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मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 50

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सूरज एक ही है जो सफर पर है मगर सूरज को सुबह देंखे तो ऊर्जावान, दोपहर में तपता हुआ और शाम को अस्तित्व खोता हुआ दिखता है, स्त्री भी कुछ ऐसी ही है। हालात मेरे पक्ष में हो तो वफ़ा, ममता और त्याग की मूर्ति, विपक्ष में हो तो कुलटा, वेवफा, कुलनाशिनी... ऐसे ही पता नही कौन कौन से शब्दों में तरासा जाता है उसे? स्त्री के जीवन को पुरुष के इर्द गिर्द इस हद तक समेट दिया गया है कि कभी कभी लगता है उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व ही नही है। ऐसी ही प्रेम, त्याग, कुंठा, विवाह और तलाक के भंवर में खुद को तलाशती तीन स्त्रियों का की कहानी है मेरी अर्द्धांगिनी उसकी प्रेमिका! जो एक पुरुष के साथ अस्तित्व में आई और उसी के साथ कहीं गुम हो गयी। Voiceover Artist : Ashish Jain Voiceover Artist : Sarika Rathore Author : Rajesh Anand
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हम शाम को गंगा गोमती से लखनऊ निकलने वाले थे । उस दिन पापा ऑफिस नहीं गए तो मैंने उसे कहा कि गाडी तो शाम छह बजे हैं और अब वैसे भी पांच बजे तक लौट आते हैं तो उन्होंने कहा नहीं आज पूरा दिन में अपने बेटे और बहू के साथ वो जानना चाहता हूँ । उस वक्त मेरी आंखें डबडबाई नहीं लेकिन तब तो आता जाता रहूंगा चल जाए । बेटियाँ भी तो ससुराल जाने के बाद अक्सर आती जाती रहती है लेकिन उसकी विदाई के बाद उसका बाप होता है जानती हूँ क्यों? क्योंकि मैंने सुना था वही पूछ लिया । चाहे बाबा जिंदगी का एक और पन्ना पलटने वाले थे तो घर छोडने के बाद सिर्फ बेटियाँ ही पढाई नहीं होती । बेटे भी होते हैं समझा नहीं हम जानते हो संजय बेटी का बाप जब बेटी के ससुराल जाता है तो वह बेटी का आलीशान घर देख कर खुश तो होता है लेकिन उस पर अधिकार नहीं लगा सकता । ठीक ऐसे ही लखनऊ के किसी घर में जब तुम अपनी दुनिया भर साल हो गई तो मैं भी शायद उसी बेटी के बाद की तरह वहाँ महसूस करूंगा हूँ । ऐसा नहीं होगा । आप कभी उस घर के मुखिया होंगे । मैं जानता हूँ । बेटा तो मुझे उस घर का भगवान बना देंगे । फिर छोडो सब हो जाना खर्च पडेंगे । आंखों में भरे पानी को पूछते हुए बोले तुम बहु को लेकर जा तो रहे हो लेकिन अभी रोकोगे कहा उसकी चिंता नहीं । पापा मेरे दोस्त नहीं आलम बाग के आस पास रहता है । अभी एक दो दिन उसी के पास रह लेंगे और उसके बाद कोई फ्रेंड खोल देंगे । अच्छा उन्होंने अजीब नजरों से मेरी और देखा । बहु का हैं गाडी का वक्त हो चला है उसे बोला हूँ जी पपालाल मैंने खुशबु का आवाज आ गई पापा मैं तैयार हो चुकी हूँ कुछ मैंने घडी देखते हुए कहा । गाडी आ गई क्या नहीं मैं खुद तुम लोगों को स्टेशन तक छोडने के लिए चलूंगा हो, हम चले जाएंगे । आप गाडी बंगला दीजिए वो सब तुम छोडो । लोग तो मेरे लिए मेरे पास एक तोहफा है । आपने जेब से चाबी का गुच्छा निकालते हुए कहा ये क्या है? पापा कुछ पूछा लखनऊ में तुम्हारे घर की चाबी फॅस की क्या जरूरत है? कुछ कुछ बोलते इससे पहले मैं बोल उठा खुशबू हैरानी से मेरी और देखने लगी । मेरी हाँ में हाँ मिलाते हुए बोली हाँ पाता । अभी इस की जरूरत नहीं है । जरूरत है । संजय पापा ने मुस्कराकर कहा कि मेरी बहू है और उसकी खुशियों का ख्याल रखना सिर्फ फर्जी नहीं । मेरा अधिकार भी है । जो कुछ भी बेटा कुछ कुछ नहीं कर पाई और मेरी और देखते हुए उसने चाबियाँ सामली । पापा ने जेब से एक पेपर निकाला और मुझे घुमाते हुए बोले लोग तुम्हारे घर का पता है, संभाल कर रख लो । खुशबू और मैं थोडी देर तक एक दूसरे की डबडबाई आंखों से देखते रहे । हमारे पास शब्द नहीं थे । कुछ कहने के लिए तुम गेट पर आ जाओ । मैं गाडी निकालता हूँ । कहते हुए पापा वहाँ से निकल गए । गाडी में बैठने से पहले एक बार फिर मैंने भरी भरी नजरों से उस घर के और देखा जल्द ही मुझ से अलग होने वाला है ।

Details
सूरज एक ही है जो सफर पर है मगर सूरज को सुबह देंखे तो ऊर्जावान, दोपहर में तपता हुआ और शाम को अस्तित्व खोता हुआ दिखता है, स्त्री भी कुछ ऐसी ही है। हालात मेरे पक्ष में हो तो वफ़ा, ममता और त्याग की मूर्ति, विपक्ष में हो तो कुलटा, वेवफा, कुलनाशिनी... ऐसे ही पता नही कौन कौन से शब्दों में तरासा जाता है उसे? स्त्री के जीवन को पुरुष के इर्द गिर्द इस हद तक समेट दिया गया है कि कभी कभी लगता है उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व ही नही है। ऐसी ही प्रेम, त्याग, कुंठा, विवाह और तलाक के भंवर में खुद को तलाशती तीन स्त्रियों का की कहानी है मेरी अर्द्धांगिनी उसकी प्रेमिका! जो एक पुरुष के साथ अस्तित्व में आई और उसी के साथ कहीं गुम हो गयी। Voiceover Artist : Ashish Jain Voiceover Artist : Sarika Rathore Author : Rajesh Anand
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