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मंथन अध्याय 12 मुक्ति मार्ग

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Manthan Written by Prabhu Dayal Madhaiya Narrated by Ashok Vyas Author : प्रभु दयाल मंढइया 'विकल' Producer : Saransh Studios Voiceover Artist : Ashok Vyas
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मंथन अध्याय बारह मुक्ति मार्ग मनुष्य के जीवन में कभी कभी ऐसे भी खडा आती हैं जब वह बिल्कुल शांत लिस्ट रहा । एकाग्रचित श्रम में ही डूब जाता है । मैं श्रम का निष्पक्ष भाव से विश्लेषण करता है । वो अपनी क्रियाओं के बारे में सोचता है । आपने वेस्ट जीवन में जाता है, अपने स्वभाव, चरित्र तथा अपनी अच्छाइयों और बुराइयों का निरीक्षण करता है । एक पल में वह संसार के अनगिनत मनुष्यों से स्वयं की तुलना का डालता है । वैश्विक ही उपयोगिता सार्थकता का मंथन कर शिवम से ही पूछने लगता है कि वह क्या कर रहा है और क्यों कर रहा है, किस के लिए कर रहा है? क्या इसके अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं है? यही वेकेशन है जब मनुष्य संसार के कर्णभेदी शोर और भागो भाग के माहौल में भी आत्मलीन होता है । योगी इसी स्थिति में पहुंच कर ही ब्रह्म के साथ सहयोग करते हैं । यही वह क्षण है जिसमें मनुष्य मनुष्यत्व में विलीन होकर परमात्मा में लीन हो जाता है है । कोई आश्चर्य की बात नहीं, अनुभव का विषय है । कभी न कभी ऐसे कुछ अमूल्य क्षण प्रत्येक मनुष्य के जीवन में अवश्य ही आते हैं । ये और बात है कि वह अभागा उन क्षणों का महत्व समझकर बेस्ट गँवाते । फिर ऐसे मनुष्य और जानवर में अंतर नहीं रह जाता । पोलू के बैल की नियति को कौन बदल सकता है? सकल पदारथ है जगह माही कर्महीन इनर पावत । नाइन कर्म मानव जीवन का अपरिहार्य अंग है । जो नर अजगर करे ना चाकरी की भावना से ग्रस्त है, वे हाथ में कमंडल लिए फटी लंगोटी में ही घूमते नजर आते हैं । स्वास्थ्य मनुष्य को यदि आपने पेट के लिए भी किसी के सामने हाथ फैलाना पडे तो उसकी इससे अधिक अधोगति नहीं हो सकती । उसका जीना मरना बेमानी है । उसी धरती का बोझ ही कहा जा सकता है । समाज पर इस प्रवृत्ति का प्रतिकूल प्रभाव पडता है, जिससे सामाजिक सांस्कृतिक संस्कार दूषित हो कर एक परजीवी वर्ग का जन्म होता है और धीरे धीरे ये महामारी राष्ट्र की जडें खोखली कर डालती है । इसीलिए समाज में ऐसी व्यवस्था अनिवार्य हो कि प्रत्येक मनुष्य अपने भरण पोषण के लिए मेहनत अवश्य ही करें । उसके कर्म का सो कर्म होना भी जरूरी हो । किसी का गला काटकर अपना हित साधना सुकर्म नहीं कहला सकता । बैठे बिठाए जो मिले वहाँ आराम है, खैरात है, छलकपट लिया जाए वह धर्म है । सूकर में अपनी मेहनत अपना पसीना अनिवार्य है । दिनभर कडी मेहनत के बाद सारा थका मजदूर जब रुकी मिस्सी खाकर गहरी नींद में होता है तो उसकी कार्यक्षमता पहले से अधिक बढ जाती है । जबकि नर्म बिस्तर पर सोने वालों को सोने के लिए नींद की गोली का सहारा लेना पडता है । लेकिन नींद फिर भी नहीं आती । शरीर बेचेन रहता है, मन में कुंठाएं कुलबुलाती रहती है और मस्त िक्ष निन्यानबे के फेर में छटपटाता रहता है । सुकर्म से प्राप्त रोक ही सूखे में भी जीवनदायी अमृत है, जबकि दुष्कर्म से मिला राज भूत भी विश्व के समान मृत्युदा आयी है । धन खाने के प्रयोग में नहीं आता खाता मनुष्य ही है । धन से तो कुछ स्थित कामनाएँ पैदा होती है । जो मनुष्य को पतन की और ले जाती है, मन उसे इस तथ्य को स्वीकार भी करता है । किंतु मैं सब कुछ जानकर भी अनजान बन जाता है और यही से उसके दुष्कर्मों का प्रादुर्भाव होता है, जो उसे मनुष्यत्व के नीचे घसीटकर पशुत्व पर लाभ पड सकता है । मनुष्य को मनुष्य बने रहने के लिए सुकर्म का मार्ग अपनाना ही होगा, जो उसका अभिष्ट है । जब भी निश्चित है कि अंततः मनुष्य को खाना नहीं है तो फिर मैं हाय तोबा क्यों पेट भरने लायक अन्य तो मनुष्य को सु काम से भी मिल जाएगा और कल कल तो करीब हैं । कल आएगा भी या नहीं । कौन जाने कल तो काल है । यहाँ तो एक पल की भी खबर नहीं । कल की चिंता में सुकर्म त्याग देना कोई समझदारी नहीं । पुरूषार्थी तो प्रतिदिन ही सक्षम है । वह अपनी मेहनत से अपने पेट लायक व्यवस्था कर ही लेगा और कर ही लेनी चाहिए और उससे भी अधिक उसे कर लेना चाहिए । संतोष संतोष से उत्तम संसार में ओर कोई स्वाद नहीं है । जिसे संतोष है वहीं उत्तम है, वहीं आस्थावान है । वह अपनी मेहनत से कमाई दाल रोटी के लिए भी ईश्वर को धन्यवाद देता है । मैं उसकी अनुकंपा का कर सकती है । इसीलिए वह उसके निकट भी है । वह दुष्कर्म को कभी प्रवक्ता हो ही नहीं सकता । जिसे संतोष नहीं, वह धन के पीछे भागता है । धन माया है एक भ्रमजाल मृगतृष्णा छलावा कस्तूरी कस्तूरी मृग की नाभि में है, किन्तु है कस्तूरी की तलाश में भागा फिरता है । उसे कस्तूरी मिले तो कहा अंततः मैं भागता भागता छटपटाकर मर जाता है । वेरी धन की भी यही स्थिति है । कहा जा सकता है कि धन के बिना मनुष्य का मान नहीं है । समाज में उसका सम्मान प्रतिष्ठा नहीं है । धन है तो सब कुछ है । घनी मनुष्य की जयजयकार होती है । धनी मनुष्य ही सुसभ्य, सुसंस्कृत, कुलीन अभी जाते हैं । धन से संसार की समस्त सुख सुविधाएं प्राप्त की जा सकती है । बीमारी के इलाज के लिए वह अमेरिका जा सकता है जबकि धनहीन, संतोषी, कुकर्मी व्यक्ति अपने झोपडे में ही छटपटाकर प्राण त्याग देता है किंतु ये अर्ध सकते हैं । यदि हम सच्चाई देखें तो वास्तविकता ये नहीं है । सुख कर्मी कभी विवश को ही नहीं सकता । मैं प्रतीक स्थिति के लिए पहले से ही तैयार रहता है । वह तो दुख, सुख, मान अपमान सबके लिए ईश्वर की कृपा मानकर झोली फैलाए रहता है । जब याचक इतना आस्थावान निष्पाप संयमी हैं तो उसका दाता मिस्टर कैसे हो सकता है । ऐसे कुकर्मी पर ईश्वर अपनी दया कि प्यार की वर्ष करता है और उसे अपने रस्से साडी रस मग्न रखता है । धन के लालच में देश के प्रतिष्ठित व्यक्ति राष्ट्र के तिलक, अपना मान सम्मान, प्रतिष्ठा, कुलीनता, सुष्मिता सबकुछ गवा बैठे प्रतिदिन तो हम देख रहे हैं हमारे देश के अगर गन्नो की धूल में गिर सकती इज्जत क्या वे धन खाते रहे? क्या उन्होंने सोने के निवाले निकले थे? खाता तो वह नहीं था किंतु कुकर्मों से कमाया हुआ धन उनका सब कुछ ले डूबा । आज भी समाज में मुंह दिखाने लायक भी नहीं है । क्या काम आया? धान धान माया है, भ्रमजाल है । मैं कृष्णा है, जो एक से दस सौ हजार लाख करोड अरब खरब की हविष्य में फैलता चला जाता है । राम का चस्का एक बार लग जाए तो फिर कभी नहीं छूटता । छूटते हैं व्यक्ति के संस्कार सुकर्म तो मार्ग और वह शनि शनि आपकी दलदल में दस था, चला जाता है । फिर उसका नामोनिशान भी नहीं बचता । जीवन भर भागते रहने के पश्चात जब मनुष्य थक हारकर निस्तेज होकर एकांत में बैठ जाता है तो वह अपने जीवन की कैसे को एकाग्रचित होकर देखता है । वह पाता है कि वह तो इस उसके लिए वेट हि भागता रहा हूँ । माँ बाप, बेटा, बेटी, पति पत्नी पारिवारिक गटक हैं । इन घटकों से ही समाज का निर्माण होता है । ईश्वर ने प्राणी मात्र में मोहपाश की एक आदर्श डोरी बांधी है । इसीलिए माता पिता, बेटा, बेटी, बहन, भाई परस्पर जुडे हुए हैं । कुछ शारीरिक तथा सामाजिक आवश्यकताएँ भी उन्हें जोडती है । पारिवारिक जुडाव नैसर्गिक है । वैसे भी मनुष्य मनुष्य का जुडाव, मानवहित और सामाजिक समस्या के लिए अनिवार्य है । मनुष्य में जुडाव न होने से संसार के विध्वंस की संभावनाएं उत्पन्न हो जाती हैं । केवल प्रभुत्व की कामना से ही मनुष्य मनुष्य का छतरू बने तो ये मनुष्य की पाशविकता है, राक्षसी प्रवृत्ति है, हिंसा लोलुपता है । विवेकशील मनुष्य में ये दुर्गुण अपेक्षित नहीं है । मनुष्य तो ईश्वर का प्रतिरूप है । उसमें तो शांति क्षेत्र, लता, करुणा, परोपकार के सद्गुण अभिष्ट हैं किंतु धन का भ्रमजाल मनुष्य का विवेक तथा उसके समस्त सदगुण नष्ट कर डालता है । मनुष्य अपने साथ दे को भूल कर व्यर्थ के झंझटों में भागा फिरता है और अंतिम पडाव पर निसहाय होकर आपने दो लाख मानव जीवन को वीर गंवाने के पश्चाताप में सिर्फ होता है । मनुष्य आता भी अकेला है और जाता भी अकेला ही है । कोई भी सगा संबंधी उसके साथ नहीं जाता । इसीलिए यदि मनुष्य समय रहते ही संभल जाए और संयम संतोष से सुकर्मों में लीन परोपकार कर जाए तो उसका जीवन सफल हो जाता है तो ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है । यह संसार नश्वर है । इसके समस्त पदार्थ, धन दौलत, रंगरूप सब नश्वर हैं । फिर भी इसमें आशक्ति ये है मनुष्य का दुर्भाग्य है, उसकी दूर्दशा का मूल है । वो धन की कामना करता है ताकि वह शक्ति प्राप्त कर सके । शक्ति सत्ता में निहित है किंतु मनुष्य की सत्ता, उन्हें धोखा, सत्ता केवल परमेश्वर की है । वहीं पर हम शक्तिवान है । परम सत्ताधारी शक्ति जल में हैं, वायु में है, प्रकाश में है जिनसे संपूर्ण ब्रह्मांड स्थिर है । ईश्वर ने जल, वायु, प्रकाश का संचय नहीं किया । वह अपनी ये अमूल्य निधियाँ सबको मुफ्त में देता है, खूब देता है और निरंतर देता है । क्या मनुष्य इस का संग्रह कर सकता है? इन्हीं शक्तियों से संसार गतिमान है । आह्वान है इनके अभाव में सब सुनने है । अंधकार में जब ईश्वर ने अपनी शक्ति का संचय नहीं किया, उसे किसी से छिपाया नहीं । जीवन के लिए, गति के लिए, उल्लास के लिए, बिना किसी भेदभाव के, प्रत्येक जीव के लिए उन्मुक्त छोड दिया तो मनुष्य उसी शक्ति से जीवन पाकर उसी पर अधिकार करने लगा किंतु है इन पर अधिकार कर ही नहीं सकता । पूरे का प्रकाश दिनभर उपलब्ध है । आप प्रकाश प्राप्त करें । चोर ऊर्जा प्राप्त करें किंतु उसका संग्रह नहीं किया जा सकता है । प्रयास के पश्चात समस्त उपकरण निष्क्रिय हैं । जल के प्रभाव तथा वायु की गति से ऊर्जा प्राप्त कीजिए किंतु इनमें स्थिरता आते ही आप ऐसा है । आप कुछ नहीं कर सकते हैं । ये मनुष्य की रिश्ता है । ईश्वर के सम्मुख उसकी लगता है । ईश्वर का स्पष्ट संकेत है कि केवल अपनी आवश्यकता अनुसार ग्रहण करो । किसी को भी कभी कोई कमी नहीं आएगी । प्रतीक की आवश्यकता स्वामी वपूर्ण होगी । अर्थार्थी किसी भी मोड बंधन में मत पडो । सबसे निर्लेप मिस्टर है । संयम से जीवन यापन करो । अपनी आवश्यकता के लिए सुकर्म करो । यदि तुम परोपकार कर सको तो आपके लिए बोनस है अन्यथा दूसरों के लिए व्यवधान मत हूँ । संसार से मुक्ति का यही एक मार गए । प्रभु सबको सद्बुद्धि प्रदान करें ।

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Manthan Written by Prabhu Dayal Madhaiya Narrated by Ashok Vyas Author : प्रभु दयाल मंढइया 'विकल' Producer : Saransh Studios Voiceover Artist : Ashok Vyas
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