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मंथन अध्याय 06 उत्कर्ष

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Manthan Written by Prabhu Dayal Madhaiya Narrated by Ashok Vyas Author : प्रभु दयाल मंढइया 'विकल' Producer : Saransh Studios Voiceover Artist : Ashok Vyas
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मंथन अध्याय छह उतकर मानव विकास की स्वर्णिम गाथा अनंत है । प्रमाण बताते हैं कि आदिकाल में मनुष्य भी चौपायों की भर्ती झुककर चलता था और उसकी एक लंबी पूछ तथा दो सीन होते थे । घोडे की तरह मजबूत, उसकी खुलते और कच्चा मांस खाने के लिए शेर, चीते जैसे धारदार नुकीले दांत होते थे । यदि उस समय के जंगली मानव को आज के मक्खन जैसे मुलायम नाइट लैंप की मध्यम रोशनी में कुशल बैठ पर वातानुकूलित कमरे में सोने वाले मनुष्य के सामने खडा कर दिया जाए तो उसका कलेजा फट जाएगा, जबकि विश्वम उसी कंटीली बेल का ही आज परिष्कृत फल है । आपकी खोज और पहिए के आविष्कार के बाद मानव विकास की गति में निरंतर वृद्धि होती चली गई । आज का मनुष्य पृथ्वी की नहीं, अंतरिक्ष की बातें करता है । कंप्यूटर नाम के छोटी सी यंत्र द्वारा उपग्रह के माध्यम से वहाँ संपूर्ण ब्रह्मांड पर दृष्टि जमाए बैठा है । अब उसे हाथ पैर हिलाने की भी आवश्यकता नहीं है । उसका प्रत्येक छोटा बडा काम स्वचालित यंत्र करते हैं । हजारों लाखों मील दूर बैठे व्यक्ति आपस में ऐसी बातें करते हैं, जैसे वे आमने सामने बैठे हैं । कोई भी लिखित संदेश वैसे का वैसा फैक्स मशीन द्वारा क्षण भर में पृथ्वी के इस छोर से उस छोर पर तत्काल भेज दिया जाता है । संसार में कहीं भी आयोजितकार्यक्रम को वहाँ सेटेलाइट के द्वारा अपने टीवी सेट पर घर बैठे देख सकता है । दनादन दौडते द्रुतगामी वाहन में बैठा बैठा ही फोन पर हवा में बातें करता है और संसार में प्रत्येक क्षण घटित होते घटनाक्रम की अधतन जानकारी रखता है । कहा जा सकता है कि मन उसे अब सर्वज्ञ हो गया है । मानव विकास की प्रगति देखकर उसके निरंतर कठोर परिश्रम के समुख अपने आप ही सिर झुक जाता है । विज्ञान ने दुर्गम जंगलों, निर्जन कंदराओं में मारे मारे भटकने वाले पशुतुल्य मानव को धूप, गर्मी, सर्दी, बर्फ से बचाकर आज वातानुकूलित भव्य बंगलों में पहुंचा दिया है । खाने को स्वादिष्ट पौष्टिक व्यंजन और मनोरंजन के नाना साधन उपलब्ध करवा दिए हैं । मानव ने पाषाण युग से अब तक जितना कष्ट झेला था, उसे उसका मधुर फल भी प्राप्त हुआ है । आज उसके पास शक्ति है, साधन है, सुविधा है । संस्कृति और सभ्यता में तो वे विश्व का शीर्षतम प्राणी है ही । शिक्षित तथा तो सब होने के कारण वह प्रकृति के रहस्यों को जान गया है । वहाँ प्रत्येक घटना का कारण बता सकता है और कब, क्या होगा । इसकी पूर्व घोषणा भी कर सकता है, पत्थरों की पेडों तथा जीवों के अवशेषों की आयु का सही अनुमान लगा सकता है और ये भी बता सकता है कि अच्छा सागर में कहाँ खनिज, तेल, गैस मिल सकती है अथवा पृथ्वी के गर्व में कहाँ क्या छिपा हुआ है । मनुष्य ने जलकी वेगवती धारा को छोड दिया है, सागर के तथा जल को बांध दिया है । बरसात के अनियंत्रित पानी से गांव गांव डूब जाते थे, करोडों की संपत्ति नष्ट हो जाती थी किंतु मानव कौशल ने इस अपूरणीय क्षति को काफी सीमा तक नियंत्रित कर लिया है । उसने तथा जल पर न केवल बडे बडे डैम बनाकर उस पर काबू पाया है बल्कि तबाही मचाने वाले पानी से बिजली बनाकर अनेक कठिन कार्य सरल कर दिए । पुल, सडक भवन निर्माण में तो उसने कीर्तिमान स्थापित की ही है, गगनचुंबी इमारतें और हवा में झूलते पुर उसकी अद्भुत कला के नमूने हैं । ईश्वर के प्रति उसकी आस्था में कोई कमी नहीं है । मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे चार तथा अन्य पूजा स्थलों की पूरे संसार में भरमार है । समुद्र के बीच में पहाडों की चोटी पर सघन वनों और दुर्गम मार्गों की कष्टपूर्ण यात्राओं के बावजूद मनुष्य वहाँ खींचा चला जाता है । इसे उस सर्वशक्तिमान की इच्छा माना जाता है । भोलेनाथ ने याद किया है चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है और मनुष्य ठिठुराती ठंड उबलती गर्मी में कितने भी कस्ट आए । पांव में छाले पड जाने पर भी वह थोडा चला जाता है । उबलते रेगिस्तानों में ईश्वरीय भक्ति उसे प्रेरित करके खींच ली गई और मनुष्य ने अपनी श्रद्धा अनुरूप भव्य पूजा स्थलों का निर्माण कर दिया । उसने अपनी कल्पना कि इस को पत्थर में धातु में कागज पर उतारा और उसे सुंदर पूजा स्थलों में प्रतिष्ठित किया, धर्मावलंबियों के ठहरने की, भोजन की व्यवस्था की तथा पवित्र प्रवचनों का आयोजन किया । मनुष्य ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में असीम प्रगति की है । उसकी उपलब्धियों की बात करें तो वह आज सर्वज्ञ जान पडता है । यदि अभी मैं ईश्वर नहीं हो सकता है तो उससे किसी बात में काम भी प्रतीत नहीं होता । ईश्वर अदृष्य है और उसकी कार्यप्रणाली गोपनीयत किन्तु मनुष्य का प्रतीक कार्य गोचर स्पष्ट खुला है । जिसे कोई भी समझ सकता है, देख सकता है अपना सकता है । मानव विकास की स्वर्णिम गाथा अनंत है । सच बात तो ये है कि मनुष्य की उपलब्धियों की कोई सीमा नहीं है । युगों युगों के उसके अथक परिश्रम तथा बार बार ठोकर खाकर पाए अनुभव ने उसे प्रकृति का स्वामी बना दिया है । आज वह श्रृष्टि का नियंता है । ये मानवीय विकास का चरमोत्कर्ष है । आशा है कि वह भविष्य में भी इसी भांति निरंतर प्रगति करता जाएगा और मनुष्य के लिए और भी आनंदपूर्ण तथा सरल जीवन के नए नए साधन खोज कर संसार के विध्वंस के सहारे को नियंत्रित करके सबको भयमुक्त जीवन जीने का वातावरण उपलब्ध करवा सकेगा ।

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Manthan Written by Prabhu Dayal Madhaiya Narrated by Ashok Vyas Author : प्रभु दयाल मंढइया 'विकल' Producer : Saransh Studios Voiceover Artist : Ashok Vyas
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