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आधी दुनिया का पूरा सच - Part 8

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आधी दुनिया का पूरा सच उपन्यास बारह-तेरह वर्ष की रानी नाम की एक नाबालिग लड़की की कहानी है, जो छतरपुर , मध्य प्रदेश के एक निर्धन परिवार की बेटी है । अपनी माँ की प्रतीक्षा में स्कूल के बाहर खड़ी रानी को उसके ही एक पड़ोसी अंकल उसकी माँ को गम्भीर चोट लगने की मिथ्या सूचना देकर घर छोड़ने के बहाने बहला-फुसलाकर अपनी गाड़ी में बिठा लेते हैं । रानी को जब पता चलता है कि वह अपनी नादानी के कारण फँस चुकी है , तब वह दिल्ली में स्थित एक अंधेरी कोठरी में स्वयं को पाती है, सुनिये क्या है पूरा माजरा| Author : Dr. Kavita Tyagi Voiceover Artist : Shreya Awasthi
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चालीस दिन तक मध्यप्रदेश में रहकर रानी की माता पिता को खोज पाने में असफल पुजारीजी रानी को साथ लेकर वापस दिल्ली लौटने के लिए शाम चार बजे पंजाब मेल में बैठ के उस समय रानी का हृदय निराशा के घोर अंधकार में डूबा था और आंखों सियासतों की धारा बह रही थी । उसको कहीं से आशा की कोई किरण नहीं दिखाई पड रही थी । रेल चल चुकी थी । यू जो रेल गति पकड रही थी, मध्यप्रदेश का सब कुछ पीछे छूट रहा था । रूंधी गाली सी रानी ने खिरकी से बाहर जाते हुए कहा काका अब मुझे मेरे मम्मी पापा कभी नहीं मिलेंगे तो भी तुम्हारे मम्मी पापा जरूर मिलेंगे । बिटिया हो सकता है वे किसी से कोई सूचना पाकर तो मैं खोजने के लिए दिल्ली चले गए हैं । हम लोग दिल्ली में रहकर उन्हें खोजते रहेंगे । पुजारी जी ने आश्वासन दिया तो उनकी शब्द से रानी के हृदय में आशा के खेल सीधे घर शाम को ठीक खाता का । अखबार में मेरा फोटो देखकर किसी ने मम्मी पापा को जरूर बता दिया होगा और मम्मी पापा पर सुनते ही मुझे लेने के लिए दिल्ली चले गए होंगे । अपनी बेटी को खोजते हुए मम्मी पापा उसी दिल्ली में मिल सकते हैं । इस सोच कर रानी को पुजारी जी के साथ दिल्ली वापस लौटना ही अपेक्षाकृत सार्थक प्रतीत होने लगा था । तक हैं कि उस समय उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य दिल्ली में रहकर अपने माता पिता की खोज करना रह गया था । यू तो इस उद्देश्य को प्राप्त करना सरल नहीं था, किंतु एकमात्र विश्वसनीय पुजारी जी का संबल पाकर उसे ये कार्य कठिन नहीं लग रहा था । पुजारी जी पर संदेह क्या अविश्वास करने का कोई कारण भी उसके पास नहीं था? यही सब सोचते सोचते कब दिल्ली पहुंच गए? रानी को पता ही नहीं चला । दिल्ली पहुंचने पर पुजारी जी ने रानी को उठ खडे होने के लिए कहा तो वह चौक कर अश्चर्यचकित खोजी दृष्टि से इधर उधर देखने लगी । जब सब ओर से खाली निराश लौटाई । दृष्टि ने उसको यथार्थ से अवगत कराया । तब पुजारी जी से आशा महेश्वर में बोली कहाँ का अभी अभी मैंने एक सपना देखा था । मुझे लगा कि मुझे मेरे मम्मी पापा मिल गए हैं । खेल सारा प्यार किया उन्होंने मुझे बेटिया तुम्हारे माता पिता मिल जाएंगे । सुपर वाले पर से अपना विश्वासमत उठने देना । हम दिल्ली पहुंच चुके हैं । चलो अब मंदिर चलते हैं । यानी उठकर पुजारी जी के पीछे पीछे चल दी । राता लगभग साढे चार बजे रानी को अपने साथ लेकर पुजारीजी मंदिर पहुंचे । वहां पहुंचकर उन्होंने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर सबसे पहले मंदिर में रखी मूर्तियों को स्नान कराया तथा मंदिर और मंदिर परिसर की सफाई की । तत्पश्चात स्वयं िस्तान करके प्रभु को भोग लगाया और रानी के भोजन की व्यवस्था की । भोजन करने के उपरांत रानी ने पुजारी जी से कहा काका आप भी जल्दी खाना खा लीजिए, खाना खाकर मेरे मम्मी पापा को खोजने के लिए चलेंगे । रानी के आग्रह पर पुजारी जी ने उसी समय प्रसाद ग्रहण कर लिया और कहा क्या दिल्ली बहुत बडी है? हम तुम्हारी माता पिता को ऐसे घूम घूम कर कभी नहीं कुछ पाएंगे । उन्हें खोजने के लिए हमें किसी समाचारपत्र से सहायता लेनी पडेगी । मैं अपने किसी परिचित से बात करके देखता हूँ जो हमारी सूचना को समाचार पत्रों में छपवा सके । पुजारी जी का प्रस्ताव सुनते ही रानी के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच आएगी । उसने घबराकर अति शीघ्रतापूर्वक कहा नहीं काका, अखबार में कुछ छपवाना हम ऐसे ही ढूंढ लेंगे । पुजारीजी रानी के प्रतिरोध का कोई कारण नहीं समझ सके किन्तु उसके घबराहट को देख कर उन्होंने तुरंत सकारात्मक प्रतिक्रिया दी तो नहीं चाहती तो नहीं । छपवाएंगे भी किया । जैसे तू चाहेगी वैसे ही करेंगे पुजारी जी से आश्वासन पाकर कुछ दिनों बाद जब रानी प्रकृतिस्थ हो गई तब अत्यंत विनम्र और इसने युक्त ढंग से पुजारी जी ने रानी से पूछा, बिटिया समाचार पत्र में सूचना छपवाने का नाम लेते ही तो इतना क्यों घबराने लगती है? अपनी घबराहट के पीछे का कारण विस्तार से बताते । फिर रानी ने कहा काम का मई को या नारी निकेतन वालों को पता चल गया कि मैं आपके साथ मंदिर में रह रही हूँ तो वे मुझे यहाँ से ले जाएंगे । काका सब राक्षस हैं । पुजारी जी के समझाने पर कि वो ऐसा कुछ नहीं कर सकेंगे, जाने ने विश्वास के साथ कहा काका विपुल इसके साथ मुझे लेने के लिए आएंगे और तब आप कुछ नहीं कर सकेंगे । पुजारी जीने समाचार पत्र में उससे संबंधित कोई भी सूचना न छपवाने करानी का आग्रह स्वीकार किया और उसे अश्वस्त किया कि उसके माता पिता को खोजने के लिए पुलिस और मीडिया की सहायता नहीं लेंगे । मंदिर की साफ सफाई और प्रभु को भोग लगाने के बाद पुजारी थी । प्रतिदिन रानी के आग्रह पर उस को साथ लेकर उसके माता पिता की खोज में राहता निकलते और देर रात मंदिर में लौटे । दो महीने तक यही उपक्रम चलता रहा । इन महीनों में उन्होंने हर एक रेलवे स्टेशन, हर एक बस अड्डा और अनेक भीड भाड वाले स्थानों को कई कई बार छान डाला । लेकिन उसके माता पिता की कहीं से किसी प्रकार की कोई सूचना नहीं मिली । एक दिन निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर रानी ने देखा एक आधी स्त्री अपने कंधे पर एक थैला लटकाए तीस कदमों से चली जा रही थी । रानी इसके पीछे माँ माँ माँ खिलाती हुई उसके पीछे दौडी पुजारीजी भी उसी दिशा में दौडे । उन्होंने अनुमान लगा लिया की संभावना रानी ने अपनी माँ को देखा है । थोडा सा अधिक तेज दौड कर रानी शीघ्र ही इस इस तरी के निकट तक पहुंच चुकी थी । उसने बहुत आशा के साथ पीछे से महिला की साडी को खींचकर हफ्ते हुए पुकारा । माँ स्त्री ने एक बार पीछे मुडकर देखा । तुरानी ने मायूस होकर उस की साडी के पल्लू पर से अपनी मुट्ठी की पकड ढीली कर दी और शमा याचना की भाव से बोली मुझे लगा मेरी माँ है । रानी की प्रतिक्रिया से संतुष्ट होकर मिस्त्री पुनः आगे बढ गई । लेकिन रानी उस दिन बहुत अधिक निराश हुई जब वह वापस लौटी मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करते ही उसके आंसू छलक कर बाहर आने लगे थे और डॉॅ । कोटली में घुसकर वह खपत थापत् कर खुद हुई । पुजारी जीने भोजन तैयार करके रानी को परोसा । तुरानी ने खाने से इंकार कर दिया । उसने कहा कि सुबह उठकर खाएगी । अगली सुबह पुजारी जी ने पूरे मंदिर में सफाई कर ली । स्नान ध्यान कर लिया और प्रभु को भोग लगाने के लिए प्रसाद भी तैयार कर लिया । लेकिन तब तक भी रानी बिस्तर से नहीं उठे । जबकि इस से पहले कुछ सुबह सवेरे प्राया जल्दी बिस्तर छोड देती थी । पुजारी जी ने उसको उठकर दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के लिए कहा और बाहर चले गए । कुछ समय प्रशाद पुजारीजी वापस लौटे तब भी रानी उसी प्रकार लेटी हुई थी । पुजारी जीने चिंतित होकर उसके नहीं उठने का कारण पूछा । बिटिया तेरी तबियत ठीक है? टानी चुप रहे । पुजारी जी ने उसके बिस्तर से उठने का संबंध पिछले दिन की घटना से जोडकर सोचा । कल हिस्ट्री में अपनी माँ का देख कर इस बच्ची के हृदय में बहुत आशा जगी थी । कलाशा की बागडोर जब एक झटके में टूट गई तब इस बच्ची का दिल भी टूट गया । अभी तक उस दृश्य को भूल नहीं सकती है । पता पुजारी जी ने रानी को समझाते हुए कहा क्या बसों में तो तुम्हारी माँ थी ही नहीं । तुम्हारी माँ होती तो पीछे पलट कर अवश्य देखती तो केवल तुम्हारी आंखों का धोखा था । जिस दिन मा मिलेगी अपनी ममता से तुम्हारी मन की सारी पेडा हर लेगी । जब तक वो हमें मिल नहीं जाएगी तब तक हम बिना थके उन्हें ढूंढते रहेंगे । पुजारीजी के सांत्वना प्रद वचन सुनकर रानी उन्हें आशा मई दृष्टि से निहारने लगी । उसकी आंखें पूछ रही थी के सचमुच किसी दिन मैं अपनी मौत वापसी मिल सक होंगी और उनका अमूल्य स्नेह पास तक होंगी । दैनिकी भाव दृष्टि पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पुजारी जीने पुनाह का क्या कि पूरी दुनिया आशा के सहारे ही जीवित । जब तक मन में आशा है तब तक ही हम जीवित है । जीवन में आशा ही ना रहे तो जीने का उत्साह समाप्त हो जाता है । मनुष्य जीवित लाश बन कर रह जाता है । रानी ने सहमती में गर्दन हिला दी किन्तु उसके मुख से कोई शब्द निःसृत नहीं हुआ । पुजारीजी कुछ शरण महा रहने के पश्चात लौट गए चुकी पुजारी से रानी को भोजन कराने के बाद ही भोजन करते थे । इसलिए रानी के उठने की प्रतीक्षा में वे मंदिर में बैठकर भगवान जी की सेवा में भजन गाने लगे । कुछ दिन गुजर जाने के बाद जेट रागिनी प्रचंड होने पर पुजारीजी उठकर पुनाह कोठी में गए । रानी ने अब तक बिस्तर नहीं छोडा था । पुजारीजी द्वारा बार बार पूछने पर कि यदि स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो डॉक्टर को बुला कर लिया । रानी ने बहुत मासूमियत से कहा काका कल से पेट में कुछ अजीब सा हो रहा है । आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ क्या बाहर का खाना कभी कभी पेट में बहुत गर्बर कर देता है पर तू चिंता मत कर । मैं तो जी त्रिपुला का छोडने देता हूँ । ये तेरे पाचन तंत्र को ठीक करेगा । ये कहकर पुजारी जी ने एक छोटी सी डीवीएस, एक चम्मच भर त्रिफला चूर्ण और गिलास भर पानी रानी को देते हुए कहा कुछ ही समय में ये अपना प्रभाव दिखा देगा । पुजारी जी का परामर्श मानते हुए रेनो ने पानी के साथ त्रिफला का सेवन कर लिया । एक घंटे पश्चात पुजारी जी के आग्रह पर अनमनी भाव से बिस्तर से उठकर भोजन कर लिया लेकिन तब भी उसका ना तन स्वस्थ था ना मन प्रसन्न था । संध्या समय तक उसके चेहरे पर इसी प्रकार उदासी छाई रही । रात को भी वो भोजन किए बिना ही हो गई थी । अगले दिन उससे समय पर बिस्तर छोड दिया और नित्यकर्मों से निवृत्त होकर मंदिर की सफाई में पुजारी जी का हाथ बंटाने लगी । पुजारी जी ने देखा की रानी का चेहरा निस्तेज तथा आंखों में चिंता का समुद्र उमड रहा था । उस की ऐसी दशा देखकर पुजारी जी ने उसको इसमें ही पूर्वक ले जाकर कोठरी में बिस्तर पर लेटा दिया और बोले क्या स्वास्थ्य से अधिक महत्वपूर्ण कोई कार्य नहीं होता? मन ठीक नहीं तो यहाँ आराम करेंगे । कोई और परेशानी है तो मुझे बोल अपनी काका को नहीं बताएगी तो कैसे काम चलेगा? टू कहे तो मैं तुझे अस्पताल लेकर चलो । एक से एक अच्छे डॉक्टर हैं । अस्पताल भी यही निकलती है, कहीं दूर नहीं जाना है । आजकल अंग्रेजी पर ही डॉक्टर मशीनों से बीमारी का पता लगाकर ऐसी दवाई देते हैं, जिसे खाते ही मरीज स्वस्थ हो जाएगा । पुजारी जी की संवेदना, सहानुभूति और आत्मीयता देखकर रानी की आंखों में आंसू चला करें । किसी पर आयकर इतनी अपना तो पाकर उसके कंट्री से रुलाई फूट पडी और उसका रूदन हिचकियों में परिवर्तित हो गया । पुजारी जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा तो मैं क्या सब कुछ ठीक हो जाएगा । ऊपर वाले के घर देर है अंधेर नहीं अपने सिर पर पुजारी जी केस ने का स्पष्ट अनुभूत करके रानी और अधिक भावुक होती थी । उसने रोते हुए कहा काका मेरे पेट में परसों से रुक रुककर कुछ अजीब सा हो रहा है । आपकी त्रिफला से भी कुछ नहीं हुआ । कोई बात नहीं किया । चल खडी हूँ मैं तुझे अभी अस्पताल में दिखा जाता हूँ । दोपहर बार डॉक्टर मैडम वहाँ मिलेंगे । पुजारी जी के निर्देश पाते ही रानी अस्पताल जाने के लिए उठ खडी हुई । सुबह का समय होने के कारण सरकारी अस्पताल में लंबी लाइन लगी हुई थी । पुजारी जी ने रानी को एक और बिठा दिया । पर्ची बनवाने के लिए लाइन में खडे होकर अपनी बारी आने की प्रतीक्षा करने लगे । अपनी बारी आने पर पुजारी जीने काउंटर पर बैठे व्यक्ति से पर्ची मांगते हुए बताया की बेटी के पेट में दर्द है । उसने पुजारी जी को हाथ में पर्ची देकर कमरा संख्या बता दिया । पुजारीजी रानी को अपने साथ लेकर पर्ची पर लिखी कमरा संख्या में पहुंचे । वहाँ भी मरीजों की लंबी पंक्ति लगी थी । वहाँ भी पुजारी जीने लाइन में खडे होकर रानी की बारी आने की प्रतीक्षा की । जब रानी की बारी आई तब डॉक्टर ने कुछ दिनों तक सामान्य पूछताछ करने के पश्चात उसके पेट का निरीक्षण परीक्षण करके कहा कमरा संख्या नौ में जाइए । वहाँ लेडी डॉक्टर बैठती है । वही इन की सही से जांच करेंगे तो जारी जी रानी को लेकर कमरा संख्या नौ में गए । जहां पर महिला रोग विशेषज्ञ बैठी थी । वहाँ परिस्थियों की भीड से अलग एक कोने में खडे होकर पुजारी जी और रानी दोनों अपनी बारी आने की प्रतीक्षा करने लगे । शीघ्र ही रानी की बारी आ गई । महिला चिकित्सक में रानी का परीक्षण करने के उपरांत रानी को बाहर बैठने के लिए कहा और अत्यंत सहज भाव से पुजारी जी से पूछा आप कौन लगते हैं बच्चे की? काका मैं रानी का काकाम । पुजारी जी ने उत्तर दिया शादी हो गई क्या की? नहीं नहीं अभी नहीं अभी तो बच्ची है । इसके माता पिता आपके साथ ही रहते हैं नहीं तो ध्यान से सुनी । आपकी बेटी प्रेग्नेंट हैं, माँ बनने वाली है आपकी बेटी महिला चिकित्सक के मुख से अनपेक्षित समाचार सुनकर पुजारी जी के पैरों के नीचे से धरती खिसक गई । क्षण भर के लिए वे पास शान बन गए । उन्हें समझ में नहीं आया कि क्या बोले क्या करें? अगले क्षण उनके मुख से अनायास निकला । ऐसा कैसे हो सकता है तो आपकी बेटी ही बेहतर बता सकती है । मैं कैसे बता सकती हूँ? महिला चिकित्सक ने ये कहते हुए नर्स को अगला मरीज बुलाने का आदेश दिया । पुजारीजी अचानक आई विपत्ति की चिंता का बोझ लेकर बाहर निकला है और रानी को साथ लेकर मंदिर में लौटा । घर आकर रानी ने पुजारी जी से पूछा काका मेरे पेट में क्या हुआ है? डॉक्टर नहीं नहीं क्या बताया है अभी कुछ नहीं बताया है । कल फिर अस्पताल जाना होगा । शायद कल कुछ पता चल सके । पुजारी जीने दृष्टि फेरकर रानी के प्रश्नों का स्पष्ट इसका उत्तर दिया । पुजारीजी के इस प्रकार के उपेक्षापूर्ण उत्तर से रानी की चिंता बढ गई । अच्छा उसमें पुनः पूछा । काका सच बता दो मुझे क्या हुआ है? डॉक्टर ने आपसे कई मिनट तक बात की थी तो कुछ तो बताया ही होगा । मेरे पेट में कैंसर तो नहीं है ना का मेरी नानी मारी थी तो मरने से पहले कहती थी कि मेरे पेट में कुछ कुछ अजीब सा होता है । डॉक्टर ने बताया था उन के पेट में कैंसर है । वही सारी बीमारी की जड है । ये कहकर रानी रोने लगी । पुजारी जी ने उसे समझाया तो मैं ऐसी कोई बीमारी नहीं है जो है वो ठीक हो जाएगी । काका कैसा नहीं है तो क्या है? मेरे पेट में आप मुझे बताते क्यों नहीं । रानी ने रोते हुए कहा मेरी बेटियां जब उसने कुछ बताया ही नहीं तो मैं तुझे क्या बताऊँ । कल किसी बडे अस्पताल में जाकर पहले अच्छे डॉक्टर से तेरी जांच कराएंगे फिर इलाज कराएंगे तब सब कुछ ठीक हो जाएगा । पुजारी जी ने रानी को समझाते हुए कहा सांत्वना देने के पश्चात कुछ दिनों तक मौन रहने के उपरांत पुजारी जी ने रानी से पुनः इसमें पूर्व पूछा बेटियाँ घर छूटने के बाद तेरे साथ कब क्या हुआ? मुझे एक बार सारी आपबीती बता दी । कहते कहते पुजारी जी की आंखे भराई पुजारीजी की गीली आंखे देखकर रानी ने क्षण भर में समझ लिया कि उसकी बीमारी का संबंध उन क्रूर अमानवीय यातनाओं से हैं जो उसने माता पिता से दूर होने और पुजारी जी का संरक्षण मिलने के बीच के समय अंतराल में भूखी थी । पुजारी जी की आत्मीयता का सम्मान करते हुए रानी ने अपनी उंगली के तौर से उनकी आंखों का पानी पहुंचकर आपने निर्माम अतीत का यथातथ्य वर्णन करना आरंभ किया । रानी यंत्रवत कहती जा रही थी और पुजारीजी सुनकर उसकी काली तीज कल्पना कर के तरफ रहे थे । अगले दिन प्रात आ ही पुजारी जी ने रानी को निर्देश दे दिया कि उस की जांच कराने के लिए अस्पताल जाना है तो शीघ्र तैयार हो जाएगा । आदेश का पालन करते हुए टानी तुरंत पुजारी जी के साथ चलने के लिए तैयार हो गई । इस पर पुजारीजी रानी को साथ लेकर एक प्राइवेट क्लीनिक में पहुंचे । नाम पंजीकरण कराने के बाद अपना नंबर आने की प्रतीक्षा में दोनों वेटिंग रूम में पडी बेंच पर बैठे हैं । उस दिन डॉक्टर के क्लीनिक पर भी ठीक नहीं थी । इसलिए कुछ ही मिनट बैठने के बाद रानी का नाम पुकारा गया । पुजारीजी शीघ्रता से उठे और रानी को वहीं बैठने के लिए निर्देश देकर स्वयं चिकित्सा कक्ष में चले गए । यानी असमंजस के बादलों में घिरी । वहीं बैठे पुजारीजी को अकेले अपने कक्ष में प्रवेश करते हुए देखकर डॉक्टर ने पूछा आप किसके साथ हैं? मरीज का डॉक्टर साहब मैं मेरी या भागी । बेटी रानी के साथ हूँ वो भी अंदर आ रही । आप से मेरी एक प्रार्थना की । मेरी बेटी रानी का शारीरिक परीक्षण करते हुए उससे कुछ ना पूछे । परीक्षण के पश्चात मैं रैनी का काका ही उसके विषय में आपसे बात करूंगा । पुजारी जी ने हाथ जोडकर कहा ठीक हैं । डॉक्टर पुजारी जी से सहमत होते हुए घंटी बजाई और रानी को पुकारा । पुजारी जी ने भी कक्ष से बाहर झांककर रेनू को अंदर आने का संकेत कर दिया । रानी ने अंदर प्रवेश किया तो पुजारी जी के अनुरोध को स्वीकारते हुए डॉक्टर अपनी स्थान से उठ खडी हुई और रानी को परीक्षण कक्ष में चलने का संकेत करके आगे बढ गई । परीक्षण कक्ष में डॉक्टर ने रानी का परीक्षण अत्यंत सहजता और सावधानीपूर्वक क्या डॉक्टर द्वारा परीक्षण होने के पश्चात डॉक्टर के बिना पूछे ही रानी ने अपनी समस्या बताई । पिछले दो दिन से मेरे पेट में कुछ अजीब सा हो रहा है । मेरे पेट में कैंसर है? नहीं ऐसा नहीं तो फिर क्या है मेरे पेट में ऐसा क्यों हो रहा है? पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ । डॉक्टर ने इस पर रानी के प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया और उस कोटकर बाहर जाने का आदेश देते हुए परीक्षण कक्ष से बाहर आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गई । डॉक्टर की पीछे पीछे रानी तो पुजारी जी ने रानी के सिर्फ ऐसा नहीं है, जिस तरह कर कहा बिटिया तो बाहर प्रतीक्षा कक्ष में बैठ के डॉक्टर साहब ऐसे दवाई लिखा कर लाता हूँ । जी का कहकर रानी चिकित्सक कक्ष से निकल गई और बाहर आकर प्रतीक्षा कक्ष में पडी बेंच पर बैठ गई । रानी के जाने के बाद डॉक्टर ने पुजारी जी से मुखातिब होकर कहा लगभग पांच महीने का अगर पाल रहा है आपकी बेटी की कोख में कि मैं जानता हूँ । डॉक्टर साहिबा दुर्भाग्य ही कह सकते हैं कि हमारी बेटी एक नरपिशाच की हवस का शिकार होकर उसके दुष्कर्म का फल भोगने को विवश है । कुमारी बच्ची है, बच्ची का हित भी देखना पडेगा और समाज भी । पुजारी जी ने डॉक्टर के चरणों में अपना सिर रख दिया । मैं आपकी पीडा और आपके कहने का तात्पर्य समझ सकती हूँ लेकिन ये इतना आसान नहीं है जितना आप समझ रहे हैं । डॉक्टर ने सपाट शब्दों में कहा तो पुजारीजी प्रश्नात्मक मुद्रा में डॉक्टर की ओर देखने लगे । इसके दो कारण है । पहला बच्ची के जंग अभी परिपक्व नहीं हुए । इससे इसके प्राण भी जा सकते हैं । दूसरा बिना पूर्व अनुमति के ये कार्य अवैध है जो की हमारे अस्पताल में नहीं होता है । डॉक्टर ने पुनः भाव शून्य मुद्रा में स्पष्ट एकदम सपाट शब्दों में कहा । पुजारी जी ने बेटी के भविष्य और ऐसी स्थिति में बेटी के प्रति समाज की संवेदनहीनता का वास्ता देकर डॉक्टर के समक्ष पुनः गिडगिडाते हुए कहा डॉक्टर साहिबा मरीज के लिए डॉक्टर भगवान होता है । एक आप ही हैं जो मेरी बेटी को उसका जीवन जीने में सहायता कर सकती हैं वरना समाज मेरी बेटी को जीने नहीं देगा । पुजारी जी की प्रार्थना सुनकर डॉक्टर के श्रद्धेय में रानी के प्रति कुछ संवेदना जगी । उसने कहा देखो यहाँ तो ऐसा वैसा कुछ भी कर पाना संभव नहीं होगा । में ये भी आप कुछ पृष्ठ बता देना चाहती हूँ की ऐसा करने में आपकी बेटी के प्राण भी जा सकते हैं । फिर भी मैं आपको एक अन्य लेडी डॉक्टर का कार्ड देती । आप इनसे संपर्क कर लीजिए । हो सकता है वो इस कार्य को करने के लिए तैयार हो जाएगा । ये कहकर उसने विजिटिंग कार्ड पुजारी जी की ओर बढा दिया । पुजारीजी कार्ड और डॉक्टर द्वारा लिखा हुआ जाने के नाम का पर्चा लेकर धन्यवाद कहकर बाहर निकला है । चिकित्सक कक्ष से बाहर आते ही रानी ने पुजारी से पूछा काका क्या बताया डॉक्टर ने डॉक्टर को दिखाने के लिए कहा है । चलो एक बार वहाँ भी दिखा लेते हैं । पुजारी जी ने डॉक्टर द्वारा दिया हुआ कार्ड रानी को दिखाते हुए कहा

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