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मैं निर्दोष हूं in  |  Audio book and podcasts

मैं निर्दोष हूं

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इंसान के हाथों होने वाले अपराध की सच्‍ची कहानियों को बयां करता यह उपन्‍यास रहस्‍य और रोमांच से भरा है।
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ये एक असाधारण मुकदमा है । मिलावट सरकारी वकील कह रहा था जो लोग इस मामले में फंसे है और जिस से नहीं हंसता से अपराध किया गया है । इस सब को देखते हुए इसे एक आम हो कमा नहीं कहा जा सकता है । मृतक मनमोहन जरा एक बडा जमीदार था । दिन्दू अभियुक्तों को अदालत के सामने पेश किया गया है । उनमें से एक उसकी पत्नी है । इस पर जिस हत्या का आरोप लगाया गया है वह सोलह जुलाई उन्नीस सौ इक्यावन को मुश्किल पुरा में रात डाली हुई थी । गर्मियों में कुंवर विक्रमसिंह वही रहा करते थे । दूसरा अभियोगी उसे ही मुख्य दोषी कहना चाहिए क्योंकि हत्या उसी के आप हो गई थी । रंजीत सिंह है । वो मृतक का चचेरा भाई है तो आरोप पक्ष यह प्रमाणित करना चाहता है कि उसने न केवल अपने भाई की पत्नी का अपहरण किया बल्कि उसके साथ मिलकर उसकी पति को मार देने का षड्यंत्र भी रचा हूँ । आरोप पक्ष का मुकदमा संक्षेप में इस प्रकार है कुमार विक्रम सिंह बहुत क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति था । अमित शाह शराब और और तो के फेरे में रहने वाला । इसलिए पति पत्नी के बीच खाई धीरे धीरे बढती गई । उसने बदनी पर अत्याचार करना शुरू कर दिया । पिछले कुछ वर्षों से उन दोनों के संबंध बहुत बिगड गए थे । जब पति पत्नी का ऍसे चरम सीमा पर था तब रंजीत सिंह ने उनके घर में आना जाना शुरू कर दिया और धीरे धीरे इसके साथ कलावति मृतक की पीडित पत्नी की बहुत घनिष्ठता हो गई । आरोप पक्ष को पता चला है कि इस दुर्घटना से कोई दस दिन पहले मामला एकदम बिगड गया था । मुझे पुरा में कुंवर विक्रम सिंह ने सबके सामने अपनी पत्नी को थप्पड मार दिया । कहते हैं बात बिल्कुल मामूली थी । उस समय रंजीत सिंह भी वही था । कलावति इस अमानवीय व्यवहार को अब अधिक नाक से सके और उसमें रंजीत सिंह से मिलकर इससे दुखदायी व्यक्ति को अपने रास्ते से हटाने की योजना बनाई । युवान अगर हमारा ख्याल है कि इसका एक कारण और भी था उसे मारने से न केवल कलावति को पीडा से मुक्ति मिलती बल्कि वो दोनों कलावति और रंजीत सिंह प्रेम के रास्ते पर भी रुक तो चलने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं । जब सरकारी वकील ने पुराने हिमाचल प्रदेश के महसूस नगर के स्टेशन जज के सामने ये मुकदमा बेहोश किया तो जिम्मेदार हूँ अन्य धनि व्यक्तियों से खचाखच भरे कोर्ट रूप में सन्नाटा छा गया । अपराध का उद्देश्य और षड्यंत्र रचना में ये मुकदमा रानी झांसी के से बहुत कुछ जानता चुका है । घटना या उन कामना, क्रूरता, व्यभिचार यानी वो सब बातें, जिनसे कोई भी हत्या, सनसनीखेज और रहस्य नहीं बन सकती हैं, इस अपराध के पीछे थी । इस क्रूर हत्या की पूरी जानकारी के लिए काफी पुरानी बातें दोहरानी होगी, क्योंकि इस हत्या का बीजारोपण तो लगभग दस साल पहले हो चुका था । सोलन पुलिस थाने के अंतर्गत कुठार के राणा का भतीजा कुंवर विक्रम से काफी धनी जमीन था । उसका रोग तभी था, उसमें वो सभी बातें थी, जो एक सामंतवादी जमीदार नहीं होनी चाहिए । उदंडता, अहंकार और न जाने क्या क्या । वो फिर घर से बाहर रहा करता था । जिंदगी को अपने ही ढंग से जीने की आदत थी उसे अपने मन मुताबिक चलने लैग, पैसा और अहंकार दोनों ही चीजें । काफी मात्रा में उसके पास विवाह उसके लिए कोई पवित्र बंधन नहीं था । बंधन के नाम से ही उसे घृणा थी । नाडी उसके लिए केवल एक क्रय विक्रय की चीज थी । जब वो शिला पीता तो उसके रन धन अपने पूर्वजों जैसे हो जाते हैं । उसके पूर्वज उसी वर्ग के प्रतिनिधि थे, जिसने अपने ऐशोआराम के सामान जुटाने के लिए बुरी तरह से किसानों का शोषण किया था । गुंडागर्दी करना और औरते रखना यही विक्रम सिंह का काम था । होने से इकत्तीस में अपने कुल की परंपरा के अनुसार उसने कुमारी कलावति से विवाह किया । वो उस समय सत्रह साल की रही होगी । वो नालगढ के सुरगी राजा की एक हवा से पैदा भी लडकी नहीं है । छरहरे बदन की और बहुत खूब सारा गेहूं रंग और मान फुसलाने वाला लक्ष्य । लेकिन उसका पति अधिक दिन इससे मादक सौन्दर्य के बंधन में नहीं रह सका । विक्रम सिंह जल्द ही उससे गया । ये उसके लिए केवल बच्चा पैदा करने की मशीन भर बंद कर रहे हैं । आनंद बनाने, गुलछर्रे उडाने के लिए उसने कोई और जगह तलाश कर रहे हैं । उससे कलावति के चार बच्चे भी हुए लेकिन उसका प्रेम होना पा सकें । उसका एक बच्चा इससे दुर्घटना से पहले मर गया था । गहन ही उदासीनता अत्याचारपूर्ण व्यवहार से उनमें वेडनस की भावना इतनी बढ गई कि लगा शायद उन में कभी प्रेम हुआ ही नहीं था । जुलाई उन्नीस सौ सैंतालीस में एक दुखद घटना से ये दूरी और बढ रहे हैं । भावी दुर्घटना के आधार बनने लगे कलावति ने पुलिस थाने में अपने पति के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी कि उसने बच्चों को मारने की तब की थी । पुलिस ने जांच की और परिणाम स्वरूप विक्रम सिंह के हथियार जब्त कर लिए गए । उसका हथियारों का लाइसेंस रद्द कर दिया गया । कलावति ने इस बात की भी अर्जी दी की जमींदारी की देखभाल कोर्ट ऑफ वर्ड्स अपने हाथों में ले लें । मृतक ने अपने भाई बलबीर सिंह के लिखे पत्र में इससे घटना की पुष्टि की थी । मांॅ मेरे भाई आशा है तो सब ठीक होगे । मैं पांच छह दिन पहले यहाँ पहुंचा हूँ । तुम्हारी भाभी नालगढ चली गई । जरा सी बात पर झगडा हो गया । उसने यहाँ तक कह डाला कि मैं पिस्तौर से बच्चों को मारना चाहता था । अब तो भी सोचो कौन बेवकूफ अपने बच्चों को मारना चाहेगा । अगर मैं ऐसी बात कहता भी तो शायद तुम्हारी भाभी को भले ही कह देता । पर सोना पुलिस थाने में रिपोर्ट भी दर्ज करा दी गई है । हम दोनों के बयान कलमबद्ध कर लिए गए हैं और फिर रानी साहब आप से नालगढ ले गई । मैं के बाद सोनल जाऊंगा । तुम्हारी बाहर ही नालगढ में ही रह रही है । नाहरगढ जाते समय उस एक विद्यालय पर दूसरा ताला ठोक दिया । सबका उसी हमीरसिंह का है । इन बातों से कट टूटा घटने की बजाय और बढेगी मैंने ताला तोड दिया है । खैर तुम्हें भी सारी बातें पता चल जाएगी । सारा मामला सामने आ जाएगा । अब मैं उसे अच्छी तरह सबका पडा होगा । उसने तो सारे मामले को मजाक समझ रखा है । विक्रम सिंह पत्र में लिखा हुआ था इस गंभीर घटना के बाद दोनों ने कभी भी एक दूसरे के निकट आने की कोशिश नहीं । ऐसे बिगडी हुई स्थिति को और बिगाड के लिए रंजीत सिंह भी घृणा और ऍप्स से टूटे उससे परिवार में मौजूद होगा । लगभग परित्यक्तता कलावति में रंजीत सिंह ने प्रतिदान का संकेत पाया और वह निर्मोही होकर आगे बढ गया । देखने पालने में अच्छा था । कलावति से चार साल छोटा था । कलावति जिन परिस्थितियों के शिकार थी उनमें रंजीत सिंह उसे बहुत आया । उसमें वो सभी बातें मौजूद थे जिनकी कल्पना कभी उसने अपने पति में की थी । रंजीत किया है वर्ष शुक्रनीति दबी दबी इच्छा है फिर से सिर उठाने लगेंगे । शुरू शुरू में रंजीत उसका ऐसा अकेला मित्र था जैसे वह थोडी बहुत सहानुभूति की आशा कर सकती थी । पर धीरे धीरे रंजीत सिंह का आना जाना बढा और विक्रम सिंह की अनुपस्थि थी । वो अक्सर आनंद बनाने के लिए बाहर ही करता था । ऐसे में कलावति की दृष्टि की मांग सहानुभूति के बजाय प्यार बढता है । उसके पति ने तो हमेशा उसे ये अधिकार देने से मना किया था । वो जानती थी कि ऐसा करके वो बाप कर रही है लेकिन उसे ये भी पता था कि यही आप प्यार भी हैं । उनके इस अनैतिक संपर्क के संबंध में आरोप पक्ष ने प्रत्यक्षदर्शी गवा प्रस्तुत नहीं किया क्योंकि व्यभिचार का प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त करना अगर असंभव नहीं तो कठिन अवश्य होता है । लेकिन उनके सभी संबंधियों ने इस बारे में अपना अपना शक अवश्य बताया । विक्रम सिंह का भाई बलवीरसिंह उसके मृत्यु पिता के रखे है । द्रोपदी कलावधि की बहन और बलबीर की पत्नी मान प्यारी और अन्य व्यक्तियों ने जो आरोप पक्ष की ओर से गवाही देने आए थे, अपना संदेह बताया कि उन दोनों का व्यवहार देखने से ऐसा लगता था कि उनमें ऐसा संबंध अवश्य है । इतना ही नहीं उनमें से बहुतों ने इस संबंध में विक्रम सिंह को चेतावनी तक दे डाली थी । अपनी स्वीकरोक्ति में दोनों अभियुक्तों ने पारस्परिक अनैतिक संबंध की बात मान ली थी । पति पत्नी का आपसी झगडा या बिगडे हुए संबंध समझौता एक हत्या का उद्देश्य नहीं बन सकते हैं । लेकिन जब किसी तीसरे व्यक्ति का बीच में प्रेम आ जाए तो हत्या का उद्देश्य काफी सब हो जाता है और इससे मामले में भी तीसरे व्यक्ति का प्रेम बीच में आया था । अगर कोई पत्नी इस आधार पर अपने पति के विरुद्ध पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराए । केस ने बच्चों को मारने की धमकी दी है । जब की वो दोनों एक सम्मानित परिवार से हैं और उसके परिणामस्वरूप पति के हथियार जब्त कर लिए जाए तो यही समझा जा सकता है कि उनका दांपत्य जीवन बहुत कलापूर्ण है । कलावती ने बताया कि विक्रम सिंह ने उसे मारने की धमकी दी थी । अपनी स्वीकरोक्ति में उसने निरंतर अत्याचार के आरोप भी लगाए हैं । विक्रम सिंह द्वारा अपनी पत्नी को सबके सामने थप्पड मारने की घटना उस अमानवीय व्यवहार की एक के चरम सीमा थी । अब पंद्रह जुलाई होने सुबह क्या उन की बात की जाए । विक्रम सिंह के बच्चे सबसे छोटे के अलावा और कुमार बलबीरसिंह बनमा जरा गए थे । बलबीर की पत्नी मान प्यारे कुठार के राणा के यहाँ नहीं हुई थी । विक्रम अपने मकान की खुली छत पर चारपाई पर सो रहा था । उसके पडोसी कलावति कि चल भाई पीछे थी कि नौकरानियां बीस तीस वर्ष जहाँ मोहंती बारा वर्ष और शीला दस वर्ष भी वही सोच रही थी । नौकर मुख्यद्वार के बाहर हो रहे हैं । दरवाजा बाहर से बंद था । शाम के उमस के बाद अब ठंडी हवा बह रही थी । दो बज चुके थे । सब तरफ सन्नाटा था । कुत्तों का भूख ना भी धर्म चुका था लेकिन कलावति की आंखों में नहीं नहीं । अचानक किसी की आवाज से डिब्बे की नींद खुल गए । उसने देखा की एक काली छाया तेजी से उसे चारपाई के पास से तो सिर्फ छाया के दायें हाथ में कोई चमकदार चीज थी । वो छाया भागती हुई छत के किनारे पहुंचकर अदृश्य हो गयी । भंजाने भय से होकर भी बैठी रहेगी जी भी न सकें । काफी कोशिश करके वह चारपाई से उठी बहुत अलग के कदमों से छत के किनारे तक आएँ और नीचे सोते हुए नौकरों को जोर से आवाज लगाई गिरना बडे इस भय से उसने फॅमिली तभी उसने देखा की एक सीढी दीवार के सहारे टिकी नहीं वो पहचान जब ऊपर की मंजिल में रसोई घर बनाया था तो उसी सीढी का इस्तेमाल किया गया था । अब वो बुरी तरह काम रहे थे इसलिए नहीं कि अकस्मात एक काली छाया देखकर वो डर गई थी बल्कि इसलिए कि उसने उस व्यक्ति को पहचान लिया था । वो बडी और विक्रम सिंह की चारपाई की ओर देखने लगे । उसका मालिक के बाल छत पर पडा था । उसकी घबराई दृष्टि कलावति की चारपाई पर भी पडी । वो खाली थी । अब उस की हिम्मत नहीं बिल्कुल जवाब दे दिया । वो बडी और दौड कर बात के कमरे में घुस गए तो कभी किसी ने उसे पकड लिया । वो उसकी मालकिन थी गलावटी जो जोर से सांस लेते थे । सिब्बी ने बताया कि मालिक फर्श पर बडे हैं । शायद मर चुके हैं । उसमें उस काली चाय के बारे में भी बता दिया कि वह रंजीत सिंह था । इस नाम पर कलावति एकदम कपडा गई और फिर शिव जी का हाथ पकडकर उसे जोर से जब छोड दिया बिल्कुल बनाऊँ । उसने उसे सख्ती से डाल दिया । तुमसे जरूर गलती हुई थी । बेवकूफ वो रंजीत सिंह नहीं हो सकता हूँ कि उन्हें डाकुओं में से होगा जो उसे कलावति को वो जबरदस्ती नीचे ले आए थे और उसके जेवर छीन कर चलते बने थे हैं । उसने सिर्फ को समझा बुझा दिया भी उसे घूमती रही । आखिर वो कर भी क्या सकती थी । वो सिर्फ एक मामूली नौकरानी थी । वो समझ के एक से ये बात अपने तक ही रखनी थी । उसने किसी से कुछ नहीं कहा । जल्दी ही सब लोग जाकर तेज आवाजों और दौडते हुए कदमों की आहट से रात की नि स्तब्धता बंद हो गए । जब नौकर और आस पास के दूसरे लोग छत पर पहुंचे तो शिव जी ने बताया कि उसने एक आदमी को भागते हुए देखा था । उसने उसका नाम नहीं बताया । कलावति ने शिव जी की सुनाई कहानी दोहरा दी । सब ने उससे कहा कि वह जरा जाकर देखे तो सही की उसके पति को क्या हुआ लेकिन वो दस से मसला हुई । सब लोग विक्रम सिंह के पास है । लेकिन अब उसे किसी की सहायता की जरूरत नहीं । वो बढ चुका था । शोरगुल सुनकर कुठार का दुकानदार लायक राम वहां पहुंचा था । उसने दो आदमियों को बिशनपुरा की पुलिस चौकी में खबर करने के लिए भेज दिया । वहाँ हेडकांस्टेबल नरसिंहदास ने आम डायरी में नोट कर दिया । रिपोर्ट में लिखा था कि रात चार बजकर दस मिनट पर सहाय दूर चमान ने खबर दी कि बिशनपुरा में डकैती हो गई । कुंवर विक्रम सिंह की हत्या हो गई है । पुलिस को जल्दी ही घटनास्थल पर पहुंचना चाहिए । हेड कांस्टेबल ने घटनास्थल पर पहुंचकर कलावति से पूरी घटना मालूम कर लूँ । उसने उससे दुर्घटना का विवरण देते हुए शुरू में सूचना देने वाली कलावती के बारे में लिखा था कि उसके परिवार के सदस्यों के बारे में सूचनाएं थी और फिर घटना का विस्तृत विवरण था । विस्तृत विवरण में लिखा था कि रात को करीब नौ बजे कुंवर विक्रमसिंह कुठार के राणा के पास से लौटा । वो कलावति और नौकरानियां छत पर सोने चलेंगे । पास में ही नहीं कीर्तन हो रहा था । इस वजह से कलावति को दो बजे तक नींद नहीं आई । बाद में उसे एक सिखने लगाया और शादियां देने के लिए मजबूर किया । उसके बाद वो सिख और एक बाहर डी से निचली मंजिल पर लिया हैं । जब लोगों से नीचे ले जा रहे थे तो उसने देखा कि कोई एक व्यक्ति उसके पति की चारपाई को दोनों हाथों से था में हुए था । वो ये नहीं बता सके कि वह व्यक्ति उसका पति था या कोई और । निचली मंजिल में उसने पांच छह डाकुओं को देखा । वे उसे एक कमरे में ले गए और संदूकों से देवर और कपडे निकाल नहीं । तभी उसने छत पर झगडने की आवाज नहीं । उसके बाद सब डाकुओं इधर उधर बिगड रहे हैं । लगभग पंद्रह मिनट बाद जब लोग आए तो वो ऊपर हैं । वहाँ उसका पति चरपाई के पास से मरा पडा था । रिपोर्ट में उसने हीरे जवाहरातों के बत्तीस चीजों के नाम के रहते हैं जिन्हें उसके अनुसार डाॅॅ रिपोर्ट में उससे सिख का हुलिया भी बताया गया था लेकिन वह रंजीत सिंह से बिल्कुल अलग था । मनमोहन जरा का जिम्मेदार कौन से लगभग पडा था । खून, गर्दन, सिर और मोहन लगे गहरे गांव से निकला था पर पडे खून से जिसमें कुछ बाल भी थे ये पता चलता था की हत्या सोते हुए की गई थी । इससे दुखद दृश्य से मजबूत हेड कॉन्स्टेबल तक का दिल मिल गया । इतना खून फैला था की बस आदमी के शरीर में इतना खून हो सकता है इसकी कल्पना लोग जरा मुश्किल से ही कर पा रहे थे । कुठार के राणा के महल से टेलीफोन द्वारा सोनल पुलिस खाने में खबर दी गई । एक बजे सब इंस्पेक्टर पृथ्वी राम और डॉक्टर ज्योति प्रसाद घटनास्थल पर पहुंचे । इससे पहले हेड कांस्टेबल को उस मकान से लगभग तीन फर्लांग की दूरी बनाने के किनारे एक तलवार की बयान पडी मिली । सब इंस्पेक्टर के आने के बाद पुलिस के डिप्टी सुपरिटेंडेंट ठाकुर जगह सिंह की देख रेख में जांच पडताल का काम तेजी से शुरू हुआ हो । तारीख को एक नाले के पास पत्थर के नीचे से सनी कमी और जाकिया मिला । एक खेत से पगडी भी मिल गई । उन कपडों के खिलाफ धूम इन्हें रंजीत सिंह का बताया गया । इधर इन चीजों के खिलाफ हुई । उधर मृतक के संबंधियों ने भी रंजीत सिंह के बारे में अपना संदेह बताया । पुलिस को उस पर शक हो गया । बाइस तारीख को बंसल डेरा में रंजीत सिंह के मकान की तलाशी ली गई और पुलिस ने कुछ खत्म अपने कब्जे में ले लिए हैं । कुठार में उसे गिरफ्तार कर लिया गया । गिरफ्तारी के फौरन बाद पुलिस की लगातार के सामने वो टूट गया । वो डाॅट को विक्रम सिंह के मकान से कोई दस कदम की दूरी पर उठी झाडी के पास ले गया और वहां से एक तलवार निकालकर पुलिस को भी दे दें । उस पर लगा खून सूख गया था । छब्बीस तारीख को पुलिस ने विक्रम सिंह के घर की तलाशी में कुछ कपडे और रंजीत सिंह का फोटो बरामद किया । वो लोग कलावति को सोना ले आए । अगले दिन से अपने पति की हत्या के आरोप में गिरफ्तार करके सोनल के प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट की अदालत में रिमांड के लिए पेश कर दिया गया । वहाँ वहाँ हैरान परेशान हो बनाया । न्याय के सामने खडे थे । अपराध का बहुत से परेशान कर रहा था । उसके चेहरे पर दुख की घनी छाया थे । फिर अचानक पलभर में जैसे उसका आवरण हट गया । मैं अपराध स्वीकार करना चाहती हूँ । वो ऍम मजिस्ट्रेट ने उसे थाने वापस से भेज दिया । कहाँ की वो अपने को स्थिर करने का प्रयत्न करें ताकि अगले दिन सुबह उसकी की रोटी ऍम अट्ठाईस तारीख की सुबह उसकी क्योंकि रोकते लिख लिख नहीं । उसने बताया की रंजीत सिंह ने पहले उसके पति के साथ घनिष्ठता बढाई और फिर उसके साथ भी खुलने मिलने लगा । उसने ये भी बताया कि रंजीत सिंह और फिर उनसे पति की खोज से बचाया करता था । उसने बिना किसी हिचकिचाहट के ये भी बता दिया कि किस तरह हरिद्वार में उनका अनैतिक रुपया शुरू हुआ था । विक्रम सिंह उस पर जिस तरह अत्याचार करता था उससे रंजीतसिंह अक्सर विक्रम को मारने की बात सोचा था । उसने ये भी स्वीकार किया कि उसके पति को उन दोनों के संबंधों पर संदेह होने लगा था । उसने कहा कि बाईस जून और आठ जुलाई में सौ इक्यावन के बीच रणबीर सिंह बिशनपुरा में उनके साथ रह रहा था । इन्हीं दिनों में से एक दिन छह जुलाई को विक्रम सिंह ने सबके सामने कलावधि को तप्पड मारा था । वो इस असहाय पीडा को अधिक करना रह सके और उस घटना के फौरन बाद उन दोनों ने मिलकर विक्रम को मारने की योजना बनाई । बडी सावधानी से योजना तैयार हुई कि या तो जीत सिंग खुद हत्या करेगा अथवा किराये के आदमियों से वो ये काम करा देखा । इस बात की योजना बहुत सावधानी से बनाई थी कि सोते हुए विक्रम सिंह की हत्या किस तरह की जाए । ये निश्चित हुआ की हत्या के बाद रंजीत सिंह को ज्यादा से ज्यादा दूर जाने का समय देकर कलावति ही डकैती देखा । शोर मचाएंगे उसे ऐसी कहानी गढनी थी जिससे यह लगे की ये अध्यक्ष चोरी की करन की गई । डकैती प्रमाणित करने के लिए इतने जवाहरात के बत्तीस जीवन रंजीत सिंह को देती है और शोर मचा दिया की वो छोटी चले गए । योजना पर अच्छी तरह सोच विचार करके वो बच्चों से चीजे लेकर रंजीत सिंह आठ जुलाई को बिशनपुरा से रवाना हुआ । सिख रूप में इसके बाद हत्या की रात की घटनाओं का विवरण था । उसका पति नौ बजकर तीस मिनट पर कुठार से लौटा । वे सब छत्तरगढ लेकिन पास में कीर्तन होने की वजह से दो बजे तक सो नहीं सके । बाद में वो अवश्य हो गई होगी क्योंकि उसे याद आता है कि लगभग एक से दो घंटे बाद उसने पाया कि कोई उसका माथा छूकर उसे जगह रहा है । नौकरानी चोर चोर चिल्ला रही थी । उठकर उसने अपने पति की ओर देखा । वह फर्श पर पडा अंतिम सांसे ले रहा था । उसके बाद वो कमरे में चली गई और जब लायक राम हुआ अन्य लोग वहाँ पहुंचे तो उसने डकैती की कढी गढा एक कहानी सुनाती थी । उसने झूठ बोला था कि वो नहीं जाती थी कि उसके पति का हत्यारा था । जब उसे कपडे दिखाए गए तो उसने कहा कि इनमें से एक रंजीत सिंह का अपनी सिर्फ के अंत में । कलावति ने कहा कि मैंने जो कुछ किया है उसके दंड से मैं बिल्कुल भी आतंकित नहीं हूँ । मेरी आत्मा पर बाप का बहुत भारी बोझ लगता है । उसी को दूर करने के लिए मैं अपना अपराध स्वीकार करती हूँ । मैं अपने पति से घृणा करती थी । मैं उससे इसलिए घृणा कर दी थी कि वह पाशविक ढंग से शारीरिक संबंध स्थापित करता था । उसकी स्वीकरोक्ति की हर बात का समर्थन स्वतंत्र गवाही द्वारा हो गया । मृतक ने अपनी डायरी में लिख रखा था की रंजीत सिंह बाईस जून को आया था और आठ जुलाई को गया जुलाई को पुलिस ने रंजीत सिंह के घर से कलावति के बत्तीस जी ओवरो में से अट्ठाईस से बरामद कर ली है । स्वीट ग्रुप में कहीं के कई बातों के प्रमाण मिल जाने के बाद ये स्पष्ट हो गया कि वो सत्य है और अपनी इच्छा से दी गई है । तीन अगस्त को रंजीत सिंह ने भी मजिस्ट्रेट के सामने अपना अपराध स्वीकार करे । कुछ छोटी मोटी घटनाओं के अलावा तीन मुख्य बातों के बारे में दोनों के बयान में भिन्नता दें । एक तो ये कि दोनों ने अपने अपने बयानों में एक दूसरे को हत्या के षड्यंत्र के लिए उत्तरदायी ठहराया था लेकिन क्योंकि वह दोनों ही हत्या के षड्यंत्र के पीछे थे इसलिए बात कुछ विशेष से महत्वपूर्ण नहीं रहेंगे । दूसरे कलावति ने अपने बयान में कहा था की हत्या के लिए पंद्रह तारीख निश्चित हुई थी लेकिन रंजीत सिंह ने कहा की हत्या चौदह, पंद्रह या सोलह इन तीन तारीखों में से किसी भी दिन की जानी थी । ये अंतर भी महत्वपूर्ण नहीं था क्योंकि पंद्रह तारीख का जिक्र दोनों बयानों में किया गया था और हत्या पंद्रह की रात में हुई थी । इसलिए शायद कलावति ने दूसरी तारीखों का जिक्र करना विकास अच्छा हूँ । तीसरा अंतर हत्या की योजना पूरी करने के बारे में था । कलावति ने कहा था कि उसे नहीं मालूम की हत्या किसने और कैसे की । दूसरी ओर फॅमिली सिंह ने इस नृशंस हत्याकांड का सनसनीखेज ब्यौरा दिया था । वह घर के बाहर अंधेरे में छिपा हुआ कलावति के इशारे का इंतजार कर रहा था । जल्दी ही हत्या हो जाते लेकिन पास में क्लिंटन होने की वजह से अवसर नहीं आ सका । कुंवर विक्रम सिंह काफी देर तक जाता हूँ । सुबह तीन या चार बजे उपर सीढियों से कलावति ने तीन या चार बार टार्च से इशारा किया । यानी ऍम वो किसी का इंतजार करना था । वो बहुत नवादा हुआ घर की ओर बढा और अंदर घुसकर सीढी से ऊपर चढ गया । उसके हाथ में तलवार थे । शब्बर गलती भी उसके पास उसे अपने पति की चारपाई के पास ले गए और मच्छरदानी उठाकर ऊपर डालते हैं । विक्रम सिंह गहरी नींद में था । इसके बाद कलावती ने तिरछी दृष्टि से अत्याचार और उसकी तलवार की ओर देखा और फिर वहाँ से चलेंगे । रंजीतसिंह चारपाई के पास खडा हुआ और आपने असहाय चचेरे भाई को कुछ देर तक देखता ना घेर । उस समय उसके दिमाग में क्या विचार आ रहे होंगे? क्या वह अपराध के गंभीर परिणामों पर विचार करने के लिए ठहर गया था? उसने धीरे से नंगी तलवार उठाई । अचानक उसका हाथ खडा होता था और गहरा साफ खीजकर उसने पूरी तेजी से विक्रम सिंह के सिर पर ुवार कर दिया । पहले आघात से अधिक जागे मृतक का शरीर कुछ दिन अच्छा होकर बिस्तर से गिर पडा और तब उसे गांव से गया हूँ । हत्यारा खोतकर आ गया और उस पर विक्रम जोर से चिल्ला उठा । रंजीत बार बार हुआ करने लगा । आखिरकार विक्रम सिंह का चिल्लाना आप क्या? लेकिन इस अंतर से भी दोनों की स्वीकारोक्तियों की सत्यता में कोई फर्क नहीं है क्योंकि दोनों बयानों में मूल बाद का विवरण तो सत्यता आएँ । तलवार, खून से सने कपडे और कलावति के जीवन मिलने जाने से हत्यारे के बयान की पुष्टि हो गई । शिव जी के बयान पर काफी कुछ कहा गया । ये तरके दिया गया है कि उचित प्रमाणों के बिना मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए उसके बयान पर विश्वास नहीं करना चाहिए । क्योंकि हत्या के बाद जब नौकर चाकर छत पर आए तो उसने रंजीत सिंह का नाम नहीं बताया, अपराधी का नाम बताने में इतनी देर करने से उसकी गवाही झूठी हो गई । इससे साबित होता है कि वह भी अपराध में सहयोग नहीं थी । लेकिन सुनवाई जज ने इस धारणा को स्वीकार नहीं किया । अपराधी का नाम बताने में देर करने का जो कारण भी ने बताया था, उससे वह संतुष्ट था । वो सिर्फ एक नौकरानी थी । अपने मालिकों के मामले में दखल देने का अधिकार उसे नहीं था । वह कलावति के आदेशों की अवहेलना करने का दूसरा हाथ से नहीं कर सकें । जब विक्रम सिंह जैसा शक्तिशाली और चतुर व्यक्ति भी उसकी मालकिन के हाथो नहीं बच्चे से कहा था तो उस जैसे नीचे जाता और कमजोर लडकी के लिए ये कहाँ सम्भवता की अपनी मालकिन के सामने सिर उठाते हैं । अपनी जान बचाने के ख्याल में भी उसके होटल सीधी हैं । हाँ, कलावादी की गिरफ्तारी के बाद स्थिति एकदम बदल गई । जब सारे तथ्य सामने आ गए तो उसे किसी का डर ना रहा । किसी बात को छिपाने की जरूरत नहीं रही और ये बात तो कलावति ने भी हैडकांस्टेबल के सामने दिए बयान और सीख रोकती । मैं मान नहीं थी कि उस रात भी छत पर मौजूद थे । सितंबर और इससे क्या उनमें सुनवाई होने के एक महीने बाद दोनों अभियुक्तों ने अपनी अपनी स्वीकरोक्ति यहाँ बदल दी और उन्हें झूठी क्या दिया तो यही आरोप पक्ष का मुकदमा था । अभियुक्तों ने अपनी ओर से किसी गवाह से पूछताछ नहीं की । अपने बयानों में उन्होंने अनैतिक ऍम और हत्या में पारस्परिक सहयोग आदि के आरोप मानने से इंकार कर दिया । रंजीत सिंह ने सफाई दी की हत्या की रात वो बस तेरा में अपने घर पर था । खून से सने कपडों और तलवार को अपनी मानने से इंकार कर दिया । अपने घर से बरामद हुए कलावति के जेवरों के बारे में उसने कहा कि वे पुलिस ने वहाँ रख दिए थे । दोनों अभियुक्तों ने एक स्वर में कहा कि बलबीर सिंह के कहने पर उन्हें झूठे हैं फसा दिया गया था । निर्णय घोषित करते हुए संजने रंजीत सिंह को हत्या के अपराध का दोषी माना लेकिन कलावति को उस आरोप से बरी कर दिया । उसने जेवरों की बरामद होने की गवाही को मारने से इंकार कर दिया और दोनों सीख रोक तियों को गलत ठहराया । शब्द की अकेली गवाही को आधार मानते हुए उसने रंजीत सिंह को मृत्युदंड दिया और कलावति को हत्या के आरोप से बरी करते हुए उसे इस बात के लिए पांच वर्ष की कडी कैद की सजा दी की उसमें डकैती की बात कहकर जानबूझकर हत्यारे को छिपाने की कोशिश की । सोलह जो उन्होंने सुबह उनको हिमाचल प्रदेश के जुडिशियल कमिश्नर चौधरी की अदालत में इस निर्णय के विरुद्ध अपील की गई । चौधरी ने आरोप पक्ष पर मुकदमा स्वीकार कर लिया । दोनों बदली हुई स्वीकारोक्तियों को भी ठीक माना । उसके अनुसार दोनों से रोक तियां सत्य थी और अपनी इच्छा से दी गई थी क्योंकि उनमें कहीं कहीं बातें प्रभावित हो गई थी । बरामद हुई चीजों के बारे में उसने कहा कि मेरा विचार है कि रंजीत सिंह के घर से जेवरों का बरामद होना बिल्कुल सही है कि पेज एवर कलावति के थे और कत्तर षड्यंत्र के संबंध में ट्रेन जीत सिंग को दिए गए हैं । संचेत में कमीशन ने कहा कि सत्य और अपनी मर्जी से दी गई स्वीकरोक्ति ियाँ, प्रत्यक्ष दर्शनीय सिब्बी की गवाही, रंजीत सिंह के घर से कलावति के गहनों का बरामद होना और हत्या के उद्देश्य आदि बातों के अपराध पर दोनों अभियुक्तों रंजीत सिंह और कलावति पर लगाया हुआ आरोप सही सिद्ध हो जाता है । शिशन जज की कलावति की हत्या के अपराध से बरी करने के फैसले को रद्द करते हुए कमिश्नर ने कहा, घटना के तुरंत बाद शिव बीने कलावति को पास के कमरे में खडी देखा । कलावति ने उसे डाटा और चुप रहने की हिदायत थी । इसके साथ ही कलावति ने फौरन झूठी डकैती की कहानी फैला दिया । इन सब बातों को देखते हुए मुझे इससे बारे में बिल्कुल भी संदेह नहीं की । हत्या होते समय कलावति बिलकुल पास में थी और कथित कहती की कहानी कर प्रचार कर उसने उसमें सहायता दें, कमिश्नर में उस पर हत्या के लिए प्रेरित करने का आरोप लगाया । लेकिन क्योंकि हत्या उसके हाथों नहीं हुई और फिर वो तीन बच्चों की मां भी है जिनमें से एक अभी बहुत छोटा है । इसलिए मेरा ख्याल है कि उसे कानून द्वारा निर्धारित दूर ठंडा होने से हर कहाँ डंडे मिलना चाहिए । अभियुक्तों की अपील नामंजूर करते हुए रंजीत सिंह को मिले मृत्यु दंड को ठीक माना गया और कलावति को आजीवन कारावास की सजा सुना दी । बुरे का अंतर बुरा ही होता है । एक गलत बात कभी सही नहीं हो सकती । माना कि कलावति पर अत्याचार किये गए, उसका शोषण किया गया लेकिन हत्या छुटकारा पाने का उपाय नहीं था । विभिन्न भावना का कारण दांपत्य संबंधों के आडे आ सकती है लेकिन हत्या उसका हर नहीं है । हत्या तो हत्या है, उससे किसी समस्या का समाधान नहीं होता । जल्दी से जल्दी छुटकारा पाने के चक्कर में किए गए एक मूर्खतापूर्ण प्रयत्न का परिणाम बुरा हुआ । दो जीवन मिल गए और तीसरा जेल की अंधेरी कोठरी में तिलमिलाकर चल रहा है क्या हूँ हूँ?

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इंसान के हाथों होने वाले अपराध की सच्‍ची कहानियों को बयां करता यह उपन्‍यास रहस्‍य और रोमांच से भरा है।
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