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Ep 2: ग्रामोफोन पिन का रहस्य - Part 1 in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts

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Ep 2: ग्रामोफोन पिन का रहस्य - Part 1 in 

AuthorHarish Darshan Sharma
ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay
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भाग दो ग्रामोफोन तीन का रहस्य ब्योमकेश ने सुबह का अखबार अच्छे से तह करके एक और रख दिया । उसके बाद अपनी कुर्सी पर पीछे सिर्फ टिकाकर खिडकी के बाहर देखने लगा । पढें, बाहर सूरत चमक रहा था । फरवरी की सुबह थी न को हराना । बादल आसमान दूर दूर तक नीला था । हम लोग घर की दूसरी मंजिल में रहते थे । ड्रॉइंग रूम की खिडकी से शहर की आपाधापी और ऊपर खुला आसमान साफ दिखाई देता था । नीचे तरह तरह के ट्रैफिक की आवाजों से पता चलता था की शहर रोजाना के शोरशराबे के लिए जाग रहा है । नीचे हैरिसन रोड का शोरगुल बढकर आकाश तक कुलांचे मारने लग गया था क्योंकि पक्षियों की चहचहाट आसमान में उडने लगी थी । ऊपर दूर तक कबूतरों की कतारें उडती दिखाई दी । लगा जैसे वे सूरज के इर्द गिर्द घेरा बनाना चाह रहे हो । सुबह के आठ बजे थे हम दोनों नाश्ता करके आराम से अखबार के पन्ने उलट रहे थे । ऍम की कोई दिलचस्पी समाचार दिखाई दे जाए । ब्योमकेश नहीं । खिडकी से हटने के बाद कहा तुमने वाजी विज्ञापन देखा, जो कुछ दिनों से बराबर छप रहा है । मैंने उत्तर दिया नहीं, मैं विज्ञापन नहीं पडता । आश्चर्य से देखते हुए ब्योमकेश बोला दोनों विज्ञापन नहीं पढते तो क्या बढते हो जो हर एक व्यक्ति पडता है समाचार दूसरे शब्दों में वह कहानियाँ जैसे मनचूरिया में कोई व्यक्ति है जिसकी उंगली से खून बहता है या फिर ब्राजील में एक महिला के तीन बच्चे हुए यही सब पढते हो यहाँ फायदा यहाँ पढकर क्यों पढा जाए है सब यही तो आज के संदर्भ में असली खबर चाहते हो तो विज्ञापन पढो ब्योमकेश विचित्र व्यक्ति था, यह जल्दी ही पता लग जाएगा । ऊपर से उसे देख कर उसके चेहरे या बातचीत से कोई यह कहा नहीं सकेगा की उसमें अनेक विशेष होगा, समावेश है । लेकिन यदि उसे ताना मारो या उसे तर्क में उद्वेलित कर दो तो उसका यह वास्तविक रूप सामने आ जाता है । लेकिन आमतौर पर वह एक गंभीर और कम बोलने वाला व्यक्ति है । लेकिन जब कभी उसकी खिल्ली उडाकर उसका मजाक बनाया जाता है तो उसकी जन्मजात प्रखर बुद्धि सभी संभावनाओं और अवरोधों को तोडकर उसकी जुबान पर खेलने लग जाती है तो उसका वार्तालाप सुनने लायक हो जाता है । मैं यही लोग संबंध नहीं कर पाया और सोचा कि क्यों ना उसे एक बार उद्वेलित करके देखा जाए । मैंने कहा दो या बात है । इसका मतलब यह हुआ कि अखबार वाले सब बदमाश लोग हैं जो अखबार के पन्नों को विज्ञापनों से भरने की जगह फिजूल की खबरें छापकर जगह बढ देते हैं । ब्योमकेश की आंखों में चमक दिखाई देने लगी । वहाँ बोला कसूर उनका नहीं है क्योंकि वे जानते हैं कि यदि वे तुम्हारे जैसे व्यक्तियों के मनोरंजन के लिए ये फिजूल की कहानियां न छापे हैं तो उनका अखबार नहीं दिखेगा । लेकिन वास्तव में चटपटी खबर व्यक्तिगत कालमों में मिलती है यदि तुम सभी प्रकार की महत्वपूर्ण खबरें चाहते हो जैसे कि तुम्हारे इर्द गिर्द क्या हो रहा है? दिन दहाडे कौन किसे लूटने की साजिश कर रहा है । इस मगलिंग जैसे गैर कानूनी काम को बढाने के लिए क्या नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं । तो तो मैं व्यक्तिगत कॉलम के विज्ञापन पढना चाहिए । राइटर्स ये सब खबरें नहीं बेचता । मैंने हस्कर जवाब दिया अगर ऐसा है तो आज इस है केवल विज्ञापन ही पढा करूंगा । पर तुम ने यह नहीं बताया कि आज तो मैं कौन सा विज्ञापन विचित्र लगा क्योंकि इसने अखबार मेरी तरफ देखते हुए कहा, पर लो मैंने निशान लगा दिया है । मैंने पन्नों को पलट कर देखा । एक पेज पर लाल पेंसिल से तीन लाइन की लाइनों पर निशान लगा था । यदि लाल निशान नहीं होता तो शायद साधारण दृष्टि में वहाँ दिखाई बिना देता । विज्ञापन इस प्रकार था शरीर में काटा यदि शरीर से काटा निकलवाना चाहते हैं तो कृपया शनिवार साढे पांच बजे वाइॅन् के दक्षिण पश्चिमी कोने पर लगे बिजली के खंबे से कंधो को टिकाई खडे रहे हैं । मैंने उस विज्ञापन को कई बार पढा और जब मुझे उसका कोई सिर पर नहीं मिला तो मैंने पूछा वहाँ के कहना क्या चाहता है? उस जो हो रहा है कि लैंपपोस्ट से कंधा दिखाने पर क्या जादू से शरीर से काटा निकल जाएगा? उस विज्ञापन का अर्थ क्या है और क्या है यह शरीर का काटा? ब्योमकेश ने उत्तर दिया, मैं भी तो यही समझ नहीं पाया हूँ । अगर तुम पिछले अखबारों पर नजर डालोगे तो पाओगे कि यहाँ विज्ञापन प्रत्येक शुक्रवार बिना किसी नाम के छप रहा है । लेकिन इस खबर में संदेश क्या है? आम तौर पर किसी विज्ञापन को छपवाने का कोई उद्देश्य होता है? इस विज्ञापन से तो कुछ पता नहीं चलता । ब्योमकेश बोला, पहली नजर में तो यही लगता है कि इसमें कोई संदेश नहीं है, पर कुछ भी नहीं है । यह कैसे मान लिया जाए । आखिर कोई व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई फिजूल के विज्ञापन पर क्यों खर्च करेगा? यदि ध्यान से पढा जाए तो पहला संदेश बिल्कुल स्पष्ट है और हो गया है । विज्ञापनकर्ता बताना नहीं चाहता हूँ कि वहाँ कौन है । विज्ञापन में कहीं कोई नाम नहीं है । अक्सर विज्ञापन ऐसे चलते हैं जिनके विज्ञापनकर्ता का नाम पता नहीं होता । पर यह सब जानकारी अखबार के दफ्तर में रहती है । अखबार अपनी ओर से एक बॉक्स नंबर छापता है । इसमें यह भी नहीं है तुम जानते होंगे कि जब कोई विज्ञापन छपवाता है तो उसका उद्देश्य यहाँ होता है कि वह खुद मौजूद रहकर लेन देन पर कोई सौदेबाजी करें । यह भी वही करना चाहता है, पर सौदेबाजी के लिए सामने नहीं आना चाहता हूँ । मैं ठीक ठीक समझ नहीं पाया । ठीक है मैं समझाता हूँ, ध्यान से सुनो । विज्ञापन देने वाला व्यक्ति इस विज्ञापन के माध्यम से लोगों से यह कहना चाहता है की है भाई सुनो, यदि तुम्हें से कोई अपने शरीर का काटा निकाल देना चाहता हूँ तो हम उस जगह इतने बजे मिलो और इस मुद्रा में खडे हो ताकि मैं तुम्हें पहचान सकूँ । अभी हम इसकी चर्चा न करें कि आखिरकार यह शरीर में काटा है । क्या चीज इस समय हम इतना ही सोच ले कि हम यदि उस काटे को निकाल देखना चाहते हैं तो हमें क्या करना होगा? उस जगह उतने बजे वहाँ जाए और लैंपपोस्ट से कंधा टिकाकर खडे हो जाए । मान लो तुम उसी समय ज्यादा इंतजार करते हो तो क्या होगा? क्या होगा? मुझे यहाँ बताने की जरूरत नहीं है कि शनिवार की शाम को उस स्थान पर कितनी भी हो जाती है । वाइॅन् लो एक तरफ है । उसके दूसरी तरफ न्यूमार्केट है और चारों तरफ अनेक सिनेमा हॉल है । तुम वहाँ निर्धारित समय से लेकर आधा घंटे तक ऍम पोस्ट देखकर खडे रहते हो तो खम्बे के आगे पीछे चलने वाली भीड के धक्के तो मैं खाने पडेंगे लेकिन इतने इंतजार के बाद भी जिस काम के लिए तुम वहाँ खडे हो उसका कोई अता पता तक नहीं और जादू से तो शरीर का काटा निकल नहीं सकता । अंत में तुम निराश होकर सोचने लगते हो की किसी ने तुम्हें क्या मूर्ति बनाया है? तब एक आए तो मैं अपनी पॉकेट में एक रुक का मिलता है जो भीड में से किसी ने बडी सफाई से तुम्हारी पॉकेट में डाल दिया है और फेल फिर क्या बीमार और दवा लेने वाला आपस में मिलते नहीं फिर भी इलाज का ना उस काम मिल जाता है । तुम्हारे और विज्ञापन दाता के बीच संपर्क कायम हो जाता है लेकिन तुम्हें नहीं पता लगता है कि वहाँ कौन है और देखने में कैसा लगता है । मैं कुछ देर उसकी बातों पर ध्यान देता रहा और बोला मान लो मैं तुम्हारे वर्णन को सही मान भी लूँ तो भी क्या साबित होता है । इससे सिर्फ यहाँ की शरीर में कांटे का सरगना हर कीमत पर अपनी पहचान को छुपाए रखना चाहता है और जो व्यक्ति अपनी पहचान उजागर करने में हिचकिचाता हो तो जाहिर है कि वहाँ कोई सीधा साधा व्यक्ति हरगिज नहीं है । मैंने अपना सिर हिलाकर कहा यहाँ तुम्हारा केवल अनुमान है इसका कोई सबूत नहीं की । जो तुम कह रहे हो वह सही हो । ब्योमकेश उठ खडा हुआ और फर्ज पर चहलकदमी करते हुए बोला सुनो सही अनुमान सबसे बडा सबूत होता है जिसे तुम जांच पर आधारित सबूत कहते हो । उसे तुम यदि बारीकी से अध्ययन करो तो पाओगे कि वह अनुमानों के एक क्रम के अलावा कुछ नहीं है । परिस्थिति पर आधारित प्रमाण बौद्धिक अनुमान नहीं है तो क्या है? फिर भी इसके आधार पर कितने लोगों को आजन्म कैद की सजा हुई है? मैं चुप रहा हूँ । किन्तु रजत से उसके तर्कों को स्वीकार नहीं कर पाया । एक अनुमान को प्रमाण मान लेना आसान नहीं लगा लेकिन फिर क्योंकि इसके दर्शकों को यही झुठला देना भी मुश्किल था इसलिए मैंने निर्णय लिया कि इस समय यही बेहतर होगा की प्रतिक्रिया के रूप में मैं फिलहाल कुछ नहीं हूँ । मैं जानता था कि मेरी चुप्पी ब्योमकेश को उद्वेलित करेगी और जल्द ही वह कोई तर्क प्रस्तुत करेगा जिनको मैं किसी तरह भी स्वीकार नहीं कर पाऊंगा । इसी बीच गोरैया उडकर हमारी खिडकी के दरवाजे पर बैठ गई । उसकी जो सोच में छोटी सी पहनी थी उसने अपनी छोटी चमकती आंखों से देखा । ब्योमकेश चलते चलते एकाएक रुक गया और गौरैया की और इशारा करके उसने पूछा क्या तुम बता सकते हो कि यह चिडिया क्या कहना चाह रही है? चौकर मैं बोला क्या करना चाह रही है मैंने । मैं समझता हूँ कि वहाँ अपना घोषणा बनाने के लिए जगह ढूंढ रही हैं और क्या क्या या निश्चयपूर्वक कह सकते हो? बिना किसी संदेह के हाँ, बिना किसी संदेह के ब्योमकेश दोनों बाजुओं को आपस में बांधकर खडा हो गया और हल्की मुस्कान से बोला तो तुमने ऐसा कैसे सोच लिया? क्या प्रमाण प्रमाण वह तो है उसके मोह में पेड की टहनी उसके मूवमेंट पहनी । क्या निश्चित रूप से यह बताती है कि वह हौसला ही बनाना चाहती है? मैं समझ गया कि मैं ब्योमकेश के तर्कों के जाल में फंस गया हूँ । मैंने कहा नहीं, लेकिन अनुमान अब ऑनलाइन बनाए तो क्यों इतनी देर से मानने से इंकार करते रहे? नहीं नहीं, लेकिन तुम्हारा कहना है कि जो अनुमान गोरैया के बारे में लगाया गया, वहाँ मनुष्य पर लागू होता है । क्यों नहीं यदि तुम टहनी मुंह में दबाकर किसी की दीवार पर बैठ जाओ तो यह साबित हो जाएगा कि तुम घोषणा बनाना चाहते हो? नहीं, इससे तो यह साबित होगा कि मैं बहुत ही ऊंचे दर्जे का उल्लू हूँ । क्या इसके लिए भी कोई सबूत चाहिए? ब्योमकेश हसने लगा, उसमें कहा, दो मुझे किसी तरह नाराज नहीं कर सकते । तो मैं यहाँ मानना ही पडेगा कि भले ही जांच पर आधारित प्रमाण में भूल हो जाए, पर तर्क पर आधारित अनुमान गलत नहीं हो सकता । मैं भी जिद पर अड गया और बोला, मैं विज्ञापन को लेकर तुम्हारे तरह तरह के अनुमानों और अटकलों पर यकीन करने के लिए तैयार नहीं हूँ । ब्योमकेश ने कहा, इससे तो यही साबित होता है कि तुम्हारा दिमाग कितना कमजोर है । जानते हो आस्ता को भी मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत पडती है । खैर तो तुम्हारे जैसे लोगों के लिए जहाज पर आधारित प्रमाणपत्र ही सर्वाधिक उपयोगी मार्ग है । कल है । शनिवार शाम को हमारे पास कोई काम नहीं है । मैं कल दिखा दूंगा कि मेरा अनुमान सही है कि अगर हो गए इतने में सीढियों से किसी के चढने की पदचाप सुनाई दी । ब्योमकेश ने कानों पर जोर दिया और बोला आगंतुक अजनबी मध्य वाले का भारी भरकम या फिर गोल मटोल हाथ में बैठे कौन हो सकता है? जरूर हमी से मिलना चाहता है क्योंकि इस मंजिल में हमारे अलावा और कौन है? वहाँ अपने आप पर ही हस दिया । दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी । ब्योमकेश जोर से बोला भी देना चाहिए । दरवाजा खुला है । एक मध्यवय के भारी भरकम व्यक्ति ने दरवाजा खोलकर प्रवेश किया । उसके हाथ में मलाका बात से बनी बेट थी जिसकी मूड पर चांदी चढी हुई थी । वह बटनों वाला अप्लास्का उनका काला कोट पहने हुए था । नीचे बढिया प्लेन तो वाली फाइन धोती झलक रही थी । वह गोरा चिट्टा क्लीन सेवथा आगे के बाल उड गए थे पर देखने में वहाँ प्रियदर्शी था तीन मंजिल सीढियाँ चढने से अंदर आते ही बोलने में उसे असुविधा हो रही थी । उसने अपनी जेब से रुमाल निकालकर चेहरा पहुंचा ब्योमकेश मेरी ओर इशारा करके आहिस्ता से बढ बढाया । अनुमान अनुमान मुझे ब्योमकेश का ताना चुपचाप सहना पड रहा था क्योंकि उसका अजनबी के बारे में अनुमान सही निकला था । आगंतुक सज्जन तब तक सहज हो चुके थे । उन्होंने प्रश्न किया, आप दोनों में से जासूस ब्योमकेश बाबू कौन है? ब्योमकेश ने पंखा चलाकर कुर्सी की ओर इशारा करते हुए कहा तस्वीर रखिए मैं ही ब्योमकेश बख्शी हो, लेकिन मुझे जासूस शब्द से चिढ है । मैं एक सत्यान्वेषी हूँ । सच को खोजने वाला मैं देख रहा हूँ । आप काफी परेशान है । कुछ देर आराम कर लें । फिर आपसे ग्रामोफोन बिन का रहस्य सुनूंगा । वे सज्जन बैठ गए और बडी देर किंकर्तव्यविमूढ होकर ब्योमकेश की तरफ ताकते ही रह गए । आश्चर्य में तो मैं भी था क्योंकि मेरे भेजे में यह घुस नहीं बता रहा था कि व्योमकेश ने एक ही नजर में उन मध्यवय के संभ्रांत साजन को उसको क्या ग्रामोफोन पिन की कहानी से कैसे जोड दिया । मैंने ब्योमकेश के कई अजूबे देखे हैं पर यहाँ तो कोई जादुई कामना में से कम नहीं था । बहुत प्रयास करने के बाद उन सज्जन ने अपने विचारों पर नियंत्रण किया और पूछ लिया आप यह कैसे जान गए? ब्योमकेश ने हस्कर उत्तर दिया केवल अनुमान पहला यहाँ आप मध्यवय है, दूसरा आप संपन्न व्यक्ति है । तीसरा आपको यहाँ समस्या हाल ही में होने लगी और अंत आप मेरे पास सहायता के लिए आए हैं । इसलिए फॅसने वाक्य वहीं छोड दिया और अपने हाथों को हवा में इस प्रकार उडाया जैसे कह रहा हूँ कि इतना सब होने के बाद उनके आने का कारण तो एक बच्चा भी जानने आएगा । यहाँ यह बताना जरूरी है कि इधर कुछ सप्ताहों से शहर में कुछ अजीब घटनाएं घट रही थी । अखबारों में उन घटनाओं को ग्रामोफोन की पिन का रहस्य के शीर्षक से छापना शुरू कर दिया था और उन घटनाओं की विस्तृत जानकारी पहले पेज की हेडलाइन के रूप में छाप रहे थे । इन समाचारों ने कलकत्ता की जनता को उत्सुकता, व्याकुलता और आतंक के मिले जुले प्रभाव से त्रस्त कर दिया था । अखबारों में भयमिश्रित आतंक पैदा करने वाले व्रतांत पढने से पहाड और चाय के अड्डों पर तरह तरह की आशंकाओं और अफवाहों का बाजार गर्म था । भय और आतंक से शायद ही कोई कलकत्ता वासी रात के अंधेरे में घर से बाहर निकलता हूँ । घटना की शुरूआत इस प्रकार हुई करीब डेढ महीने पहले सुकिया स्ट्रीट निवासी जय हरी सान्याल सुबह के समय कार्ड वाली रोड पर चल रहे थे । सडक पार करने के लिए जैसे ही उन्होंने कदम बढाया वे एकाएक ऑन रेमू सडक पर गिर गए । उस समय सडक पर काफी भीड थी । उन्हें सडक से उठाकर एक और लाया गया तो पता चला कि उनकी मृत्यु हो चुकी है । उनकी एक का एक मृत्यु की जब खोजबीन की गई तो देखा गया कि उनके सीने पर खून की बूंद है पर आसपास किसी गांव का कोई निशान नहीं पाया गया । पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में प्राकृतिक मृत्यु घोषित करके लाश को अस्पताल भेज दिया हूँ । बोस टमार्टम में एक विचित्र तथ्य सामने आया जिससे पता चला की मौत ग्रामोफोन के छोटे से पिन से हुई है क्योंकि वह ह्रदय में पाई गई जो गढकर अंदर पहुंची थी । यहाँ पे कैसे रजाई के अंदर पहुंची इस प्रश्न के उत्तर में होशियार विशेषज्ञों ने अपने निर्णय में बताया कि इसे छोटे रिवाल्वर ये उसी प्रकार के यंत्र से सीने के ठीक सामने बिल्कुल पांच से मारा गया है जिससे बिन मृत व्यक्ति की खाल और माँ से होकर सीधा रजय में पहुंची और उसकी तत्काल मृत्यु हो गई । अखबारों में इस व्रतांत को पढकर काफी शोरगुल हुआ था । इसके बाद मृत व्यक्ति की संक्षिप्त जीवनी भी प्रकाशित हुई और पत्रों में ऐसी अटकलें भी छापी गई कि यहाँ वास्तव में हत्या ही है या कुछ और । अगर हत्या है तो इस को कैसे अंजाम दिया गया लेकिन एक बात जो कोई नहीं बता पाया कि इस हत्या के पीछे उद्देश्य क्या था और हत्यारे को इससे क्या लाभ हुआ । अखबारों में यह भी छापा की पुलिस ने अपनी जांच शुरू कर दी है । चाहे क्या डोसे वह उडने लगा कि यह झगडा पट्टी के सिवाय कुछ नहीं है । उस व्यक्ति को दिल का दौरा पडा था और अखबारों के पास कोई सनसनी के समाचार वही था तो उन्होंने यह कहानी गढकर दिल को तार बना दिया है । लेकिन आठ दिनों के बाद अखबारों ने अपने मुख्य पृष्ठों पर डेढ इंच के बडे बडे टाइप में जो समाचार छपा उसको पढकर कलकत्ता का संभ्रांत तबका भी चौक कर सोचने पर मजबूर हो गया । चाय के अड्डों के धुरंधर भी सन्नाटे में आ गए हुआ हूँ । आशंकाओं और अटकलों का बाजार बारात के पूर्व मुद्दों की भांति तेजी से बढने लगा दे निकाल के तूने लिखा ग्रामोफोन बिन्नी फिर तांडव शुरू किया । अजीब और राज्य में घटनाओं से लोग भयभीत । कलकत्ता की सडके पूर्णतः सुरक्षित कालकेतु के पाठकों को याद होगा कि कुछ दिन पहले श्रीजय हरी सान्याल की सडक पार करते समय एक का एक मृत्यु हो गई थी । जांच से पता चला की एक ग्रामोफोन पेन उनके राॅय में घुसा मिला और डॉक्टर में उस दिन को ही मृत्यु का कारण घोषित किया था । उस समय हमने संदेह उजागर किया था की वहाँ कोई साधारण दुर्घटना नहीं है और उसके पीछे कोई छुपा भयानक सडयंत्र है । हमारा वहाँ संदेह अब पक्का हो गया है । कल ठीक वैसे ही अजीब दुर्घटना घटती है । प्रख्यात व्यवसायिक कैलाशचंद्र मौलिक कल शाम लगभग पांच बजे मैदान के निकट गाडी से जा रहे थे । रेड रोड पर उन्होंने अपनी कार रुकवाई और पैदल चलने के लिए गाडी से बाहर आए । एक का एक उनके मुंह से चीख निकली और वो जमीन पर गिर पडे । उनके ड्राइवर और अन्य लोग उन्हें उठाकर कार्तक लाए लेकिन तब तक उनका प्राणांत हो गया । यह देखकर वहाँ एकत्र सभी लोग घबरा गए लेकिन भाग्य वर्ष जल्दी ही पुलिस आ गई । कैलाश बाबू रेशमी कुर्ता पहने हुए थे और पुलिस को उनके सीने पर खून की बूंद देखी इस भाई से कहीं यहाँ स्वाभाविक मृत्यु न हो । पुलिस ने तुरंत लाश को अस्पताल भेजा । डॉक्टर की रिपोर्ट में कहा गया कि मृतक के रहे में ग्रामोफोन बिन गुस्सा पाया गया और बताया गया की वहाँ बिन नजदीक से उनके सीने में सामने से शूट किया गया था । यहाँ स्पष्ट है कि यह कोई प्रत्याशित अपराध नहीं है और यहाँ की जघन्य हत्यारों का गिरोह शहर में आ गया है । यहाँ कहना मुश्किल है कि ये कौन लोग हैं और कलकत्ता के इन जाने माने नागरिकों को मारने में उनका प्रयोजन क्या हो सकता है । लेकिन जो वास्तव में अनोखा है वहाँ है उनकी हत्या का तरीका । इसके अलावा हथियार और उसका इस्तेमाल भी राजस्थान के पर्दे में छुपा है । इलाज बाबू अत्यंत उदार और मिलनसार सज्जन पुरुष थे । यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि उन जैसे व्यक्ति का कोई अहित चाहता हूँ । मृत्यु के समय उनकी आयु केवल अडतालीस वर्ष थी । कैलाश बाबू विदुर है । उनके बाद उनकी संपत्ति कि स्वामी उनकी बेटी होगी । हम कैलाश बाबू की बेटी और दामाद के लिए गहन सहानुभूति प्रकट करते हैं जो उनकी मृत्यु से शोकाकुल है । पुलिस अपनी जांच पडताल कर रही है । फिलहाल कैलाश बाबू के ड्राइवर को संदेह है के चलते हिरासत में ले लिया गया है । इसके बाद लगभग दो सप्ताह तक अखबारों में काफी उत्तेजना फैली रही । पुलिस जोर शोर से अपराधी की तलाश में व्यस्त रही लेकिन हाथ पल्ले कुछ पडता न देख कर के भी हैरान और परेशान पुलिस खोजबीन में लगी रही । लेकिन अपराधी का कोई सुराग पानी तो दूर वह ग्रामोफोन बिन के गहन रहस्य के बारे में भी कोई प्रकाश नहीं डाल भाई और करीब पंद्रह दिन बाद ग्रामोफोन बिनने अपनी करामात दिखाई । इस बार का शिकार कृष्ण दयाल लाख नाम का एक सूदखोर धनवान था । वहाँ धर्मतल्ला और वेलिंग्टन स्ट्रीट के चौराहे पर सडक पार करते समय सडक पर ही गिर गया और से कभी नहीं उठा । इस बार फिर मीडिया में ऐसा घमासान छिडा जिसने खबरों के परखच्चे उडा दिए । सम्पादकीय लेखों में पुलिस की कार्यक्षमता और व्यर्थता पर तीखे प्रहार और तेज हो गए । कलकत्ता महानगर में आतंक अच्छा गया । नागरिकों में भय और दहशत घर करने लगे । अड्डो में चाय दुकानों, होटलों और ड्राइंग रूमों में इस विषय को छोड कर कोई और विषय ही नहीं रहा ।

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ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay