Made with  in India

Buy PremiumDownload Kuku FM

12. Rishi Vishwamitra Ne Dashrath Se Kiya Anurodh

Share Kukufm
12. Rishi Vishwamitra Ne Dashrath Se Kiya Anurodh in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts
15 KListens
श्री राम Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त Voiceover Artist : Ramesh Mudgal
Transcript
View transcript

श्री राम भाग बारह जब किस किन्दा नगरी में रावण और बाली में संदेह हो रही थी तो लगभग उसी समय विश्वमित्र अयोध्या में राज प्रसाद के द्वार पर बहुत द्वारपालों को कह रहे थे । महाराज को सूचना दो विश्वामित्र व कुछ अन्य मुन्नी बता रहे हैं राजऋषि विश्वामित्र के साथ उनके चार से छह भी थे । द्वारपालों ने ऋषि विश्वामित्र का नाम सुन रखा था अतः उनमें से एक आगंतुक ऋषि का नाम सुनते ही बागा और महाराज दशरथ को सूचना देने अंतर पुर में जा पहुंचा और दूसरा उनको आसन देकर जल इत्यादि के लिए पूछने लगा । अंतपुर को गया द्वारपाल दासी द्वारा भीतर सूचना भेज उत्तर की प्रतीक्षा में खडा रहा तासी गई और तुरंत ही लोटी उसने द्वारपाल को बताया महाराज की आ गया है कि ऋषि को आदर सहित अतिथि गृह में ठहराया जाए और उनके विशेष सेवा का प्रबंध हो । महाराष्ट्र हम वहाँ पहुंच रहे हैं । राजनीति का ऋषि यथोचित सत्कार और सेवा की गई । ऋषि अभी विश्राम कर उठे ही थे कि महाराज दशरत अपने पुरोहित, वशिष्ठ और मंत्रियों सहित अतिथि गृह में पहुंच गए । महाराज देशी के चरण स्पर्श कर आज जो सामने खडे हो गए । विश्वामित्र ने महाराज को आशीर्वाद दिया और सामने बैठने को कहा । जब महाराज और उनके साथ आए सब मंत्रीगण बैठ गई तो विश्व मित्र ने महाराजका महारानियों का तथा पुत्रों का कुशल मंगल पूछता हूँ । यथोचित उत्तर पापा । रिषी ने कहा हम एक विशेष कार्य से आए । उस कार्य में आपकी सहायता की आवश्यकता है । यदि आप मेरी बात मानने का वचन दे तो मैं हूँ रिसीवर । यह सब राजपाट और मैं भी परिवार आपकी सेवा के लिए उपस् थित हूँ । आज्ञा करिए । यहाँ से कोई भी व्यक्ति निराश नहीं जाता है । महाराज ऋषि में अपना आश्रय बताने के लिए कहा । भगवान आपका कल्याण करेंगे । मैं अपने सिद्धाश्रम में एक यज्ञ का अनुष्ठान कर रहा हूँ । उसमें कुछ राॅड डालते रहते हैं । मैं चाहता हूँ कि जब तक मेरा यह पूर्ण नहीं हो जाता हूँ मेरी तथा यज्ञ की रक्षा करने वाला कोई वीर पुरुष वह रहे । इस कार्य के लिए मुझे आपके दो पुत्र राम और लक्ष्मण उपयुक्त समझ में आए हैं । मैं चाहता हूँ कि आप उनको मेरे साथ भेज दें । यज्ञ होने पर मैं उनको यहाँ छोड जाऊँ । राजा दस जानते थे किस सिद्धाश्रम ऐसे वन में है जहां किसी राजा का राज नहीं वहाँ राक्षसों का बाहुल्य है । राजा का विचार था कि राम और लक्ष्मण अभी सूप कुमार है और वे राक्षसों से युद्ध करने में सक्षम नहीं । इस कारण है आवाज नहीं, ऐसी का मुख देखते रहेंगे । ऋषि विश्वामित्र ने कुछ देर तक राजा के उत्तर की प्रतीक्षा की और फिर पूछ लिया राजन क्या विचार कर रहे हैं? हूँ । मैं अपनी सेना के साथ तो हम आपके आश्रम की रक्षा के लिए चल सकता हूँ । राम और लक्ष्मण अभी बालक है । इन्होंने अभी तक कोई युद्ध नहीं देखा । नहीं । राजन आप नहीं समझते । यज्ञ की रक्षा के लिए सेना गई तो वैसे हम ही यज्ञ में विघ्न बन जाएगी । साथ ही मैं जानता हूँ कि जो कार्य ये दो बालक कर सकते हैं, आप की एक छोटी सेना भी नहीं कर सकेगी । मुझे आप के दोनों पुत्र चाहिए । बताइए एसवी का अथवा मैं यहाँ से निराश रोड जाऊँ । राजा ने वशिष्ठजी की ओर देखा । वह भी मोहन बैठे रहे । कुछ देर सन्नाटा छाया रहा । तब आदेश में विश्वामित्र उठ खडे हुए । इसका अभिप्राय यह था कि वह जा रहे हैं । उनके उठने पर राजा दशरथ बहत बीत होगी । उन्हें हो गया था कि विश्व मित्र नाराज हो जाएगा । फिर उनको वचन भी देख चुके थे । अतः उन्होंने राजनीति के पकड लीजिए और कहा भगवन मुझ पर दया करेंगे । मुझे मंत्रियों और रोहित जी से संबंधी कर लेने दीजिए । विश्वामित्र बैठ गए और राजा से बोले, यज्ञ की रक्षा किसी देश अखबारनगर की रक्षा के समान नहीं होती । मैं ऐसी बस इस बात को जानते हैं । वहाँ तो एक अथवा दो स्थित धनुर्धर ही चाहिए जो रक्षा का कार्य शांति से कर सके और जब वे सुरक्षा कार्य कर रहे होंगे तब हम शांतिपूर्वक कर सकेंगे तो मैं स्वयं प्रस्तुत हूँ । मैं साथ चलूंगा । राजा बोले नहीं राजन, अब आपकी आयु इस कार्य के लिए उपयुक्त नहीं राजी खुशी बोल । अब वासी सिंह जी ने राजा दशरथ को संबोधित कर कहा, काजल राजनीति ठीक कहते हैं । राम और लक्ष्मण मैं सब कुछ कर सकेंगे जो आप या आपकी पूर्ण सेना नहीं कर सकेंगे । मेरी सम्मति है ये राज देशी को पूजन कर इनको राम तथा लक्ष्मण के साथ विदा कर दिया जाए । इस पर राजा का मुख्य उतर गया । राजा ने दैन्य दस्ती से नाॅट और राजऋषि विश्वामित्र की ओर देख कर कहा भगवन! मुझे उनके जीवन का ध्यान लग रहा है । महाराज जहाँ राजऋषि उपस् थित होंगे वहाँ मृत्यु समीर भी नहीं आ सकती है । इस कथन के पश्चात राजा के पास कहने को कुछ नहीं रहा । सेवक द्वारा राम और लक्ष्मण को वहीं बुला भेजा और उनको समझाकर राजऋषि विश्वामित्र के साथ कर दिया । मार्ग में चलते हुए राजनीति ने राम और लक्ष्मण को अपने विषय में और अपने यज्ञ के विषय में समझाया । नारद मुनि के कथनानुसार विश्वामित्र ने काम इत्यादि वो रावण ऍम के साथ युद्ध के लिए तैयार करना था और इस युद्ध की तैयारी के लिए रावण से युद्ध करने की आवश्यकता की बात बतानी आवश्यक थी । इसके लिए दानव देव संस्कृति में अंतर बताने की भी आवश्यकता थी । इसी उद्देश्य से विश्वमित्र ने अपनी ही जीवन कथा से वार्ता आरंभ कि उन्होंने चलते हुए पूछा राम जानते हो कि मैं कौन हूँ? महाराज इतना ही जानता हूँ कि आप एक ऋषि है और सिद्धाश्रम ने एक यज्ञ कर रहे हैं । यह तो तुमको ठीक ही बताया गया । सिद्धाश्रम के मार्ग में एक ताडका वन है । उस वन का नाम एक ताड का नाम की महसूस तरीके नाम पडा है । वो स्त्री अति बहन कर योद्धा है और उसके साथ ही नर्म आस भी खाते हैं । अतः इस वन के आसपास के ग्रामों में ये किसी भी मनुष्य को बस ने नहीं देते । कोई आ जाए तो उसे लूटकर और मारकर उसका मांस भी खाते हैं । इससे धीरे धीरे वन क्षेत्र बढ रहा है । अतः यदि बातों में दिखती है तो नारी समझ दया नहीं करेंगे । गुरुजी सामने पूछा ये किसकी लडकी और किसके पत्नी है? वह सुकेतु नाम के शख्स की लडकी है । गोल्ड तपस्या के उपरांत उसके घर या लडकी उत्पन्न हुई थी । ये अति सुन्दर देवकन्या के सवाल थी । यस देव लोग के निवासी है । इसका विवाह एक धुंध नाम के व्यक्ति से हो गया । उन इस सुंदर स्त्री पर इतना मुझे हुआ कि वह सादा उसकी आज्ञानुसार काम करता है । ताड का और सुंदर कि संताल एक दुर्जन बाल सियाली उत्तर हुआ । उसका नाम मारीज हमारी मांसाहारी हो गया । इससे मैं जहाँ कहीं भी वन पशु मिलते हैं, उनको मार कर खा जाता है । एक बार मैं अगस्त ऋषि के आश्रम पर आया । अगस्त्य ऋषि उन दिनों देव पुत्रों को पढाने के लिए देव लोग में ही आश्रम बना कर रहते थे । वहाँ बहुत से हम लोगों को अच्छा से बिहार करते देख उनका मांस खाने की लालसा करता हुआ उस आश्रम के पास ही रह गया । वह नित्य आश्रम के लोगों को मार मार कर खाने लगा । रिषी ने उसे मना किया परंतु नहीं माना । इस कारण महर्षि ने मार इस को श्राप दे दिया । क्या शराब दिया सामने पूछ लिया उसको देश निष्कासन का श्राप दिया और इंद्रा ने मैं उसी के कथन का पालन करते हुए मार । इसको देव लोग से निकल जाने की आज्ञा दे दी तो यह शराब कहा जाता है हूँ । ऋषिमुनि किसी की हत्या नहीं करते और ऍम किसी को कोई दंड देते हैं, साहब ही देते हैं । शराब का भी प्राय यह है कि वे किसी पार्टी को उसके पाप का दंड सुना देते हैं और उस दंड का पालन राजा कराता है । यही बात मारीज के साथ हुई । मारीज को देव लोग से निकाल दिए जाने का दंड हो गया । ऋषि का या वचन देव राजेंद्र को बताया गया तो इंद्र ने अपने गण भेज मार इसको देव लोग से बाहर कर दिया । मरीज को देव लोग से निकाला गया तो उसकी माँ लडका को अति दुख हुआ । उसने अपने पति को कहा कि इस ऋषि से यह दंड वापस करवाई । फोन मुझे जी के पास पहुंचा और अगस्त्यजी माने नहीं । इस पर सुंदर ने मुनि जी को मार डालने की धमकी दे दी तो मोदी जी ने उसे मृत्युदंड का श्राप दे दिया । मैं केंद्र की आ गया से मृत्युदंड पा गया । इसपर तो ताडका रोज से भर गई और उसने अगस्त है । आश्रम को उजाडना और वहाँ के प्राणियों को मारना कम कर दिया । इस कारण ताडका को भी देव लोग से निकाल देने का शाप दे दिया गया । बारिश इस वन में रहता था । ताडका भी यहाँ गई और दोनों यहाँ सब प्रकार के उपद्रव करते रहते हैं । इनके मुख को नरमा इसका स्वाद लग चुका है । इस कारण जहाँ भी किसी अकेले या तो अकेले मान लोगों को देखते हैं तो उनको मार कर खा जाते हैं । मैं सन्यासी हूँ, जीवहत्या नहीं कर सकता और इस क्षेत्र में किसी राजा का राज नहीं है । अतः मुझे तुम्हारे पिता के पास जाना पडा । राजा दशरथ चक्रवर्ती राजा है । समझ पा रहे व्रत में जो भी क्षेत्र किसी राज्य में नहीं आता उस की सुरक्षा का दायित्व चक्रवर्ती राजा का होता है और तुम उसका प्रतिनिधित्व कर रहे हो । जब राम और लक्ष्मण इस वन में से गुजर रहे थे कि ताडका से साक्षात्कार हो गया । व्यस्त री मांसाहर के कारण बेडोल शरीर और आपने व्रत दांतों के साथ भयंकर रूप वाली प्रतीत हो रही थी । साथ ही वह युद्ध करना भी जानती थी । राम को पकडा मारकर खा जाने के विचार से लाभ की राम को राजऋषि विश्वामित्र ने सचेत कर रखा था । अतः राम ने उसे देखते ही धनुष पर बाण चलाया । वो राक्षसी की बातें घायल करती । इस पर रोज से भरी हुई राम को मारने के लिए थोडी तो राम ने उस पर बाढ वर्ष का उसे मार डाला । उस के मर जाने पर राम ने मैं उसी से पूछ लिया भगवन यह देवकन्या तो प्रतीत नहीं होती थी । इसका रूपवती विकराल था । आपने कहा था कि एक सुंदर देवकन्या थी परन्तु जब सुंदर से सुंदर व्यक्ति चिरकाल तक जरूर कार्य करता है तो उसका रूप विकृत हो जाता है । नरमा खाने से भी आकृति में विकराल पन उत्पन्न होने लगता है । तब से अधिक प्रभाव पडता है अपने करो और रहन सहन का । इस काॅपी शात्रों वाला था । यही कारण है कि इसकी सुन्दर गाया बद्दी व्यक्तिरूप हो गई थी । डाडका को मारकर उस वन में से निकल सिद्धाश्रम पर जा पहुंचे । बहुत पहुंचते ही राम और लक्ष्मण यज्ञमंडप की रक्षा का प्रबंध करने लगे और ऋषि अपने साथियों के साथ अपने अधूरे यज्ञ की पूर्ति में जुट गए ।

Details
श्री राम Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त Voiceover Artist : Ramesh Mudgal
share-icon

00:00
00:00