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34. Sampaati Ne Bataya Ravana Ka Pata

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श्री राम Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त Voiceover Artist : Ramesh Mudgal
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श्री राम भाग तेतीस तो गृह इस किन्दा नरेश अभिषेक हुआ पाली का लडका अंगद तो गृह का महामंत्री और युवराज नियुक्त हुआ । अनुमान सेनाध्यक्ष बनाया गया और सुग्रीव का कार्य चलने लगा । राज्य विषय के उपरांत प्रथम कार्य यह किया गया कि दक्षिण पठार के फोन क्षेत्र में गुप्चर भेजे गए जिससे पता चले कि रावण ने सीता को कहाँ छुपा रखा है । समुंद्र के इस बार जिधर आर्यव्रत था, भली प्रकार देख लिया गया । चीता के होने का समाचार नहीं मिला तो फिर किसी को लंका में भेजने का कार्यक्रम बना । उन दिनों चटाइयों का भाई संपत्ति अपने भाई की फौज में वहाँ आया हुआ था । मेंहदी पक्षियों की भर्ती आकाशचारी था । वह भी जताई क्यूँकि भारतीय जी सर अभियान को उडाता था । वहाँ सीता की फोर्स में गए अनुमान एवं उसके साथियों को मिला । हनुमान ने उसे बताया कि उसके भाई को रावण ने मारा है और अनुमान है कि सीताजी को लंका में बंदी बनाया गया है । हनुमान ने सागर पार जाकर सीता जी को ढूंढने का अपना निश्चित भी बताया । संपत्ति को अपने भाई की हत्या करने वाले रावण पर रोज आ गया । उसने हनुमान से पूछा क्या तुम विमान उडाना जानते हो? हाँ, मैंने शिक्षा प्राप्त करते हुए देव लोग में यह सीखा था । ठीक है तो मेरा विमान लोग और इसके द्वारा एक उडान में सागर नाम जाओ उसी सहायक आता रिसर्च पक विमान द्वारा अनुमान समुद्र पार कर लंका में जा पहुंचा । विमान को एक अंधेरे निर्जन स्थान पर घने वृक्षों में छुपाकर लंकापुरी में गुप्त रूप से प्रवेश कर गया । ठीक रही लंका में हनुमान ने एक शोकमग्न महिला को स्वर्ण प्रसाद के पीछे बनी अशोक नामक सुरक्षों की वाटिका में घने वृक्षों के नीचे बैठे देखा । श्री राम द्वारा सीता का वर्णन जिस प्रकार किया गया था, अनुमान उससे तुरंत उस महिला को पहचान गया कि यह महिला सीता के अतिरिक्त कोई नहीं हो सकती है । परंतु अनुमान चीता जी से मिलने से पहले कोई निश्चित प्रमाण चाहता था । ऍम काल के गहराते अंधकार में छुपकर उस घने वृक्ष पर चढ गया और उसके पत्तों में छिपकर बैठ गया, जिसके नीचे सीताजी समाधिस् बैठी थी । अचानक रावण जिसे हनुमान पहचानता था, जीता से मिलने आया और हनुमान को दोनों में हुए संवाद को सुनने का अवसर मिला । रावण के साथ इतनी ही दासियाँ थी । उसके मन में आया कि इसी समय रावण पर कूद पडे और उसका गला घोटकर उसको यम द्वार पर पहुँचा देगा । परन्तु जिस कार्य से मैं आया था वह रावण की मृत्यु से संभव नहीं था । रावण लंका का राजा अवश्य था परन्तु लंका का राज्य अन्य सहस्त्रों राक्षसों के प्रबंध से चलता था । उन सभी के रहते सीताजी को लेकर भाग निकलना संभव नहीं था । अतः अपना क्रोध मन ही मन में पी विवस, हनुमान, रावण, सीता जी में हुए संवाद सुनने लगा । रावण कह रहा था तो मैं सुन्दर देश की इस सुंदरनगरी में इस अति उत्तम वाटिका में अशोक सुरक्षा के नीचे बैठी शोक मनाकर अशोकवाटिका और अपना अनादर कर रही हूँ । इन सबके स्वामी देवी, लोग, यक्ष, लोग, गंधर्व, लोग यहाँ तक कि हम और वरुण भी विजय करने वाला रावण का उन्हें गिरफ्तार नहीं करना चाहिए । देवताओं की कन्यायें मुझ पर बलिहारी जाती हैं । एक तुम हो जिसकी पिछली कई मार्च से मैं कानूनी विनय कर रहा हूँ और तुम मानती ही नहीं । क्या रखा है उस मोर वनवासी राम में जो अपनी सौतेली माता के मोह में फंसे बूढे पिता क्या न्याययुक्त वासन पर राजपाट फोर्टी वन को चला आया है? देखो सीटें यदि मैं चाहूँ तो तुम्हें बलपूर्वक अपनी पत्नी बना सकता हूँ । सीता ने आंसू बहाते हुए कहा तो मेरी ओर से अपने मन को हटा लो । जैसे पापा शादी सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता, उसी प्रकार तो मेरी साहब के योग्य भी नहीं हूँ । मैं एक टेस्ट आर्यकुल की कन्या हूँ और एक अतिश्रेष्ठ आर्य परिवार की पता हूँ और तुम एक अपहर्णकर्ता मेरे पति को तो मूर्ख कहते हो परंतु तुममें साहस नहीं । तुम उनके सामने अपने बल और वैभव की कीर्ति बखानकर सकूँ । तुमने चोरी चोरी सुनना से मेरा अपहरण किया है । मुझे विश्वास है जिस समय उन्हें पता चला कि तुमने मुझे यहाँ छुपा रखा है, है, यहां पहुंचेंगे और तुम और तुम्हारी सेना चीजे उसी नाम के द्वार को जाएगी जिसपर विजय का दम तुम भर रहे हो । यदि तुमने मुझ पर बलात्कार करने का यत्न किया तो मेरी मत देह को ही पास होगी । यह जीवात्मा तो श्री राम के जीवात्मा से संयुक्त हो चुकी है । अब इस मन और तन का किसी अन्य से संपर्क नहीं बन सकता । देखो रावण यदि अब भी तुम अपना कल्याण चाहते हो तो मुझे उनके पास पहुंचा । अपनी व्यस्तता के लिए उनसे समामा हे शरणागत वत्सल है । चरण में आए कि सादा रक्षा करते हैं । मैं तुम्हारा प्राप्त जमा कर देंगे । यह तो मैं तुरंत करना चाहिए? नहीं ऐसा ना हो कि तुम्हारे उनके शरण में जाने से पूर्वी है । यहां पहुंचे और तुम्हें वह तुम्हारे राक्षसों से ही इस लंका को जला डाला । इस प्रकार निरस्त और गहना की भावना से परिपूर्ण शब्दों को सुन रावण का स्रोत बढने लगा है । इस प्रकार की सम्मति और डांट डपट की बात सुनने का अभ्यस्त नहीं था । मैं क्रोध से काम था । हुआ बोला एस्ट्रि तो निर्धन, अनाथ हवा मोर मनुष्य का अनुसरण कर रही हो और ऐसी स्त्री का जो परिणाम होता है, मैं तुम्हारा भी होगा । तो मेरे बहुत की सामग्री भी बनोगी और यहाँ की नीति दासियों की बातें रखी जाऊंगी । रिजेंटा रावण ने सीता पर नियुक्त दासियों की मुखिया को कहा इस इस तरीके हाथ पांव बांधकर मेरे प्रसाद ने पहुंचा दो । मैं आज इसका विमान दूर जोर करूंगा । देखूंगा कि इसका कंगला वनों में भटकने वाला पति इसकी क्या सहायता करता है? रिजेंटा अभी रावण का मुझे देख ही रही थी की पटरानी मंदोदरि जो रावण के साथ अशोकवाटिका मैं आई थी और जिसे रावण अन्य स्त्रियों के साथ कुछ अंतर पर छोड आया था, आगे बढाई और रावण से बोली नर्स रेस्ट क्रोध में कुछ नहीं करना चाहिए । इसे कुछ समय और दीजिए, जिससे इसको अपनी स्थिति का ठीक ठीक ज्ञान हो सके । जब है आपके वैभव और शक्ति को समझ जाएगी तो उस समय यह स्वतः प्रसन्नतापूर्वक आपकी पत्नी बनना स्वीकार कर लेगी । यहाँ प्राय स्त्री स्वभाव है । रावण क्रोध से कांप रहा था । मंदोदरी अन्य साथ आई स्त्रियों की सहायता से रावण को वहाँ से पकडना अशोकवाटिका से बाहर ले गई । जाते हुए रावण कहा गया मैं तो मैं और एक मास का समय देता हूँ । यदि तब भी तुम अपने हाथ पर चढ रही तो तुम्हारा स्थान मेरी निकृष्ट दासियों में होगा । सीता अपनी स्थिति पर अत्यंत निराश और अग्नि प्रज्जवलित कर अपने को उसमें बहुत कर देने का विचार करने लगी । रिजेंटा उन सेवी गांव पर मुखिया नियुक्ति जो सीता की निगरानी पर रखी गई थी । रावण के चले जाने पर सीता ने उसे कहा त्रिजटा! यह अग्नि प्रदीप्त करो । मैं अभी शरीर को छोड देना चाहती हूँ । इसलिए देवी त्रिजटा ने कुछ इस निकृष्ट असूर के मेरे तन पर बलात्कार करने से पूर्व ही मैं इस देश को छोड देना चाहती हूँ । है । मुझ को ऐसा है कि श्रीराम को अर्पित इस तन को कोई अन्य पुरुष थे, वो भी जाएगा । रिजेंटा मंदोदरी की ही सेविका थी और उस पर धर्मात्मा विभीषण का प्रभाव था । वहाँ सीता का निर्णय सुन हाथ जोड बोली देवी निराश होने में कारण नहीं, परमात्मा पर विश्वास रखो, उसकी शक्तियां काम करेंगे और उनका विरोध कोई देख दाना या मनुष्य नहीं कर सकता हूँ । रावण कितना भी बलशाली क्यों ना हो मैं परमात्मा की इच्छा के विरोध अपनी शक्ति से नहीं कर सकेगा । भगवती तुम्हारा उद्दार समीर भी प्रतीत होता है । हमारे राजा गा कुपित विचार सफल नहीं हो सकेगा । मैं जानती हूँ आप नहीं मानती । इसी से कहती हूँ कि देवी धैर्य अदालन कर अपने संकल्प पर रहना चाहिए । जैसा मैंने सुना है कि श्रीराम परमात्मा की आभा से सुशोभित उन पर विश्वास रखें । मुक्ति का समय अब निकट ही है । जीता कोई संवाद सुप्रतीक हुआ त्रिजटा पूना बोली देवी परमात्मा जो सब स्थान पर व्यापक है का आश्रय लेकर अब विश्राम करूँ । रिजल्ट आने दासियों को आज्ञा दी । दूर चली जाओ । नेता जी अब सोयेंगे । इतना कहकर भी सीता को वहाँ छोड वाटिका से बाहर चली गई

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