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17 - गांधी पत्रकारिता के प्रतिमान एवं ग्रामोत्थान

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“कस्तूरबाग्राम रूरल इंस्टीट्यूट, कस्तूरबाग्राम, इंदौर” में 15-16 जनवरी, 2016 को “ग्रामीण समाज और संचार: बदलते आयाम” विषय पर संपन्न “राष्ट्रीय संगोष्ठी( national seminar)” के तहत प्रस्तुत विद्वता-पूर्ण शोध लेखों का संग्रहणीय संकलन है यह पुस्तक। जो निश्चित रूप से एक पुस्तक के रूप में मीडिया-जगत के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के साथ साथ विभिन्न विषयी अध्येताओं के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगा। Voiceover Artist : RJ Manish Author : Dr. Nirmala Singh Author : Rishi Gautam Producer : Saransh Studios Voiceover Artist : Manish Singhal Author : Dr. Nirmala Singh & Rishi Gautam
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गांधी पत्रकारिता के प्रतिमान ऍम उद्धार गांधी जी बीस फीसदी के संभव था । पहले भारतीय थे, जिन्होंने समाचारपत्रों की उपयोगिता एवं ताकत को पहचाना और अपने उद्देश्य को पाने के लिए उन का समुचित उपयोग किया । गांधी जी ने ऍम कई दशकों तक पत्रकार के रूप में कहा रह गया तथा अनेक समाचारपत्रों का संपादन भी किया और अपनी एक मौलिकता एवं नैतिकता से संपृक्त पत्रकारिता को जन्म दिया । उन्होंने पत्रकारिता को एक आदर्श रूप दिया तथा उसे व्यवहारिक बनाया । गांधी जी के लिए पत्रकारिता आत्माभिव्यक्ति का साधन थी । उनकी पत्रकारिता उनके जीवन का तर्पण थी । उन्होंने लोकसेवा और लोक जागृति का कार्य पत्रकारिता के द्वारा क्या उनकी देखरेख तथा संपादन में अनेक समाचारपत्र यंग इंडिया, सत्याग्रही, नवजीवन और हरिजन आदि निकले थे, जिनमें उनके ग्रामोत्थान के लिए किए गए महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्यों तथा विचार प्राप्त होते हैं, जो स्वयं उनके सपनों का भारत की आधारशिला थे । दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के पश्चात शुरुआती दौर में वे राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए सदैव प्रयासरत रहे । कालांतर में लगभग उन्नीस सौ चौंतीस के पश्चात उनके लिए हरिजन उद्धार तथा ग्रामोत्थान का प्रश्न सर्वप्रमुख बन गया । ये इनके जीवन के श्रेष्ठतम् का रहे थे । अब गांवों के आर्थिक, नैतिक एवं सामाजिक पुनरोद्धार के लिए तीव्रता से उनमें हुए । गांधी का विश्वास था कि भारत अपने चंद्र शहरों में नहीं बल्कि सात लाख गांवों में फसा हुआ है । उनके अनुसार गांवों की सेवा करने से ही सच्चे स्वराज्य की स्थापना होगी । अन्य सब कहत मैं मेरा थक सिद्ध होंगे । अगर काम नष्ट हो जाए तो हिंदुस्तान भी नष्ट हो जाएगा । दुनिया में उसका अपना मिशन ही खत्म हो जाएगा । गांधी जी के अनुसार अगर हिंदुस्तान को सच्ची आजादी पाने है तो उसे देहातों में जाकर झोपडियों में रहना होगा, महलों में नहीं । महात्मा गांधी चाहते थे कि ग्रामों का विकास हो । ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार और संपन्नता लाने के लिए चहुमुखी प्रयासों पर बल दिया । विक्रम मीन भारत की समस्याओं से पूरी तरह पाकिस् थे । उनके ग्राम स्वराज की कल्पना इस प्रकार की थी कि वह एक पूर्ण प्रजातंत्र होगा जो अपनी जरूरतों के लिए पडोसी पर भी निर्भर नहीं करेगा । यद्यपि वह परस्पर सहयोग से कम लेगा, उनके पास आवश्यक समिति हो, खेल मैदान हो, उपयोगी फसलों को उगाने हेतु आवश्यक समीर ने हो अपनी एक नाटक शाला पाठशाला और सभा भगवान हो जहाँ शुद्ध पीने के पानी का इंतजाम होगा । बुनियादी तालीम के आखिरी दर्जे तक शिक्षा सबके लिए लाजमी होगी । जात पात और क्रमागत अस्पृश्यता जैसे भेद इस ग्राम समाज में बिल्कुल ना रहेंगे । अहिंसा की सत्ता ही ग्रामीण समाज का शासन बाल होगी । गांव का शासन चलाने के लिए हर गांव में एक पंचायत चुनी जाएगी । एक नैतिक एवं सामाजिक उत्थान गांधी ने यंग इंडिया तीस मार्च में कहा था कि हमें अपना ध्यान गांव की ओर लगना चाहिए । उन्हें संकुचित दृष्टि उनके पूर्वाग्रह हूँ और बहनों आदि से मुक्त कराना है और इसके लिए आवश्यक है कि हम उनके साथ उनके बीच में रहे, उनके सुख दुख में हिस्सा ले और शिक्षा तथा उपयोगी ज्ञान का प्रचार करें । उन्हें समय स्वास्थ्य और पैसे की बचत करना सिखा सकते हैं । उनके अनुसार ग्राम उधार में अगर सफाई ना आए तो हमारे गांव कचरे के घोरे जैसे ही रहेंगे । ग्राम सफाई का प्रश्न जीवन का अविभाज्य अंग है । दीर्घकाल से जस्ट स्वच्छता की आदत हमें पड गई है । उसे दूर करने के लिए महान परक्रम की आवश्यकता है । लियोनल कटर्स ने हमारे गांवों को घोडे का ढेर कहा है । हमें उन्हें आदर्श बस्तियों में बदलना है । हमें उन्हें स्वच्छ पानी, शुद्ध हवा और ताजा अन्य की जानकारी देनी है । इसके लिए हमें उनके पास जाना होगा । उनकी सेवा को की तरह दृढ निष्ठा से उनकी सेवा करें । हम उनके भंगी बन जाए और उनके स्वास्थ्य की रक्षा करने वाले परिचारक बनेगा । गांधी के अनुसार सुधर के छोटे कार्य में लग जाना चाहिए, जो आज भी जरूरी है और तब भी जरूरी रहेगा जब हम अपना उद्देश्य प्राप्त कर चुकेंगे । सच तो यह है कि ग्राम कार्य की यह सफलता हमें अपने उद्देश्य के निकट ले जाएगी । दो । आर्थिक पुनरुत्थान भारत जैसे कृषि प्रधान देश की अर्थव्यवस्था के नवीनीकरण की समस्याओं से जूझते भारतीय मजदूर किसान के लिए गांधी ने विकेंद्रित अर्थनीति की बात कही थी । देश में खेती की महत्ता और पूंजी की कमी को ध्यान में रखकर ही गांधी जी ने खेती और कुटिर उद्योगों के माध्यम से ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था पर जोर दिया था । उनका कहना था कि हमारी आबादी का प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा कृषि जी भी है, लेकिन यदि हम उनकी मेहनत का सहारा फल खुद ही छीन ले या दूसरों को छीन लेने दें तो इसका आशय है कि हमें स्वराज्य की भावना नहीं है । उनका विचार था कि कठिन परिश्रम करने वाले ग्रामवासियों से एकता साथ नहीं होगी और तभी हम उस जनता का ठीक प्रतिनिधित्व कर सकेंगे । गांधी जी गांवों को स्वाबलंबी बनाए रखने के हिमायती थे । उनकी सोच थी कि यदि आवश्यक हो तो बडी पूंजी वाली योजनाएं बनाए लेकिन उन का निर्माण और संचालन स्थायी साधनों से ही होना चाहिए हूँ ।

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“कस्तूरबाग्राम रूरल इंस्टीट्यूट, कस्तूरबाग्राम, इंदौर” में 15-16 जनवरी, 2016 को “ग्रामीण समाज और संचार: बदलते आयाम” विषय पर संपन्न “राष्ट्रीय संगोष्ठी( national seminar)” के तहत प्रस्तुत विद्वता-पूर्ण शोध लेखों का संग्रहणीय संकलन है यह पुस्तक। जो निश्चित रूप से एक पुस्तक के रूप में मीडिया-जगत के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के साथ साथ विभिन्न विषयी अध्येताओं के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगा। Voiceover Artist : RJ Manish Author : Dr. Nirmala Singh Author : Rishi Gautam Producer : Saransh Studios Voiceover Artist : Manish Singhal Author : Dr. Nirmala Singh & Rishi Gautam
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