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11. Devraj Indra Ke Saath Hua Chhal

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श्री राम Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त Voiceover Artist : Ramesh Mudgal
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हूँ । आप सुन रहे हैं रमेश मुद्गल से गुरूदत्त लिखित छेदीराम को असन सोने जो मन सा है श्री राम बहुत ग्यारह । रावण के विंध्यप्रदेश के राजा अर्जुन द्वारा बंदी बनाए जाने के समाचार की भिन्न भिन्न स्थानों पर दिन दिन प्रतिक्रियाएं हुई । देव लोग में केंद्र को पता चल गया कि राजनीति और युद्धनीति में कहाँ अंतर है । व्यवहार मैं राजनीति अपने राज्य में रहने वालों से संबंध रखती है । मैं देश तथा जाती में धर्मानुसार प्रचलित होती है । छत्रों के साथ नीति भिन्न होती है । युद्ध में शत्रु माया का व्यवहार भी कर सकता है । आप की पराजय के पश्चात कोई सुनने वाला नहीं । मेघनाथ ने इंद्र को भी माया सही बंदी बनाया था । उस राक्षस सैनिकों को देवताओं के पहरावे में केन्द्र के पास भेज दिया गया और केंद्र को कहा गया कि देवताओं ने रावण की सर्वश्रेष्ठ नर्तकी को बंदी बना लिया और वह राजा इंद्र को अपना करते हैं और संगीत सुनाएगी । केंद्र छल्ला में फस गया और अपने थोडे से साथियों के साथ लडकियाँ देखने चला गया है वहाँ मेघनाथ नहीं उसे बिना प्रयास ही बंदी बना लिया । एक बार जब इन्द्र बंदी हो गया तो उससे अपनी मनचाही करते हैं । मान वाली नारद मुनि विश्व भर में भ्रमण करते थे और राय सब राजाओं से परिचित थे । उनसे देवराज इंद्र ने राजा अर्जुन की विजय का था सुनी की किस प्रकार नर्मदा के जल को बांध लगा रोकने का प्रबंध किया गया है और जिस से उस फोन नदी क्षेत्र में पानी का बहुत रोका या बढाया जा सकता है । इस विधि से बिना एक भी तीर चलाए रावण के तीन चौथाई सैनिक डूब गए । उस पक विमान जलभर जाने से बेकार हो गया था और डूबते रावण को बंदी बना लिया गया था । केंद्र समझ गया कि आर्य राजा देवताओं से नीति में बाजी ले गए है । उसमें आरियों को ही राक्षसों से भिडाकर रावण का वध करने का विचार बनानी है हम नारद ने कहा देवराज एंड राजा अर्जुन तो हो गया है । आपको स्मरण होगा कि कौशल नरेश राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि किया था तो मैं बस पाँच वर्ष के थे । उनकी सबसे छोटी रानी भी उस समय चालीस वर्ष की थी । उसकी तीनों रानियों में से किसी के भी संतान थी । मैं ऐसी संघी ने यह करवाया था उसी अगर में पिता में ब्रह्मा जी के निर्देश पर अश्विनी कुमारों ने यहाँ से रोशन वाला अगर राजा के यज्ञ में भेजा था और उसे राजा दस अपने अपनी तीनों पत्नियों को खाने को दिया था । बडी रानी पचास वर्ष से ऊपर की आयोगी थी है । उसके गर्म में एक अति तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ था । दूसरी रानी सुमित्रा के दो पुत्र हुए थे और तीसरी रानी के लिए पुत्र हुआ था । चारों भाई देवी गुणों से संपन्न और कुशल योद्धा है परंतु उन के बाद दिव्यास्त्र नहीं है और नए ही उनमें उन दिव्यास्त्रों के प्रयोग की योग्यता है । नारद ने आगे बताया, पिता मैंने मुझे अपनी योजना आगे चलाने के बारे में बताया है कि राजा दशरथ का बडा लडका राम अब सक्षम हो गया है और वह रावण को पराजित कर सकेगा । अतः उसे दिव्यास्त्र प्रयोग करने का ढंग सिखाने का प्रबंध करना चाहिए । इस समय गंगा के दक्षिण की ओर विन्ध्याचल की तलहटी के वन में राजऋषि विश्वामित्र अपना असम बनाकर रहते हैं । उनके पास बहुत से दिव्यास्त्र था । मैं की योजना के अनुसार मैं उनके पास जा रहा हूँ और उनको उन अस्त्र शस्त्रों के प्रयोग का ढंग राम को बता देने का आग्रह करूंगा । परन्तु मेरा अनुमान है कि रावण को परास्त करने के लिए ऋषि विश्वामित्र के अस्त्र शस्त्र काम नहीं चलेगा । इसमें आप भी कुछ सहायता करते हैं । केंद्र ने कहा बात ये है की मम्मा के समूह मेरी रावण से संधि हो चुकी है । इस कारण मैं सहायता नहीं कर सकता । ठीक है आपको उससे युद्ध नहीं करना चाहिए परंतु आप ऐसे दिव्यास्त्र तो राम के पास पहुंचा ही सकते हैं जो राम जैसे युवक प्रयोग कर सके । ठीक है मैं यह कर सकूंगा परन्तु मुझसे एक भयंकर भूल हो गई थी और राजऋषि विश्वामित्र गोतम किसी के साथ किए गए मेरे उस स्थल के कारण मुझसे कुपित है । वह मुझ से मिलेंगे भी नहीं । लगता है उनके पास जाने से मेरी सहायता का बेहद खोल जाएगा । दंडकवन में सरभंग ऋषि का आश्रम है जो बहुत पहले लंका में आपने आज समय तपस्या करते थे । माल्यवान ऍसे पीडित ऋषि शरभंग महादेव के पास पहुंचे थे । वहाँ से सहायता नहीं मैं धूमने मुनि की सहायता से सागर पति विष्णु के पास गए थे । भैया विष्णु ने उन्हें दंडकवन में आज शाम बनाकर रहने की सहायता की थी । वहाँ रहते हुए कुछ अन्य ऋषियों के साथ तपस्या कर रहे हैं । ऐसा करता हूँ कि उन्हें मैं अपने शस्त्र दे दूंगा । मैं इस योग्य है कि उनके चलाने का ढंग सीख और सीखा सकें तो ऐसा करिए कि आप सरभंग ऋषि से संपर्क बनाइए और मैं विश्वमित्र जी से बात करता हूँ । नारद मुनि ऋषि विश्वामित्र के पास मदद और पुरूष नगरों के गुजर जाने पर बने वन में जा पहुंचा । राजऋषि विश्वामित्र उन दिनों एक यज्ञ कर रहे थे । उन के कुछ हिस्से भी उस यज्ञ में सम्मिलित हो रहे थे । ऋषि विश्वामित्र नारद को पहचानते थे । अतः देवऋषि नारद के आने की सूचना पर ऋषि विश्वामित्र उनके स्वागत के लिए आश्रम से बाहर आए और देवऋषि के चरण स्पर्श कर उन्हें आदर से आश्रम में ले गए । सम्मान से कुछ आसन पर बैठाकर हाथ जोड पूछने लगा, भगवान् कैसे आना हुआ? मैंने सुना है कि आप इस भयंकर वन में बैठे यह कर रहे हैं और यहाँ पर राक्षसों ने विभिन्न तथा बाधाएं डालनी आरंभ कर दी है । हाँ भगवन ये नित्य यह को ब्रस्ट करने आते हैं । मुझे और मेरे शिष्यों को तो हानि पहुंचा नहीं सकते । मैं अपनी रक्षा के लिए अपने सस्त्र प्रयोग कर लेता हूँ । कठिनाई है कि यहाँ पर बैठे हुए मैं किसी की हत्या नहीं कर सकता । किसी राजा की सेना यहाँ सहायता को आए तो इस आश्रम की शांति नष्ट हो जाएगी । आपकी कहते हो । नारद ने कह दिया मैंने भी ऐसा ही सोना है और मैं आपकी सहायता के लिए आया हूँ । मैं आपका अत्यंत आभारी रहूंगा । देखो रिसीवर आपको कोई सत्रीय कुमार चाहिए जो आपके दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर सके और फिर इस वन को राक्षसों से मुक्त करा सके । ये है तो ठीक है परंतु मुझे यह है कि मेरे अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग सीकर भले लोगों को भी कस्ट दिन आराम नहीं कर दे रिसीवर सोशल राज्य की राजधानी अयोध्या में राजा दशरथ अपने चार युवा पितरों के साथ रहते हैं । चारों ही दी रीलीज शिक्षित व उत्तम व्यवहार वाले हैं । उनमें सबसे बडा आराम है ऍम जा के सभी गुणों से संपन्न है और इस कार्य में सक्षम भी है । उसका छोटा भाई लक्ष्मण उसका भक्त है । दोनों ही बहुत सुभाव रखते हैं । निश्चय ही उनके हाथों में आपके सस्त्र सुरक्षित रहेंगे । आप राजा दशरथ से आपने यज्ञ की रक्षा के लिए उनको मांगला और यदि वे सुपात्र लगे तो उनको शिक्षा देकर तैयार को निश्चित ही वे आपके यज्ञ के निर्वेग होने में सहायक हो जाएंगे । तत्पश्चात मैं इस धरती को पार्टी वह दुराचारी राक्षसों से मुक्त कर सकेंगे । ये धर्मात्मा राजा के पुत्र धर्म की रक्षा करेंगे । परन्तु महाराज कसरत अपने पुत्रों को यहाँ इस भयंकर वन में भेजना पसंद नहीं करेंगे । इसका प्रबंध हो सकता है । आप राजा के पुरोहित वशिष्ठजी के सामने राजकुमारों को यह की रक्षा के लिए मांग लेना । मैं ऐसी वशिष्ठ आपकी सहायता कर देंगे । अपने गुरु पुरोहित की बात राजा टाल नहीं सकेंगे । इस प्रकार योजना बन गई । उसी दिन राजऋषि विश्वामित्र अन्य मुनियों के साथ अयोध्या के लिए चल नहीं हूँ ।

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श्री राम Producer : Saransh Studios Author : गुरुदत्त Voiceover Artist : Ramesh Mudgal
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