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18-मुट्ठी भर धूप -मीरा in  |  Audio book and podcasts

18-मुट्ठी भर धूप -मीरा

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वीर की नजर जब पहली बार मीरा पर पड़ी, तो जबरदस्त आकर्षण के जादू ने उसे अपने वश में कर लिया। मीरा को भी कुछ-कुछ महसूस हुआ। देखते-ही-देखते यही उनकी जिंदगी बन गई। दोनों को एक-दूसरे की तरफ खींचनेवाली ताकत ही मानो एकमात्र सच्चाई थी, जिसे बयां नहीं किया जा सकता। हालांकि यही प्‍यार उन्‍हें एक-दूसरे से अलग कर देता है। अचानक एक तबाही उन पर हमला करती है और उनके सपनों को झकझोर देती है। कुछ बाकी रह जाती है तो सिर्फ नफरत, जो उनके प्यार के जितनी ही ताकतवर है। बरसों बाद, किस्मत एक और चाल चलती है और दोनों को आमने-सामने ला खड़ा करती है। एक बार फिर। इस बार फैसला उन्हें करना हैः अपनी नफरत के हाथों बरबाद हो जाएं या प्यार को एक और मौका दें। Voiceover Artist: Ashish Jain Script Writer: Vikram Bhatt
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नीरा सोमवार की सुबह कल रात वीर मेरे घर आया था । नताशा की बात सुनते ही में सिर से पैर तक काॅल । उसकी हालत अच्छी नहीं हूँ । मुझे बहुत तो मुझ से बात करनी चाहिए । उसने कहा है तो तुमसे मिलने गया । मैंने पूछा मैं पांच करने की अच्छाई बुराई में नहीं जाना चाहती थी । उसे तुम्हारा नंबर चाहिए था, दे दिया नहीं । मैंने कहा कि नंबर देने से पहले तुमसे पूरे होंगे । बिना पूछे ही वह सवाल मेरे और नताशा के बीच रह गया । अब फोन में हम कुछ देर के लिए मौन हो गए । सिंगापुर में सुबह और दोपहर के बीच का वक्त था । मैंने जितना ऑफिस को किराए पर लिया था उसकी छत से लेकर फर्श तक की बडी बडी खिडकियों से बाहर छितिज को देख रही थी । सिंगापुर आने के बाद दो हफ्ते में मैंने सीख लिया था । सिर्फ क्रिकेट बदल देने से आपके दिल की तस्वीर नहीं बदल जाती है । अब जहाँ भी जाते हैं अपने साथ अपने संसार को लेकर चलते हैं । फिर दुनिया के चिथडे हो चुके थे और मैं उन्हें चित्रों को लिए खुल रही थी हूँ । मैं बस इतना कह सके और मुझे कोई जवाब सूचना ही नहीं हूँ । मुख्यमंत्री तुम्हारा नंबर दे दूँगा क्योंकि मतलब मैं तो कह रही हूँ तुम समझ रही हूँ । प्रकाशा ने सफाई मांगी । मैं सोच रही थी कि काशी वैसा नहीं करती । उसे मेरा नंबर भतेना । नताशा । अभी ये सब बहुत मुश्किल है । इसे और मुश्किल मत बनाओ और उससे पहले ऍम तो मैं पत्थरदिल वाली कुतिया नहीं हूँ । मैं सच में बहुत कठिन स्थिति में हूँ । कुछ नींद नहीं आती । कुछ पार पार फील्ड का चेहरा फिर सामने दिखता है । इतना हर बार ऐसे वाहनों को बनाने के बाद रो पडती हूँ जिनसे मुझे लगे कि मैं उसके लिए नहीं हो रही है । नताशा कुछ नहीं ऍम उसके पीछे समंदर को सुन सकती हूँ । मैं सोच रही थी कि वो अपनी छत पर सेलफोन लेकर खडी होगी तो आप प्लीज मैंने उसके मौन विरोध से लडने की कोशिश की । मुझे नहीं लगता की तो मैं पत्थरदिल हो ही रहा है लेकिन लेकिन तुम मेरी छुट्टी होती और देखा होता कि वीर कैसा दिख रहा था । तो तो तुम एक बार फिर से जरूर टूट जाती तो बहुत दुबला हो गया है । ऐसा लगता है जैसे कई दिनों से शिव नहीं की और कई रातों से सोया भी नहीं । उसके मैं ऐसी थी जिसे लिफ्ट परसवार होने से ठीक पहले उसने सिगरेट का कश लगाया था तो बिल्कुल मुझे ही सब पता नहीं । बंद करो कि प्लीज प्रकाश पर वो ठीक पडी । उस सहन गई और बीच में ही रुक गए । मेरा नंबर मत तो प्रिया और अगर तुम ने दिया तो मैं जाकर दूसरा नंबर ले लेंगे । मैं जितनी सहजता से कह सकती थी कह दिया । नताशा थोडी देर तक चुप रही और फिर फुसफुसाते हुए बोले मैं कल तुम बिल्कुल पत्थरदिल हो । मैं कुछ कहती इससे पहले ही उसने फोन काट दिया । मैं पूरे दिन उस बारे में सोचने से बचती रही और क्वालालंपुर के खरीददारों को इंडियन फूट बेचने का प्रयास करती रहेगी । मैं अपने अपार्टमेंट के अकेलेपन नहीं लौटी । तब वीर को लेकर नताशा की बताई तस्वीर नहीं मुझ पर सुनामी की तरह हमला कर दिया । मुझे लग रहा था मैं अपने कमरे के कोने में उसे उसके बदहाल और अस्त व्यस्त रूप पे खडा देख रही हूँ जो आपने शोकाकुल नजरों से मेरी तरफ देख रहा था । मुझे दर्द का ऐसा हो रहा था । मैंने एक बार फिर आंसू को बह जाने दिया । वो हमेशा के लिए मेरे साथ ही बन गए थे । मुझे नताशा से नफरत हो रही थी । कि उसने मुझे फोन ही क्यों किया । मुझे से नफरत हो रही थी कि वो उसके घर क्यों गया । मुझे अक्षय से नफरत हो रही थी कि वह क्यू भर गया । मुझे नफरत हो रही थी कि मुझे अच्छे क्यों करना पडा । मैं हर किसी और अपने जीवन की हर चीज से मतलब कर रही हैं । मैं बच निकलने के रास्ते तलाश कर रही थी । अगले दो हफ्तों में मैंने एक स्थानीय जिम की सदस्यता ले । शाम को ढाई घंटे के प्रसाद के बाद इतना थक जाऊंगी कि वीर की शादी भी नहीं आएगी । बीस भारत था वीर का अस्त व्यस्त बिना शिव क्या चेहरा मेरे दिमाग पर छप चुका था? ऍम हर रात मेरा हाल चाल लेने के लिए फोन किया करते थे । हम काम की बात करते थे । मैं उनसे मॉम के बारे में मुंबई ऑफिस और दूसरी बातों के बारे में पुष्टि थी । काम अक्षय के बारे में बात नहीं करते थे तो बहुत दुख देने वाला था । शुक्रवार की देर रात भी जब सिंगापुर उसके मामले में बताते हुए मुझे एक महीना हो चुका था । डैड ने मुझे कुछ ज्यादा ही देर से फोन किया । उन्होंने और मामने मूवी देखने का फैसला किया था तो मुझे लगा की अच्छी बात है क्योंकि वो धीरे धीरे जिंदगी को कल ही लगा रहे देंगे । डैड की आवाज थोडी शाम तक रही थी । अक्षय की मौत के बाद पहली बार इतनी शाह और शायद उनके किसी नए ऍम मुझे सवाल पूछने की हिम्मत दी । इस समिट कर रही थी आपको लगता है कि मैं इतना अच्छा कर रही हैं जितना अक्षय कर सकता हूँ । मैं नहीं जानता मेरा लक्ष्य क्या कर सकता था । डाॅ । को ममता से कहा मुझे नहीं लगता कि तुम्हें अपना जीवन ये सोचना जीना चाहिए की अगर अक्षय तुम्हारी जगह होता तो क्या करता हूँ । लक्ष्य को पहले हो चुका हूँ सुरक्षा बनने की कोशिश में मीरा को नहीं खोना चाहता हूँ तुम जैसी हो वैसे ही रहो । मीरा तो बहुत अच्छा काम कर रही हूँ ऍम मैं जानता हूँ की अक्षय ने हम सभी के दिलों में एक खालीपन पैदा कर दिया है जो कभी भरा नहीं जा सकेगा । लेकिन उस खालीपन के साथ जीना ठीक है । अपना जीवन तुम अपनी माँ जब मेरे लिए अक्षय का जिक्र ऍम तुम ने ऐसा किया तो मुझे बहुत बुरा लगेगा । जीवन जीवित मीरा के लिए तो मर चुका है । उसके लिए हम उन सब का त्याग नहीं कर सकते हैं जो जीवित है । ऍम की आवाज में शोक सुन सकती थी लेकिन मातम अब साफ तौर पर समाप्त हो चुका था । मैंने उनसे कहा की मैं उनसे प्यार करती है पर चलती ही फोन काट दिया । ये अगली सुबह के बाद है ऑफिस जाने के लिए मैं लिफ्ट में सवार हुई और मेरे चारों और सिंगापुर वाले मलय और मंदारिन की मिली जुली भाषा में बात कर रहे थे । कुछ कुछ भी समझ नहीं आ रहा था । जीवन में दिव्यज्ञान उस तरीके से नहीं आता जैसे फिल्मों में दिखाते हैं फॅार जाना और बिजली करती है जीवन बस आपके मन में तभी गांव आते हैं और फिर बडी तेजी से गर्म हवा के गुब्बारे की तरह पडा आकार ले लेते हैं । टाइप सही कह रहे थे । मुझे अक्षय की जगह लेने के लिए अक्षय बनने की जरूरत नहीं थी । मुझे मीरा बने रहना था और बाकी के बातें अपने आप हो जाएंगी । ऍम अकेली रह गई थी । मुझे जिस रोड करना था तो पीछे छूट चुका था । मैंने जब वीर को छोडने का फैसला किया सबसे मैं वही मेरा हूँ जो सिर्फ अपने करियर का पीछा कर रहे हैं । बिल्कुल नहीं । मैं उससे बहुत प्यार करती थी । मैं प्यार जीवन के बीच अदला बदली कर सकती थी, जिसके हर कोई करता है में मुझे और मुझे अब अपनी गलती का ऐसा हो रहा था । मैंने अस्थायी भावना के आधार पर स्थायी फैसला कर लिया था । मैंने तय कर लिया था कि मुझे खुश रहने का कोई अधिकार नहीं । अब सब कुछ खो दिया था । चलते मुझे एक ऐसे नुकसान के बदले खुश रखा जिसे किसी भी तरह के त्याग से पूरा नहीं किया जा सकता था । मुझे मुंबई होगा । मुझे पीर के पास लौटना होगा । लिफ्ट का दरवाजा एक अनजान से प्रोपर पडा । एक बुजुर्ग महिला मुझे देख कर मुस्कुराई, पलट कर किसी के मुस्कान का जवाब मुस्कान से दिए । न जाने कितनी दिन पी चुके थे । वापस मुस्कराती पिछली बार के जैसा नहीं था जब मैं मुंबई पहुंची थी । ऍसे अराइवल लाउड्स तक जाने के दौरान मुझे उस सुबह याद आ गये जब मैं स्विट्जरलैंड से लौटी थी । उस सुबह जब अच्छे हमें छोड कर जा चुका था, उस दिन मेरे से दूर जा रही थी । अब मैं उसके पास ताकि जा रही थी और इंतजार नहीं कर सकती थी । साइड में मेरे लिए कार भेजी थी और मैं चाहती थी कि वो और मॉम दोनों ही जाग रहे होंगे । मुझे देखना चाहते होंगे, लेकिन मैं को देखने का इंतजार नहीं कर सकती थी । सिंगापुर से लेकर यहाँ तक कि फ्लाइट के दौरान मैं उसके दरवाजे की घंटी बजाने की बात सोचती आएगी और चाहती थी कि उसके उस अनमूल वहाँ को देखो । मुझे देखते वक्त उसके चेहरे पर आते हैं । मुझे गए हुए तीन महीना बीत चुका था । उसे देखे या बात किए हुए और दो हफ्ते जब नताशा के घर मेरा नंबर मांगने के लिए पहुंच गया था । मैं जानती थी कि वह मुझे बहुत नाराज होगा । लेकिन मैं ये भी जानती थी कि वह समझ जाएगा । जो भी हो उसे समझना ही होगा तो ही तो मेरे जीवन का प्यार है । मैंने घंटी बजाई । नहीं जाने उसने दरवाजे तक आने में कितनी देर लगाई तो मेरे सामने चीज में खडा था । उसने शर्ट पहने की भी जरूरत नहीं समझी थी । बहुत पूरी हालत में था । उसका चेहरा मरियल सा हो गया था । उसका पसंद भी बहुत घट गया था । भाषा भी कह रही थी, व्यस्त व्यस्त था और उसकी गाडी बडी हुई थी । वालों से आपने देखने की कोई परवाह ही नहीं थी । अगर भी मुझे अपने दरवाजे पर अचानक देखकर पहुंचकर रह गया था तो जरूर ये पांच उस करता हूँ कि किसी बहुत ढूंढ के कोने में होगी तो उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था । वो भावशून्य था, मानव पत्र आया होगा । दूसरी तरफ मैं फूट फूटकर होने वाली है । मैं झट से उसकी बहु में चली गई और मैंने बिल्कुल वही क्या तो हूँ । रोने के दौरान मैं बस यही कहती रही, मैंने गौर किया कि मुझे अपनी बाहों के घेरे में लेने में थोडा लगा है । उसी जवान औरत उसके बैड रूम से बाहर नहीं पिज्जा वाला है क्या? हाँ, समय तो उसके आने का ही हुआ है । उसने कहा । और फिर मुझे देखते ही चल उसी का हाथ में रिपीट से चल गया और उसके साथ साथ मुझे अपनी पूरी दुनिया फसल की नजर आएगा ।

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वीर की नजर जब पहली बार मीरा पर पड़ी, तो जबरदस्त आकर्षण के जादू ने उसे अपने वश में कर लिया। मीरा को भी कुछ-कुछ महसूस हुआ। देखते-ही-देखते यही उनकी जिंदगी बन गई। दोनों को एक-दूसरे की तरफ खींचनेवाली ताकत ही मानो एकमात्र सच्चाई थी, जिसे बयां नहीं किया जा सकता। हालांकि यही प्‍यार उन्‍हें एक-दूसरे से अलग कर देता है। अचानक एक तबाही उन पर हमला करती है और उनके सपनों को झकझोर देती है। कुछ बाकी रह जाती है तो सिर्फ नफरत, जो उनके प्यार के जितनी ही ताकतवर है। बरसों बाद, किस्मत एक और चाल चलती है और दोनों को आमने-सामने ला खड़ा करती है। एक बार फिर। इस बार फैसला उन्हें करना हैः अपनी नफरत के हाथों बरबाद हो जाएं या प्यार को एक और मौका दें। Voiceover Artist: Ashish Jain Script Writer: Vikram Bhatt
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