं इस देश से चल और भारत लौटाऊं । सुनहरे सपने टूटने का कारण ये था कि अमेरिका पर अठारह सौ नब्बे से आर्थिक संकट के बादल मंडरा रहे थे और अब अठारह सौ छियानवे में ये बहुत गहरा गया । इसी के बारे में पंद्रह हजार फर्मों, बैंक और छोटे कारखानों का दिवाला पीता हजारों मजदूर बेकार हो गए और जो काम पर थे उन की मजदूरी घटा दी गई । विवेकानंद जिस अमेरिका से भारत के चरित्रों के लिए धन जुटाने गए थे, वहाँ पैसे के लिए हायतौबा मची हुई । अमेरिका के अभिजात वर्ग का जीवन कितना सतही तथा विडंबनापूर्ण था, इसके बारे में लिखा है वर्धा राव ने जिस महिला से मेरा परिचय करा दिया था, वे और उनके पति शिकागो समाज के बडे गणमान्य व्यक्ति है । उन्होंने मुझे बहुत अच्छा बर्ताव किया परन्तु यहाँ के लोग विदेशियों का जो सरकार करते हैं वो केवल और उसको दिखाने के लिए ही है । धन की सहायता करते समय प्राया सभी मूल लेते हैं । इन्हीं दिन शिकागो से मिशिगन झील के किनारे जैक्सन पार्क में विश्व प्रदर्शनी हो रही थी । ये प्रदर्शनी कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज की चौथी शताब्दी मनाने के लिए आयोजित की गई । इसलिए इसे विश्व कोलंबस प्रदर्शनी कहा जाता था । जिन चार सौ बडी इमारतों में ये प्रदर्शनी पहली मई से पहली नवंबर अठारह सौ तक छह महीने चली, उन का निर्माण दो बरस में हुआ था । इसमें देशों और अमरीका के तमाम राज्यों ने भाग लिया । कोलंबस के बाद से चार सौ बरस में पाश्चात्य देशों ने विज्ञान उद्योग और कलाम जन्नती की वहाँ प्रदर्शित हुई थी । धर्म महासभा भी इसी उपलक्ष्य में बुलाई गई थी । उसके अलावा शिक्षा, दर्शन, उद्योग और समाज संबंधी विषयों पर अलग अलग सम्मेलन हुए जिनमें लगभग छह हजार पत्र पडे गए और उन्हें सात लाख श्रोताओं ने सुना । विवेकानन्द शिकागो में ग्यारह दिन रुके और वे हर रोज प्रदर्शनी देखने जाते हैं । विज्ञान के नए नए आविष्कार, कई प्रकार के छोटे बडे यंत्र और तरह तरह की विचित्र वस्तुएं देख कर स्वामी बालक के सदृश्य सुन के मेले की इमारतें वास्तुकला का शाहकार थी । मुख्य इमारतों के मध्य जो विशाल चौक था, उसमें स्वाधीनता की भव्य मूर्ति थी । एक तरफ विशाल फब्बारा था और दूसरी तरफ स्तंभ पंक्ति । मेले की विशिष्ट वस्तु इंजीनियर डब्ल्यूजी फॅमिली था, जो खास तौर पर इसी अवसर के लिए बनाया गया था । विवेकानंद ने दस ग्यारह दिन तक इस प्रदर्शनी को देखा फिर भी मन नहीं भरा । विज्ञान और नए के प्रति उनके मन में जो आकर्षण था उसका एक और उधारण यह है कि चार बरस बाद जब सी वीर दंपत्ति के साथ इंग्लैंड स्विट्जरलैंड गए तो जिनेवा में एक कला प्रदर्शनी चल रही थी । उन्होंने इसे दिनभर चाव से देखा । अंत में बेलून देखकर में उसमें उडने के लिए मछली थे । बेलून एक नया अविष्कार और इसमें आकाश रमन जोखिम से खाली नहीं था इसलिए श्रीमती सीवी ने उसमें उठने पर आपत्ति की । लेकिन स्वामी जी कब मानने वाले थे पीना सिर्फ खुद खडे बल्कि सिवियर दंपति को भी साथ बैठाया । आकाश साफ सुथरा था ऊपर से सूरज डूबने का मनोहर दृश्य देखकर स्वामी जी बडे प्रसन्न बेलून जब धरती हुई जो दिलचस्प भी है और इससे कई बातों पर प्रकाश भी पडता है । ये घटना उन्होंने अपने पत्र में रोचक ढंग से बयान की है । अभी हाल में शिकागो में एक बडा तमाशा हुआ । कपूरथला के राजा यहाँ बता रहे थे और शिकागो समाज की कुछ लोग उन्हें आसमान पर चढा रहे थे । मेले में राजा के साथ मेरी मुलाकात हुई थी पर्व जो अमीर आदमी ठहरे, मुझे फकीर के साथ बातचीत क्यों करते? उधर एक सनकी साथ धोती पहने हुए महाराष्ट्र ग्रामीण मेले में कागज पर नाखून के सहारे बनी हुई तस्वीरें बेच रहा था । उसने अखबारों के संवाददाताओं से उस राजा के विरुद्ध तरह तरह की बातें कहती । उसने कहा था कि ये आदमी बडी नीच जाति का है और ये राजा गुलाम के अलावा और कुछ नहीं है । और ये बहुत दुराचारी होते हैं इत्यादि और यहाँ के सत्यवादी संपादकों ने, जिनके लिए अमेरिका मशहूर हैं । इस आदमी की बातों को कुछ वृद्धों देने के लिए अगले दिन के अखबारों में स्तंभ के स्तंभ रंग डालें जिनमें उन्होंने भारत से आए एक ज्ञानी पुरुष का उसका मतलब मुझ से था, वर्णन किया और मेरी प्रशंसा के पूल बांध कर मेरे मुँह से ऐसी कल्पित बातें निकलवा डाली की जिनको मैंने स्वप्न में भी कभी नहीं सोचा था । उस महाराष्ट्रीय ग्रामीण ने कपूरथला के राजा के संबंध में जो कुछ कहा था उन सबको उन्होंने मेरे ही मुख से निकला हुआ रख दिया । अखबारों ने ऐसी खासी मरम्मत की की शिकागो समाज में तुरंत राजा को त्याग दिया । इस से ये भी प्रकट होता है कि इस देश में धनिया खिताबों की चमक दमक की अपेक्षा बुद्धि की कदर अधिक उन्हें एक दिन पता चला कि धर्म महासभा सितंबर से पहले नहीं होंगी और ये भी पता चला की सभा की नियमावली के अनुसार किसी सभा सोसाइटी के परिचय पत्र के बिना कोई भी व्यक्ति प्रतिनिधि नहीं बन सकता और प्रतिनिधि बनने के लिए ये समय निश्चित था वह भी चुका है । मतलब ये स्वामी जी को हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में उसमें शामिल होना असंभव दिखाई दिया । उनके पास धन बचा था उसमें से अधिकांश होटल के दो हफ्तों के खर्च में उड गया । वहाँ की ठंड सहन करने लायक गर्म कपडे भी उनके पास नहीं थे । तो हैरान और परेशान शिकागो से हॉस्टल गए । कुछ भी हो वो अमेरिका ही में रहकर वेदांत का प्रचार करना चाहते थे । जब बॉस्टन से लौट रहे थे तो अचानक गाडी में एक धनी वृद्ध महिला से उनका परिचय हो गया । उसे जब पूछने पर मालूम हुआ कि विवेकानंद एक भारतीय सन्यासी अमेरिका में वेदांता प्रचार करने आए हैं तो वहाँ उन्हें अपने साथ एक करीब के गांव में ली गई और उन्हें वहाँ अपने घर पर आराम से रखा लिखा है । यहाँ पर रहने से मुझे ये सुविधा होती है कि मेरा हर रोज एक पॉइंट के हिसाब से जो खर्च हो रहा है अब बच जाता है और उनको ये लाभ होता है कि वे अपने मित्रों को बुलाकर भारत से आया हुआ एक अजीब जानवर दिखा रही है । जिंदू पत्रों साॅस लिए गए हैं कि विवेकानंद साहित्य के प्रथम खंड में संकलित है । स्वामी जी को इस वृद्ध महिला के घर पर रहने से और भी काफी लाभ पहुंचा । वो उन्हें एक महिला सभा में ले गई जिसमें उनका पहला व्याख्यान हुआ । महिलाओं की सलाह मानकर उन्होंने पूछा बदल ली । आम इस्तेमाल के लिए उन्होंने एक काला लंबा कोर्ट बनवाया । गेरुआ रंग की पगडी और चोखा व्याख्यानों के समय पहनने के लिए रख छोडे । स्त्री कारागार की सुपरिटेंडेंट श्रीमती जॉनसन से परिचय हुआ । उनके साथ जाकर कारागार देखा जिसे भी सुधर शाला कहते थे । बंदियों को समाज की उपयोगी अंग बनाने के लिए वहाँ उनकी साझ सुंदर बर्ताव किया जाता है । स्वामी जी ने अपने पत्र में उसका विस्तृत वर्णन किया है । फिर इस वृद्ध महिला के मकान पर उनका परिचय हारवर्ड विश्वविद्यालय में यूनानी भाषा के प्रोफेसर जेएस राइट से हुआ । थोडी देर की बातचीत में प्रोफेसर महोदय स्वामी जी से बहुत प्रभावित हुए । उन्होंने कहा आप शिकागो महासभा के अध्यक्ष अपने मित्र डॉक्टर बरोज के नाम उसी समय पत्र लिखा । ये पत्र लेकर स्वामी जी फिर शिकागो की ओर चले । रेल का टिकट प्रोफेसर महोदय ने अपनी जेब से खरीद कर दिया । विवेकानंद खुशी खुशी का बोला है । गाडी देर से पहुंची थी और उनके पास धर्म महासभा के दफ्तर का जो पता था वो कई रास्ते में हो गया था । अब इतने बडे शहर में वह दफ्तर का पता कैसे लगा । राहत जल्दी दो चार आदमियों से पूछा तो उन्होंने स्वामी जी को निग्रो समझकर घृणा से मुंह मोड लिया । रात का समय बर्फ देखना शुरू हो गया और ठहरने का कोई ठिकाना माल गोदाम के पास एक खाली पैकिंग बॉक्स मिल गया । उन्होंने उसी में घुसकर सारी रात सवेरे होते ही सडक पर निकल पडे । भूख के मारे बुरा हाल था । भीक्षा में कुछ आ जाने के लिए दर दर घूमने लगे । पर वो हिंदुस्तान नहीं अमरीका जहाँ भी गए वहीं उन्हें तो कार आ गया । लोगों ने देखते ही घृणा से दरवाजा बंद कर लेते थे और कईयों ने तो उन्हें हटाने के लिए बल प्रयोग किया । आखिर थक हारकर स्वामी जी एक सडक के किनारे बैठ गए । सामने के विशाल भवन की खिडकी से एक अपूर्व सुंदर रमनी ने उन्हें देख लिया । वहाँ उनके असाधारण व्यक्तिगत से प्रभावित होकर तुरंत नीचे आई और उनके पास आकर पूछा महाश् है क्या धर्म महासभा के प्रतिनिधि है? स्वामी जी ने अपनी विपत्ति इस रमणी को कहते नहीं और उससे डॉक्टर बरोज के ऑफिस का पता पूछा । ये रमणी उन्हें अपने घर में ले गई और कहा कि सुबह भोजन के बाद वह स्वयं उन्हें बात छोड आएगी । इस रमणी का नाम कुमारी मेरी है ना । वो उसकी माँ बाद में स्वामी जी की अनन्य भक्त बन गई और बडी सहायक सिद्ध हुई । भोजन और विश्राम के बाद कुमारी है । उन्हें धर्म महासभा के दफ्तर मिलेगी । उन्हें वहाँ हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में ले लिया गया और जिस मकान में प्रतिनिधियों के रहने की व्यवस्था की गई थी उसमें वे अतिथि के रूप में रहने लगे । धर्म महासभा में विवेकानंद की भूमिका भारतीय कट्टरपंथियों, इसाई मिशनरियों तथा पादरियों द्वारा उनके विरोध और अमेरिका तथा ब्रिटेन में धर्म प्रचार की बात हम धर्म महासभा परिच्छेद में अलग से लेंगे । अब हमें ये देखना है कि उन्होंने अपने इस प्रवास काल में अमेरिका तथा दूसरे पांच सात देशों में क्या देखा और क्या सीखा । उनकी यात्रा के दो पक्षों को आपस में गडबड कर देने से हमे डर है कोई भी बात स्पष्ट नहीं हो पाएगा । विवेकानंद ने अपने प्रवास के अगस्त अठारह सौ से अगस्त अठारह सौ पंचानवे तक और फिर नवंबर अठारह सौ पंचानवे से अप्रैल अठारह सौ छियानवे तक ढाई साल अमेरिका में मिलता है । बीजू सपने संजो कर आए थे आते ही टूट गए यहाँ की जीवन का उन पर पहला प्रभाव यह पडा ठगी और धोखाधडी के लिए ये बडी आदेश यहाँ के दशमलव नौ प्रतिशत लोगों की नीयत दूसरों से अनिश्चित लाभ उठाने की ही रहते हैं । आठ मोदी के पूरे गाये उन्होंने अपने को जल से बाहर मछली की तरह वर्क किया लेकिन उसके बावजूद उन्होंने बुद्धि को कुंठित नहीं होने दिया और वो जिस उद्देश्य से विदेश आए थे से हमेशा सम्मुख रखा । धीरे धीरे भले लोगों से परिचय हुआ जिनसे उन्हें आदर और स्नेहमिलन धर्म महासभा में प्राप्त सफलता के बाद तो उनकी श्रद्धालुओं तथा भक्तों की संख्या बहुत बढते सारे देश में घूम घूमकर भाषण दिए । जहाँ कहीं भी गए लोगों ने उन्हें अपने घरों में ठहराया । जैसे जैसे जनजीवन से संपर्क बढता गया वैसे वैसे उन्होंने इस नए राष्ट्र के गुण दोषियों का सम्यक विवेचन किया । पच्चीस सितंबर अठारह सौ चौरानवे को गुरु भाइयों के नाम पत्र में लिखते हैं, इस देश में ग्रीष्मकाल में सब समुद्र के किनारे चले जाते हैं । मैं भी गया था यहाँ वालों को नाम खेलने और यार चलाने का रूप है । यार ठीक प्रकार का हल्का जहाज होता है और यहाँ की लडकी पूरे तथा जिस किसी के बाद धन है उसी के पास है । उसी में पाल लगाकर वे लोग प्रतिदिन समुद्र में डाल देते हैं और खाने पीने और नाचने के लिए घर लौटते हैं । गाना बजाना तो दिन रात लगा ही रहता है । पियानो के मारे घर में टिकना मुश्किल हो जाता है । हाँ, तुम जिन जी डब्ल्यूएल के पते पर चिट्टियां भेजते हो, उनकी भी कुछ बातें लिखता हूँ । वृद्ध है और उनकी वृद्धा पत्नी है । दो कन्याएं, दो भतीजियां और एक लडका है । लडका नौकरी करता है इसलिए उसे दूसरी जगह रहना पडता है । लडकियाँ घर पर रहती है इस देश में लडकी का रिश्ता ही रिश्ता है । लडकी का विवाह होते ही वहाँ और हो जाता है । कन्या के पति को अपनी स्त्री से मिलने के लिए प्रायः उसके माँ बाप के घर जाना पडता है । यहाँ वाले कहते हैं सैन्य साॅस बेटा तभी तक बेटा है जब तक उसका बयान नहीं होता । पर बेडी आजीवन बेटी की रहती है । चारों का न्याय और युवती अविवाहिता है । विवाह होना इस देश में महासचिन कार्य हैं । पहले तो मान के लायक को दूसरे घर का हूँ । लडकी यारी में जो बडे पक्के हैं परन्तु पकड में आ रहे वक्त नौ दो ग्यारह लडकियाँ अनाज कूदकर किसी को फंसाने की कोशिश करती है । लडकी जाल में बढ रहा नहीं चाहते आखिर इस तरह लव हो जाएगा जब शादी हो जाती है । ये हुई साधारण बात पर दूर तेल की कन्यायें रूप होती है । बडे आदमी ही करनी हैं । विश्व विद्यालय की छात्राएं हैं ना ऐसे गाने और प्यानो बजाने में अद्धितीय कितने ही लडकी चक्कर मारने हैं लेकिन उन की नजर में नहीं चलते । जान पडता है विवाह नहीं करेंगे । तीस पर मेरे साथ रहने के कारण महा वैराग्य सवार हो गया है । वो इस समय ब्रह्मा चंदन में लगी रहती है । खेल की कन्याओं के नाम मेरी और ही रहे हैं और ऍम दोनों कन्याओं के बालसन हैले है और दोनों वीजियो की काले ये जूते सीने से चंडीपाठ तक सब जाती है । भतीजे के पास इतना धन नहीं है । उन्होंने किंडरगार्डन स्कूल खोला है लेकिन करने आये कुछ नहीं काम आती है । कोई किसी के भरोसे नहीं रहता । करोडपतियों के पुत्र भी रोजगार करते हैं । विवाह करके अलग किराये का मकान लेकर रहते हैं । कन्यायें मुझे दादा कहती है मैं उनकी माँ को माँ कहता मेरा सब सामान नहीं के घर में हैं । मैं कहीं भी जाओ वे उसकी देखभाल करती है । यहाँ के सब लडके बचपन ही से रोजगार में लग जाते हैं और लडकियाँ विश्वविद्यालय में पढती लिखती है तो इसलिए यहाँ सभाओं में नब्बे फीसदी स्त्रियाॅ उनके आगे लडको की दाल नहीं गल । मजे की बात यह है कि अमेरिका की आज से अस्सी बरस पहले के सामाजिक जीवन का ये जीवन से ऋण एक सन्यासी नहीं किया और इसी पत्र में आगे लिखा है इस देश की नारियों को देखकर मेरे तो हो सड गए मुझे बच्चे की तरह घर बाहर दुकान बाजार में लिए करती हैं, सब काम करती है । मैं उसका चौथाई हिस्सा नहीं कर सकते । ये रूप में लक्ष्मी और गुड में सरस्वती हैं । ये साक्षात जगदंबा इनकी पूजा करने से सर्वसिद्धि मिल सकती है । अरे राम राम जो हम भी भले आ रही है । इस तरह की माँ जगदम्बा अगर अपने देश में एक हजार तैयार करके मार सकते हो तो निश्चित हो कर मार सकता हूँ । तभी तुम्हारे देश की आदमी आदमी कहलाने लायक नहीं है तो हमारे देश के पुरुष इस देश की नारियों की बात तो अलग है । एक ही देश के अलग अलग शहरों का अलग अलग विशिष्ट चरित्र होता है । विवेकानंद की दृष्टि उसे भी समझने में नहीं लिखा है । मैं कुछ महीनों के लिए न्यूयॉर्क चाहे वो शहर मानव, संपूर्ण संयुक्त का मस्तक है, हाथ तथा कोषागार स्वरूप ये अवश्य है कि मौसम को ग्रामीणों, काशी मीडिया चर्चा का प्रधान स्थान कहा जाता है और यहाँ अमेरिका में हजारों व्यक्ति ऐसे है जो मेरी प्रति सहानुभूति रखते हैं । लेकिन फिर पेरिस और लंदन घुमाने के बाद जोसेफिन पहली कांड को लिखा यूरोप की साफ सिंदर नगरों की अपेक्षा न्यूयॉर्क बहुत गन्दा और विभिन्न लगता है अमेरिका का पारिवारिक जीवन अनर्गल दा की सीमा तक स्वच्छता इस मिथ्या धारणा का उन्होंने भरसक खानदान क्या उन्होंने साधिकार का कितने ये सुंदर पारिवारिक जीवन में नहीं, यहाँ देखें यहाँ की नारियों को उन्होंने हिम के सदृश पवित्र, असाधारण रूप से शिक्षा और मानसिक तथा नैतिक दृष्टि से उन्नत पाया । इसके अलावा अमेरिका की सामान्य जीवन का चित्रण देगी । यहाँ जैसी गर्मी है ज्यादा भी वैसा ही है । गर्मी कलकत्ता से दैनिक भी कम नहीं जारी की । क्या बाद समूचा देश दो दिन हाथ, कहीं कहीं तो चार पांच हाथ गहरी बर्फ में ढल जाता है । दक्षिण की ओर बर्फ नहीं पडती पद बर्फ तो छोटी चीज है । जब पारा बत्तीस डिग्री पर रहता है तब बर्फ गिरती है । कल कट्टी में पारा सात डिग्री से नीचे बहुत ही कम उतरता है । इंग्लैंड में कभी कभी शून्य तक भी जाता है परन्तु यहाँ पारा शून्य से चालीस पचास डिग्री तक नीचे चला जा रहे हैं । उत्तरी हिस्से में जहाँ कनाडा है हमारा जम जाता है उस पार महासागर का तापमान, वक्त यंत्र काम में लाया जाता है जब बहुत ही ठंडक होती है । आज जब पारा बीस डिग्री के नीचे रहता है तब नहीं थी । मेलघाट थी कि बर्फ गिरी की ठंड की हद हो गई । सोमवार नहीं बर्फ से रात काम ठंडे दिनों में अत्यंत ठंडक में एक तरह का नशा हो जाता है । गाडियां उस समय नहीं जल्दी बिना पहिए की । इसलिए नाम का एक यान सी किया जाता है जब को जमकर सख्त हो जाता है । नदी, नाले और झील पर से हाथ भी चल सकते हैं । नियाग्रा आवत प्रचंड प्रवाह वाला विशाल निर्झर जमकर पत्थर हो गया है परन्तु मैं अच्छी तरह पहले थोडा डर मालूम होता था । फिर तो गरज के मारे रेल से एक दिन कनाडा की समीर दूसरे दिन अमेरिका के दक्षिण भाग में व्याख्यान देता सकता हूँ । घर की तरह गाडियाँ भी भाग के नलों से खूब गर्म रखी जाती है और बार चारों तरफ वर्ग के अत्यंत सफेद ढेर रहते हैं । कैसी अनु की बडा डर था कि मेरी नागपुर कान गिर जाएंगे पर आज तक कुछ हुआ बाहर जाते समय ढेरो गर्म कपडे, उस पर समूह का कूट जूते फिर जूती पर एक और उन्हें होता । इन सब सामानों से ढककर जाना पडता है । साथ निकलते गी दाडी में जम जाती है उस पर तमाशा यह है कि घर के भीतर बिना एक डेली बर्गर दिए ये लोग पानी भी अरे भाई घर के अंदर गर्मी रहती है हर एक कमरा और सी आपके नलो से गर्म रखी जाती है ये लोग कला कौशल में अब ये है वो गिलास में अभी भी है धन कमाने और खर्च करने में अद्वितीय । यह उद्वरण देने का उद्देश्य अमेरिका की बहुत ही उन्नति और समृद्धि दिखाना नहीं बल्कि विवेकानंद की बहुमुखी प्रतिभा और लेखन शैली का आभास कर रहा है । इससे उनकी व्यापक तथा समय दृष्टि को समझने में मदद मिलती है और फिर इस से ही विज्ञान के विकास और खोल के विस्तार की प्रक्रिया को समझने में भी मदद मिले । अमेरिका में रहते हुए विवेकानंद ने जो धर्म प्रचार किया, इस भौतिक उन्नति सी क्या तालमेल स्थापित किया और तालमेल पैदा करने में उनके चिंतन का क्षितिज कहाँ था, ये बात विशेष रूप से समझने की है और ये हमारे अगले परिषद का विषय विवेकानंद अपने ही कथानानुसार दृश्य देखने वाले यात्री अथवा निरुद्देश्य पर्यटक नहीं थी । ये तो भारत की दरिद्रता का उपाय ढूंढने अमेरिका । इसलिए देश और देश की निर्धन जनता को उन्होंने कभी एक क्षण के लिए भी नहीं बुलाया । अमेरिका की ये उन्नति तथा समृद्धि देखकर चरित्र तथा विभिन्न भारत का चित्र भी उनकी दृष्टि में खेला जाता था । देखिए तब उन का दिल कैसे खून के आंसू होता था । इस देश में करोडों मनीष शियम होगा, आकर दिन गुजारते हैं और दस बीस लाख साधु और दस बारह करोड ग्रामीण उन गरीबों का खून चूस कर देते हैं और उन की उन्नति के लिए कोई चेहरा नहीं करते । क्या वो देश है? क्या करें? क्या वह हर में है या शास्त्र का कोई नृत्य भाई इस बात को और समझो में भारत वर्ष को हूँ, घूम कर चुका और इस देश को भी देखा क्या बिना कारण की कहीं कार्य होता है? क्या बिना पाप की सजा मिल सकती है? उन्होंने देखा, पूर्व पश्चिम में सारा अंतर यह है कि वे एक एक राष्ट्र है, हम नहीं अर्थात सफलता एवं शिक्षा का प्रसार वहाँ व्यापक सिर्फ साधारण में व्याप्त है । उच्च वर्ग के लोग भारत और अमेरिका में समाज । लेकिन दोनों देशों में निम्न वर्गों में जमीन आसमान का अंतर है । हमने निम्नवर्ग को शिक्षा तथा सुविधा से वंचित करके पंगु बना दिया । राष्ट्र का अंक ही नहीं रहने दिया । परिणाम यह है कि विदेशी हमलावरों के हाथों मुठ्ठीभर, विलासी, उच्च वर्ग की पराजय, सारे देश की पराजय बनके निम्न वर्गों ने हार जीत से कभी दिलचस्पी नहीं रहेगी । जब इतना चूसा, कुछ आ गया तो वे क्यों रखें? इसी से अंग्रेजों के लिए भारत को जितना आसान हो, उन्होंने देखा कि एक राष्ट्र बनने की हमारी आवश्यकता है । एयर ही एवं भौतिक शिक्षा शिक्षा का माध्यम आंखि नहीं, कान भी है । देश के लिए समर्पित शिक्षित नौजवान गांव गांव और दरवाजे दरवाजे जाकर अनपढ गरीब जनता को विभिन्न राष्ट्र के बारे में कहानियाँ एक माजिक लाॅग लू और नक्शा लेकर जाए और बातचीत द्वारा गोल गणित तथा इतिहास आदि के बारे में हरकत में आया बयान नहीं रुकेगा । हम देख चुकी है कि भारत भ्रमण के बाद अपनी इस योजना के लिए जब महाजनों तथा राजी महाराजा उसे धन पाने की कोई आशा नहीं रही तब अमेरिका है सेरेन विजय स्वामी को यहाँ भी वही निराशा हाथ लगी और इसे उन्होंने यहाँ व्यक्ति इस देश में पूरे साल भर तक व्याख्या देने पर ही मैं अपने कार्य के आरंभ के लिए धनार्जन की । आपने इस योजना में शराबी सफल ना, जिस प्रकार बिल्ली की नर्म नर्म खाल के नीचे तीखेपन जी छिपे रहते हैं । इसी प्रकार अमेरिका की बहुत ही कुंती तथा समृद्धि की चकाचौंध के पीछे दमन और शोषण के जो भयंकर छिपे हुए थे, विवेकानंद की पहली दृष्टि ने उनकी भी देख लिखा है पांच चार निवासी हमारे जाती भी की जाए, जितनी बडी समालोचना करें और उनके बीच एक ऐसा जाती भेज है जो सराहनीय अमेरिकावासियों के अनुसार सर्वशक्तिमान डॉलर यहाँ सब कुछ कर सकता है । अठारह सौ छियानवे के आर्थिक संगठने में और भयंकर रूप धारण कर लिया था । अमेरिका के लिए ये बुरा साल था अठारह सौ चौरानवे में बैंकरों की तादाद राष्ट्र के इतिहास में उस समय तक की किसी भी तरह आपको बार कर चुके हैं । निर्धन तथा विभिन्न लोग गिरोह डर गिरोह रोटी और रोजी की तलाश में देशभर में इधर उधर खूब रहे । अगस्त में पुलमैन कंपनी तथा रेलवे मजबूरों की जबरदस्त हडताल । हालांकि सुधारवादी ट्रेड यूनियन नेता जो व्यक्ति संपत्ति को नुकसान पहुंचाएगा अथवा खान तोडेगा मजदूरों का मित्र नहीं शत्रु है ये कहकर हडताली मजदूरों को शांत रखने का प्रयास कर रहे थे । इसके बावजूद मजदूर हिंसा पर उतर आए बडे पैमाने पर संपत्ति की तोड फोड भी और अदालतों में औपचारिक कार्यवाही करके उन्हें अंधाधूंध जेलों में कैसा है? हाँ विवेकानन्द नहीं ये सब अपनी आंखों देखा और देखिए निग्रो होने वाले अमानवीय, अच्छा तथा रंगभेद के ऍम रास्ता हटाने के लिए लडे हुये अमेरिका की गृह युद्ध का उल्लेख करते हुए विवेकानंद ने अपने मद्रास के क्षण में एक आजकल की दास इस युद्ध के पूर्व के दासों की अपेक्षा सौ गुनी अधिक पूरी दर्शा को पहुंच गए । इस युद्ध से पूर्व ये बेचारे नीग्रो कम से कम किसी की संपत्ति तो थे और संपत्ति होने के नाते इनकी देखभाल नहीं की जाती थी कि कहीं दुर्बल और बेकाम ना हो जाए । पर आज तो ये किसी की सम्बन्धी है ही नहीं । मामूली बातों के लिए ये जीती जी जला दिए जाते हैं, गोली से उडा दिए जाते हैं और उनकी हत्याओं पर कोई कानून लागू नहीं होता । क्यों? इसलिए किए निगर है मानवीय? मनुष्य तो क्या पशु नहीं । स्वाधीनता को राष्ट्रीय आदर्श घोषित करने वाला अमेरिका शासक वर्ग पिछले पचास बरस में विस्तारवादी बना हुआ था । अब साम्राज्यवादी शक्ति बनने की दौड में यूरोपियन देशों से किसी तरह पीछे नहीं था । इसी से बन जोला का सीमा विवाद था जिसमें दक्षिण अफ्रीका में फंसे सोने के कारण ब्रिटेन को छोडना पडा । इसी से स्पेन के साथ युद्ध छिडा और अमेरिका ने क्यूबा फिलीपाइन पर अपना अधिकार जमाया । चीन के बारे में खुले दरवाजे का सिद्धांत ऐसी नीति का परिणाम अमेरिका, डॅान अपने और दूसरे देशों की मेहनत कर जनता का खून चूसकर अपनी जोरिया भर रहे थे । पर मैं भारत के अनपढ गरीब जनता को एक शिक्षा देने के लिए आर्थिक सहायता पाने की आशा कैसे जा सकते? अबे तू धार्मिक रूढिवाद ही को बढावा दे सकती थी और भी रही है । आपने घनी मित्र ले गेट के साथ ॅ उसको न्यूयॉर्क से पैरिस पहुंच कला संस्कृति तथा भूख विलास उच्चतम केंद्र में लेकिन कब क्या देखने के लिए विवेकानंद लगभग दो से रुके और उसके बाद इंग्लैंड । चलिए वहाँ से कुमारी जो ऍम को उन्होंने लिखा मैं सकुशल लंदन पहुंच गया । भारत से लौटे बहुत से अवकाशप्राप्त जनरलों से मुलाकात भी मेरे प्रति बहुत विशिष्ट और मिनी प्रत्येक काले आदमी को निग्रो समझने का वहाँ अद्भुत ज्ञान यहाँ और कोई भी सडक पर टकटकी लगाकर मुझे नहीं देखता हूँ । और फिर एक महीने बाद श्रीमती लेकिन को लिखते हैं यहाँ के अंग्रेज बडी सहयोग है । कुछ एनजीओ इंडिया को छोडकर भी काले आदमियों से बिल्कुल घृणा नहीं करते । नाम मुझे सडकों पर झूठ ही करते हैं । कभी कभी में सोचने लगता हूँ कि कहीं मेरा चेहरा गोरा तो नहीं हो गया । केंद्र ॅ शक्ति को प्रकट कर देता है । आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि यहाँ बहुत से विचारशील स्त्रीपुरुष सोचते हैं कि सामाजिक समस्या का एकमात्र हल हिन्दू की जाति प्रथा है । आप कल्पना कर सकते हैं कि अपने मस्तिष्क में ये भाव रखते हुए वे समाजवादियों तथा दूसरे समाजवादी प्रजातंत्र वादियों से कितनी घृणा करते हैं । से यहाँ पुरुष अत्यंत उच्च शिक्षा प्राप्त भारतीय चिंतन में अत्यधिक रुचि रखते हैं किंतु स्त्रियाँ बहुत कम । अमेरिका की अपेक्षा इंग्लैंड अधिक संकुचित । जब क्लास लेना शुरू की तो आज सिंगर पेरूमल को अठारह नवंबर अठारह सौ पंचानवे के पत्र में लिखा, अमेरिका की अपेक्षा इंग्लैंड में मैं निश्चय ही अधिक कार्य कर सकता हूँ । दलके दिलाते हैं और इतने लोगों को बैठाने का मेरे पास खान भी नहीं रहता है । इसलिए वे सब लोग यहाँ तक कि सीरिया भी पालथी मारकर जमीन पर बैठी है । मैं उनसे कहता हूँ कि वे ये कल्पना करने का यत्न करें कि वे भारत के गगन मंडल की निजी फैले हुए वट वृक्ष की छाया चले गए थे और ये विचार अच्छा लगता है । अंग्रेजी की गुलामी और भारत में उनके अत्याचारों के कारण मन में उनके प्रति घृणा तथा अवज्ञा का जो भाव था वो यहाँ पर बदल गया । वे दिसंबर के शुरू में फिर अमेरिका चले गए और अप्रैल अठारह सौ छियानवे के अंत में लौट स्वदेश लौटकर कलकत्ता में भाषण देते हुए जाओगे । कुछ अंग्रेज शिष्य भी मौजूद थे । उन्होंने कहा था ब्रिटिश भूमि बर अंग्रेजों के प्रति मुझसे अधिक घृणा का भाव लेकर कभी किसी ने पैर ना रखा होगा । इस मंच पर जो अंग्रेज बंधु हैं, वे ही उसका साक्षी देंगे परन्तु जितना ही में उन लोगों के साथ रहने लगा जितना ही उनकी सात मिलने लगा । जितना ही ब्रिटिश जाती कि जीवन नियंत्र की कर लक्ष्य करने लगा । उस जाति का हिरेश पंदन किस जगह हो रहा है । ये जितना ही समझने लगा उतना ही उन्हें मैं प्यार । छह जुलाई के पत्र में फ्राॅड को लिखते हैं । ब्रिटिश साम्राज्य की कितने ही दोष क्यों ना हूँ पर भाव प्रसार का ऐसा कृष्ट यंत्र अब तक कहीं नहीं रहा है । मैं इस यंत्र के केंद्र स्थल में अपने विचार रख देना चाहता हूँ और सारी दुनिया में रह जाएंगे । लगातार काम करते हुए अभी बहुत थक गए इसलिए स्विट्जरलैंड में दो महीने विश्राम किया । वहाँ से गुडविन को लिखा मुझे बहुत ताजगी मालूम होती है । मैं खिडकी से बाहर दृष्टि डालता हूँ । मुझे बडी बडी नदियां दिखती है और मुझे अनुभव होता है कि मैं हिमालय में बिल्कुल शाह मेरे । इसमें आयो ने अपनी पुरानी शक्ति वहाँ प्राप्त करेंगे । संस्कृत के विख्यात विद्वान ऍम के निमंत्रण पर विवेकानन्द स्वाॅट जर्मनी बडे बडे शहरों तथा राजधानियों को देखते हुए कील पहुंचे । पॅाल विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्राध्यापक थे । उनके साथ उपनिषद, वेदांत दर्शन और शांकर भाष्य पर विचार विनिमय हुआ । ज्ञान चर्चा के दौरान पर पैसे महोदय किसी काम से उठकर चले गए । थोडी देर बाद भी लौटे तो देखा कि स्वामी जी कविता की पुस्तक के पन्ने उलट रही । इस काम मेरे मतलब थी कि उन्हें प्रोफेसर की आहट भी सुनाएगा । पडे पुस्तक समाप्त हो गई । स्वामी जी ने तब उन्हें अपने पास बैठा देखा । बोले पुस्तक पड रहा था । संभव है कि आप बहुत देर से आए शाम कीजिए । चेहरा देख रहे स्वामी जी ने ये भाग लिया कि बॉल डाइसन को उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ । स्वामी जी ने उनका संदेह मिटाने के लिए पुस्तक में पडी हुई कविताएं सुनाना शुरू की । प्रोफेसर महोदय इसमें में भरकर बोले, आपने ये पुस्तक अवश्य पडी हुई नहीं कैसे संभव है कि दो दो पृष्ठों की पुस्तक आधे घंटे में याद हो जाए । स्वामी जी ने हसते हुए कर दिया मैं वही पुस्तक यहाँ देखी है मैं क्योंकि पूरे मनोयोग से पडता हूँ इसलिए सारे कुछ तक मुझे इसी तरह याद हो जाती है । कहावत है कि विद्या कंटकी और पैसा काटकर सन्यासी होने के कारण विवेकानंद पैसे तो अपने पास नहीं रखते थे लेकिन जो कुछ पढते थे में उन्हें कांत हो जा रहा है । बडा बहुत कुछ था और आपने इस वरन शक्ति के कारण से चलती फिरते विश्व पोस्ट धर्म महासभा में उन्हें जो असाधारण सफलता प्राप्त हुई, उसके एक मुख्य रूप कारण ये पांच जाती । देश की उन्नीस में उन्होंने दूसरी यात्रा की । बंगाल पत्रिका उद्बोधन के लिए यूरोप यात्रा की संस्करण लिखे थे । जर्मनी की उभरती हुई जवान शक्ति का मूल्यांकन उन्होंने इन शब्दों में लिखा जर्मनी की जनसंख्या वृद्धि प्रबल है, जर्मन बढेगी, कष्ट सहिष्णु हैं । आज जर्मनी, यूरोप का आदेश दाता है । सबसे ऊपर दूसरी जातियों से बहुत पहले जर्मनी । प्रत्येक निर्णयकारी का राजदंड का भय दिखाकर विद्या सिखाई । आज इस वृक्ष का फल भोजन बन रहा है । जर्मनी की सेना प्रतिष्ठा में सर्वश्रेष्ठ है । जर्मनी ने जान लगा दी है । युद्धपोतों में भी सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त करने के लिए जर्मनी व्यापार में भी अंग्रेजी को प्रयास कर दिया है । अंग्रेजी के उपनिवेशों में भी जर्मनी कारोबार जर्मन मनीष धीरे धीरे एकाद बच्चे लाभ कर रही हैं । जर्मनी के सम्राट की आज्ञा से सब जातियों ने चीन के क्षेत्र में सिर्फ चुका जर्मन सेनापति क्या नहीं स्वीकार जून हिस्सों में यूज होता है । पवित्रता तथा शांति संगठन चीनी किसानों तथा दस्तकारों का ग्रुप संगठन था । चीन से विदेशियों को मार भगाने के लिए सशस्त्र संघर्ष शुरू किया जिसे चीनी जनता का व्यापक समर्थक प्राप्त हुआ । इतिहास में संघर्ष को बक्सर विद्रोह का नाम भी दिया गया है जो होतवानी, इसकी शक्ति और देश व्यापी समर्थन का अनुमान इस बात से से है । इसमें लगाया जा सकता है कि उसने ब्रिटेन, अमेरिका, रूस, फ्रांस और जापान की संयुक्त सेना का लाख वह में घिराव किया और से तहस नहस करना । विद्रोहियों की इस वजय से सभी साम्राज्यवादी शक्तियों के हाथ पांव फूल गए और उन्हें चीन में अपना प्रभुत्व खत्म होता दिखाई दिया । अजय विद्रोह को कुचलने के लिए अगस्त में प्रोटीन अमेरिका जाता । जर्मनी, रूस, फ्रांस, इटली तथा ऑस्ट्रिया हंगरी समीर आठ देशों ने जोर मिनी कमान के अधीन संयुक्त मोर्चा बनाया । संघर्ष एक बरस तक चलता विद्रोही बडी वीरता से लडे लेकिन अंत में चीन की सामंती चिंग सरकार ने साम्राज्यवादियों के आगे हथियार डाल । विवेकानंद ने अपनी उक्त यात्रा वर्णन में इसी विद्रोह का उल्लेख किया है । इस से पता चलता है कि उनकी दृष्टि कितनी क्या और वे दुनिया की सारी हलचलों पर नजर रखते थे । ये दृष्टि जितनी व्यापक थी उतनी दूरदर्शी अगस्त अठारह सौ में फॅस जी । एस । राइट के मान पर ठहरे हुए थे । वहाँ चले गए बुद्धि जीवी उसी विवेकानंद की जो वार्ता हूँ, उसे श्रीमती राइट ने इतिहास का प्रतिशोध इस शीर्षक से भी बंद किया तो उसका कुछ दिन शाम यहाँ उस वक्त करते हैं जिससे स्वामी जी की दूरदर्शिता तथा मानव प्रेम और साम्राज्यवाद के प्रति तीव्र घृणा का पता चलेगा । लिखा है अभी कल की ही बात उन्होंने अपनी संगीत महत्व नी में कहा थी सिर्फ कल की चार सौ वर्ष से अधिक पूर्व नहीं । फिर उन्होंने एक गीर जाती और पीडित राष्ट्र के ऊपर की गई निर्भया था और दमन की कहानियां सुनाई और भविष्य में आने वाले निर्णय वो अंग्रेज । उन्होंने कहा, केवल कुछ समय पहले बर्बर स्त्रियों के शरीर पर ले रहे थे और अपने शरीर की घिनौनी दुर्गंध छिपाने के लिए सुगंध लगती थी । अत्यंत ऍम तभी भी केवल इस पर भरता में से एक नहीं । ये तो कम से कम पांच सौ वर्ष पहले की बात है और क्या मैंने नहीं कहा । जरा देर पहले मनुष्य की आत्मा की प्राचीनता को दृष्टि में रखने पर इन कुछ सौ वर्षों की क्या गिनती है? तब स्वर में एक विनम्र और औचित्यपूर्ण परिवर्तन करते हुए उन्होंने कहा वेंटास बर्बर भयानक शीट और उनकी उत्तरी जलवायु जन्म दिया भावर कष्टों ने उन्हें जंगली बनाना । उन्होंने कुछ अधिक भावना के साथ तेजी से कहा भी केवल मार डालने की बात सोचते हैं उनका धर्म कहाँ? वो उस पवित्र पुरुष का नाम लेते हैं । अपने मनुष्य भाइयों से प्रेम करने का दावा करते हैं । सबके बनते हैं इसाई धर्म के द्वारा नहीं । ये तो उनकी भूख है जिसने उन्हें सबसे बनाया उन की ईवन नहीं । नहीं मानव प्रिंट, केवल उनकी जवाब पर विजय पर केवल बुराई और हर प्रकार की हिंसा ही हिंसा । मेरे भाई मैं तुमको पुकारता हूँ, मैं तो मैं प्यार करता हूँ । तब कुछ और धीरे बोलते हुए उनका मदुल कंटिंग गंभीर होता गया और अंत में घंटा निनाद के सदृश टॅाप किन्तु ईश्वर के दंड का भागी बनना पडेगा । प्रभु कहते हैं कि प्रतिशोध मेरा है । मैं उसे चुका हूँ और विनाश आ रहा है । तुम्हारे साइट कितने हैं दुनिया की एक तिहाई नहीं उनको डी को भी चीनियों को देख ईश्वर का प्रतिशोध है । तुम्हारे ऊपर उद्दीप्त हो जाएगा । घोडों का एक और आक्रमण कुछ कुछ बताते हुए उन्होंने कहा इस समस्या यूरोप को पदार्थ प्रांत कर देंगे । वे एक भी साबित नहीं छोडेंगे । पूरे स्त्रियाँ और बच्चे सभी चल बचेंगे और अब यू फिर आएगा । उनके स्वर्ण में वरनाथ वेदना और करना तत्पश्चात अचानक उदासीनता पूर्वक आपने युगदृष्टा को अलग करते हुए उन्होंने कहा मुझे कोई चिंता नहीं हैं । दुनिया इससे और अच्छी होकर निकलेगी तो ये सब आ रहा है । ईश्वर का प्रतिशोध शीघ्र उनकी वार्ता में दैनिक भावुकता है, पर चिंतन कितना सही था? ब्रिटिश साम्राज्यवाद पीता सिकुडकर कोने में जा रहा सीधी सच मुझे एक विश्वशक्ति बनकर उभर आए हैं । विवेकानंद की मृत्यु के सत्तर बरस बाद जिस युग में जी रहे हैं और साम्राज्यवाद के संपूर्ण विनाश सहयोग है और आज क्रांति इतिहास की मुख्यधारा है । विश्वव्यापी वर्तमान महा अव्यवस्था तथा उथलपुथल से दुनिया निश्चित रूप से अच्छी होकर निकलेगी ।

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स्वामी विवेकानंद की अमरगाथा.... Swami Vivekanand | स्वामी विवेकानन्द Producer : Kuku FM Voiceover Artist : Raj Shrivastava