Made with  in India

Buy PremiumDownload Kuku FM

9. Pratibha KI Chunauti

Share Kukufm
9. Pratibha KI Chunauti in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts
15 KListens
क्रन्तिकारी सुभाष Author:- शंकर सुल्तानपुरी Author : शंकर सुल्तानपुरी Voiceover Artist : Raj Shrivastava Producer : KUKU FM
Read More
Transcript
View transcript

प्रतिभा को चुनौती प्रभावती का हृदय शांत था । विफलता कि वह सीमा बाहर कक्ष में संतुलित थी । अंतररा कक्ष में आते ही टूट गई और उनका संता पांच सौ में बदल गया । भोजन कक्ष में दुर्गा की भव्य मूर्ति के समाज इसने माथा टेक दिया । हाँ तू ही बता इस झंड मेरा क्या करता था? महत्व को प्रमुखता दिए थे तो पत्नी पर आघात होता है । ऍम क्यूपेक शक्ति तो पति फिर घर में लांछित होता । मैंने अपनी क्षमता भर तो उन्होंने संतुलन बनाये रखने का प्रयास किया है । पति मेरे प्राण पर पुत्र मीरांशाह है । ग्रहण की अभी ला कर के अंश के प्रति निष्ठावान नहीं रहा जा सकता । यदि मच्छी भूल हुई हो तो इतना प्रदान करना माता की मैं उस सुधार मेरा सुभाष गया । प्रेम आदर्श करते हुए का पुतला है । इसके उद्देश्य से ही महान है । कोई भी अवरोध उसके उद्देश्य कुछ ही नहीं कर सकता । मेरी विनती है कि उसके उद्देश्य कुतुब बल प्रदान करें और उसे पत्र मुख ना होने दे । एक का एक कक्ष के द्वार तक आ गए । सुभाष ठगे से रह गए । माँ का देवी के समक्ष इस प्रकार का विनय मिला । उन्हें विस्मित कर उठा । माँ संताप की स्थिति में ही देवी की शरण में आती है ये नहीं किया था इसलिए उन्हें ये समझते देर न लगी कि आज भी कोई असाधारण घटना घटित हुई है जिसमें माँ को व्यतीत कर दिया है । क्या बात है? हाँ तुम स्वास्थ्य नहीं लगती कहते हुए सुभाष माँ के निकट चले आए और बडी बहन दृष्टि से उसके व्यथा व्यवहार मुखडे पर देखने लगे । नहीं नहीं कुछ भी नहीं । कुछ नहीं ऍम खाना । प्रभावती ने रूंधे हुए स्वर में कहा बेटे से अपनी मनोव्यथा छिपाने के लिए झट से शुरू करो को आंचल से समेट लिया और स्वाभाविक मुस्कान के निष्फल चेष्टा के साथ बोली देवी की आराधना में कोई निश्चित समय नहीं होता वरन् मनुष्य को जब भी अवकाश मिले, देवी देवताओं का स्मरण करना चाहिए । हाँ तुम अभिनय भी कर लेती हो । मृदल मुस्कान के साथ सुभाष ने माँ को दोनों बाहों में भर लिया और उनकी डबडबाई आंखों में छापते हुए वो बोले धैर्य और साहस की साक्षात मूर्ति जब स्वयं भी अपना संतुलन खो बैठे वर्षी ही किसी गंभीर प्रतिक्रिया का आभास होता है । मैं जानता हूँ हेमा तुम कभी भी अकारण नहीं हो सकती । तुम्हारी आंखों में कभी भी साधारण आघात से आंसू नहीं आ सकते है । ना विशेष बात हंगामा पुत्र की इस अंतर परिवेशी अभिव्यक्ति ने माँ के संतुलन के हे शांशी को भी तोड मरोड दिया था कि वो गागर जो अब तक छू रही थी अब पाँच से छलक पडी जैसे सुभाष ने उसमें एक भारी काम कर डाल दिया हो । प्रभावती ना चाहते हुए भी सुब क्या भरने लगी? अरे इस तरह बच्चों जैसा रोना बताओ ना! क्या कारण है माँ सुभाष की माँ इस तरह नहीं हो सकती । कैसी विचित्र बात है कि जो लाखों करोडों के आंसू पूछने का संकल्प रखता हूँ, स्वयम उसी की मारो । ये हर्ष और गौरव के आंसू है । बेटे मानित अच्छे ही आंसुओं को समेटकर कहा ये आज मेरे दुर्बलता नहीं, मेरी सहनशक्ति के परिचायक हैं । मैं हूँ बेटे के दुःख सुख में रोना मेरी प्राकृतिक व्यवस्था है साथ ही मैं पत्नी भी हूँ इसलिए पत ित्व के प्रति निष्ठावान रहना मेरा कर्तव्य है, कोई विशेष बात नहीं । आज मेरी समस्या का समाधान हो गया की समस्या का समाधान सुभाष ने छूटते ही पूछा था आज तेरे पता नहीं तेरी कर्मपथ का निर्णय कर लिया और मैं प्रसन्न हूँ कि वर्षों की चिंता समाप्त हुई । मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ । स्पष्ट का होना मा स्पष्ट है । उन्होंने दिल्ली एम । ए । की पढाई स्थगित कराकर तुझे आईसीएस की प्रतियोगिता में बैठने के लिए विलायत भेजने का निर्णय लिया है । इस निर्णय सेमरताल की प्रताप ही पूर्ण था, सहमत हैं । शीघ्र ही तेरे विदेश जाने की व्यवस्था की जा रही है । ये घोषणा शुभाष के लिए बिच्छू के डंक मारने के समान थी, जिसमें उनके तलवे से आरंभ होकर रोम रोम में जलन पैदा कर दिया । गंभीरता और संतुलन का वो पुतला उद्वेग से अस्थिर दिखने लगा । पिताजी चाहते हैं कि मैं ब्रिटिश सरकार के अधीन उच्च पदाधिकारी बनकर अपने वास्तविक उद्देश्य से विमुख हो जाऊँ । मैं जानता हूँ नौकरशाही के दबाव ने पिताजी को इस असंगत निश्चय के लिए विवश किया है । मेरा जन्म एक विशेष देश को पूरा करने के लिए हुआ है, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जी हुजूरी करने में आडे आएगा । पिताजी ने मेरे प्रति ऐसा प्रतिकूल निर्णय क्यों कर लिया? ठीक है तो क्या कहता है? बेटे, पिता और प्रतिकूल निर्णय युवा उत्तेजना में उनके साथ विचारों को लांछित कर रहा है । अपने बेटे से में ऐसी असर नहीं करती? नहीं नहीं, मैं उनकी पितृत्व को तो लांछित नहीं करता हूँ । मेरे प्रति उनके जो कर्तव्य अच्छा, उनके प्रति मेरी जो कर्तव्य है मैं उनकी अवहेलना करने की कल्पना भी नहीं करता । किंतु एक नवयुवक को अपनी आकांक्षा और उद्देश्यों पर विचार करने का स्वतंत्र अधिकार भी तो होना चाहिए । आईसीएस बनना मेरी जीवन का उद्देश्य नहीं है और इस दृष्टि से पिताजी को अपना ये निर्णय बदल देना चाहिए । मैं भी उनसे बात करता हूँ । सुभाष अपना संपूर्ण विरोध एक ही साथ में समाप्त कर द्रुतगति से पिता के कक्ष की ओर चले गए । पिता पुत्र के बीच की मर्यादा ना तोड बैठना । बेटे माँ का विनीत कैंट स्वर्ण के कान में पडा । सुभाष जिस समय पिता के कक्ष में पहुंचे, रायबहादुर जानकीनाथ मेज पर झुके कोई पत्र लिखने में तल्लीन थे । सुभाष के पदचापों ने उनका ध्यान आकर्षित किया । उन्होंने कलम मेज पर रख दी और गंभीरता से बोल तुम बडे मौके से आ गए । आप बैठो, कुछ आवश्यक बात करनी है तुम से । सुभाष ने श्रद्धा से अभिवादन किया और तथा के सामने पडी कुर्सी के सहारे खडे हो गए । क्षण भर को उन्होंने बडी सूक्ष्म दृष्टि से पिता की मुखमुद्रा का अध्ययन किया और फिर अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ गए । एमएस करना कोई विशेष मैच में नहीं रखता । समय नष्ट करने से कोई लाभ नहीं मैं चाहूंगा कि आइसीएस कंपटीशन में बैठने के लिए तुम लंदन चले जाओ । मैंने लगभग सारी व्यवस्था कर दी है । संक्षेप में रायबहादुर ने सुभाष को अपना निर्णय सुना दिया और प्रतिक्रिया देखने के लिए उनके चेहरे पर अपनी आंखें टिका दी । सुभाष दो झंड मूर्ति व्रत रहे । फिर हल्की निश्वास के साथ बोले, पिताजी, यदि विलायत जाकर आईसीएस बनना ही एकमात्र उद्देश्य हो तो आप क्या गया? शिरोधार्य हैं तो ये मेरे संकल्प के वृद्ध एक कुछ समझौता होगा । आईसीएस बनकर में स्वतंत्रता के साथ अपनी आत्म और अपने देश के प्रति न्याय ना कर सकूंगा । किसी भी संपन्न पिता का प्रतिभावान बेटा इसलिस बन सकता है । ये उसके लिए कोई असाधारण बात नहीं होंगे । यदि संपन्नता और प्रतिभा का सदुपयोग जन सेवा के लिए किया जाए तो गौरव का विषय होगा तुम्हारा मतलब रायबहादुर का स्वर्ग कठोर था । वास्तव में मैंने आईसीस बनने की आकांक्षा कभी नहीं और न कभी करता हूँ । मैं चाहता हूँ कि मुझमें जितनी भी शक्ति और क्षमता है, उसका उपयोग देश सेवा करे । तुम्हारी इस भावना को मैं कोरी, किताबी, आदर्शवादिता और युवा समय भी समझता हूँ । रायबहादुर गंभीर और भारी स्वर में कहने रहेंगे, तुमने देश सेवा, जन सेवा, दया, त्याग वगैरा वगैरह तमाम तमाम सारे भावनात्मक शब्द याद कर लिए हैं और हर समय उन्हें कल्पना में बहते रहते हो देश सेवा से आ जाती है । इस तरह की फिजूल बातें बेकार नौजवानों के विकृत मस्तिष्क की बहुत है, जिनके पास अपने जीवन में कोई नियम, कानून और स्तर नहीं है । मैं ऐसे एक टूर समझता हूँ । एक ऐसा फितूर जो नौजवान दिमाग में बडी तेजी के साथ पैदा होता है और यथार्थ की एक ही ठोकर से चकनाचूर हो जाता है । हम जानते हो मैंने बहुत कानून पडा है । आए दिन मेरी आंखों के सामने तमाम ऐसी बातें गुजरती है । इसलिए तो मैं समझ लेना चाहिए कि तुम्हारा सही रास्ता क्या है? सुबह पिता के इसका टू व्यक्तव्य ने सुभाष को झकझोर कर रख दिया । फिर भी मैं संयत स्वर में बोले नौजवान को मस्तिष्क की विकृति और बहकने संसार को कभी कभी महान उपलब्धियां दी है । यदि इतिहास की कथाएं सकते है तो ईसा गौतम अशोक ये सभी नौजवानी में बैठते थे और बात कोई युगप्रवर्तक कह गए । आपके कई बेटे हैं, आईसीएस कोई भी बन जाएगा, किन्तु मुझे मेरी आकांक्षा उद्देश्य के लिए स्वतंत्र छोड दीजिए । साफ क्यों नहीं कहते कि तुमने आईसीएस बनने की क्षमता ही नहीं है । रायबहादुर ने सुभाष के स्वाभिमान पर तीव्र प्रहार किया और अपनी क्षमता कुछ पाने के लिए तुमने सेवा और त्याग का मुलम्मा चढा रखा है । ठीक है आइसीएस का कंपटीशन । लोहे के चने चबाने के समान मैं विश्वास नहीं करता कि तुम सफल ही हो जाओगे, लेकिन असफलता के भाई से तुम्हें कतराना नहीं चाहिए । सुभाष का स्वाभिमान कल मिला था । उनके लिए सर्वाधिक कष्टदायक स्थिति वो होती थी, जब कोई उनके आत्म सम्मान को आघात पहुंचाया और वे प्रतिवाद न कर सकें । क्षमता क्षमता का निर्णय परीक्षक के निष्कर्ष का विषय है । पिता जी यदि आप मुझे आईसीएस बनाने के लिए कटिबद्ध ही है तो मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मैं आपके अभिलाषा को निष्फल नहीं होने दूंगा । सुभाष में विवाद को बढने नहीं दिया । उनका विरोधाभास पिता के संताप का कारण नहीं बन सका । आंतरिक रूप से किसी अन्य निर्णय पर पहुंचकर उन्होंने बनाया जाने की स्वीकृति दे दी । ठीक है, एक हफ्ते के भीतर ही तुम्हारे जाने की व्यवस्था हो जाएगी । समय कम है, तुम है, परीक्षा भी काफी करना है । मेरे ख्याल से तुम्हें कॉलेज छोडकर कंपटीशन की तैयारी में जुट जाना चाहिए । अपनी बात समाप्त कर रायबहादुर पनाह अपने कार्य में तल्लीन हो गए । सुभाष गहरे मानसिक द्वंद्व के साथ अपने कक्ष में लौटे । ये कैसी स्थिति थी, जिसमें उन्हें अपने साथ समझौता करने के लिए नैतिक रूप से विवश कर दिया । इस समय दो ज्वलंत प्रश्न उनके सामने थे । एक और पिता की चुनौती स्वीकार कर आईसीएस में सफलता प्राप्त करना । दूसरी ओर आत्मनिष्ठ के विरुद्ध अपने देश से विचलित ना होगा । वो दोनों स्थितियों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे । यद्यपि दोनों की धारा पृथक थी और उन में से किसी एक को स्वीकार कर लेना दूसरे के प्रति व्यवस्था का सोचा था । गहरी चिंता धारा में हाथ से हाथ बांध ही विपक्ष में एक ओर से दूसरी और टहल रहे थे । उनके हृदय तथा मस्तिष्क में भीषण द्वंद चल रहा था और इस घटना के एक सप्ताह पर शायद आईसीएस की प्रतियोगिता में सम्मिलित होने के लिए सुभाष ने वायुयान द्वारा लंदन के लिए प्रस्थान किया । उनका हृदय और मस्तिष्क भारत और भारत के शोषितों के पास था । उनकी भावनाएं उनके चरम उद्देश्य के साथ थी । केवल उनका शरीर व बौद्धिक पक्ष तथा प्रतिभा लंदन जा रही थी, जिससे पिता की चुनौती ने उद्वेलित कर दिया था ।

Details
क्रन्तिकारी सुभाष Author:- शंकर सुल्तानपुरी Author : शंकर सुल्तानपुरी Voiceover Artist : Raj Shrivastava Producer : KUKU FM
share-icon

00:00
00:00