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Ep 1: सत्यान्वेषी (दि इनक्विजिटर) - Part 3 in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts

Story | 21mins

Ep 1: सत्यान्वेषी (दि इनक्विजिटर) - Part 3 in 

AuthorHarish Darshan Sharma
ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay
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यहाँ बहुत हम बाद में करेंगे । इस समय हमें जरूरी है खाना । मुझे चक्कर आ रहे हैं लेकिन इस समय नहीं आने से अधिक और कुछ जरूरी नहीं है । डॉक्टर कमरे में आ गए । अतुल ने उन्हें देख कर कहा, अनुकूल बाबू । कहावत के अनुसार विलक्षण प्रतिभा की तरह मैं लौट आया हूँ । अंग्रेजी में एक कहावत है खोटा सिक्का नहीं चलता । मेरी स्थिति बिल्कुल वैसे ही है । पुलिस ने भी बेरंग वापस कर दिया । गंभीर मुखमुद्रा में डॉक्टर ने कहा अतुल बाबू हो या जानकर खुशी हुई कि आप वहाँ पर लॉर्ड आए हैं । शायद पुलिस ने भी आपको निर्दोष पाया हो और छोड दिया हूँ । लेकिन आप अब यहाँ और नहीं । मैं समझता हूँ आप समझ गए होंगे । मेरा मंतव्य क्या है? यहाँ पूरे मैच का सवाल है । सभी चाहते हैं जाना देखिए, मुझे अन्यथा न लीजिए । मुझे आप के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से कुछ नहीं हैं । पर अतुल ने तुरंत जवाब दिया वो मैं समझ गया । निश्चित रूप से । मुझ पर तो अपराधी का बिल्ला लग चुका है । मुझे सडक लेकर आपके मुसीबत में पढना चाहेंगे । क्या पता पुलिस आपके विरुद्ध भी अपराध उकसाने या मदद करने का चार्ज लगा सकती है? कैसे कहा जाए तो क्या आप चाहते हैं कि मैं आज ही मैं छोड दूँ । डॉक्टर कुछ देर तो चुप रहा फिर अनिच्छा से बोला भी है । आज रात रहे जाइए तो कल सवेरे अतुल बोला जरूर मैं कल आपको कष्ट नहीं दूंगा । कल मैं अपनी जगह तलाश कर लूंगा । जहाँ भी हो कुछ ना मिला तो अंततः पडोस में उडिया होटल तो मिल ही जाएगा और वहाँ खर्च दिया अनुकूल । बाबू ने पुलिस स्टेशन में हुई बातों को पूछना चाहा जिसके उत्तरमें अतुल दो एक मामूली बताकर नहाने चला गया । डॉक्टर ने मुझसे कहा मुझे लग रहा है कि मैंने अतुल बाबू को नाराज कर दिया लेकिन मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं है । मैं पहले ही बदनाम हो चुका है । यदि मैं उसमें किसी अपराधी को और शरण दू तो सुरक्षा की दृष्टि से क्या सही होगा? आप ही कहिए । सच्चाई यह थी की सुरक्षा और अपने को बचाए रखने के ऐतिहात के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता हूँ । मैंने उदासी से सिर्फ लाकर हाँ में हाँ मिलाई और कहा देखिए आप मैच के स्वामी है इसलिए आप जो ठीक समझते हैं वहाँ आपको करना पडेगा । मैंने भी कंधे पर तौलिया डाला और बाथरूम की तरफ बढ गया । डॉक्टर पश्चाताप की मुद्रा में चुपचाप अकेले बैठे रहे गए । मैं और अब्दुल लंच के बाद अपने कमरे में आ रहे थे कि देखा गंजाम बाबू दफ्तर से आ रहे हैं । उन्होंने जैसे ही अतुल को देखा तो चेहरा सफेद हो गया । चिल्लाकर बोले, आतुर बाबू, आप क्या? वाकई में अतुल थोडा मुस्कुराया और बोला हाँ, मैं अतुल ही हूँ । अंजाम हूँ क्या आप दृष्टि दोस्त समझ रहे हैं? गंजाम बोले, लेकिन मैंने सोचा पुलिस ने । उन्होंने दो बार धूप को गले में निकला और तेजी से अपने कमरे में चले गए । अतुल ने खुशी में आगे न जाकर धीरे से कहा, एक बार का अपराधी सादा ही अपराधी रहता है । फॅमिली मुझे देखकर चौकर घबरा गए । उसी शाम अतुल बाबू ने बताया, भाई, हमारे दरवाजे में जो लॉक लगा है, लगता है वहाँ टूट गया है । मैंने भी देखा हमारे दरवाजे का विदेशी ताला काम नहीं कर रहा था । हमने अनुकूल बाबू को बताया । उन्होंने भी आकर देखा और बोले विदेश तालों में यही समस्या है । जब तक ठीक है तब तक बढिया काम करते हैं, पर जब खराब हो जाए तो इंजीनियर को छोड कर कोई बनाए नहीं सकता । हमारे देश जी, दाले इससे कहीं अच्छे हैं । जो भी हो मैं कल सुबह पहला कहाँ से ठीक कराउंगा और वे सीढियों से वापस उतर है । रात को सोने से पहले अतुल ने कहा अजीत सिर दर्द से फटा जा रहा है । क्या तुम कुछ सुलझा सकते हो? मैंने कहा तो माँ अनुकूल बाबू से दवा क्यों नहीं ले लेते हैं? अतुल बोला होम्योपैथी किया उससे कुछ होगा । चलो ठीक है देखा जाए पानी की तूने क्या कुछ कर सकती है? मैंने कहा मैं भी चलता हूँ तुम्हारे साथ मुझे भी कुछ अच्छा नहीं लग रहा है । डॉक्टर अपनी दुकान बंद करने जा रहे थे । हमें देखते ही उन्होंने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा । अतुल बोला हम लोग आपकी दवा चखने आए हैं । मुझे बडे जोरों का सिर दर्द हो रहा है । क्या आप मदद कर सकते हैं? डॉक्टर में प्रसन्न मुद्रा में कहा वर्ष मैं जरूर आपको राहत दिला सकता हूँ । यहाँ और कुछ नहीं । थोडी सी बदहजमी है जो आपको परेशान कर रही है । सुंदर है बैठे है । मैं अभी एक दोस्त देता हूँ । उन्होंने कुछ ताजी दवाई सेल्स से निकली एक पुडिया बनाकर दी और बोले जाइए इससे खाकर सो चाहिए । आपको याद भी नहीं होगा कि आपको सिर दर्द था भी या नहीं । ऍम बाबू आप भी कुछ मुझे मुझे लग रहे हैं । उत्तेजना के बाद आप भी थकान से पस्त दिखाई देते हैं । क्यों है ना? यही बात तो क्यों ना मैं आपको भी दावा दे दो ताकि सुबह आप भी स्वस्थ और ताजा महसूस करें । हम दवा लेकर वापस जा ही रहे थे कि अतुल ने अनुकूल बाबू से पूछा क्या ब्योमकेश बक्सी नामक किसी व्यक्ति को जानते हैं? थोडा चौकर अनुकूल बाबू बोले, नहीं तो ये कौन है? अब्दुल ने कहा, मैं नहीं जानता । मैंने इन का नाम आज पुलिस स्टेशन में सुना । मुझे लगता है वे इस केस के इंचार्ज हैं । डॉक्टर में दोबारा सिर हिलाकर कहा नहीं, मैंने कभी या नाम नहीं सुना । अपने कमरे में लौटने के बाद मैंने कहा अब्दुल अब तो मुझे सब कुछ बताना होगा क्या? सबकुछ बताऊँ तो मुझे कुछ छुपा रहे हो, लेकिन यह नहीं चलेगा तो मुझे सब कुछ बताना होगा । अतुल कुछ देर शांत रहा । फिर एक नजर दरवाजे पर डालकर बोला अच्छा ठीक है । मैं बताता हूँ आवेदन आकर मेरे बैड पर बैठो । मैं भी सोच रहा था कि समय आ गया है कि तुम्हें भी कुछ बता दिया जाए । मैं उसके बैड पर बैठ गया । अतुल भी दरवाजा बंद करके मेरे पास ही बैठा । मेरे हाथ में दवा की पुडिया थी । मैंने सोचा मैं उसे खा लूँ । फिर उसकी बातें शुरू हूँ । लेकिन जैसे ही मैं दवा खाने को उठा उसने टोक दिया । उसे अभी रहने दो । पहले मेरी गाने सुन लो फिर उसे ले लेना । उसने लाइट बुझा दी और मेरे कान के पास आकर आहिस्ता से अपनी कहानी सुनाने लगा । मैं चुपचाप दहशत में और कभी प्रशंसा में पूरी कहानी सुनता रहा हूँ । करीब पौन घंटे बाद संक्षेप में अपनी कहानी कहकर अतुल बोला आज के लिए इतना पर्याप्त है । शेष कहानी कल तक इंतजार कर सकती है । उसने घडी के चलते डायल में देखा । अभी काफी समय दो बजे से पहले कुछ नहीं होगा । क्यों ना तब तक थोडी नींद लेले । मैं समय उन्हें हर जगह दूंगा । लगभग डेढ बजे मैं ज्यादा हुआ लेता था । मेरे काम इतने सजग है कि मुझे अपने रजाई की धडकन भी साफ सुनाई दे रही थी । मेरी मुट्ठी में वह वस्तु जकडी हुई थी जो अतुल्य मुझे दी थी । अंधकार में सन्नाटे के अलावा कुछ नहीं था । एक का एक मेरे कंधे पर अतुल के हाथ से मैं सजा हो गया । यह संकेत हमने पहले ही तय कर लिया था । मेरी सास धीमी और गहरी हो गई । जैसे सोए हुए व्यक्ति की होती है । मुझे लग रहा था कि वह घडी आ गई है । कब दरवाजा खुला मुझे पता नहीं चला । लेकिन एक का एक अतुल के बैठ पर एक धमाका हुआ और कमरे में रोशनी हो गई । मैं हाथ में लोहे की छड लेकर झपट्टे के साथ खडा हो गया । मैंने देखा कि अतुल हाथ में रिवॉल्वर लिए और दूसरे आज से लाइट के स्विच को दबा खडा है । अतुल के बैठ के पास घुटनों के बल झुके हुए अनुकूल बाबू अतुल को ऐसे घूर रहे थे जैसे एक घायल चेयर अपने शिकारी को घूरता है । अतुल की आवाज गूंजी क्या दोनों भाग्य है? अनुकूल बाबू आप जैसा अनुभवी व्यक्ति अन्ततः एक तकिया में ही घूम पाया । यही ना जरा भी हिलने की कोशिश ना कीजिए और छुरा फेंक दीजिए । जरा भी हिले तो गोली चला दूंगा । अजीत जाकर खिडकी खोल दो । देखो पुलिस बाहर खडे इंतजार कर रही है । जरा देखो ना । डॉक्टर मौका देखकर दरवाजे की ओर झपटा लेकिन अतुल के मजबूत हाथ का एक मुक्का उसके जबडे पर लगते ही वह गिर पडा । डॉक्टर उठ बैठा और बोला भी है मैं भागने की कोशिश नहीं करूंगा लेकिन दया करके यहाँ तो बता दो कि मुझ पर किस बात का अपराध लगेगा । उसकी पेरिस बनाने में बहुत समय लगेगा । डॉक्टर पुलिस ने पूरी चार्जशीट बना ली है । वहाँ समय आने पर आपको मिल जाएगी, लेकिन अभी के लिए । उसी समय पुलिस इंस्पेक्टर कमरे के अंदर आते हुए देखा । उसके पीछे सिपाही अतुल ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, अभी के लिए मैं आपको सत्यान्वेषी ब्योमकेश बख्शी पर हमला करने और उनकी हत्या करने की कोशिश करने के लिए पुलिस को सौंप ता हूँ । फॅार ये है अपराधी इंस्पेक्टर में बिना कुछ कहे अनुकूल बाबू के हाथों में हथकडी बहरा दी । डॉक्टर ने खूंखार आंखों से देखा और बोला यह षड्यंत्र है । इस ब्योमकेश बख्शी और पुलिस ने मिलकर मुझे झूठे केस में फंसाया है, लेकिन आप को छोडूंगा नहीं । देश में कानून है और मेरे पास पैसे की भी कभी नहीं है । अतुल ने कहा, जरूर कीजिए । आखिर बाजार में कोकेन का अच्छा दाम मिलता है । विकृत चेहरा बनाकर वहाँ डॉक्टर बोला कोई सबूत है कि मैं को केनगर धंदा करता हूँ जरूर अनुकूल । बाबू शुगर मिल की बोतलों में क्या है डॉक्टर? इस प्रकार चौका जैसे उसके पैरों के नीचे साहब आ गया हूँ । वहाँ बोला कुछ नहीं । उसके आंखों से अतुल के लिए क्रोध और चिंगारियां निकलती रही । यहाँ अनुकूल बाबू की छवि नहीं थी । स्वच्छ जनता के जाने में एक का एक एक खुंखार हत्यारा निकल आया था । यह सोच कर के पिछले कुछ महीने मैंने इस व्यक्ति के साथ कराते हैं । मेरे रोंगटे खडे हो गए । अतुल ने पूछा डॉक्टर अब यहाँ बताया कि कल रात आपने हमें क्या दवा दी थी? क्या वहाँ वो रुपया का छोडने था? चलिए आप नहीं बताएंगे । मुझे कोई फर्क नहीं पडता । केमिकल जांच हमें सब कुछ बता देगी । उसने जरूर जलाया और बिस्तर पर सहारा लगा कर बैठ गया और बोला इंस्पेक्टर आप कृपया मेरा बयान ले लें । एफआईआर बनने के बाद डॉक्टर के रूम की तलाशी हुई, जिसमें कोकेन से भरी दो बडी बोतल पाई गई । डॉक्टर चुप बना रहा हूँ । लगभग सुबह होने वाली थी जब डॉक्टर तथा उसके माल के साथ पुलिस ने प्रस्थान किया । अतुल बोला, यह जगह तमाम आप और उठा पटक से भरी बडी है । होना तो मेरे घर चलकर एक कप चाय पी लो । हम लोग हैरिसन रोड स्थित तीन मंजिली इमारत के सामने उतरे । घर के बाहर गेट पर बीटल की नेम प्लेट पर लिखा था ब्योमकेश बख्शी, सत्यान्वेषी फॅार ब्योमकेश जरूरत तकल्लुफ से बोला आपका स्वागत है । कृपया मेरे घर में प्रवेश करके मुझे आदन प्रदान करें । मैंने पूछा यहाँ सत्यान्वेषी इनकी विजिटर । यह मामला क्या है? यहाँ मेरी पहचान है । मैं जासूस शब्द पसंद नहीं करता हूँ । जांच पर्यवेक्षक शब्द तो उससे भी व्यर्थ है । इसलिए मैं अपने आपको सत्यान्वेषी अर्थात सच की खोज करने वाला कहता हूँ । क्या बात है आपको पसंद नहीं । ब्योमकेश इमारत की पूरी दूसरी मंजिल पर रहता था । कुल मिलाकर चार से पांच विशाल कमरे थे जिन्हें पूरी रूचि के साथ सजाया गया था । मैंने पूछा क्या तो माँ अकेले ही रहते हो । हाँ केवल मेरा सेवा पूरी राम साथ रहता है । मैंने निश्वास छोडकर कहा बहुत ही अच्छी जगह है । कब से रहते आए हो । लगभग एक वर्ष हो गया । थोडे समय के लिए नहीं था जब मैं तुम्हारे मैच में रुका हुआ था । इसी बीच बूटीराम ने इस दो जलाकर चाय बना रही थी वो । उनके इसने गरमा गर्म चाय की चुस्की लेकर कहा, मैं समझता हूँ कुछ दिन जो मैंने भेज बदलकर तुम्हारे साथ बिताएं । वास्तव में काफी रोचक रहे लेकिन अंतिम दिनों में डॉक्टर में पकड लिया था और इसके लिए मैं जिम्मेदार था तो वो कैसे खिडकी के बारे में मैंने ही पहली बार बताया था और वही मेरा भेज दिया । हो गया । अभी नहीं समझे रहे भाई अश्विनी बाबू ने इसी खिडकी से ऐसे नहीं आप कहानी शुरू से बताइए । ब्योमकेश ने चाय की दूसरी चुस्की लेकर कहा कुछ तो मैंने तो मैं कल रात ही बता दिया था अब शेष कहानी सुनो । तुम्हारे इलाके में जो आए दिन हत्याएं हो रही थी उसको लेकर पुलिस कुछ महीनों से काफी परेशान थी । पुलिस पर एक और सरकार का दबाव बढ रहा था । दूसरी और प्रयास अपना अभियान चलाए हुए था और जरा भी मौका मिलने पर सरकार का गला पकड रहा था । ऐसी स्थिति में मैंने पुलिस कमिश्नर से समय मांगा और उन्हें बताया कि मैं एक प्राइवेट डिटेक्टिव हूँ और मुझे विश्वास है कि इन हत्याओं के पीछे के रहस्य का पता लगा सकता हूँ । काफी चर्चा का बाद कमिश्नर में आगया प्रदान कर दी कि मैं स्वतंत्र रूप से इन मामलों की छानबीन कर सकता हूँ । शर्त केवल लिया थी की स्वीकृति की जानकारी मेरे और कमिश्नर केबीसी रहेगी और इस प्रकार मैं तुम्हारे मैच में आया । झानबीन के लिए यह जरूरी था की मुझे काम करने के लिए ऐसा स्थान मिले जो वारदात के निकट हो । इसी उद्देश्य से मैंने तुम्हारे मैच का चयन किया । उस समय मुझे यह पता नहीं था कि विपरीत पार्टी का कर्मस्थल भी वही मैच है । शुरू से डॉक्टर स्वभाव से अत्यंत सज्जन पुरुष लगा । मुझे इस बात का भी भान हुआ कि होमियोपैथी जैसा पैसा गैरकानूनी कोकेन स्मगलिंग को रोकने के लिए एक बहुत ही कारगर उपाय है । किन्तु मैं तब तक इस निर्णय पर नहीं पहुंच पाया था कि इस धंधे का रिंगलीडर कौन हो सकता है । मुझे पहली बार डॉक्टर पर संदेह अश्विनी बाबू की मृत्यु से एक दिन पूर्व हुआ । चाहे तो मैं यहाँ तो उस दिन हमारे मैच के सामने एक गरीब बंगाली की लाश मिली थी । जब डॉक्टर में सुना जो व्यक्ति मारा था, उसकी धोती के फैंटे से एक हजार के नोट मिले हैं तो उसके ऊपर शरवर के लिए नोटों के हाथ से निकलने का लालच का बहुत चलता था । उसके बाद से मेरे सारे संदेह उस पर ही केंद्रित हो गए । फिर उस दिन की घटना जब अश्विनी बाबू छुपकर हमारी बातें सुन रहे थे । दरअसल वे हमारी बातें सुनने नहीं आए थे, बल्कि डॉक्टर से बात करने आए थे । जब उन्होंने देखा कि हम लोग बैठे हैं तो कुछ बहाना बनाकर ऊपर अपने कमरे में चले गए । अश्विनी बाबू के व्यवहार से मैं भी कुछ समझ नहीं पा रहा था और कुछ समय तक मैं भी इस उधेडबुन में रहा कि कहीं वे ही तो अपराधी नहीं है । जब मैंने उनकी अनुकूल बाबू से हुई बहुतों को फर्ज पर लेटकर सुना तब भी मेरे मस्तिष्क में कुछ स्पष्ट नहीं हो पा रहा था । लेकिन इतना मुझे आभास हो गया था कि अश्विनी बाबू ने कोई भयंकर घटना देखी है । लेकिन जब उस रात उनकी हत्या हुई तो मेरे मस्तिष्क में सब कुछ स्पष्ट हो गया । क्या बे तुम समझ नहीं पाए? डॉक्टर नितांत गोपनीय तरीके से गैरकानूनी नशीली दवाओं का धंधा करता था और आपने इस रिंगलीडर के काम को रहस्य की अभेद चादर से छिपाए रखता था । जो कोई भी उसके भेद को जान जाता था, उसे फौरन रास्ते से हटा दिया करता था । यही कारण था जिसकी वजह से उस पर अभी तक कोई आज नहीं आ पाई थी । जो व्यक्ति सडक पर मरा पाया गया था, वहाँ अनुकूल बाबू का ही दलाल था या फिर माल सप्लाई करने वाला सरगना था । यहाँ मेरी धारणा है । हो सकता है मैं गलत भी हूँ । उस रात जब व्यक्ति डॉक्टर के पास आया था तब दोनों में तकरार हो गई थी । हो सकता है उस आदमी ने अनुकूल बाबू को ब्लैकमेल करने की कोशिश की हो या उन्हें पुलिस में जाने की धमकी दी हो और जब वह जाने लगा हो तो अनुकूल बाबू ने उसका पीछा किया और मौका मिलते ही उसे समाप्त कर दिया । अश्विनी बाबू ने यहाँ घटना अपनी खिडकी से देखी थी और कुछ मतलब भ्रष्ट हो जाने की स्थिति में इस घटना की जानकारी डॉक्टर को देने गए थे । मैं कह नहीं सकता उनकी मंशा क्या थी । वे अनुकूल बाबू के एहसानों से दबे हुए थे और शायद इसलिए अनुकूल बाबू को इस घटना से सचेत करना चाहते थे । लेकिन उसका परिणाम ठीक इसके विपरीत हुआ । डॉक्टर की नजर में अश्विनी बाबू ने जिंदा रहने का अधिकार खो दिया था । उसी रात जब बाथरूम जाने के लिए उठे थे, उन की नृशंस हत्या कर दी गई । मैं कह नहीं सकता कि शुरू शुरू में डॉक्टर का मुझ पर कोई संदेह था, लेकिन जब मैंने पुलिस को यहाँ बताया कि वह खिडकी है, हत्या का कारण है, तब डॉक्टर समझ गया कि मैं भी कुछ करने जा रहा हूँ और इस प्रकार मैंने भी अपने जीवन समाप्त करने का अधिकार अर्जित कर लिया था । लेकिन मैं उसके लिए अभी तैयार नहीं था । इसलिए मेरे दिन पैनी नजर और सजग पहरेदारी में कटने लगे और तब पुलिस ने एक भूल कर दी । मुझे गिरफ्तार कर लिया । जो भी हो, कमिश्नर में स्वयं आकर मुझे छोडा दिया । मैं मैच में लौट आया और तभी अनुकूल बाबू को विश्वास हो गया है कि मैं इनवेस्टिगेटर हूँ । लेकिन उन्होंने अपने विचारों को छुपा लिया और विशाल रजय दिखाते हुए मुझे उस रात रहने की अनुमति दे दी । इस दरियादिली का एक ही उद्देश्य था कि उसी रात किसी भी समय मुझे मौत के घाट उतार दिया जाए । मैं जितना डॉक्टर के बारे में जानता था उतना शायद कोई नहीं जान पाया था । तब तक डॉक्टर के खिलाफ कोई सबूत नहीं था । उस समय उसके कमरे की यदि तलाशी हो जाती तो कुछ कोकेन की बोतलों के सिवाय कुछ नहीं मिलता जिसके बिना पर उसे जेल हो जाती है और अदालत में कानून की निगाह में यह साबित नहीं किया जा सकता था कि वहाँ एक जघन्य हत्यारा है । इसलिए मुझे उसे ट्रैक करना जरूरी था । दरवाजे के ताले में एक नाखून फसा, अगर मैं नहीं उसे जाम किया था । जब डॉक्टर ने सुना तो मन ही मन प्रसन्न हो गया कि हमारा दरवाजा रात में खुला ही रहेगा । और अंत में जब हमने उससे दवा मांगी तो उसे अपने भाग्य पर यकीन ही नहीं हुआ । उसने मोरदिया की डोज दी और समझ लिया कि हम उसे खाकर उसके आने तक बेहोश हो जाएंगे और वहां बडी आसानी से हमें हमेशा के लिए नींद के आगोश में सुला देगा और इस प्रकार हुआ खुद मेरे जाल में फंस गया और क्या मैंने कहा मुझे जाना चाहिए । तुम तो फिलहाल तो जोर जाना नहीं चाहो गए नहीं पर तुम क्या मैं जा रहे हो? हाँ क्यों? क्या मतलब है? क्या होगा रे भाई, क्या मुझे वापस नहीं आना है? मैं सोच रहा था कि तुम्हें भी अंत मैं तो छोड नहीं पडेगा । तो क्यों ना यहाँ आकर मेरे साथ ही रहो । यह भी तो अच्छी जगह है । कुछ लडकी शांति के बाद मैं हिस्सा से बोला क्या मेरा एहसान उतारना चाहते हो? ब्योमकेश ने अपनी बात है मेरे कंधों पर रख दी और कहने लगा आ रहे नहीं भाई, ऐसा कुछ नहीं है । मैं सोचने लगा हूँ कि तुम नहीं रहोगे तो तुम्हारी कमी महसूस होगी । मैं कुछ सप्ताह में तुम्हारे साथ रहने का आदी हो गया हूँ । क्या वाकई ऐसी बात है? इससे ज्यादा नहीं? ऐसी बात है तो यही रहूँ, मैं अपना सामान लेकर आता हूँ । मुस्कुराकर ब्योमकेश ने कहा मेरा सामान भी लाना ना भूलना ।

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ब्योमकेश बक्शी की रहस्यमयी कहानियाँ writer: सारदेंदु बंद्योपाध्याय Voiceover Artist : Harish Darshan Sharma Script Writer : Sardendu Bandopadhyay