Made with  in India

Buy PremiumDownload Kuku FM

13. Swami Vivekanand

Share Kukufm
13.  Swami Vivekanand in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts
1 LakhListens
स्वामी विवेकानंद की अमरगाथा.... Swami Vivekanand | स्वामी विवेकानन्द Producer : Kuku FM Voiceover Artist : Raj Shrivastava
Read More
Transcript
View transcript

ऍम बात की बात सत्य जितना महान होता है, उतना ही सहज बोधगम्य होता है । स्वयं अपने अस्तित्व के समान से हैं विवेकानंद विवेकानंद की मृत्यु की तीन दिन इस बाद में घटनाएं घटित होने लगी जिनकी प्रतीक्षा में उन्होंने महासंघ हर्ष का सूत्रपात किया और नए भारत का सपना देखा । डॉक्टर पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी कांग्रेस का इतिहास पुस्तक में लिखा है, बीसवीं सदी के पहले पांच साल लॉर्ड कर्जन के दमनपूर्ण शासन के कलकत्ता कॉर्पोरेशन के अधिकारों में कमी । सरकारी गुप्त समितियों का कानून विश्वविद्यालयों को सरकारी नियंत्रण में लाया जिससे शिक्षा महंगी हो गयी । भारतीयों के चरित्र को असत्य, मैं बताना, बारह सुधारों का बजट, तिब्बत आक्रमण जिससे पीछे से तिब्बत मिशन का नाम दिया गया और अंत में बंगला छह । ये सब लॉर्ड कर्जन की ऐसे कार्य थे जिनसे राजभवन भारत की कमर टूट गई और सारे देश में एक नई स्पिरिट पैदा हो । विदेशी शासन कि अत्याचार और लूट खसोट के विरुद्ध आक्रोश बराबर बढ रहा था कि लॉर्ड कर्जन की बंग भंग योजना ने जलती पर तेल का काम किया । इस योजना के अनुसार बंगाली भाषा भाषी जनता को उनकी इच्छा के विरुद्ध दो प्रांतों में बांट दिया गया था । ना सिर्फ बंगाल के हिंदू और मुसलमानों ने इस योजना का विरोध किया बल्कि पट्टाभि सीतारमैया लिखते हैं, संपूर्ण भारत ने बंगाल के सवाल को अपना सवाल बनाते हैं । प्रत्येक प्रांत बंगाल की प्रश्न के साथ अपनी समस्याओं को और छोड कर आंदोलन को ज्यादा कह रहा हूँ । ऍम पंजाब के सैनिक प्रदेश में जनता के अंदर एक नया तूफान लाकर खडा कर दिया । इसमें जिस के सिलसिले में लाला लाजपत राय और सरदार अजीत सिंह को देश निकले की सजा सरकार ने दमन नीति अपना ही तो उसका परिणाम उल्टा निकला । जैसे जैसे दमन चक्र तेज हुआ, वैसे ही संघर्ष उग्ररूप धारण करता चला गया । में स्थिति चरमसीमा को पहुंच गई थी । अखबारों पर मुकदमे चलाना एक आम बात हो गई । युगान तेरे संध्या बन्दे मातरम नहीं जागृती के प्रचारक पत्र थी । सब बंद कर दिए गए । संध्या के संपादक ड्रामा बांधा उपाध्याय अस्पताल में मर गए । महाराष्ट्र में जुलाई उन्नीस सौ आठ को लोकमान्य तिलक गिरफ्तार किए गए । उसी दिन आंध्र में हरी सर्वोत्तम राव तथा अन्य व्यक्ति पकडे गए । पांच दिनों की सुनवाई के बाद लोकमान्य तिलक को छह साल की सजा में अठारह सौ इक्यानवे में छुट्टी हुई । छह मास्की के बीस में जोड दी गई । आंध्र के श्रीहरि सर्वोत्तम को नौ महीने की सजा मिली । सरकार ने इतनी थोडी सजा के खिलाफ अपील योर हाईकोर्ट ने उनकी सजा बढाकर तीन साल कर दी । राजद्रोह के लिए पांच साल सजा देना तो निरो मामूली बात थी । इसके बाद जल्दी कि राजद्रोह देश से गायब हो गया । वास्तव में वो अंदर ही अंदर अपना काम करने लगा और उनकी जगह बम पिस्तौल नहीं । कभी कभी के दुःख के राजनीतिक खून भी होने लगे । जिनमें सबसे साहसपूर्ण खून उन्नीस सौ में लंदन की एक सभा सेंसर कर्जन बाय लिखा हुआ था । ये खून मदनलाल ढींगरा नहीं किया था, जिसे बाद में फांसी दी गई । अभियुक्त को बचाने की कोशिश करने वाले डॉक्टर लाल का का नामक एक पार्टी सर्जन को भी फांसी की सजा दी गई । अनुशीलन नाम का का अधिकारी गुप्त संगठन में बना विवेकानंद की आयरिश शिष्य बहन निवेदिता तथा अरविंद घोष । इसके बुनियादी सदस्यों में से किसी बरस अठारह वर्षीय युवक खुदीराम बसु ने फांसी के फंदे कुछ हुआ । मुजफ्फरपुर जिला जज किंग्सफोर्ड को मारने के लिए उसकी बग्गी पर दो बम गिराए थे । उसकी तस्वीरें सारे देश में घर घर फैल गई । विवेकानंद का छोटा भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त क्रांतिकारियों के पत्र युगांतर का संपादक था । हिंसावादी प्रचार करने के अपराध में उसे लंबी सजा मिली तो उसकी पूरी माता ने अपने पुत्र की इस देश सेवा पर खर्च प्रकट किया और बंगाल की पांच सौ महिलाएं उन्हें बधाई देने उनके घर पर उपेन्द्रानन्द । दत्त ने भी अदालत में बडे साहस के साथ घोषणा की कि मेरे पीछे शक बार का काम संभालने वाले तीस करोड आदमी मौजूद हैं । पूर्व बंगाल में गुरखा सेना बुला ली गई राजद्रोही, सभा बंदी, कानून प्रसार और क्रिमिनल ऑॅफ इत्यादि दमनकारी कदम उठाए गए और इस सब के बावजूद संघर्ष खुले तथा ग्रुप के रूप से शुरू हुआ था । लेकिन अब उसने देश में अभी रूप धारण कर लिया था और बहिष्कार स्वदेशी राष्ट्रीय शिक्षा तथा स्वराज चार सूत्री प्रोग्राम । उसका आधार कलकत्ता का बेलूर मार्च क्रांतिकारियों की गतिविधियों का केंद्र बन गया था और सरकार से बंद कर देने पर विचार कर रही विवेकानंद को इस आंदोलन का श्रेय देते हुए रोमान रोल नाम लिखते हैं । विवेकानंद के निधन के तीन वर्ष पश्चात तेल अगर गांधी के महान आंदोलन के श्री गणेश के रूप में जो संगठित जन आंदोलन उठे, सब मद्रास के संदेश में नहीं आगे बडो की गुरु गंभीर बुखार के कारण हुआ जिसने बहुतों को जगाया है । इसाज ईसवी संदेश का दौरा अर्थ था एक देश के लिए और दूसरा विश्व के लिए अद्वैतवादी । विवेकानंद के मन में उसका व्यापक अभिप्राय ही प्रधान परिंदों भारत का पुनर्जीवन दूसरे अर्थ नहीं किया । उससे राष्ट्रवाद की बहुत कृष्णलाल होती थी जिससे आज संसार क्रस्ट जिसका सांघातिक प्रभाव आज सर्वत्र देखा जा रहा है या यूं कहे कि आदि से ईव सन्देश में जोखिम रात इसमें संदेह नहीं कि विवेकानंद का संदेश सारे देश में फैला और उसके फलस्वरूप वे घटनाएं घटी जिनके विवेकानंद प्रतीक्षा की ना सिर्फ घटित हुई बल्कि उन्होंने इतने जबरदस्त आंदोलन का रूप धारण किया कि उसके आगे ब्रिटिश सरकार को झुकना पडा और उसने अपनी बंग भंग योजना रद्द कर दिया । अठारह सौ सत्तावन के स्वाधीनता संग्राम के बाद ये पहला संघर्ष था जिसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद पराजित हुआ । इससे हमारे समूचे राष्ट्र का कौर पडा लेकिन इसमें संदेह नहीं कि विवेकानंद के संदेश में ये जोखिम की थी कि राष्ट्रवाद की भावना बढते बढते अंधराष्ट्रवाद में परिणी हो जाएँ । विवेकानंद ने राष्ट्र के सोते हुए सी को जगाया और उसमें आत्मविश्वास पैदा किया कि यूनान, मिस्र और रूममेट गए हैं । लेकिन लगातार विदेशी आक्रमणों के बावजूद हमारा राष्ट्र अब भी जीवित है और जीवित रहेगा । कारण ये है कि हमारे सुविशाल देश में महान संस्कृति के निरंतर धारा क्यों को युगों से बह रही है और वही राष्ट्र की भीड हैं, वही उसकी शक्ति है तो कोई भी विदेशी शक्ति ना उसे मिटा सकती है और ना उस राष्ट्र को हमेशा के लिए गुलाम बनाकर रख सकते । वे कारण के इसी संदेश को उन्नीस सौ पांच में लिखी गई तैराना आएं । हिंदी का रूप देकर इकबाल गुन बनाया सारे जहां से तो ऍम हम बुलबुले हैं जिससे कि फॅसा ऍम ना ऍम रूमा ॅ ऐसी बाकी मैं ये ऍम तो हिंदुस्तान की महानता, विशालता और सुन्दरता का गुणगान करना चाहिए । इससे राष्ट्रीयता की भावना सुदृढ होती है, लेकिन उससे सारे जहां से अच्छा मानने से ये स्वस्थ भावना अंधराष्ट्रवाद में बदल जाता है और वहाँ बच्चे नहीं, किसी से विजयी विश्व तिरंगा प्यारा हमारे पूरे स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीय गान बना रहा और लोग से बिना सोचे समझे लहर की है कर क्या करेंगे? किसी भी इस उसने सुझाने का कष्ट नहीं किया कि विश्व को विजय करना कदाचित हमारा दिए नहीं । हम सिर्फ अपने देश को विदेशी दासता से मुक्त कराना चाहते हैं कि दूसरे पर आज तुम देश भी मुक्त हो और अपनी अपनी जगह स्वतंत्र रहेंगे । इस समय चिंतन के अभाव में राष्ट्रीय भावना विकसित तथा सुदृढ होने के बजाय भावुकतापूर्ण मुर्खता में बदल गयी और उससे प्रतिक्रियावाद पूरा । बीस शताब्दी के प्रारंभ में रोमान रुलाना और एच । जी वेल्स टिहरी पाशा के चिंतकों ने राष्ट्र राष्ट्र में देश युद्ध तथा अहिंसावाद का विरोध करते हुए विश्वबंधुत्व मानव प्रेम और विश्व शांति का आदर्श प्रस्तुत किया । अद्वैतवाद का अभी क्यूंकि यही आदर्श है इसलिए रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद ने स्वतः रो माम गुलाम का ध्यान आकर्षित किया और उन्होंने इन दोनों भारतीय महापुरुषों की जीवनियां लेकर उन के माध्यम से विश्वबंधुत्व के आदर्श को प्रचारित प्रसारित किया । उनका मत था कि इस प्रकार धर्मांधता विश्व मानव को संप्रदायों में विभाजित करती है और वह संप्रदायिक व्यस्त ही आपस में लडते झगडते हैं । उसी प्रकार राष्ट्रवाद भी एक सांघातिक प्रवृत्ति है जब विश्व मानव को विभिन्न राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं में बात होती है । इससे एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर चढ दौडती है और इस से प्रेम के बजाय घृणा, द्वेष तथा हिंसा ही अधिक पडती । यही कारण है कि रोमांट बोला उनको विवेकानंद के संदेश में जोखिम दिखाई दी । इसका स्पष्टीकरण उन्होंने क्या किया? यह जोखिम हमारी जानी हुई है । हमने ऐसे बहुत से आदर्शों को पवित्रतम आदर्शों को अत्यंत घनिया चाहती है । भावनाओं के पोषण के लिए विकृत किए जाते देखा । परन्तु श्रृंखल भारतीय लोग समाज को बिना अपने राष्ट्रीय एकता का अनुभव कराये । उसे विश्व मानक की एकता का बोध कराना की कैसे संभव होता? एक के माध्यम ही से दूसरे तक पहुंचा जा सकता है । हो किंतु में एक अन्य मार्ग की उत्तम मानता हूँ । वहाँ अपेक्षतया अधिक दुर्गम हैं परन्तु अपेक्षया अधिक सीधा भी है, क्योंकि मैं भलीभांति जानता हूँ कि राष्ट्रचेतना से वंचित रह जाते हैं । उनकी श्रद्धा और मोदी मार ही में छूट जाती है । जो हो, वहाँ विवेकानंद का विश्वनाथ था, क्योंकि इस विषय में वे गांधी के समान ही मानव सेवा के प्रयोजन से ही राष्ट्र जागरण की अभिलाषा मतलब एकता सचमुच पवित्रतम आदर्श है । देखने सुनने में अच्छा लगता है, पर इसमें दोषी है कि इसका आधार अमूर चिंतन हैं, लेकिन अमूर्त मानव का कहीं कोई अस्तित्व नहीं । आज के युग में मानव पहले राष्ट्र में और फिर राष्ट्र के भीतर वर्गों में बना हुआ है । स्थिति में मानव एकता के मार्ग को तब बताना वास्तव में उत्पीडितों की राष्ट्रीय जीतना तथा शोषितों की वर्ग चेतना को कुंठित करना है । इससे जाने अनजाने साम्राज्यवादी और शोषकों अर्थात देशी विदेशी प्रतिक्रियावादियों का ही हिट पोषण होता है । जब तक राष्ट्र की मुक्ति और समाजवादी क्रांति द्वारा उत्पीडन तथा शोषण कांत नहीं हो जाता और वर्ग विभाजित समाज के बजाय वर्गहीन समाज अस्तित्व में नहीं आ जाता, तब तक मानव एकता का स्वप्न साकार नहीं । जब से आलीम से एक साक्षात्कर में एच । जी । वेल्स ने बडे उत्साह से भरकर इस पवित्रतम आदर्श की व्याख्या की तो सियाली गिन्नियों से खूब मंडू की संज्ञा दी थी । तमाम गुलाम ने अपनी चिंतन की असंगति के कारण ही विवेकानंद और गांधी को आपस में गडबड कर दिया । उन्होंने नासिर गांधी को बल्कि विवेकानंद को भी समझने में भूल अति । वे अपनी उत्तर विश्लेषण को जारी रखते हुए आगे लिखते हैं इस पर भी विवेकानंद जैसे व्यक्ति ने गांधी जैसे व्यक्ति से अधिक सतर्क होने के कारण राजनीतिक कार्य में धर्म भावना के प्राधान्य की बहुत चेष्टा कभी उचित नमानि जो गांधी नहीं, जैसा कि अमेरिका से आए उनके पत्रों से प्रकट है, वहाँ निरंतर अपने और राजनीति के मध्य नंगी तलवार रखे रहे । मुझे छूना नहीं राजनीति के प्रलाप से मुझे कोई मतलब नहीं है । इसका मतलब ये एक ही रो मामला में विवेकानंद के स्वामी प्रेशर था । धार्मिक पक्ष को भी देखा । उनकी दृष्टि है देखने में असमर्थ रही कि विवेकानंद ने धर्म के माध्यम से हमारी राजनीतिक लडाई सचित रूप से लगे । ये ठीक है कि रो नाम गुलाम की चिंतन में जो संगती ही वा किसी हद तक विवेकानंद के चिंतन में भी थी । हम पहले कह चुके हैं कि विवेकानंद हमारे देश के उभरते हुए पूंजीवादी वर्ग के प्रवक्ता और अपने इस वर्ग स्वभाव ही के कारण उन का चिंतन धार्मिक अद्वैतवाद से आगे बढ पाया । भौतिकवाद की कगार पर आकर रुक गया । उन्होंने ये तो कहा कि पचास बरस तक और सब देवता को उठाकर ताक पर रख दो, सिर्फ नरेंद्र नारायण की पूजा करो यही तुम्हारा देखता है । नरेन्द्र बहुत पीडित की पूजा पर सेवा एक बात है पर उन्हें क्रांति की शक्ति के रूप में देखना और वर्ग आधार पर संगठित करना एकदम दूसरी बार है जो विवेकानंद सोच नहीं पाए और आपने उक्त वर्ग स्वभाव के कारण के लिए सोच पाना संभव भी नहीं था । जरूरत इस बात की थी कि उनके सिर के बल खडे सिद्धांत तो उसी प्रकार बाप के बाल सीधा खडा किया जाता । इस प्रकार मार्क्स ने हेगेल के सिद्धांतों को किया था । ये तभी संभव था जब उनके बाद कोई दूसरा विवेकानंद पैदा हुआ होता, लेकिन नहीं हुआ । उनके ग्रुप भाई और शिष्य मध्यवर्ग से आए । हाँ, विवेकानन्द उनके जीवन में ही नहीं समझ पाए । बाद में क्या समझते हैं? जिस प्रकार उमामी गुलाम ने विवेकानन् के धार्मिक पक्ष को ही देखा, उसी प्रकार इन लोगों ने भी सिर्फ धार्मिक पक्ष को देखा और राजनीतिक पक्ष की उपेक्षा की और अब भी कर रहे हैं । परिणाम यह कि विवेकानंद ने जिस धर्मांधता के वृद्ध आजीवन संघर्ष, क्या उनके नाम बर्फ वही फैलाई जा रही है? आपने आदर्शवादी चिंतन के कारण जो मामू ओलांद ने हमारे राष्ट्रीय संघर्ष के इतिहास को भी समझने में भूल गई । बंग भंग योजना के विरुद्ध जो जन आंदोलन उठा था, जिसकी आगे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को घुटने देखने पडेंगे, उसके नेता बाल गंगाधर तिलक, विभिन्न चंद्रपाल और लाला लाजपत राय थे और इसी से बाल पाल लाल तीन नाम हिमालय से कन्याकुमारी गूंज उठी तो मान उलान ने तिलक के साथ गांधी का नाम व्यर्थ में जोड दिया । गांधी उस समय दक्षिण अफ्रीका में था और ब्रिटिश साम्राज्यवादी उसे नेता बनाकर भारतीय राजनीति के अखाडे में ला उतारने के लिए योजना बद्ध ढंग से उसका प्रशिक्षण कर रहे हैं । प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी तत्वों को वह अगर प्रतिवाद वो आपस में गडबड करने से प्रतिक्रियावादी का हित पोषण होता है । हमारे देश में महाभारत के जमाने से ही ऐसा होता रहा है और राष्ट्रीय संघर्ष के इतिहास में भी ऐसा हुआ । इन दोनों तत्वों को जब तक अलग अलग न कर लिया जाए तब तक विवेकानंद और गांधी की अठवा तिलक और गांधी की भूमिका को समझ लेना असंभव और इससे समझ लेना आवश्यक है क्योंकि समझे राष्ट्रचेतना और वर्ग जीतना कुंठित तथा विकृत रहेगी । कांग्रेस की स्थापना अठारह सौ पचासी में हुई तो वह दलाल तत्वों का संगठन था । इन तत्वों ने अतीत से अपना संबंध विच्छेद करके अंग्रेज के आगे आत्मसमर्पण कर दिया था । उनकी दृष्टि में पश्चिम की प्रत्येक वस्तु श्रेष्ठ और अपना जो कुछ था, वह सब रहेगा । उनका विश्वास था कि अंग्रेज हम जंगली और असर भी लोगों को सभ्य बनाने के लिए ही सात समुद्र पार से आए हैं । उनसे सहयोग करना ही हमारे उधार तथा उन नदी का एकमात्र मार हैं । अतेम कांग्रेस अधिवेशनों से राजभक्ति का परिचय देकर पद और प्याज प्रशासन के कुछ अधिकार मांगे जा रहे हैं, लेकिन बाद में देश भक्त भी कांग्रेस में आए और धीरे धीरे उन का जोर इतना बडा की बंग भंग योजना के वृद्ध जन आंदोलन के दौराया उन्नीस सौ सात के सूरत अधिवेशन में उन्होंने इन राजभक्त दलाल तत्वों को जिनके नेता गोपालकृष्ण गोखले थे, कांग्रेस से निकाल बाहर किया और तभी आंदोलन आगे बढ पाया । यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी क्योंकि देश, भक्त और राज भक्तों में अलगाव के बिना विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष का सफल होना संभव नहीं था । अब ये हुआ की तिलक के नेतृत्व में जिन देशभक्त तत्वों ने जन आंदोलन को आगे बढाया, उन्हें उग्रवादी की और जिन अंग्रेज भक्तों को कांग्रेस निकाला गया उन्हें मार ट्रेड अथवा उदारवादी की संज्ञा दी गई । इसका प्रयोजन देशभक्त और अंग्रेज भक्त के बीच के अंतर को मिटाने अर्थात प्रगति, शील और प्रतिक्रियावादी तत्वों को आपस में गडबड करने और दोनों को देशभक्त सिद्ध करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं था । परिणाम ये कि घृणा के पात्रों को भी आदर तथा श्रद्धा के पात्र बना दिया गया । हमारा स्वाधीनता संग्राम जब गुप्त रूप से और खुले रूप से आगे बढ रहा था और जब युद्ध कि परिस्थितियां राष्ट्रचेतना और वर्ग चेतना को तीव्र बना रही थी तो ब्रिटिश शासकों ने जनवरी उन्नीस सौ में गांधी को दक्षिण अफ्रीका से लाकर भारतीय राजनीति के अखाडे में उतार दिया । अंग्रेज गौरवगान करने और पांच शाह के जीवन पद्धति को श्रेष्ठ मानने का युग अब बीत चुका था । गांधी को बताया गया कि भारत की अपन जनता अपनी प्राचीन परंपरा के अनुसार अवतार पुरुष अथवा राजपुरुष को सहज में नेता मान लेती है इसलिए उसने लंगोटी पहनकर महात्मा का रूप धरा और भारतीय संस्कृति से छोडा संबंध चुना । हुआ ये कि सूरत अधिवेशन में जिन अंग्रेज भक्तों को निकाला गया अब गांधी की अगुवाई में कांग्रेस की बागडोर फिर उन्हीं की हाथ में आ गई । विवेकानंद के काम को भी डर से नष्ट करने के लिए एनीबेसेंट और सी एफ एंड्रयूज तरीके लोगों को गांधी का सहयोगी बनाया गया । हुआ ये कि विचार की दृष्टि से उन्नीसवी सदी के अंत तक विवेकानंद ने देश को जहाँ पहुंचा दिया था, गांधी वहाँ से ढाई सौ बरस पीछे लेंगे तो अलग भी । विवेकानंद की तरह भारतीय संस्कृति को समझ और इस पर गर्व करने वाले जनवादी नहीं था । उन्होंने गीता रहस्या नौजवानों को क्रांति की प्रेरणा देने के उद्देश्य से लिखा था । इसके विपरीत गांधी ने गीता माता नाम से गीता की जो व्याख्या की उसका उद्देश्य निश्चित रूप से प्रतिक्रियावादी है क्योंकि वह संघर्ष को अन्तर्मुखी बनाती हैं । मन्मथनाथ गुप्त ने वो हमारे क्रांतिकारी पुस्तक की भूमिका में उसकी आलोचना ही होगी । याशीर की बात है कि जब गांधीजी ने राष्ट्रीय आंदोलन को प्राधिकारी मोड से हटाकर दूसरा मोर देना चाहा तो उन्होंने गीता पर अनासक्ति योग नाम से क्या क्या लगी । इसमें उन्होंने गीता द्वारा हिंसा का समर्थन किया और योग का आंकी कुरुक्षेत्र का युद्ध असल में कोई युद्ध नहीं था । ये तो मन और इंद्रियों का युद्ध मात्र गांधी द्वारा कांग्रेस और खिलाफत के समझौते को बहुत बडी राष्ट्रीय एकता का नाम दिया जाता है । वास्तव में यह हिंदू पुनर दीन, बाद का मुस्लिम पुनरुत् तीन बाद के साथ सिद्धांतहीन तथा अवसरवादी समझौता था । इसका उद्देश्य तिलक से कांग्रेस का नेतृत्व हथियाना था । चौरा चौरी घटना के बहाने गांधी ने जब आंदोलन वापस लिया तो बालू रेत की नींव पर खडा राष्ट्रीय एकता का ये महल भी ढह गया । राष्ट्रीय एकता अंतर्विरोधों के समुचित समाधान द्वारा ही संभव है उन्हें डालने टहलाने का भयंकर परिणाम । हम देश के बंटवारे के रूप में भुगत चुके हैं और भुगत रहे गांधी ने गीता और वेदांत दर्शन की अहिंसावादी व्याख्या करके संघर्षरत जनता को मानसिक रूप से निःशस्त्र क्या में वाइसरॉय की ट्रेन को बम से उडाने घटना के बाद गांधी ने यंग इंडिया में कल आप दीपों बॉल का सिद्धांत नाम से जो लेख लिखा और नमक सत्याग्रह शुरू करने से पहले वाइसरॉय के नाम जो पत्र लिखा उससे स्पष्ट है कि उसकी लडाई ब्रिटिश साम्राज्यवाद कि संगठित प्रतिक्रियावादी हिंसा के विरुद्ध नहीं बल्कि हमारे राष्ट्र की क्रांतिकारी हिंसा के विरुद्ध थी । भगत सिंह और उनके साथियों ने गांधी की इस क्रांति विरोधी और राष्ट्र विरोधी भूमिका को भलीभांति समझ लिया था । काॅम के उत्तर में उन्होंने फॅमिली प्रकाशित किया जो तीस जनवरी को गुप्त रूप से देशभर में बांटा गया । वो यहाँ शुरू होता है हाल ही की घटनाओं से, जिनमें वाइसरॉय की ट्रेन को बम से उडाने की कोशिश पर कांग्रेस का प्रस्ताव और बाद में यंग इंडिया में गांधी जी का लेक विशेष रूप से उल्लेखनीय है । जाहिर है कि इंडियन नेशनल कांग्रेस ने गांधी के साथ मिलकर क्रांतिकारियों लाख युद्ध शुरू कर दिया है । फिर ये समझाने के बाद की दमन और अन्याय के लिए प्रयोग हिंसा है । पर अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए बल प्रयोग कदाचित हिंसा रहीं । अपने उद्देश्य की व्याख्यान शब्दों में ही थी । क्रांतिकारियों का विश्वास है कि देश की मुक्ति का एकमात्र मार्ग क्रांति क्रांति के लिए दिन रात काम कर रहे हैं, उसका परिणाम विदेशी सरकार, उसके पिट्ठुओं तथा जनता के सशस्त्र संघर्ष के रूप ही में प्रकट नहीं होगा बल्कि बहुत देश में एक नया समाज स्थापित करने का कारण बनेगा । ऐसी क्रांति, पूंजीवादी व्यवस्था, विषमता तथा विशेषाधिकारों को हमेशा के लिए तब ना दी या आपके लिए प्रसन्नता और करोडों मनुष्यों के लिए जो विदेशी साम्राज्यवादियों तथा भारतीय पूंजीपतियों की लूट खसोट का शिकार बने हुए हैं, समृद्धि का संदेश लाएगी । इससे देश का वास्तविक रूप संसार के सामने आएगा और वो एक नए राज्य तथा नये समाज को जन्म देगा । श्रमिक वर्ग देश की बागडोर अपने हाथ मिलेगा । जनता का खून चूसने वाले वर्गों को हमेशा के लिए राजनीतिक सत्ता से वंचित करें । क्रातिकारियों को नौजवानों के असंतोष में इस आगामी क्रांति के चिन्ह दिखाई दे रहे हैं । व्यवस् धार्मिक रूढिवाद तथा मानसिक दासता को चकनाचूर करने के लिए अधीर हो उठे हैं जो क्रांति की राह में रूकावट बनी हुई है । जो जो भी क्रांतिकारी विचारधारा को आत्मसात करते जाएंगे उनके मन में देश की गुलामी का एहसास बढता जाएगा और ये एहसास उनके मन में आजादी की ऐसी प्याज पैदा कर देगा जो तासा की जंजीरों को छोडे बिना नहीं बुझ पाई । ये प्यास निरंतर बढती चली जाएगी । गुलामी के एहसास और आजादी की तरफ से उन का खून खोलेगा और वे आतताइयों को मौत के घाट उतारने के लिए मैदान से निकला है । देश में आतंकवादी आंदोलन की शुरूआत इस प्रकार हुई है ये आंदोलन क्रांति का एक आवश्यक तथा अनिवार्य चरण हैं । ना आतंकवाद पूर्ण क्रांति है और न ही आतंकवाद के बिना क्रांति संपन्न हो सकती है । आज तक संसार में जितनी क्रांतियां हुई है उनसे हमारे इस दृष्टिकोण की पृष्टि होगी । आतंक आता आयु के मन में भय उत्पन्न करता है । इससे यह सिद्ध हो जाता है । जनता अपने वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं है और वहाँ इसे बदल देने के लिए तडप रही । दूसरे देशों में भी ये आंदोलन बढते बढते क्रांति और आर्थिक स्वाधीनता लाने का कारण बनी । क्रांतियों के दृष्टिकोण की व्याख्या ऊपर कर दी गई हैं । देश के लिए वे जो कुछ करना चाहते हैं वो इससे स्पष्ट है । दुनिया भर में मजदूरों, किसानों और शासक वर्गों के दरमियान जो संघर्ष चल रहा है तो उसमें रहनुमाई हासिल करते हैं । उन्हें विश्वास है कि उन्होंने अपने भी पूर्ति के लिए जो ढंग अपनाया हैं, वो आज तक कभी असफल नहीं । अगर कांग्रेस के खद्दरधारी दलाल तत्वों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्यवाद की सहायता ना की जाती तो सरकार का कोई भी दमन इस आंदोलन को असफल बनाने में निश्चित रूप से असफल रहेगा । इसका मतलब ये हुआ कि विवेकानंद ने जिस नए भारत का स्वप्न देखा और क्रांतिकारियों ने जिसे अपने खून से सींचा, गांधी दर्शन उसकी भ्रूण हत्या, कान निकृष्टतम षड्यंत्र था । इससे अहिंसा क्यों? कहाँ जाएँ? ये जो देशी विदेशी नीति, ईद स्वार्थों की निर्मम हिंसा की क्रांति को विफल बनाने अथवा स्थगित करने का भयंकर परिणाम हमारे सामने हैं । सत्य और अहिंसा के नाम पर धोखा धडी, लूट खसोट और भ्रष्टाचार का बाजार घर में प्रत्येक राज्य में दर्जनो होंगे और पाखंडी अवतार पैदा हो गए । साल के अंत में विश्वबंधुत्व तथा मानव सम्मेलनों की बाढ सी आ जाती है । बडे बडे जुलूस निकलते हैं, बडे बडे चल से होते हैं और इन तथाकथित अवतारों को बडे बडे नेताओं राजपुरुषों का सहयोग सहज प्राप्त हो जाता है । देशी विदेशी नहीं । स्वार्थ इन सम्मेलनों और जलसे जुलूसों पर अपना कालाधन दिल खोलकर खर्च करते हैं । पर जब देश की भूख की जनता रोटी मांगती है तो उस पर गोलियां था की जाती है । भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद ने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी नाम से जब अपना दल संगठित किया तो आतंकवाद सामूहिक क्रांति के चरण में प्रवेश कर रहा था और इस दल का मार्ग सी क्रांतिकारी विचारधारा से संबंध जुड गया था । मार्च स्वास्थ्य संबन्धित जुड जाना हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के एक स्वाभाविक प्रक्रिया के कारण ये की अक्टूबर कि रूसी क्रांति के बाद समाजवादी क्रांति को क्या मार्क्सवादी विचारधारा और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व के बिना किसी जनवादी क्रांति का भी सफल होना संभव नहीं रहेंगे? प्रदेश का दुर्भाग्य ये है कि उन के बाद चौथे दशक में जब मार्क्सवादी विचारधारा ने जोर पकडा और जन आंदोलन ने मजदूर यूनियनों और किसान सभाओं का रूप धारण किया और उसका नेतृत्व भी अंग्रेज भक्त दलाल तक होने हथिया लिया । जिस तरह गीता तथा वेदांत के दौरे में गांधी ने महात् साईका बहुरूप भरा था, उसी तरह जवाहरलाल नेहरू ने समाजवाद का बहू भरा और इन दोनों ने जनता के साथ जो छल किया, उस स्थल का भांडाफोड करना कम्युनिस्ट पार्टी का काम था । लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी अपनी ये ऐतिहासिक भूमिका अदा करने में इसलिए असमर्थ रही कि उसके नेता भी में कॉलेज की शिक्षा प्रणाली में पले ढेले अपनी राष्ट्रीय परंपरा से अब हिंद उच्च वर्ग तथा मध्यवर्ग के अवसरवादी बुद्धिजीवी उनमें से अधिकांश की शिक्षा इंग्लैंड में हुई थी । वास्तव में वे मार्क्सवादी न होकर संशोधन मारनी संशोधन बाद नेताओं ने गांधी और नेहरू के छल का भांडाफोड तो क्या करना था, उलटा कम्युनिस्ट पार्टी को कांग्रेस हाईकमान का पिछलग्गू बनाकर क्रांति को विफल बनाने में उसका साथ दिया । आज के हालात में तथाकथित मार्क्सवादी नेताओं का अवसरवाद आपने नग्न रूप में हमारे सामने अधिक टीका टिप्पणी की आवश्यकता है । सोचने समझने की बात ये है कि नेतृत्व गांधी के हाथ में आने से पूंजीवादी नवजागरण की प्रक्रिया अधूरी रह गई और समाजवादी नवजागरण का सूत्रपात ही नहीं हुआ । गांधी का विरोध सुभाष ने किया और इसी कारण तिलक के बाद जनता में उनका आदर कांग्रेस के किसी भी नेता से अधिक, लेकिन सुभाष मार्क्सवादी नहीं । इसलिए वे राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय स्थिति का सही मूल्यांकन नहीं कर पाए । के लाहौर अधिवेशन में मुकम्मल आजादी का प्रस्ताव पास हो जाने के बाद उन्होंने मजदूरों, किसानों तथा नौजवानों को संगठित करने और समानांतर सरकार बनाने का प्रस्ताव तो रखा, पर इस प्रस्ताव के रद्द हो जाने के बाद स्वयं उन्होंने भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाएं । हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के कुछ संगठन और सशस्त्र संघर्ष की परंपरा को फॉरवर्ड ब्लॉक, कम्युनिस्ट पार्टी अथवा किसी भी पार्टी ने आगे नहीं बढाया । परिणाम ये कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद उन्नीस सौ छियालीस में जब क्रांति का जबरदस्त बाहर आया तो कोई भी पार्टी उसका नेतृत्व करने में सक्षम नहीं थी । परिणाम यह है कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग के दलाल नेतृत्व ने क्रांति की पीठ में छूरा खोक्कर, ब्रिटिश साम्राज्यवाद से समझौता कर लिया । क्रांति एक रचनात्मक, ऐतिहासिक शक्ति है । उसमें राष्ट्र के उत्कृष्ट तत्व भरकर ऊपर आते हैं, गले सडे वी कृष्ट तत्व झड जाते हैं और विचार का स्वस्थ विकास होता हैं । हमारे देश में क्रांति को छू की निरंतर डाला पर सब स्थगित किया । परिणाम ये कि विचार एक स्थान पर आकर तो इससे साहित्य और संस्कृति का प्रयास हुआ । चिंतन को सही दिशा, ना मैं हम यासी को प्रगति तथा उन्नति समझ बैठे । इकबाल का जिक्र पहले आया है और अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए हम फिर इकबाल का उदाहरण देना चाहेंगे । ये उदाहरण इसलिए भी उचित है कि इकबाल ने जहाँ शुरू में सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा लिखकर प्रसिद्धि पाई, वहाँ चौथे दशक में कुछ वो मेरी दुनिया के गरीबों को जगह तो लिख कर वाम पक्षियों में विशेष महत्व प्राप्त लेकिन एक बार अब दुनिया ही की बात करते थे और इस्लामी घातक ऍम की बात करके वजन की देश की बात करना हो ना उनकी कविता बदनियत राष्ट्रवाद है । वे कहते हैं इन ताजा खुद गांव में बडा सबसे बदन जो पैर है, उसका है । वहाँ मतलब का फर्ज अर्थात पूंजीवादी युग ने जो नए नेता निर्माण किए हैं उनमें सबसे बडा देवता देश है और उसका जब परिधान है वह धर्म का सफर या मूर्ति चिंतन है जिसका आधार उमामी, गुलाम तथा एच जी वेल्स इत्यादि आदर्शवादी विचार को का पवित्रतम आदर्श है । अब देखना यह है कि यह अमूर्त चिंतन इकबाल हो । कहानी हाँ विवेकानन्द द्वारा भारतीय राष्ट्र सौदे सी को जगाने के उद्घोष से प्रभावित हो गए इस इकबाल ने बाकी मगर है अब तक नामोनिशान हमारा का स्वर लापाता वही अब सिसली द्वीप पर खडे नाम के सोये सी को जगह पे टिक पडते हैं । वो कहते हैं मैं तेरा तो स्वास्थ वह हिंदुस्तान ले जाऊंगा, यहाँ होता हूँ और वो बाहर हूँ । परिणाम ये कि हमारा इतिहास बढ गया, परंपरा बढ गई और नायक बढ गए । हम आपस में लड मरे और अब तक लड रहे हैं मान अव्यक्ता तो क्या स्थापित होनी थी । राष्ट्रीय एकता भी खंडित हो गयी । कम्युनिज्म अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन है और कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मार्क्स और एंगेल्स का उद्घोष हैं दुनिया भर के मजदूरों एक हो जाऊँ जैसा कि हम पहले कह चुके है कि मार्क्सवाद असल में बहुत दिक्कत द्वैतवाद है । अपने इतिहास और संस्कृति से अनभिज्ञ में कॉलेज की शिक्षा पद्धति में ढले हुए वामपंथी नेताओं तथा प्रगतिशील एक कोने सब्जपोश का भी गलत अर्थ लगाया और राष्ट्रीयता को नकारकर अमूर्त चिंतन को बढावा । हाल ही में कश्मीर के उग्र वामपंथी राम प्यारी शराब की पुस्तक प्रेजेंट इंडियन सोसाइटी आज का भारतीय समाज नजर से कुछ भूमिका में पुस्तक लिखने का उद्देश्य क्रांति की शक्तियों को दृढ बनाना बताया गया है । इस पुस्तक के लेखक ने पाकिस्तान बनने का पहला कारण ये बताया कि गांधी वेद और उपनिषदों का नाम लेता था । दूसरा कारण ये बताया कि संसद के इतनी प्रतिशत सदस्य संस्कृत को राष्ट्रीय भाषा बनाने की बात कहते हैं और तीसरा कारण ये बताया कि कांग्रेस के प्रतिक्रियावाद नेताओं ने वंदे मातरम को राष्ट्रीय कान का दर्जा दिया । आप निवेशित शिक्षा प्रणाली ने ऐसे तो वो एक बडी तायदाद पैदा कर दी है जिनके पास देश की धरती पर नहीं हैं जो भारत को अपना देश नहीं समझते और भारत की चंदा से जिनका कोई तादात में नहीं, ऐसी पुस्तकें ऐसे ही लोगों के लिए लिखी जाती है और वही उन्हें पढते हैं । इन तथाकथित वामपंथियों के पास ना भाषा है और ना विचार । परिणाम ये कि पिछले सत्तर वर्ष के आंदोलन में हमारे इतिहास, दर्शन, संस्कृति में उन का कोई स्थान नहीं । मार्क्सवाद एक वैज्ञानिक सिद्धांत उसे सिर्फ पुत्रवत करने से काम नहीं चलेगा । उसे भारत की ठोस परिस्थितियों पर लागू करके ये जानना होगा कि भारत आज क्या है? कल क्या था, सौ बरस पहले किया था और हजार बरस पहले क्या था? अतीत को समझ लेने के बाद ही वर्तमान का निर्माण संभव है । इसके लिए अपने इतिहास और दर्शन का ज्ञान आवश्यक है । वीर उपनिषद्, रामायण, महाभारत, कपिल, कणाद, गौतम, चाणक्य, शंकराचार्य, रामानुज, चैतन्य, कबीर, नानक, रामकृष्ण, परमहंस और विवेकानन् सब हमारे हमें उन की ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टि से व्याख्या करनी है । वो व्याख्या ही मार्क्सवाद का मूलरूप होगी । मार्क्सवाद के समूह रूप को हमारी जनता सेहत से ग्रहण करेगी और से क्रांतिकारी भौतिक शक्ति में बदल दी । लेने ने ऐसा किया और वे सफल माओत्सेतुंग और कोच्चि मैंने ऐसा किया तो उन्हें भी सफलता मिली । सांस्कृतिक परंपरा से जुडकर ही लोग क्रांतिकारी बनते हैं । माओत्सेतुंग ने तो यहां तक कह दिया संस्कृति ईन सेना जडबुद्धि सेना है, शत्रु को पराजित नहीं कर सकते । गंगा युगो युगों से अविरल गति के साथ धरती पर बह रही है । उस की धारा को किसी एक विशेष सीन की धारा से अलग नहीं किया जा सकता । अपने विशिष्ट उद्गम और विशिष्ट मार्ग से बहने के कारण गंगा के चैनल में जो एक विशिष्ट गुण हैं, वहाँ दर्ज जिला बोल गाजवा यान सी के चल में नहीं और गोल्ड और यान सी के पानी में जो विशिष्ट गुण है, वह गंगा के पानी में नहीं । इसके इस विशिष्ट गुड को नकारकर सबके पानी को सम्मान बना देना संभव नहीं, बल्कि चल के विशिष्ट उनको समझ लेना ही जिस पर वो रहता है उस धरती संबंधी संबंध, ज्ञान गंगा की धारा ही की तरह हमारे देश में विचार कि तुम्हारा यू उपयोग से अविरल गति के साथ बहती चली आ रही हैं । इस धारक किसी भी स्थान पर बीच में कार्ड देना संभव नहीं है । विशिष्ट भौगोलिक, ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण उसके विकास की भी एक विशिष्ट प्रक्रिया है । हमें इस विशिष्टता को समझना होगा और अपने चिंतन का सूत्र विचारधारा से जोडकर विवेकानंद उसे जहां लाकर छोड गए हैं उसे आगे बढाना होगा मिरामार स्वाद भागने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । निसंदेह आज के युग में मार्क्सवाद, लेनिनवाद और मौत से कम विचारधारा का ज्ञान आवश्यक है लेकिन अपनी सांस्कृतिक परंपरा को समझना और से जुडना और भी आवश्यक । विवेकानंद को प्रतिक्रियावादी कहने वाली आग विकृत सुधारक ना सिर्फ ये कि राष्ट्रीय संघर्ष से अलग रहे बल्कि उनमें से बहुतों ने राष्ट्रविरोधी और जनविरोधी निकालना के बाद समाजवाद और प्रगतिशील नेताओं तथा लीग को की भूमिका भी आज किसी से छिपी नहीं । दरअसल राष्ट्र को नकार कर अंतरराष्ट्रीय बनने वाले तथाकथित बाम पक्षियों ने अतीत की हर शय को ही समझने वाली, परंपरा विरोधी और समाज विरोधी प्रवृत्ति ही को अधिक बढाया फैलाया । इससे दलाल होगा ही पोषण आज देश में क्रांति की परिस्थिति पहले की अपेक्षा कहीं अधिक परिपक्क है । जनता क्रांति के लिए तैयार है, पर इसकी रहनुमाई करने वाली क्रांतिकारी पार्टी अभी सामने नहीं । राष्ट्रीय को नकारना ही सब भाव का मुख्य कारण है । हमारी अपन और नरेंद्र साडियों के अनुभव को अपनी झोली में प्राण फंसे संभाले हुए उसके हाथ चाहे खुरदुरे और घायल है क्योंकि कठिन श्रम किया है और उन पर क्रूर पर आहार होते रहे हैं पर वहाँ झोली को मजबूती से पकडे और हमें हुए या पर और दरिद्र जनता करती का नेतृत्व उसी पार्टी को सौंपेगी जो उसकी झोली के अनुभव को आदर से देख कर के डाॅ । पार्टी भी क्रांतिकारी तभी बन पाएगी और तभी जनता से उनका तादात में स्थापित होगा । ये मुंबई नहीं कि अतीत तो प्रतिक्रियावादियों के लिए छोड दिया जाए और भविष्य के मालिक राधिका कार्यशक्ति का आभाव कठोर परिषद का यह खुद को कुछ हो जाओ और तब तक आगे बढते चलो जब तक की आपने भी को प्राप्त नहीं करना हमेशा उसके खून को कर माता रहा है । मजदूर, किसान विध्यार्थी तथा देश की समूची मेहनत का जनता अब जाग उठी है और पिछले चालीस पैंतालीस बरस के अनुभव से उसने भली भांति समझ लिया है कि सशस्त्र क्रांति के बिना भारत का स्वप्न साकार नहीं होगा और उसका नेतृत्व करने वालों को भी समझ लेना होगा की पार्टी जनता से बडी नहीं बल्कि जनता पार्टी से बडी हैं और इस समझ को व्यवहारिक देना होगा ।

Details
स्वामी विवेकानंद की अमरगाथा.... Swami Vivekanand | स्वामी विवेकानन्द Producer : Kuku FM Voiceover Artist : Raj Shrivastava
share-icon

00:00
00:00