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अजंता - 4

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जीवन का लक्ष्‍य क्‍या है? इस सवाल ने उपन्‍यास के मुख्‍य पात्र बद्रीनारायण को बहुत ज्‍यादा विचलित कर दिया था। प्रेम कुमारी का प्‍यार और आचार्य का वात्‍सल्‍य भी बद्रीनारायण की बेचैनी को कम नहीं कर सका बल्कि दिन ब दिन यह बढ़ता ही गया। बद्रीनारायण खुद को अजंता के भित्ति चित्रों के निर्माण में खुद को झोंक देता है। उसे लगता है कि उसने जीवन का लक्ष्‍य पा लिया। क्‍या सच में बद्रीनारायण ने जीवन का लक्ष्‍य पा लिया था?
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वेंकन्ना को भी अपनी सफलता से गहरी चोट पहुंची । उसे अपने आप से घृणा हो गई तो चुपचाप वहां से चल दिया । अब फिर पेट भरने की समस्या उसके सामने नहीं क्योंकि परेशानी उठाता हुआ उस सात दिन जगह जगह मारा मारा फिरता रहा । आखिरी की चिंता ने उसकी हालत बिगाडती नहीं । इन सात दिनों में उसने जहाँ तहाँ ठोकरे गए जहाँ किसी से कुछ मिला खा लिया नहीं तो पेट पर पत्थर रखकर आगे चल रहा है । इस तरह से वो अपने आप से भी निराश हो चुका था । तब उसे वो मूर्तिकार मिला । वो बूढा आदमी था और चेहरे से काफी चालाक लगता था । लेकिन तो भी वो मन का बहुत बुरा नहीं था । उसने वेंकन्ना को अपने यहाँ रख लिया । एक बार फिर वेंकन्ना की चिंता दूर हुई और वह चैन से अपने काम में लग गया । लेकिन इस बार उसके सुख में एक नई बाधा उपस् थित हुई । बूढे मूर्तिकार की एक लडकी थी, सरसी वाला है । वो रूपवती थी और उसकी चार हाल में हंसिनी कैसा आकर्षण था । रूपवती होने के कारण वो गर्वीली भी बहुत थी । उस जगह के तमाम नवयुवक उसके रूप पर मोहित थे और उस को आकर्षित करने के लिए भवनों की तरह उसके इर्द गिर्द मंडराते थे । इस सुंदरी को प्रसन्न करने के लिए सभी अपनी जान तक दांव पर लगाने को तैयार थे । लेकिन सरसी वाला को अपने रूप पर इतना अधिक गर्व था कि वो किसी की ओर आंख उठाकर भी न देखती । वेंकन्ना को सरसी वाला से कोई आकर्षण था वो उसे नीची नजरों से देखता हूँ । सरसि वाला को मैंं करना कि इस बात से कुछ हैरानी हुई क्योंकि उसका ख्याल था कि और नवयुवकों की तरह वेंकन्ना भी उसके आगे पीछे चक्कर काटेगा । वेंकन्ना की रुखाई देखकर उसे कुछ उत्सुकता हुई । ये उत्सुकता बढते बढते उलझन बनी और फिर उस उलझन ने प्रेम का रूप ले लिया । इसके बाद तो वह गर्वीली सरसी बाला वेंकन्ना के प्रेम में व्याकुल होते थे । वह वेंकन्ना को रिझाने की कोशिश करने लगी । वेंकन्ना के लिए एक नई मुसीबत थी । उसी स्त्रियों से घृणा थी और जहाँ तक होता वो उनसे बचकर रहने की कोशिश करता हूँ । अब सरसी वाला उसके शांत जीवन में शराब बन कराई । वो इसी सोच में रहता हूँ कि किस तरह इस विपदा से पीछा छुडाया जाए । सरसी बाला उसके हर काम में दखल देती और हर समय उसके सिर पर सवाल रहे थे । वेंकन्ना बहुत परेशान होता । वो सर सी वाला से बचने की कोशिश करता हूँ और अक्सर उसे झिडक भी देता है । कभी कभी तो हाथ पकडकर वो उसे अपने कमरे से बाहर कर देता । लेकिन सरसी वाला इन बातों से उसकी तरफ और अधिक खींचती जाते हैं । उस समय की तरह उसके साथ लगी रहती है । आखिर जब वह बहुत परेशान हो उठा तो एक दिन चिढकर उसने सरसी वाला के पिता से कहा आप अपनी लडकी का विवाह क्यों नहीं करते? सिर्फ उससे कौन विवाह करेगा? बूढे ने हंसते हुए कहा इतने नवयुवक है कोई भी बहुत खुशी से उसे अपनी पत्नी बनाने को तैयार होगा तो तुम ही उसे क्यों नहीं भी बात कर लेते हैं । मैं क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया? मुझे स्त्रियाँ बिल्कुल पसंद नहीं है और न ही मैं तुम्हारी लडकी को पसंद करता हूँ । सरसि तो तुम्हें पसंद करती है । दोनों की जोडी बहुत अच्छी रहेगी । मैं इसी बात को सोचता रहा हूँ और इस निर्णय पर पहुंचा हूँ कि आज से दसवें दिन तुम दोनों का विवाह करता हूँ । क्यों ठीक है ना नहीं बिल्कुल नहीं वेंकन्ना चीखा मैं कहता हूँ मुझे विवाह नहीं करना है । बूढा जोर जोर से हंसने लगा और फिर इकाई गंभीर होकर बोला वेंकन्ना हादसे दसवीं रोज तो मेरी लडकी से विवाह करोगे । सुन लिया तुमने । विमॅन बिना उसने मिन्नत की तर्क दिए लेकिन बूढा अपनी बात पर अडा रहा । अब वेंकन्ना फंस गया था । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें जाए तो कहाँ जाए और रही तू कैसे रहे । उसका मन अपने काम से उचट गया । उसकी भूख उड गई । सरसीवा लाने, उसे दिलासा देने की कोशिश की तो वह और भडक उठा वेंकन्ना को अब इस उलझन से बचने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था । वेंकन्ना की उदासीनता और तिरस्कार सरसी वाला से सहन नहीं किया गया । आज तक उसने ही पुरुषों का सिर झुकाया था । लेकिन अब एक मूड व्यक्ति उसका तिरस्कार कर रहा था । वो उस से प्रेम करती थी । इसलिए इस तिरस्कार ने उसके मन को और अधिक उत्तेजित कर दिया और अब अपनी भावनाओं को वश में रखना उसकी बस की बात ना रहे । एक रात वो वेंकन्ना के कमरे में जा पहुंची और उसके सामने खडी होकर उसने एका एक अपने सारे कपडे उतार फेंके । वो भावावेश में काफी हुई । गोली प्रिया वेंकन्ना इधर देखो ये रूप तुम्हारे लिए अर्पित है । इसे स्वीकार करो गिलानी और भय से वेंकन्ना सिहर उठा और फिर एकाएक उस घर से वो भाग लिया । तब से स्त्रियों के साइड से भी उसे भय लगने लगा । लेकिन जहाँ भी वह जाता स्त्रियों से बचना पाता । एक मंदिर में वह शिला चित्र खोद रहा था कि तभी देवदासियां उसके पीछे पड गई । वो उन चित्रों को अधूरा छोडकर वहां से भाग निकला । फिर एक गांव में पहुंचा जहाँ मेले की तैयारियां बडे जोर शोर से चल रही थी । गांव वालों ने उसे कृष्ण की एक विराट मूर्ति बनाने के लिए कहा । लेकिन यहाँ भी गांव की स्त्रियां आकर उसके काम में विघ्न डालने लगी और उससे छेडछाड करने लगी । आखिर यहाँ से भी उसे अधूरी मूर्ति छोडकर भागना पडा । लेकिन इस बार उसने निश्चय कर लिया कि वह पर्वत पर जादा से उमर भर परेशानियों में फंसे । चिंता करते करते वो दुखता गया था । उसे लगता था कि पर्वतों में उसके मन को शांति मिलेगी और वो तमाम चिंताओं से मुक्त हो जाएगा । पर्वत की ओर जाते हुए रह में उसकी एक बूढे भिक्षु से भेंट हुई जो अजंता जा रहा था । वेंकन्ना भी उसी के साथ हो लिया । अजंता आकर उसे पहली बार शांति मिले । यहाँ उसका समय चैन से बीत रहा था और वो अपना ब्रह्मचर्य जीवन सुख से बिता रहा था । बद्रीनारायण आपने ध्यान में बैठा हूँ । पहले तो उसे अपने पास से आती हुई आवाज सुनाई नहीं, लेकिन फिर उसका ध्यान उधर आकर्षित हो गया तो वापस के आई हूँ । उसने रूखे स्वर में पूछा मैं और क्या करूँ? प्रेमानंद ने उत्तर दिया, मैं तो यही की हो चुकी हूँ । मेरे बारे में सभी जानते हैं । मैं तुम्हें भी पहले ही बता देना चाहती थी, लेकिन तुम्हारी बातों के कारण कुछ इसकी चाहती रहे । इसी बात से तुम नाराज हो गए । हाँ बद्रीनारायण नहीं उसे अनमनेपन से उत्तर दिया और फिर क्षणभर की खामोशी के बाद बोला तुम्हारा नाम क्या है? प्रेमकुमारी उन्होंने तो मैं मठ में कैसे ले लिया? मैं चित्रकला सीखना चाहती थी और जब ये बात मैंने आचार्य विज्ञानानंद से कहीं तो उन्होंने इसे पसंद नहीं किया । लेकिन मैंने पुरुषों जैसा देश बना लिया तो विवश होकर उन्हें मेरी बात माननी पडेगी । मैं इस बात को छिपाकर रखना चाहती थी लेकिन धीरे धीरे ये भेद सभी को पता चल गया । फिर भी लोग मेरे साथ पुरुष जैसा ही व्यवहार करते हैं । बद्री नारायण का चेहरा उसी तरह खींचा रहा । उसे ये सब बिलकुल अच्छा नहीं लगा । अब मेरी और तुम्हारी मित्रता नहीं रह सकती । वो मंत्री मुझ पर इतना क्रोध न करो । मेरे साथ पहले जैसा ही व्यवहार करते रहो । तुम इस बात को अपने मन से निकाल भी तो सकते हो कि मैं लडकी हूं, मान जाओ बद्री नहीं, अब ऐसा नहीं हो सकता है । मेरी तुम्हारी कोई जान पहचान नहीं । लेकिन क्यों? बद्री कैसे पिछले की मैं एक लडकी हूं या इसलिए कि मैंने तो मैं शुरू में ये बात नहीं बताई । मैं स्त्रियों के साथ मिलजुल रखना पसंद नहीं करता हूँ । उन्हीं से बचने के लिए मैं नगर के जीवन से भाग कराया था । अगर तुम्हें मेरे बारे में पता ही नहीं चलता तो तब दूसरी बात थी । हैरानी की बात है कि मुझे कभी संदेह नहीं हुआ । मैं सोच रहा था कि किशोरावस्था में बुद्ध तुम जैसे रहे होंगे । कितना छल हुआ तो मुझे एक लडका नहीं समझ सकते हैं । नहीं, मैं तो एक बार कह चुका हूँ । अब तो मुझे अकेला छोड दो । लेकिन बाकी सब लोग तो मेरे साथ लडकी जैसा व्यवहार करते हैं । ठीक है, लेकिन मैं बाकी सब जैसा नहीं कहकर बद्रीनारायण फिर अनमना सा हो । खाने में लग गया । प्रेमकुमारी उठकर खडी हुई और कुछ देर तक उसे चुपचाप वो चलाते देखती रही । लेकिन जब उसने आंखें ऊपर न उठाई तो हार कर वहाँ से चली थी । खाने के बाद बद्रीनारायण ने बर्तन हुए और उन्हें ले जाकर अपनी कोठरी में रख दिया । कोठारी से एक बार फिर वो बाहर निकला तो उसने देखा कि सभी लोग संघ चैत्य की ओर जा रहे थे जहाँ से प्रार्थना गायन की धुन तैरती हुई आ रहे हैं । बद्रीनारायण के होठों पर एक उदास मुस्कान उभरी और एक बार अपने कंधे झिंझोडकर वो दूसरी तरफ को चल दिया । बागोरा के तट पर आकर पानी की धारा के बीच रखे हुए पत्थरों पर कदम रखते हुए वो परले सिरे पर पहुंच गया । वहाँ से उसी पगडंडी पर हो लिया जिस पर की वो पहले प्रेम के साथ गया था । एक मील तक झाड झंखाड लांघता हुआ । आखिर वह उसी हरी भरी वाटिका के पास था निकला जिसमें झोपडी बनी हुई थी । ये झोपडी बिल्कुल एकांत में थी और आश्रम की तरह सुंदर थी । यहाँ का शांत वातावरण बद्रीनारायण को बहुत आ रहा था जो पडी के द्वार तथा अन्य स्थानों से मध्यम मध्यम रोशनी छनकर बाहर आ रही हैं । बद्रीनारायण छोटी सी चारदीवारी फांदकर वाटिका के अंदर पहुंचा और वहाँ से झोपडी के दरवाजे पर पहुंचकर उसने जोर जोर से दस तक थी । एक लंबे चौडे और तगडे आदमी नहीं दरवाजा खुला है । उसका रंग निखरा हुआ था और आंखों से उदारता झलकती उसके भरे भरे होठों पर योद्धाओं की जैसी बडी बडी कुंडल दार मुझे थी । उसकी दाढी काफी लम्बी थी और सिर के बाल कंधों पर गिरे हुए थे । सिर्फ उसकी दाडी मूंछों और सिर के सफेद बालों से उसकी उम्र का पता चलता था । सही है । उस व्यक्ति ने बद्रीनारायण को सामने खडा देखकर पूछा मैं उन महिला से मिलना चाहता था जिनसे दोपहर के समय मेरे यहाँ भेंट हुई थी । अच्छा मुझे भी पता चला था । उस बात का आओ अंदर आ जाओ । बद्रीनारायण अंदर जाकर एक तख्त पर बैठ गया । दोपहर वाली महिला भाई हूँ तो बद्रीनारायण नहीं, उसे प्रणाम किया है । आशीर्वाद देते हुए वह कहने लगी है, कहा बेटा क्या बात है? बद्रीनारायण कुछ झिझकता भेज के चाहता हुआ बोला मैं प्रेमकुमारी के संबंध में कहना चाहता था । उसे आपको मत में शामिल होने की आज्ञा नहीं देनी चाहिए थी । वो अभी तक उस वृद्धा की ओर नहीं देख रहा था, लेकिन उसके स्वर में काफी गंभीरता थी । वृद्धा उसकी बात सुनकर मुस्कुराई बद्रीनारायण ने आंखें उठाकर देखा तो वृद्धा के चेहरे पर हंसी खेल रही थीं । बेटा वो कुछ भट्ठी लडकी हैं और हमेशा अपने मन की बात पूरी करती है । शुरू में एक बार मठाधीश विज्ञानानंद यहाँ आए थे । उस समय उसने विज्ञानानंद से ये इच्छा प्रकट की थी की वो भी मठ में चित्र बनाना चाहती है । आचार्य विज्ञानानंद पहले तो बिल्कुल न माने लेकिन उसके हटने उनसे आखिर अपनी बात मनवा ही मठ में सब पुरुष पुरुष हैं । उनमें वो अकेली लडकी कैसे रह सकती है । बेटा वो तो बिल्कुल लडकों की तरह ही लगती है । इसलिए शुरू शुरू में तो किसी को उसकी लडकी होने का पता भी नहीं चलता हूँ । लेकिन बाद में न जाने कैसे ये बात सभी जन गए कि वो लडकी है । फिर भी किसी ने कोई आपत्ति न कि सभी उसे पसंद करते हैं वो भी उनमें घुल मिल गई हैं । फिर सभी भिक्षु अपनी कठोर साधना में लगे रहते हैं । हर एक अपने काम में इतना तल्लीन रहता है की किसी लडकी के वहाँ होने ना होने की ओर उसका जरा भी ध्यान नहीं जाता हूँ । फिर भी आपकी दृष्टि में उसका वहाँ रहना उचित है । मैं क्या करूँ? जनता के पीछे तो पागल है । वो कहती है कि जनता उसके जीवन का भाग बन चुका है । उसकी इच्छा है कि वहाँ चित्र बनाते बनाते ही उसके जीवन का अंत हूँ । उसका हट देखकर हमने उसे वहाँ रहने की अनुमति दे दी । अगर हम उसे मना करते तो शायद वो मन ही मन फुटकर अपने जीवन का अंत कर ली थी । इसीलिए हमने उसे रोकना ठीक नहीं समझा हूँ । ये क्षुद्र जीवन बिताने के लिए उस पर इतनी कडी रोक टोक क्यों लगाई जाए? तभी एक चौदह पंद्रह वर्ष की लडकी कमरे में आई । वो बहुत सुन्दर थी । उसके अंदर अभी लता की तरह कोमल थे । उसका रूप ऐसा था की कोई भी मनुष्य देखकर अपने आप को भूल जाए । उसके रूप में काम का ऐसा जादू था कि किसी कठोर से कठोर साधक के मन में भी वासना चाहते । बद्रीनारायण बहुत हैरानी से उसकी ओर देख रहा था । बूढी स्त्री उसकी हैरानी देखकर मुस्कुराई और कहने लगी ये मेरी छोटी लडकी हैं । कमल कुमार ये भी चित्रकला जानती है । बद्रीनारायण ने पूछा । नहीं इसे संगीत और नृत्य का शौक है । आपकी और भी कोई लडकी है नहीं, ये दोनों ही बहुत हैं । बद्रीनारायण चुप हो गया । कुछ क्षण की खामोशी के बाद वो उठ खडा हुआ और बोला, अच्छा मैं चलता हूँ, मुझे आ गया दीजिए । आशा है आप ने मेरी बातों का बुरा नहीं माना होगा । नहीं बेटा हूँ ऐसी कोई बात नहीं तो मैं यहाँ आने की पूरी स्वतंत्रता है । प्रेम ने मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ बता दिया था । बेटा तो थोडी देर के बाद चले जाना । बद्रीनारायण फिर बैठ गया । तभी उस तगडे व्यक्ति ने पहली बार उससे कहा हूँ । प्रेम ने मुझे बताया था कि तुमने उज्जैनी में शिक्षा प्राप्त की है । वहाँ रघुनाथ को तुम जानते थे । वो बहुत अच्छी तरह वहाँ के प्रधान निर्माण शिल्पी थे । बहुत ही सभी हुए वास्तुकार थे तुम्हारा उसके साथ काफी संबंध रहा । हाँ और एक मैं क्या हूँ? सभी लोगों ने बहुत पसंद करते हैं तो बहुत हसमुख और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे । जब भी कभी मेरा मन उदास होता हूँ, मैं उनके पास चला जाता हूँ । उनकी बातों से मेरी उदासी दूर हो जाते हैं । आप का उनसे परिचय था वो मेरा सबसे काेहराम इतना बल्कि ठीक ठीक कहा जाए तो मेरा सिर्फ वहीं अकेला मित्र ना बद्रीनारायण बहुत आश्चर्य से अपने सामने बैठे व्यक्ति को देखने लगा । आखिर उसने पूछा हूँ आप तो आप रामगुप्त हैं । हाँ, वो आप के बारे में बहुत बातें किया करते थे बल्कि लगभग हर समय आपका नाम उनके होठों पर रहता था । वो आप को बहुत याद करते थे । मुझे आप के बारे में उन्होंने बहुत सी बातें सुनाई नहीं तो हमेशा यही सोचा करते थे कि आप जाने कहाँ होंगे । रामगुप्त ने कोई उत्तर नहीं दिया लेकिन वह मन में सोच रहा था कि रघुनाथ अब भी उसे याद करता है । उस ने ठंडी सांस नहीं और खिडकी के पास जाकर बाहर देखने लगा । रात के गहरे अंधेरे में झोपडी के अंदर की हल्की रोशनी बाहर के कुछ छोटे छोटे बहुतों पर जम गयी । नहीं । वो और रघुनाथ गहरे मित्र थे । रघुनाथ वास्तुकार था और बहुत बडे योद्धा हरी से इन का लडका था । वो अपने पिता के साथ दो युद्धों में लड चुका था । उसके साहस और वीरता के कारण उज्जैनी राज दरबार में उसे काफी सम्मान मिला था । लेकिन स्वभाव से शांतिपुरी होने की वजह से इन दो युद्धों के रक्तपात और लूटमार ने उसका मन भेज दिया और उसे युद्ध से घृणा हो गए । उसने निश्चय कर लिया कि अब वह कभी भी किसी युद्ध में भाग नहीं लेगा । वो राजकीय वास्तुकार के पास गया और उस से निवेदन किया कि उसे अपना शिष्य बना लें । उसके माता पिता को रघुनाथ का ये नया काम पसंद नहीं आया हूँ । उन्होंने उसे इस से हटाने की पूरी कोशिश की लेकिन रघुनाथ नाम आना और अपनी धुन में लगा रहा हूँ । धीरे धीरे वो एक अच्छा वास्तुकार बन गया । उसने नए और अजीब अजीब भवनों की रूपरेखा बनाई । इनमें से हर एक की अपनी अनोखी और अनूठी सुंदरता थी । शीघ्र ही वह प्रसिद्ध हो गया और छोटी का वास्तुकार माना जाने लगा । इसी समय अपने जीवन चक्र में पहली बार उसे एक लडकी से प्रेम हुआ । वो एक नवयौवन प्रमिल जा, अपूर्वा रूपवती नहीं । उसके सौंदर्य की चर्चा राज्यभर में नहीं और उसके पिता सुदर्शन राज्य के सबसे सम्मानित दरबारी हैं । सुदर्शन के पास प्रमिल जा के विवाह के लिए बहुत प्रस्ताव आने लगे हैं तो उन्हें स्वयं पर घमंड हो गया । वो अच्छे से अच्छे वर का तिरस्कार करने लगे । राज दरबार में उनकी सबसे ऊंची साख थी इसलिए सब लोग उनसे डरते थे । जो भी उनकी लडकी के सौंदर्य से आकर्षित होकर उनके पास प्रस्ताव लेकर जाता हूँ, वो उसे दुत्कार देते हैं । रघुनाथ को ये सब मालूम था । उसने प्रमिल जा को मंदिर आते जाते देखा था और उसके आगे अपना मन हार चुका था । वो उसके प्रेम में अपनी सुधबुध भोला हुआ था । तभी एक दिन अचानक वो ये खबर सुनकर बहुत चक्का रह गया की प्रमिल जा का किसी ने अपहरण कर लिया है । गहरी वेदना उसके मन में भर गई । उसका दिल इस घटना से टूट गया । प्रमिल जा की बडी खोज की गई । राजा ने चारों ओर अपने सैनिक भेजे लेकिन पता नहीं चला कि वह कहाँ गई और उसे कौन उठा ले गया । रघुनाथ का जीवन एक गहरी उदासी से भर गया । अब किसी काम में उसका मन ना लगता है । उसने सबसे मिलना जुलना छोड दिया और वो अकेला घर में बंद रहता है । आखिर एक दिन उसके मन में विचार उठा की । इस तरह व्यर्थ समय गंवाने से बेहतर तो ये है कि वो अपनी कला की साधना में ही जीवन लगा दें और वो एक बार फिर से अपने काम में जुट गया । लेकिन इस बार वो अपने आप को बुलाने के लिए काम कर रहा था । इस गहरी लगन में उसने धर्मशालाओं, वाटिकाओं महलों, झीलों, मंदिरों, स्तूपों और दूसरे भवनों की रूपरेखा बनाई । चारों दिशाओं में उसका नाम खेल गया । उसे अपने समय का सबसे बडा वास्तुकार माना जाने लगा । उसकी कला ने उज्जैनी नगर का रूप बदलकर रख दिया ।

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जीवन का लक्ष्‍य क्‍या है? इस सवाल ने उपन्‍यास के मुख्‍य पात्र बद्रीनारायण को बहुत ज्‍यादा विचलित कर दिया था। प्रेम कुमारी का प्‍यार और आचार्य का वात्‍सल्‍य भी बद्रीनारायण की बेचैनी को कम नहीं कर सका बल्कि दिन ब दिन यह बढ़ता ही गया। बद्रीनारायण खुद को अजंता के भित्ति चित्रों के निर्माण में खुद को झोंक देता है। उसे लगता है कि उसने जीवन का लक्ष्‍य पा लिया। क्‍या सच में बद्रीनारायण ने जीवन का लक्ष्‍य पा लिया था?
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