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मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 58

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मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 58 in  | undefined undefined मे |  Audio book and podcasts
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सूरज एक ही है जो सफर पर है मगर सूरज को सुबह देंखे तो ऊर्जावान, दोपहर में तपता हुआ और शाम को अस्तित्व खोता हुआ दिखता है, स्त्री भी कुछ ऐसी ही है। हालात मेरे पक्ष में हो तो वफ़ा, ममता और त्याग की मूर्ति, विपक्ष में हो तो कुलटा, वेवफा, कुलनाशिनी... ऐसे ही पता नही कौन कौन से शब्दों में तरासा जाता है उसे? स्त्री के जीवन को पुरुष के इर्द गिर्द इस हद तक समेट दिया गया है कि कभी कभी लगता है उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व ही नही है। ऐसी ही प्रेम, त्याग, कुंठा, विवाह और तलाक के भंवर में खुद को तलाशती तीन स्त्रियों का की कहानी है मेरी अर्द्धांगिनी उसकी प्रेमिका! जो एक पुरुष के साथ अस्तित्व में आई और उसी के साथ कहीं गुम हो गयी। Voiceover Artist : Ashish Jain Voiceover Artist : Sarika Rathore Author : Rajesh Anand
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अगले दिन सुबह मुझे घर से जरा जल्दी निकलना पडा । ऑफिस में एक मीटिंग थी । उस वक्त तक पंखुडी के लिए दूध नहीं आ पाया तो मैं निकलते वक्त खुशबू को कहता गया कि वह ऑफिस निकलने से पहले हर हाल में दूध मंगा कर रखते हैं, ताकि हमारी अनुपस् थिति में पंखुडी को कोई तकलीफ हो । ऑफिस पहुंच गया, मगर खुशबू ने दूध मांगा ही लिया होगा इस बात की मुझे तसल्ली नहीं हो पा रही थी । खुशबू इधर कुछ दिनों से इन सब मामले में कुछ आप्रवासी हो गई थी । बेटिंग खत्म होते ही मैंने खुशबू के मोबाइल पर फोन किया तो कॉल नहीं लगी । मैंने उसके ऑफिस फोन किया तो देर तक घंटी बजती रही । वो नहीं उठा । मैंने फिर से ट्राई किया । उन किसी कर्मचारी ने उठाया । उससे मैंने खुशबू को लाइन पर बुलाने के लिए कहा तो वह कहने लगा सर मजबूत ऑफिस में नहीं है । पटेल सर के साथ कहीं निकली हुई हैं कहाँ? अब पता नहीं है, बता कर नहीं गए । ऑफिशियल काम था, कह नहीं सकता । लेकिन आपको बोल रहे हैं कि मैं बाद में फोन करता हूँ । अगर मैंने फोन रख दिया उसमें जब शाम को घर पहुंचा तो पता चला कि दूर आज आया ही नहीं । मैंने जब आया से पूछा की खाने में पंखडी को क्या दिया था? इस सवाल पर वो बनाते हुए बोली क्या करती साहब? बिस्कुट के अलावा और कुछ नहीं था । पिच में कुछ से रखे हुए थे । उसी को काट कर दिया तो उसे खाया भी नहीं । वो अब भी वहाँ कटा हुआ रखा है । उसने सामने अलमारी की ओर इशारा करते हुए बोला मैंने घूम कर देखा । लगभग पूरा का पूरा से सुरक्षित था तो कितना ही होगी । मैं अंदाजा नहीं लगा पा रहा था । मैंने दौड कर पंखुडी को गले से लगा लिया और कुछ करते हुए पूछा ट्विटर रोक लगी हैं उससे से लाया । मैंने बगैर कपडे बदले सीधे उसे गोद में ले जाकर बाजार की तरफ निकल गया । लौट कराया तो खुश हुआ । चुकी जी मुझे देख कर मुस्कुराई लेकिन मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं क्योंकि मेरे अंदर पीडा थी, पंखुडी के लिए था । पेडा आॅफिस पर नहीं थी । कहाँ गए थे आप लोग? मैंने सवाल किया आज मुझे इस बात की कतई फिक्र नहीं थी कि वह पूरा मान जाएगी । तुमने आज फिर ऑफिस फोन किया और संजय आप लोग का क्या मतलब था? पहले तो वह भडकी मेरे चेहरे पर किसी क्रोध की रेखाओं का उसे जल्द ही अनुमान लग गया । उसके होठों की मुस्कान अचानक गायब हो गई । आप लोग का मतलब है ना पटेल के साथ पहुँच गयी तो वहाँ उसमें एक एक हफ्ते की कोशिश की, मगर हो तो उसका साथ नहीं दिया । खिलाते हुए बोली वो क्या है ना? संजय एक जरूरी काम वंश हमें असरगंज हम जानते हैं अजय देवगन पैसे तो नहीं जाना पडा । मैं अचानक चलना बडा हो ये बात हम बहुत बार तुम्हारे मुझे सुन चुके हैं । नहीं संजय हम वो नहीं कहना चाह रहे थे । दरअसल आजम दूसरे प्रेस में गए थे । अच्छा किस प्रेस में उसके दिमाग में कोई दम आया तो बोल गई । वहाँ का फोन नंबर है तुम्हारे पास नहीं । उसके होट सूखा लगे । अच्छा चलो पटेल का तो कोई पहुंॅच नंबर होगा है । नंबर ऍम मेरे पास भी रखा हुआ था । मैंने रिसीवर उठाते हुए उस की और देखा, लेकिन फोन करके उनसे पूछेंगे क्या? ऍफ का फोन नंबर मैंने कहा उन्हें भी नहीं मालूम होगा । उन कैसे जानती हूँ कि उन्हें नहीं मालूम होगा । फॅमिली नंबर बोलो । जोर देते हुए कहा साहब, मैं जा रही हूँ, अभी ये का एक आया की आवाज आई जाओ मैंने वही बैठे बैठे कह दिया । अब आॅड कहती हूँ वो तेजी से आया की और भागे दूध आया था । मुझे दूर से खुशबु का स्वर सुनाई दिया । शायद मेरे गुस्से के कारण को समझ गई थी । उस दिन खुशबू मेरे पास नहीं हुई है । खाना खाने के बाद वो नीचे वाले बेडरूम में चली गई । पंखुडी मेरे पास ही थी । अगली सुबह घर से निकलते वक्त उसने मुझे बात नहीं किए । ऑफिस पहुंचा तो पता चला की वो उस दिन फिर ऑफिस नहीं गई । शाम को जब मैंने पूछा ऑफिस क्यों नहीं गई? झल्लाकर बोली मेरी मासी और इसके बाद तो मैं कुछ कहना है । उसमें लाल लाल आंखों से मेरी और देखा । मैं चुप हो गया । इन गुजरे सालों का वह पहला मौका था जब मेरी मर्जी जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था । प्राथमिक फिर हम अलग अलग कमरे में ही सोए थे ।

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सूरज एक ही है जो सफर पर है मगर सूरज को सुबह देंखे तो ऊर्जावान, दोपहर में तपता हुआ और शाम को अस्तित्व खोता हुआ दिखता है, स्त्री भी कुछ ऐसी ही है। हालात मेरे पक्ष में हो तो वफ़ा, ममता और त्याग की मूर्ति, विपक्ष में हो तो कुलटा, वेवफा, कुलनाशिनी... ऐसे ही पता नही कौन कौन से शब्दों में तरासा जाता है उसे? स्त्री के जीवन को पुरुष के इर्द गिर्द इस हद तक समेट दिया गया है कि कभी कभी लगता है उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व ही नही है। ऐसी ही प्रेम, त्याग, कुंठा, विवाह और तलाक के भंवर में खुद को तलाशती तीन स्त्रियों का की कहानी है मेरी अर्द्धांगिनी उसकी प्रेमिका! जो एक पुरुष के साथ अस्तित्व में आई और उसी के साथ कहीं गुम हो गयी। Voiceover Artist : Ashish Jain Voiceover Artist : Sarika Rathore Author : Rajesh Anand
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