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मेरी अर्धांगनी उसकी प्रेमिका - 43 in Hindi

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Authorराजेश आनंद
सूरज एक ही है जो सफर पर है मगर सूरज को सुबह देंखे तो ऊर्जावान, दोपहर में तपता हुआ और शाम को अस्तित्व खोता हुआ दिखता है, स्त्री भी कुछ ऐसी ही है। हालात मेरे पक्ष में हो तो वफ़ा, ममता और त्याग की मूर्ति, विपक्ष में हो तो कुलटा, वेवफा, कुलनाशिनी... ऐसे ही पता नही कौन कौन से शब्दों में तरासा जाता है उसे? स्त्री के जीवन को पुरुष के इर्द गिर्द इस हद तक समेट दिया गया है कि कभी कभी लगता है उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व ही नही है। ऐसी ही प्रेम, त्याग, कुंठा, विवाह और तलाक के भंवर में खुद को तलाशती तीन स्त्रियों का की कहानी है मेरी अर्द्धांगिनी उसकी प्रेमिका! जो एक पुरुष के साथ अस्तित्व में आई और उसी के साथ कहीं गुम हो गयी। Voiceover Artist : Ashish Jain Voiceover Artist : Sarika Rathore Author : Rajesh Anand
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जॉन्सटाउन के अपने घर में घुसने से पहले मैं जी भर के उसे देख लेना चाहता था । दूरियाँ रंग में रंगा हुआ वो घर मेरी माँ की जिंदगी की कीमत पर बनाया गया था । आप अपने बिजनेस में इतना बिजी थे कि वो मेरी माँ को फोर सबके चार पल भी कभी नहीं दे पाए । माँ की बीमारी से लेकर उनकी मौत तक पर एक बार भी घर नहीं लौटे । मैं अपनी आखिरी सांस के वक्त भी पापा को देख नहीं पाई । अपने अपने किराये के घर में कम्पनीबाग जाते वक्त अक्सर यही से गुजरा करता था । मगर इस घर की और कभी नहीं देखा । वहीं दरवाजे पर खडे हो गए । एक पापा ने आवाज नहीं आ रहा हूँ । मैं थक जाते हुए आगे बढ गया । इस घर को बनाते बनाते मैंने बहुत कुछ हुआ है । उन्होंने मेरी और देखा । शायद इतना कि उतना बोझ मैं अपने काम से जिंदगी भर नहीं उतार पाऊंगा । लेकिन क्या तुम जानते हो कि उन था मेरे अंदर आई कैसे? उन्होंने नजरे झुका ली । उनकी और देखने लगा । उनकी आंखें भर आई थी, मेरे कंधे पर हाथ रखते हैं । उन्होंने कहा उच्चतम पैदा हुए थे । उस वक्त हम लोग सोहबतियाबाग में किराये के घर में रहते थे तो कोई दो तीन महीने के रहे होंगे । हमारे मुँह के अंदर छाले आ गए थे । उस दिन तुम सारी रात होती रहेगी । मुझे अच्छे से याद नहीं है लेकिन शायद रात के दो या तीन बजे होंगे । मकान मालिक ने दरवाजा खटखटाया, मैंने खोला मेरे दरवाजा खोलते ही वो हम पर बरस पडे । मेरी बहुत पेड से हैं और तुम्हारे बच्चे के रोने के चक्कर में वो सो नहीं पा रही है । संजय क्या तुम यकीन करो? उन्होंने एक बार फिर मेरी और देखा । आधी रात को वो औरत सुबह ही कमरा खाली करने का हो सुनाकर चली गई और अचानक उनकी आंखों से पानी चला पडा तो देवेश्वर में बोले अभी सुबह ही कमरा खाली करना होगा । उस दिन मैंने एक बात और उसी की आप दूसरों के घर में थोडा बहुत हो सकते हैं । मगर होने के लिए आपको अपना ही घर चाहिए । मैं आवाज पापा की और देखता रहा । शायद वो अपनी सफाई देने से ज्यादा मुझे जिंदगी के बेरहम चेहरे के बारे में बताने की कोशिश कर रहे थे । मेरी आंखें छरछरा पडेगी । माँ ने मुझे इस घटना के बारे में कभी जिक्र नहीं किया था तो भारी माँ को आपने तीन महीने के बच्चे के साथ पूरे दो रातें और तीन दिन इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर गुजारनी पडेगी । अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने कहा मैं सारा दिन बादलो सब पैसे और कमरे के इंतजाम में यहाँ वहाँ भटकता रहा । तीसरे दिन शाम को जाकर मैं तुम दोनों के लिए कमरे का इंतजाम कर पाया । मैं कमरा कुछ खास नहीं था लेकिन तुम्हारी मां डेढ तक भरी भरी आंखों से उन दीवारों को घूमती रही । पता नहीं क्यों बाबा हूँ मेरा दिल फट पडा । उस वक्त पहली बार मुझे घर और पैसे की कीमत समझ जाएगी । इससे पहले मैं पैसे को सिर्फ जीवन गुजारने का स्वाद नहीं समझ रहा था, लेकिन उस दिन समझाया कि पैसा साधन नहीं । दरअसल ये खुद अपने आप में एक जिंदगी है और उसके बाद जब मैं पैसे कमाने के लिए घर से निकला तो चलते चलते इतनी दूर चला आया । वहाँ पर लौटना बहुत मुश्किल हो गया । हमारी माँ की चिंता को मैं भी नहीं दे पाया । जानते हो ना हूँ मैं झपट कर उनसे चिपक गया । चाहते हो संजय उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ गिरते हुए कहा, जिंदगी में मैंने बहुत स्ट्रगल किया है । समस्याएँ भी बहुत आएंगे । मगर उस वक्त हर बार मेरी आंखों के सामने हमारे बचपन का होता हुआ चेहरा जाया करता था और उसने मुझे कभी हार नहीं नहीं दिया । मैंने एक बात दिल पर ठान ली थी कि मेरा बेटा भले ही गरीबी और अभाव में पैदा हुआ हूँ, मगर मैं उसे गरीबी में जीने नहीं दूंगा साहब जाए एक का एक एक अधेड उम्र का इंसान हाथ में चाय के ब्रेक था में हुए आकर हमारे सामने खडा हो गया । चलो चाय पीते हैं । आपने मुझे खुद से अलग करते हुए कहा मैं अपने आंसुओं को पूछता हूँ, उनके पीछे पीछे चल दिया । मगर मेरे जहन में राजेश आनंद की कविता गूंज दे रहे हैं । पिता के प्यार को आधार बनाते हुए उन्होंने लिखा था टूटकर भी मेरे चेहरे पर मुस्कान क्यों हैं? इस सवाल पर हर शख्स परेशान क्यों है? अक्सर होता हूँ आप को काम कर मैं एक आंसू मेरे दर्द की पहचान क्यों है? सामान्य ने क्या काम सफाया है मुझे उसे ही आपने दर्ज पर अभिमान क्यों हैं? होता रहा हूँ वगैरह हर बार भारत के लिए इस बात पर सब इतना हैरान क्यों है? जल रहा हूँ धूप में जिनका घरोंदा बनकर मेरे पसीने से वही इतना परेशान क्यों है? कैद हो अगर तुम घर की दीवारों के बीच तो बेघर से पूछ दीवारों कारमा क्यों है? दो गज जगह भी नहीं मिली धरती में मुझे हम पूछते हो कि पिता आसमान क्यों है?

Details

Sound Engineer

Voice Artist

सूरज एक ही है जो सफर पर है मगर सूरज को सुबह देंखे तो ऊर्जावान, दोपहर में तपता हुआ और शाम को अस्तित्व खोता हुआ दिखता है, स्त्री भी कुछ ऐसी ही है। हालात मेरे पक्ष में हो तो वफ़ा, ममता और त्याग की मूर्ति, विपक्ष में हो तो कुलटा, वेवफा, कुलनाशिनी... ऐसे ही पता नही कौन कौन से शब्दों में तरासा जाता है उसे? स्त्री के जीवन को पुरुष के इर्द गिर्द इस हद तक समेट दिया गया है कि कभी कभी लगता है उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व ही नही है। ऐसी ही प्रेम, त्याग, कुंठा, विवाह और तलाक के भंवर में खुद को तलाशती तीन स्त्रियों का की कहानी है मेरी अर्द्धांगिनी उसकी प्रेमिका! जो एक पुरुष के साथ अस्तित्व में आई और उसी के साथ कहीं गुम हो गयी। Voiceover Artist : Ashish Jain Voiceover Artist : Sarika Rathore Author : Rajesh Anand
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