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भुतना का तोता - 17

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मध्यम श्रेणी परिवार में जन्मी, पली-बढ़ी, डॉ॰ श्रीमती तारा सिंह को बचपन से ही नृत्य, संगीत एवं कविता लेखन से विशेष लगाव रहा। स्कूल और कालेज दिनों में ये कई बार अपनी कविताओं तथा साहित्यिक वाद-विवाद में श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए प्रशंसा-पत्र व पुरस्कार पाने में अग्रणी रहीं। इनकी प्रमुख कृतियों में से एक आंसू के कण सुनिये आप सिर्फ KUKU FM पर| Script Writer : Sikha Singh Author : Dr Tara Singh
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भूतना का तोता देहरी गांव के भूतना का एक का एक पशुता छोड देता बन जाना लोगों को अचरज में डाल दिया । किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था । ये सब हुआ कैसे? वही लोग जो कभी उसकी बात का मखौल उडाया करते थे । अब उस की हर बात को एक पुण्य आत्मा की आवाज समझने लगे । भूतना कहता था संत का काम है उपदेश देना और भक्त का काम है अक्सर शा उसका पालन करना । इसी को गुरुभक्ति कहते हैं । हमारे ग्रंथों में भी यही कहा गया है कि गुरु की अवहेलना करना महापाप है । गुरु प्रमुख रानी नरक में जाता है । ऐसे ही वचन द्वारा भूतना धीरे धीरे त्यागी महापुरुष की श्रेणी में गिना जाने लगा । उसकी श्रद्धा करने वालों की संख्या बढने लगी । श्रोताओं में पटवारी, चौकीदार, थानेदार कभी कभी तो बडे हकीम भी आ जाने लगे । भूतना भी उन लोगों का जोरदार स्वागत करने लगा । आठों पहर अपमान का घूंट पीने वाला भूतना प्रतिबद्धता का वक्त इन्कारी बन गया, जिससे दोनों तरह के पुरुषों का विधेयक दीपक प्रकाशित होने लगा । एक दिन भूत ना अपने घर के छप्पर पर बैठा एक तोते को पकडने में किसी तरह कामयाब हो गया । फिर क्या था भुगतना का दिन फिर गया । उसकी तो चांदी निकल आई । उसने सबसे पहले दो तीन को हाँ और न कहना सिखाया । जब तोता पूरी तरह हाना बोलने लगा, तब उसे लेकर भूतना गांव के बाहर एक चौराहे पर बैठ गया । लोगों के पूछने पर बताया था या एक चमत्कारी होता है या किसी भी समस्या का हल होना और न होना हाँ और नाम में बता देता है । कितनी अल्प आवस्था में भूतना तोते की अलौकिक सिद्धि को देखकर लोग विस्मित हो जाने लगे । आज परोस के समस्त गांव में उसकी ख्याति फैल जाने लगी, मानो उस ने दिग्विजय कर लिया हूँ । ऐसे तो उतना बहुत गरीब और दुर्बल नौजवान था, लेकिन उसका तोता उसके रूप को चमत्कृत कर दिया था । भूतना गांव के मुखिया सोहन लाल की पत्नी कलावती जो एक गर्व शीला, धर्मनिष्ठा, संतोष और त्याग के आदर्श का पालन करने वाली नारी थी, जिसके चरित्र में रमणीयता और लालित्य के साथ पुरुषों का साहस और धैर्य भी मिला हुआ था । यद्यपि अपने पति की स्वार्थ भक्ति से उसे बहुत अच्छी थी, पर इस भाव को वह पत्ति सेवा में कभी बाधक नहीं बनने दी । उसी जब पति के अध्यक्ष पतन का पता चला, तब उसकी बच्ची खुशी श्रद्धा भी चली गई या नफरत नहीं, बल्कि उस की ही चिंता थी । उसने कई बार अपने व्यंग शहरों से छेदना और कटु शब्दों से पति के विधेयको वेदना चाहते । मगर सोहनलाल पर इसका कोई प्रभाव नहीं पडता । पति की नित्यम इंडियन ड्रिलिंग दृश्य ने कलावति के दिल से अपनेपन को मिटा दिया था । कभी सोच तीस में हस्तक्षेप करो, कभी सोचती आत्महत्या कर ली । सारी रात आंखों में कर जाती दिन निकल जाती । तभी एक औरत ने बातों ही बातों में बताया बोली जानती हो कलावति अपने गांव के भूतना के पास एक होता है, सुनती हूँ तोता सटीक भविष्यवाणी करता है, कला होती है । जानकर हस्ती हुई बोली अच्छा ऐसी बात है तो कल में उससे मिलकर देखती हूँ । सच है या कोई छलावा, मैं जाकर उससे पूछूँगा । मेरी दस वर्षों की अविश्रांत तपस्या निष्फल क्यू हो गयी । जीवन की आशाएं आकर लॉट हो गई । उसके वापस लाने के लिए मैंने अपनी आत्मा पर कितना अत्याचार किया । देवताओं की आगे कितनी मिलती मांगी पर सारे प्रयत्न निष्फल रही । क्यों इन शोक युक्त विचारों से खुद को उसने इतना को सर की उसकी आंखें भर आई । अपनी व्यवस्था पर उसे इतना दुख कभी नहीं हुआ था, जितना आज बताते हुए हो रहा था । यद्यपि कलावति मनु भागों को गुप्त रखने में सिद्धहस्त लेकिन आज उसका किसी आया चेहरा उसकी सारगर्भित प्रेम व्याख्या का पर्दा खोल दे रहा था । उसकी व्यग्रता इतनी बढ गई थी कि वह स्थिर रह सके । स्त्री धर्म उसके पैरों को चौखट से बाहर जाने नहीं दे रहा था । बार बार वार धर्म की शिलाओं से टकराकर लौट आती थी । उसी लगा कि धर्म से कह रहा है क्रीम नश्वर है । मिसाल नहीं कौन? किसका पति कौन किसकी पत्नी या सब माया जाल है, पर मैं अविनाशी हूँ तो मेरी रक्षा करूँगा । कलावती स्तंभित हो गई, पर धमकी कि उठती लहरी कलावति के मंडे को ना तोड सके । चित्र की दृढता और मनोबल का उसे अनुभव भी नहीं हुआ । उसे अपने जीवन के सागर तट की रक्षा स्वयं करना होगा । कारण उसकी सारी आकांक्षाएं इसी तटपर विश्राम किया करती थी, जिसे प्रेमलता ने इस रक्षा तट को विध्वंस कर दिया । वह जल्दी जल्दी कदम बढाती हुई उस चमत्कारी तोते से मिलने घुटना के घर पहुंच गई । जेट महीने की चिलचिलाती धूप में एक अनजान उस पर जवान महिला को देखकर भूतना किसी अनहोनी की आशंका से आप उठा । उसमें विनती कर पूछा, नया राशि मुखी तुम्हारी क्या समस्या है जो इस झुलस टी धूप में तुम सबसे आंखे बचाकर मुझसे मिलने आई हो तो मैं देख कर लगता है तुम कोई साधारण नारी नहीं बल्कि किसी प्राचीन देव का था कि पातरी हो कलावती व्यंग भाव से बोली सुना है तुम्हारे पास एक चमत्कारी होता है, जो तीनों कालका ज्ञानी है, जिसके पास हर समस्या का हल है । भूतना ने जोर देकर कहा हाँ वो तो है । कलावति ने तलकर कहा तो एक बार उसका दर्शन करा हूँ । भूतना अभी लेकर आता हूँ । बोलकर घर के भीतर गया और तोते को लाकर कलावति के सामने रख दिया । कहा ये रहा वो तोता इसकी शक्ति का अनुभव खुद कर नीचे पूछे क्या पूछना है? कलावति तोती से मधुर स्वर में पूछा अच्छा तो तुम यह बताओ जो मर्द अपने वैवाहिक जीवन का दायित्व नहीं निभाता है । स्वच्छंद काम क्रीडा की तरंगों में सांडों की तरह दूसरों की हरी भरी खेती में मूड डालकर अपने कुत्सित अभिलाषाओं को तृप्त करता है । इसके बाद उसके बीआई पिता का उसके साथ क्या कर्तव्य बनता है? क्या तब भी ब्याहता पत्नी धर्म को मानने के लिए बाध्य हैं । तोते ने नाम गर्दन हिला दिया । भूतनाथ नुकीली दृष्टि से कलावति की ओर देख और समझ गया यहाँ स्वाधीन कार है । तौर पति हित का परस्पर विरोध हो रहा है । निःसंदेह या शिकार रास्ता भटक कर यहाँ आया है । इसी जाल में फंसने से अब कोई रोक नहीं सकता । भूतना कलावति से बडी ही संजीदा होकर बोला बाहर बडी गर्मी है और आप मेरी अतिथि हैं । अतिथि सत्कार मनोज का धर्म है । इसलिए आप मेरे घर के भीतर आइए । कुछ चाय पानी का इंतजाम में करता हूँ । कलावति गंभीर हो कठोर आवाज में कहीं तुम अपनी किसी स्वार्थ सिद्धि की खाते मुझे अपने बहुमूल्य उद्देश्य से भटका तो नहीं रहे हो? अन्यथा इतना आवभगत क्यों? भूतना माफ कीजिए या हमारा? मनोज घर में है । आप को कबूल नहीं तो कोई बात नहीं । गर्मी का तापमान सातवें आसमान पर है, शाम भी होने वाला है और निर्दयी, अधर्मी लोग रास्ते पर उतरने वाले ही हैं । उनसे आपकी रक्षा करना मेरा धर्म बनता है । इसलिए मैंने आपसे निवेदन किया कलावती! तिरस्कार भरी नजरों से उसकी ओर देख कर पुलिस मैं तुम्हारी कृतज्ञता और दया का भाग नहीं उठा सकती । इसलिए तुम अपने ज्ञान सरोवर के जल को आंदोलित होने से रोको । भूतना तोते की कसम खाकर कहा मैं अपने शरणागत धर्म की रक्षा करूँ । सेवा मेरा कोई स्वार्थ नहीं है । कलावती अपने क्रोध को दबाकर विनम्र हो बोली, मैंने आज तक ऐश्वर्या की प्रतिष्ठा बस सम्मान की बात सुनी थी, मगर मैं वो देख रही हूँ, ऐसा कभी नहीं देखा था, न सुना था । इसलिए आज में तुम्हारी प्राण पालक ता तत्पर्ता को देखकर हैरान हूँ । दुर्वासा ओं का भंडार बना भूतना बडे ही इत्मीनान से बोला आईआरसी तो रईसों का गहना होता है । हम जैसे गरीबों का वही यशी हाथ की हथकडी है । भूत ना अपने त्याग का परिचय देकर कलावति की श्रद्धा का पात्र बन गया । फिर क्या था, अब तो भूतना का कपट, गरीब जग सबकुछ कलावति को उपयुक्त लगने लगा । भूतना ने भी यह सोचकर कि स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी पर आठ से शास्त्र चलाना भी विजय प्राप्ति का साधन है । औचित्य अनौचित्य निर्णय तो सफलता के अधीन है । जीते तो पुण्य हारी तो पाप भूतना ने कलावति के मनोगत विचारों को उसी तरह प्रोत्साहित किया, जैसी कोई कबूतर बाज बहते हुए कबूतरों के लिए दाने बिखेर भी खेल कर अपनी छतरी पर बुलाता है और एक एक कर सभी कबूतर फंस जाते हैं । कलावति ने अपने सभी मनोगत भावों को भूतना से अपना जान बता दिया । सारी बातें सुनकर भूतना को यह समझते देर नहीं लगी कि कलावति के बेटे यौवन की अग्नि अभी तक निर्वेद की राख से ढकी हुई है । मगर भीतर धधक रही है उसमें वजन पर मुस्कुराहट अंग पर ब्रह्मचर्य की रक्षिता लाते हुए कहा और देखना कर आप घर लौट चाहिए । मगर एक बार कल फिर आपको आना होगा । अच्छा तो होता कि आप रात यही रुक जाती, सुबह पडते चली जाती । कलावति ने मनी मन काफी विचार के बाद तय किया कि जाना फिर आना ठीक नहीं होगा । ऐसे भी एक रात के लिए अतिथि सत्कार के आश्रय को ठुकराना भी तो ठीक नहीं है । क्यों नहीं भूतना की बात मानकर यही रुक जाओ । सुबह लौट क्योंकि कलावति को उतना के कठोर ब्रह्मचर्य के आदर्श को देखकर रिधम में विश्वास हो गया कि देव प्रतिमा सा दिखने वाला भूत ना कभी मेरा अनिष्ट नहीं कर सकता । वहाँ आंखे बंद कर एक खटोले पर हो गई । आंख लगी भी नहीं थी कि उसे लगा कोई मानव आकृति उस की ओर बढती आ रही है । कलावति चिल्ला उठी बोली तुम कौन हो? जो भी होगा अब और एक कदम भी आगे नहीं बढना । आकृति रुक गए और पूछे क्या? या आप का अंतिम हुक्म रहे और हाथ जोडकर बोले, मैं स्त्रियों के मनोभावों से सर्वथा अपरिचित हूँ, क्योंकि मैं कुमारा हूँ । इसलिए संभव है मैं उतावलेपन में यहाँ चलाया । मेरी दुस्साहस पर आपका प्रसन्न होना स्वाभाविक है । कोई गौरवशाली रमनी इतनी सहज नीति से वशीभूत नहीं हो सकती, यह मुझे पता नहीं था । लगता है अपने सतित्व रक्षा करते करते अपनी प्रेम वासना को पूरी तरह दबा दिया, वरना आप मेरा तिरस्कार नहीं करती । ठीक है, मैं चला जाता हूँ । कलावति विस्मित हो भूतना को जाते हुए देखती रही और मन ही मन बुदबुदाई ईश्वर मुझे माफ करना । मैं परिस्थितियों की अंधभक्ति थी, इसलिए मुझे आज यह सब देखना पडा, जिसे में धर्म परायण, सच्चरित्र और सत्यनिष्ठ युवक समझी थी । असल में वह प्रशासनिक लगा । इसमें किसी का दोष नहीं है । मुझे तो मेरे अपने चरित्र ज्ञान नहीं धोखा दिया ।

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