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मंथन अध्याय 07 हास

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Manthan Written by Prabhu Dayal Madhaiya Narrated by Ashok Vyas Author : प्रभु दयाल मंढइया 'विकल' Producer : Saransh Studios Voiceover Artist : Ashok Vyas
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अच्छा मंथन अध्याय सात बार मानवीय प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि मनुष्य एक सीडी ऊपर चढता है तो वहाँ दो सीढियां नीचे आ गिरता है । मैं गिर गिरकर उठा है । इसीलिए उसके निरंतर कठिन परिश्रम पर लेशमात्र भी संदेह नहीं किया जा सकता है । आदिकाल से ही वह प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते आ रहा है और बार बार ठोकर खाकर फिर नए अनुभव तथा अधिक उत्साह के साथ मैदान में उतारा है । उसने एक एक चीज को कई कई बार जांचा परखा है । प्राकृतिक मूल पदार्थों में कोई भी तो ऐसी चीज नहीं जिसमें मनुष्य ने अपनी सुविधानुसार परिवर्तन नहीं किया हो । वनों को, पहाडों को, समुद्र को, वनस्पतियों को, आकाश को उसने अपनी आवश्यकता अनुसार प्रयुक्त किया है । मनुष्य को मशीन और मशीन को मनुष्य तो मैं बना ही चुका है । अब यदि कुछ शेष है तो मनुष्य का जड हो जाना बचा है । भौतिक सुविधाओं के सुलह होने से मन से धीरे धीरे निष्क्रिय होता जा रहा है । प्राप्त होकर इटली से रात को सोने तक अब उसे हाथ पाँव हिलाने की आवश्यकता नहीं है । उसका प्रतीक कार्य मशीन करती है । मनुष्य और मशीन में केवल इतना अंतर रह गया है कि मनुष्य को अब भी उदरपूर्ति करनी पडती है । दैनिक नित्य कार्यों के लिए उसे सोच पाखाना जाना पडता है । इसके अतिरिक्त उसके निर्जीव मशीन होने में कोई कमी नहीं है । उसकी संवेदना मर चुकी है । उसके वजह मैं मानवता का लोग हो चुका है और पारिवारिक संबंधों का निरंतर खास होता जा रहा है । आज का सुविधा होगी । मनुष्य इतना आरामपरस्त हो गया है कि यदि भोजन उसके मुंह में अपने आप चला जाए तो संभव है वह हाथ हिलाने तक का कष्ट उठाना उचित ना समझे । वो स्वादिस्ट पोस्टिंग व्यंजन खाता है । गद्देदार नर्म बिस्तर पर सुख की नींद होता है । गर्मी सर्दी से उसे कोई सरोकार नहीं है । वातानुकूलित भवनों में रहता है । यदि किसी रात उसे भरपूर नींद ना आए तो नींद नहीं आने के कारणों की खोज में विशेषज्ञों की टीम आकाश पाताल एक कर देती है । घर की बिस्तर कि वातावरण की जैविक, रसायनिक, राजनीतिक एवं सुरक्षा की दृष्टि से जांच की जाती है । अन्य जल, डूसू, प्रत्येक खाद्य पदार्थ का शुक्र अन्वेषण किया जाता है । मनुष्य अब साधारण मानव नहीं रहा । वह वीवीआईपी व्यक्ति बन गया है । अब तो उसे ठीक भी आती है तो जमीन कांपने लगती है । आसमान थर्रा उठता है । मनुष्य के हाथ का एक महत्वपूर्ण कारण उसका अहंकार तथा परिजीवी होना है । मनुष्य मनुष्य में एक जोडी खाई बन गई है जो तीनों दिन और छोटी होती जा रही है । एक व्यक्ति जेड श्रेणी की सुरक्षा में घर से बाहर निकलता है । बुलेट प्रूफ, काले शीशे की कार अथवा विशेष ध्यान में यात्रा करता है । खाने में, पीने में, घूमने फिरने में बहुत सावधानी बरती जाती है । सीधे सीधे वो किसी से बात नहीं करता, किसी से मिलता भी नहीं । प्रत्येक कदम पर मध्यस्थ उसके साथ रहते हैं । ये सचिव सलाहकार एक एक विषय पर गहन विचार करके उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं तो उपायों की भारतीय झुककर चलने वाले जंगली मानव ने कभी इसकी कल्पना भी नहीं की थी कि वह तो खट्टे मीठे फल फूल कडवे थी, के कंदमूल खाकर धूप गर्मी में झुलस कर ठंड में एट सिकुडकर प्रतिद्वन्दियों से लडकर नुकीले पत्रों पर होता था । प्राकृतिक आपदाओं से जूझता हुआ एडियां रगडकर मर जाता था । आज भी मनुष्य कहलानेवाले असम के प्राणी पाषाण युग की यातनाओं में ही जी रहे हैं । चाहे उनके दो हाथ और दो पाँच हो गए हैं । सिर से सिंह और पीठ से पूछ हट गई है मगर साथ ही साथ उसके दातों की धार और मुश्किल आपन भी भोथरा हो गया है । रक्त पिपासा की तीव्रता समाप्त हो गई है । आज तो वह भूख से त्रस्त हालत से फस्ट मारा मारा फिरता है और जवानी से पहले ही झुककर चलने लगता है । मनुष्य का मनुष्य द्वारा शोषण भी मानवीय प्रगति के हाथ का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण है । ज्ञान विज्ञान और भौतिक विकास की पराकाष्ठा यह है कि भौतिक चकाचौंध में सोने चांदी की खनक में रूप की सडक में मनुष्य मनुष्यता से बहुत आगे निकल गया है । आज उसका अपना कोई इस नहीं, परहित उसे अभिष्ट नहीं, केवल अवसर अनुकूल किसी के भी सामने वह हाथ जोड देता है । स्वार्थ सिद्धि में मैं कहीं भी सिर झुका देता है । मैं ईश्वर को नहीं मानता, किन्तु अपना काम निकालने के लिए वह हर किसी के भगवान को मानने लगता है, क्योंकि अब वह राजनीतिक दांवपेच जानने लगा है । वैसे ईश्वर की आराधना के लिए उसके पास समय नहीं है, लेकिन राजनीति का जाल लेकर शतरंज की चाल चलता हुआ । नंगे पांव किसी भी दुर्गम से दुर्गम पूजा स्थल पर पहुंच जाता है । ईश्वर को वह मानता नहीं, इंसानियत को जानता नहीं । केवल ढोंग प्रपंच, स्वांग, शब्दजाल वाक के जाल माया जाल ही पहचानता है । प्रत्येक वस्तु के उत्कर्ष की भी एक सीमा होती है । बहुत एक प्रगति उत्कष्ट पर है । फिर भी यदि उसे उसमें अभी कुछ और गुंजाइश है तो जैसे जैसे वैज्ञानिक विकास होता जाएगा, मनुष्य बीसीडी, डर, सीडी और ऊंचा होता जाएगा । संभव है एक समय ऐसा भी आए जब मनुष्य वायु पर निर्वाह करने लगेगा । सुगंध से चलने लगेगा । लेकिन जीवन निर्वाह तो तब होगा जब मनुष्य के सांस लेने योग्य स्वच्छ वायु बचेगी । सुगंध देने वाले पेड उपलब्ध होंगे । वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए संभावना तो ये है कि कुछ समय बाद पथरी पर पेड पौधे ही नहीं होंगे । ऊंची ऊंची गगनचुंबी इमारतें ही शेष होंगी, जिसमें मनुष्य के लिए केवल एक शायिका पर रात काटने भर का जुगाड होगा । सडकों पर हाईस्पीड स्वचालित वहाँ तोडेंगे आकाश में निजी वायुयान नजर आएंगे । आदमी टेबलेट खाकर निर्वाह करेगा । फिर ना उसे भोजन की आवश्यकता होगी और न पानी की । फिर उसे नित्य कार्यों की भी जरूरत नहीं पडेगी । मनुष्य तथा रोबोट में कोई अंतर नहीं रह जाएगा । आदमी फिर चौपाया बन जाएगा । प्रकृति का नियम है कि उत्कर्ष के पश्चात खास आरंभ हो जाता है और धीरे धीरे विकास की गति रुक जाती है । फिर पतन का दुष्चक्र तेजी से घूमने लगता है । अनुभव बताता है कि कोई केवल गुड खाकर अधिक समय तक जिंदा नहीं रह सकता । अच्छा हूँ

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Manthan Written by Prabhu Dayal Madhaiya Narrated by Ashok Vyas Author : प्रभु दयाल मंढइया 'विकल' Producer : Saransh Studios Voiceover Artist : Ashok Vyas
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