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भाग - 07

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लड़की की शादी होते ही और उसके ससुराल चले जाने पर किस तरह अपने पराए और पराए अपने हो जाते हैं, रिश्‍तों के इस भंवर को बीना न समझ सकी। और उसकी इस नासमझी ने पति-पत्‍नी के बीच दरारें आ गईं। उनके फूलों से सुखद जीवन में कांटों की चुभन पैदा कर दी। यह बात बीना को बहुत देर से समझ में आई कि उसके दांमपत्‍य जीवन में कटुता लानेवाली कोई और नहीं उसकी अपनी मां ही है। छोटी-छोटी बातों से गृहस्‍थ जीवन में किस तरह विष घुलता है और कैसे इससे बचा जा सकता है… इस उपन्‍यास में बड़ी रोचकता से बताया गया है। Writer: रा. श्याम सुंदर
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भारत सात राकेश को पहले उतारा कि शादी हो जाने के बाद बिना कि फोन का इंतजार था । वो एक सप्ताह तक तो यही सोचता रहा कि या तो बिना फोन करेगी शादी बिहा की झंझट से छुटकारा पाते ही घर वापस चली आएगी । पहले तो माँ थी इसलिए मायके चली गई थी । अब उसी मायके टहल जाने की क्या जरूरत है? फिर जब उसकी मुझ से कुछ कहा ही नहीं था तो राकेश कैसे समझ जाता है कि अब बीना लौट कर नहीं आएगी । वैसे वो समझ सकता था की तारा की शादी पर न जाने के कारण बिना जरूर नाराज हो गई होगी लेकिन नाराज होकर मायके में ही ठहर जाएगी । ऐसा तो उसने ख्वाब में भी नहीं सोचा था । लेकिन जब बीना शादी के एक हफ्ते बाद भी नहीं आएगा तब उस की आशंका विश्वास में बदलने लगी । उसे लगा कि अब देना मानी बनकर मायके में रह जाएगी और वो अपेक्षा करेगी कि वह जाकर उसे मनाकर वापस बुरा लाए । लेकिन राकेश ने सोचा कि जब बीना इतना नहीं समझ सकती कि वहाँ उसकी पगडी उछाली जा रही है और उसकी पोजिशन वह करियर का मजाक उडाया जा रहा है इसलिए राकेश वहाँ नहीं जाना चाहता । तो बीना की हटधर्मिता के कारण वो उनकी आगे झुक जाए । गया । बिना अगर इस बात पर जवाब डाल दी है कि राकेश की वहाँ बेज्जती होने के बावजूद वहाँ उठे बैठे और उनके साथ घुल मिल कर रहे, तो ये उसका बचपना होगा । वो ऐसा मूर्ख नहीं है कि अपमानित होने के बाद भी वहाँ दो रोटियों के लिए चला जाएगा । कोई कितनी वापस खाता है या सच्चा आगे इससे किसी को क्या सरोकार है, बेटी भी है । इसलिए उन्हें अनुचित बोलने का हक तो हासिल नहीं हो जाता । फिर बिना को उसने अभावों में तो नहीं रखा है । हाँ, इतना जरूर है कि बिना कुछ ज्यादा अपेक्षाएं रखने लगी थी उससे और वह यह अपेक्षा पूरी नहीं कर पाया था । अगर उसकी आशाएं वह उपेक्षाएं उसके बूते के बाहर हूँ तो क्या करें? अपनी नई नवेली दुल्हन को खुश रखने के लिए कहीं से कर्ज तो नहीं ला सकता? यह कोई सामान गिरवी तो नहीं रखा जा सकता । जितना उसके हाथों होगा, उतना ही तो वह कर पाएगा और करता आया है बिहार के पहले भी जब पीना को साडी खरीद कर दी । उसने बहुत जहाँ था कि बिना पूर्णिमा सिल्क हाऊसेज तरीके बेलबूटों वाली आठ सौ रुपए कि वह कीमती साडी ना खरीदें । मगर जब दमयंती ने उसी चुप रहे जाने के लिए कहा तो वह चुप कर गया । जितना हो सका पीना को ढील दिखाई । अगर इससे ज्यादा ढेल दिखाता तो शायद वो कर जो में डूब गया होता । हर एक मनुष्य की अपनी क्षमता होती है और वह अपनी अहमद कि पटरियों पर ही चल पाता है । मोटर गाडियों के लिए प्रशस्त मार्ग होता है और हवाई जहाज के लिए विशाल विस्तृत आसमान । लेकिन रेलगाडियों के लिए समानांतर बची हुई पटरियां रहती है । हवाई जहाज की गोते खाकर उडान भरते हुए वो मोटर गाडी को अपनी इच्छा से टेडी मेरे सर पर भागते हुए देखकर रेलगाडी को अपने पटरियों से उतारकर तो नहीं चलाया जा सकता । हमारी तो पटरियों से बनी बनाई आमदनी हैं और उसी के अनुसार गुजर होगी । उन पटरियों से उतरकर कहा ये प्लेन की हो तो नहीं लगाए जा सकती । अगर बिना के मन में ऐसी महत्वकांक्षाएं थी तो किसी से चाहूँ कार के लडके से प्यार कर लेती । उसके साथ क्यों शादी कहीं अब शादी के बाद उसी होल्ड करने के लिए क्यों साथ ही है जबकि वो जानती है कि उसकी इतनी ही क्षमता है आठ दस दिन राकेश को अकेला अकेला घर खाने को दौडने लगा । ऐसे तो वह सवेरे कॉलेज जाकर शाम को ही लौटा था । इन दिनों वो शाम को कभी चौबीस प्रेस में कभी विद्या मंदिर में जाकर बैठ जाता था और काफी समय गपशप करके रात को होटल में खाते कर लौटा था । फिर भी जब रात को उसे नींद नहीं आती और बीना की सहसा याद आ जाती और विकेट की कुछ एक अविस्मरणीय घटनाएं याद हो आती तो बीचे हो कर घर में ही चहल करनी करने लगता भी सोचता है कि इससे तो बिना कुछ जाकर लीवाला फिर स्वाभिमान से भरकर वो इस ख्याल को छोड देता । कुछ एक दिन उसी उठते बैठते बिना की आज बताने लगी और रात को तो उसकी जैसे कल्पना करके ही वो उत्तेजित होता था । फिर धीरे धीरे जब तक की को आलिंगन में लेकर उसे खराटे दार नींद आने लगी तो उसे लगा कि होटल का खाना खाकर बेजारी से चलने लगी है । वो खाना पकाने नहीं जानता था । हाँ, कभी कबार चाय काफी बना लेता था । वैसी उसे स्टोर भी ठीक से चलाना नहीं आता है । एक बार जब उसे आग दिखाकर स्टोर कोपेल लगाई और तुरंत खूब बंद कर दिया तो भाव अगर एक लड्डू थी और उसकी थोडी सी फोर इंडिया को आज आ गई थी, तब से उसके मन में अज्ञात सब भय बना रहता है । तब से अब स्टॉप चलता भी है तो काफी सतर्क होकर और डर डर कर चलता है । वैसे वो सोचता है कि अगर इस वक्त आ जाए तो कितना अच्छा हो । अगर मैं आ गई तो उसकी जिंदगी फिर से लहलहा उठेगी और वो शादी के इस प्रकरण को ही जैसे बुला देगा । लेकिन उसने जब दयाल मामा को खत्म का और वहाँ से जवाब आया कि दमयंती दो तीर्थ यात्रा करने चली गई है तो वो बेहद उदास हो था । उसे लगा और इसके बिना घर जैसे खाली खाली सा लग रहा है । राकेश ब्याज से पहले सोचा था कि लाॅ तो वो हो ही गया है और हमारे पास भी है । इसलिए क्यों ना थीसीस लिख कर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त कर ले । जैसे भी उसे साठोत्तरी हिंदी कहानी में काफी दिलचस्पी रही है । उसके पास उत्कृष्ट साहित्य पत्रिकाओं का काफी संकलन था और उसने कई एक पत्रिकाओं के अनेक वर्षों के अंक जिन्द करवा कर दिए थे । उसने नहीं खानी के ऊपर लिखी गई काफी विवेचनात्मक पुस्तकें भी इकट्ठी कर रखी थी । झट उसने विश्वविद्यालय में एक विषय का पंजीकरण करा लिया । साठोत्तरी कहानी आधुनिक समाज के परिपेक्ष्य में और वह टीस लिखने बैठ गया । लेकिन जब अचानक उसका बयान तो हो गया और शादी के बाद घर पर टंटा फसाद होने लगा तो उसने अपनी किसी स्थगित कर दी थी । अब उसे लगा कि क्यों ना वहीं किसी बैठकर पूरी कर ले । पैसे भी । आजकल उसे काफी समय रहता है और घर में भी एक प्रकार की अजीब सी शांति छाई रहती हैं । कोई शोर शराबा नहीं, कोई झगडा फसाद नहीं । कोई रुकावट डालने वाला चूडियां नहीं और कोई आचल नहीं । जो सहेजी उसका ध्यान अपनी और खींचने । वह दिन रात थीसीस लिखने में जुट गया । उसकी मेज पर कई कि दावे खुल गए और फुल स्केप की कई शीट फाडी वह लिखी जाने लगी । इन दिनों वो एकाग्रचित ऐसा कुछ छूट गया कि उसे समय का खयाल ही नहीं रहता । शाम को लौटे ही मेज पर छूट जाता और किसी से कितने रहता । फिर जब थकान मिटाने के लिए अंगडाई लेता और देखता की आंखें नील में बोझ हुई जा रही है तो उसकी नजर बाई कलाई पर बनी गाली पर चली जाती और वो देखता की जांच की दो बच गए हैं या ढाई बज गए हैं तो अपनी उंगलियों को चटकाता हुआ और टेडी तर्जनी को सीधा करता वह सोने चला जाता । जिस दिन राकेश ने किसी पूरी करके भेज दी उस दिन उसे राहत की सांस ही उसे लगा कि जैसे एक बडे कर्तव्य के भारतीय छुटकारा पा गया है । दो चार दिन तो राकेश आयाम करता रहा और खून नींद लेता रहा लेकिन फिर बेकार हो गया और सोचने लगा कि अब क्या करें । होटल में खाना खाकर और अनवरत परिश्रम करके किसी लिखने से उसका शरीर गिर गया और उसे खासी सी रहने लगी थी । वैसे तो इन बातों से नहीं घबराता मगर जब उसकी पसलियों में भी दर्द होने लगा और उसे अपनी पसलियां कभी कभी नाम, नाम सी लगने लगी और हम कार्ते वक्त उसे ज्यादा ही बलगम गिरने लगी तो वह चिंतित होता था । एक दिन तो उसके बलगम में कुमकुम के छोटे से टीके की तरह खून का एक कतरा चमकने लगा और वो इतना देख कर ही बुझता गया । उसे कहीं दबे दिख तो नहीं हो गया है । इतना सोचते ही उसका माथा चकराने लगा और वो फटी फटी आंखों से छत को देखता हुआ जाकर लेट गया । उसे सोचा की अगले हम कार में खून के थक्के के थक के निकल आएंगे । इस विचार मात्र से वह फस्ट पड गया ये क्या हो गया उसे । अब तो उसे अपना एक से करवाकर अस्पताल में दाखिल हो जाना पडेगा । अस्पताल में इलाज के लिए जाने कितने दिन ठहरना पडेगा यहाँ दमयंती और बिना भी तो नहीं है क्यों? नबिया को फोन कर के गहनें की वो बीमार है और वो तुरंत चली आई नहीं नहीं ये तो फिर अपनी यहाँ है वो मुस्कुरा पडा अपनी जीत क्या अपनी हार क्या पति पत्नी के दांपत्य जीवन में कोई विजेता और कोई विजिट भी रहता है क्या? दोनों तो सब वैसे जीवन के साथ ही है । दुख सुख के भागीदार है । सुख में एक दूसरे को चूमते चाहते हैं और दुःख में एक दूसरे को सहलाते ढांढस बचाते हैं । दोनों आपस में कभी टकराते हैं तो कभी एक दूसरे के सामने झुक जाते हैं । कहीं ऐसा तो नहीं है कि ज्यादा पढा लिखा रहने के डब्बे में उसने बीना को समझने की कोशिश ही नहीं की । पहले तो माँ के साथ पीना लडती झगडती रही तब तो दो लोगों की दो पीढियों की टकराहट समझकर वो चुप रहा । लेकिन जब माँ भी दयाल मामा की यहाँ चली गई तो फिर इन दोनों में ये टकराहट क्यूँ बिना अपने मायके से जाने कौन कौन सी अपेक्षाएं आशाएं लिये ससुराल आई थी मगर वो उसके प्रति निष्ठुर ही बना रहा । मानक बीना महत्त्वाकांशी है इसलिए उसकी सब अपेक्षाएँ आंका जाए । अनुचित तो नहीं है वो अपनी तमाम अपेक्षाएं तो पूरी करने के लिए नहीं कह रही थी । सिर्फ दो एक अपेक्षाएँ थी जो छोड नहीं सकती थी किसी को बिहार लाना और उसकी उमंगों को तिरस्कृत करके उसी सिर्फ ये कह देना की जो है उसी से अपने आप को एडजस्ट कर लो । गे तो एक प्रकार से अन्याय ही हुआ । ज्यादा पत्नी से यह अपेक्षा रखनी कि वह अपने मायके जैसी भी रही हूँ । जितनी भी सुख सुविधाओं में वह आनंद की पडेंगे, भरती रही हूँ वो आकर यहाँ वही सब कुछ स्वीकार कर लेगी जो कुछ उपलब्ध है तो वो सबसे बडी मोरकट्टा होगी । उसी के साथ अत्याचार करना है । ये तो ऐसा हुआ जैसे बनी बनाई रसोई की थाली किसी के सामने रख दी जाएगी और उसे कह दिया जाए कि यहाँ तो यही खाने को मिलेगा । खाना हो तो खाओ वरना अपना रास्ता नापो । ऐसा होटल में हो सकता है, घर पर नहीं । घर में तो हर एक की रूचि को ख्याल में रखकर खाना पकाया जाता है । फिर जहाँ आदमी को जाने कितने साल रहना हूँ, वहाँ वो ऐसी पाबंदी का बोली क्यों करेगा? एक दिन के लिए गुजर बसर करने नहीं आई थी । देना वहाँ जीवन साथ निभाने के लिए आई थी और उसकी अपनी ही को पल इसी आशाओं को पनपने का मौका ही नहीं दिया । उसने सिर्फ निर्ममतापूर्वक उसकी तमाम आशा को कुछ चलता गया । फिर बिना मांगती भी क्या थी वही ना कि वो एक स्कूटर खरीद ले और हम एक्सटेन्शन में मकान बदलने चार । एक हजार में स्कूटर मिल जाएगा और मकान बदलने में से किराये में कोई खास फर्क नहीं पडेगा । इस समय से अचानक याद आया कि उसने पिछले छह महीनों में तीन एक हजार बैंक में जमा कर दिए हैं । अब अगर एक हजार का कहीं से भी इंतजाम कर ले तो वह बडी आसानी से एक सेकंड है, स्कूटर खरीद सकता है । जहाँ एक्सटेंशन में मकान बदलने का सवाल तो वो भी कोई ऐसी बात नहीं है जो हल्ला की जा सके । सिटी एरिया की तरह वहाँ पर तो इतनी पेशगी लेते नहीं । चार महीनों को किराया पेश्के लेते हैं जहाँ किराया से थोडा बहुत किसी और जरिए से इंतजाम किया जा सकता है । स्कूटर के खर्च के लिए भी बहुत सोचने की जरूरत नहीं है क्योंकि ऑटो रिक्शा का किराया जो नहीं देना पडेगा फिर अब तो उसके किसी सबमिट कर दी है । डॉक्टरेट की उपाधि के बाद उसे पचास रुपये वेतन भी अधिक मिलने लगेगा । कहीं अगर उसकी किसी किसी प्रकाशक को पसंद आ गई और छत गई तो उसी ऍम भी मिल जाएगी । वो ऐसे उछल पडा जैसे उसके हाथ में खजाना लग गया हूँ । लेकिन फिर वो मुझे आ गया । अब कैसे जाएगा बिना के पास उसकी वजह से बिना का अपने नाते रिश्तेदारों में कितना अपान हुआ होगा । उसने पिछले छह महीनों से उसकी जाकर सूरत तक नहीं देखी । फोन करके कुशल क्षेम तक नहीं पूछे । दो दो बार भी यहाँ के निमंत्रण आए और टेलीफोन खडा उठे । ड्राइवर देखने आया फिर भी वो नहीं है । जब कौशल्या देवी बीमार थी और अस्पताल में भर्ती हो चुकी थी तब भी होने देखने नहीं गया गया था तो सिर्फ मौत पर और उससे भी शमशान से लौटकर सीधा अपनी घर चलाया था । जिस घर में एक चलता फिरता प्राणी उठ गया जहाँ एक हमेसा आधार टूट गया । वहाँ उसने किसी को जाकर दो शब्द सांत्वना की तो नहीं कहेगा । उसने जाकर बिना के आंसू भी नहीं पूछे । जिसमें अपनी माँ को खो दिया था । उसे जाकर ढांढस भी नहीं बनाया । उसे उस घर में छोड दिया था जहां हर कोई एक से गम में गमगीन था और वहाँ किसने किसको कितनी सांत्वाना दी होगी इस बात की वो कल्पना कर सकता है । अच्छी चीज वो कितना भी पढा लिखा हूँ । कितना भी आदर्शवादी हो अपने उसूलों का पक्का है लेकिन फिर भी उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था । उसे अपने किए पर लग जैसी होने लगी । उसे लगा कि वह किसी को भी मो दिखाने लायक नहीं रह गया है । किस मुँह से जाकर वो बिना से कहे पीना चलो अब घर चलो नहीं नहीं वो बिना को मोदी खाने लायक नहीं रह गया है । इससे तो बेहतर है की वो ऐसे ही अपनी जिंदगी को खत्म कर दे । वैसे भी उसे बलगम में खून गिरता है । जरूर उसे तपेदिक हो गया होगा । और अगर जरा लापरवाही हो गई तो जरूर वह तपेदिक से ही मान जाएगा । कोई बैल की घरघराहट सुनकर राकेश उठा और उसकी पांव कांपने लगे । उसे खडा नहीं रहा गया । उसने छत दीवार था और दीवार को टटोलता हुआ द्वार तक चला गया और उसने सिटकनी खोल दी । देखा तो सामने दयाल मामा खडे थे । उसने फोरेन अपनी आखों को मलकर देखा । दयाल मामा ही थे एक बार की वो खुश हो था लेकिन फिर दुख का एक गोला सब ओपन कर उसके गले तक आया और उसने बस आंसू का जोलर रोककर पूछा ऍम आप अब मांझी भी आई हैं । दयाल के अंदर आते ही फिर उसकी आंखे सीढियों पर बिच गई मान ही आई । अरे अभी तो वो तीर्थयात्रा से लौटी कहा है मैं तो अपनी उगाही के लिए कल आया हूँ । सोचा तुम से मिलकर सुबह ही एक्सप्रेस ट्रेन से वापस चला जाऊँ । एक खुशी की लहर उठी और उसे दुख की लहर दबोचकर चली गई । इतने दिनों के बाद गया इमाम आए और जा भी रहे हैं और माँ कितने दिन दूर रही हैं उससे इतने दिन कभी दूर रही नहीं सदा सदा के लिए । कहीं नाराज होकर माँ दयाल मामा के यहाँ तो नहीं ठहर गई है और उससे छूट वूट लिख दिया है कि वह तीर्थ यात्रा पर जा रही है ताकि बेना को सांस की अनुपस्थिति का अहसास हो लेकिन वो क्या जाने की बीना भी पिछले छह महीनों से यहाँ नहीं है और वह अकेला इस सुनसान घर में एक आई की जीवन व्यतीत कर रहा है । कौन है अपना ऐसा जो उसके बारे में सूचना होगा? माँ बीना वे अपने हैं । अगर अपने होते तो इतने दिन खोज खबर नहीं लेती । वे सब तो बनाए हैं, पर आए लेकिन उसमें भी तो किसी खोज खबर नहीं ली । वो भी उन्हें पराया समझकर । इतने दिन कटा कटा सा दूर दूर से आ रहा है । जब माने लिखा तो वो क्यों नहीं? तीर्थ यात्रा पर जाने से उसे रोकने के लिए बम्बई चला गया । जब बीना तारा के बयान के बाद इस घर में नहीं लौटी तब वो उसे लेने क्यों नहीं गया? यहाँ पर सब अपने है बशर्ते हम उनको अपना समझे हमी अगर होने पर आया समझे लगेंगे तो पहले ही हमें पराया समझे लगेंगे । हम अगर दूसरों की खोज खबर नहीं लेंगे तो वो हमारे पीछे थोडी मारे मारे भेजेंगे । छह तो दुनिया हैं, खूब सौदा नकद है । इस हादसे दे कुछ हट ले । जो दूसरों को जैसा समझता है वैसा ही समझा जाता है सिर्फ समझने का । फिर है दयाल मामा ने उसकी फटी पडी आंखे और लडते हुए पाऊँ देखकर उसका हाथ थामा ही था कि उनका हाथ जल उठा हूँ । ये क्या? राकेश को तो जोर का बुखार बिना कहाँ है? बिना यहाँ कहाँ उसे मायके गए हुए तो छह महीने हो गए । छह महीने क्यों बहुत लंबी कहानी है । आप खडे खडे सुन लेंगे क्या? दयाल ने अपना सामान एक तरफ रखकर राकेश को थाम लिया और उसे जाकर शयन कक्ष में लेटा दिया । भेज उससे उसके सामने डॉक्टर को फोन नंबर पूछा और नीचे जाकर हॉस्टल में फोन करना चाहा । मगर राकेश ने बता दिया कि फोन तो घर पर ही है । दयाल मामा ने डॉक्टर को फोन किया और फिर वह कमरे में टहल अपनी बेचैनी दूर करने लगे । उधर दमयंती तीर्थ यात्रा पर गई हुई थी और उसका पिछला खत्म हरिद्वार में आया था । अभी तो वह प्रयाग और काशी जाने वाली है । उसे लौटने में अभी एक आज सप्ताह लग जाएगा और इधर बीना रूठकर मायके जाकर बैठ गई है । ठीक है आज कल के लडके भी कैसी बचकानी बातें करते हैं । सास बहू की पटरी नहीं बैठी ये तो मान लिया मगर पति पत्नी की भी नहीं पडती है यहाँ तो उधर दमयंती तो कह रही थी भैया, मैं ही सारी फसादों की जड हूँ इसलिए चली आई और वह दोनों सुखी और संतुष्ट रहेंगे । मगर यहाँ दो दो महीनों में भी इनकी आपस में नहीं पडती और बिना मायके भाग गई और यहाँ ये साहबजादे अकेले पडे हैं । अचानक राकेश का उतरा हुआ चेहरा देखकर उनके मन में असीम गया उपजीत उन्होंने डॉक्टर के आने पर राकेश को दिखाया । डॉक्टर से सब कुछ खुद खोदकर पूछ लिया । जब डॉक्टर ने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं कभी गर्मी की वजह से बलगम में एक आध बार खून के छोटे कतरे गिर जाते हैं । आप चाहे तो इनका एक्स रे निकलवा लीजिए और खून की जांच करवा लीजिए । तब कहीं दयाल मामा की बिगडी हुई साथ लौटाई । डॉक्टर एक इंजेक्शन लगाकर और गोलियां देकर चला गया । दयाल मावा ने राकेश से कहा अब बीना का फोन नंबर बताओ, उसे बुला लूँ, अब उसे बुलाने की क्या जरूरत है । अब तो इंजेक्शन लगाने से मैं ठीक हो जाऊंगा । बचपना मत करूँ । मैं तेहरा मुसाफिर या ठहरूंगा कितने दिन नर्सों कचेहरी में मेरी पेशी है । कल सवेरे में किसी भी हालत में रवाना हो जाऊंगा । यहाँ बीना आ जाएगी तो तुम्हारी देखभाल भी करेगी और तुम्हें खाने पीने के लिए भी तो नहीं लगानी पडेगी । राकेश ने अपने ससुराल वालों का फोन नंबर बता दिया । नंबर में लाने पर यहाँ से जवाब आया हो । फिल्में दयाल बोल रहा हूँ । बिना कहा है दयाल कौन गया? अरे भाई में राकेश का मामा मुझे बिना से बात करनी है तो आप लेकिन बीना को तो अस्पताल में दाखिल करा दिया गया है । उसी रात को दर्द को ज्यादा होने लगा था । डाइट क्या उसके पास भरी थी? हाँ तो वहाँ से कोई समाचार आया नहीं । अभी अभी फोन आया था । डॉक्टर आ नहीं कह रही है कि एक आध घंटे में प्रसव हो जाएगा । कौन से अस्पताल में दाखिला क्या है? वाणी विरास अस्पताल में ठीक है । दयाल मामा ने फोन रख दिया । खुशी की एक शीन रेखा राकेश के चेहरे पर प्रकट होकर ओझल हो गई, जिसे बरसाती बादलों में सूरत की किरण फूटकर विलीन हो जाये । राकेश को देखकर दयाल खुशी से झूम कर बोले अरे हम तो तुम बाप बनने वाले हो है । कल तक तुम्हारा बुखार उतर जाएगा तो कल शाम को बीना के पास चले जाना और जब प्रसव सुख हो जाए तब बीना को सीधे घर पर ले आना, कोताही मत करना । मैं भी बम्बई जाकर दमयंती के आते ही उसे रवाना कर दूंगा । समझे ना खुद ही मतगणना राकेश ने से हिला दिया । दयाल उसके लिए थर्मस में काफी और ब्रेड ले आया । उसको खिलाकर वह खुद होटल में खाने चला गया । फिर लौटकर राकेश के साथ हो गया । दूसरे दिन राकेश को बुखार कम था । फिर विद्यालय डॉक्टर को बुलाकर राकेश को दिखा दिया । डॉक्टरी इंजेक्शन लगाकर चला गया । दयाल ने अपना सामान उठा लिया और स्टेशन जाने से पहले बोले देख मुझे वक्त नहीं है । मैंने अभी तुम्हारी ससुराल फोन किया था, मगर लगता है वहाँ पर कोई नहीं है । शायद डिलीवरी हो गई है । पिछले सभी अस्पताल गए होंगे तो शाम को अस्पताल चले जाना और मेरी तरफ से बच्चे को प्यार कर देना । हो सके तो आज ही मुझे खत लिख देना । मुझे बम्बई में उतरते ही मिल जाएगा । समझना कोताही मत करना । राकेश सिर्फ हिलाता रह गया । फिर उसने अपना सिर दयाल मामा के आगे झुका दिया । दयाल मामा आशीर्वाद नहीं देते, सिर्फ बाहों में लेकर पीठम दबा देते हैं । आज भी उन्होंने ऐसा ही किया । फिर कहा, हर एक इस की क्या जरूरत है? मगर जाते वक्त रुपये दिए बगैर भी नहीं रहते हैं । उन्होंने दस का नोट निकालकर राकेश की कमीज की जेब में डाल दिया । राकेश उन्हें जाता हुआ देखता रहा । जाने क्यों जबसे उसने सुना है की बीना अस्पताल गई है तब से उसका मन में चल रहा है । फिर जब देखा कि बलगम में खून के कतरे नहीं है और बलगम इतना ज्यादा नहीं गिरता है तो उसका वहम जाता रहा । उसने उठकर गाडी बनाई फिर हाथ मौत हो गया और कपडे बदलकर मकान को ताला लगाया । फिर उसने कॉफी हाउस में जाकर टोस्ट खाकर कॉफी पी और ऑटो रिक्शा में बैठकर वाणी विलास अस्पताल चला गया । पहले तो दरबान में उसे रोकना चाहा लेकिन जब उसने उसका हाथ गरम किया तो उसे राकेश को अंदर जाने दिया हूँ । जब लेबर वॉर्ड गया और उसने बीना के बारे में पूछा तो उसे एक नर्स ने बताया कि उसी अभी अभी स्पेशल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है । दोपहर का समय सारे अस्पताल में एक निस्तब्ध मौन छाया है । कभी कभी नर्सों के साइकिलों के तब तक आवाज आ रही है वो सीरिया चढकर गलियारे में बढ गया । हर एक कमरे में गजब सन्नाटा छाया है । भूले भटके से रोने सिसकी आने की या बात करने की आवाज आती है या मुंडेर पर से करवा गांव गांव का रुकता है वरना फिर वहीं नी स्थल देता । वो वार्ड में घुस गया । उसने देखा कमरे में चार पलंग पडे हैं बिना बाई तरफ के होने वाले पलंग पर लेती है कम्बल । थोडे उसका उदास मलि चेहरा देखकर राकेश सहम उठा ये क्या बीना के चेहरे पर ऐसी मुर्दनी छाई हुई है क्या प्रसव के बाद औरतों का जहरा ऐसा हो जाता है । उसके निकट पडा झोला खाली पडा था । उसने सोचा शायद बच्चों के कमरे में उसका बच्चा ले गए होंगे वो बिना की तरफ बढ चला । पलंग के नीचे पडा स्टूल उसने निशब्द खींच लेना चाहा मगर चिकने फर्श पर स्टील का स्टूल बज उठा और बिना क्या खुल गई? उसने अभी बोझिल पलके उठाकर मुझे मुझे नजरों से राकेश को देखा । जरा देर के लिए राकेश लंबित रह गया । ये क्या? कितनी कमजोरी? क्या प्रसाद के समय काफी तकलीफ हुई है? बिना को नॉर्मल डिलीवरी नहीं हुई है । वो आशंकी ठोठा उसका दायां हाथ अनायास बीना के सिर के बालों पर चला गया और बीना ने उसकी हथेली अपने चेहरे पर लेकर अपना चेहरा ढक लिया और फिर वो सुबह उठी उसकी हथेली भेजने लगी । ये क्या बीना मुझे माफ कर दो । राकेश कुछ भी माफ कर दो मैं अपने गुनाहों की सजा भुगत रही हूँ । राकेश की कुछ समझ में नहीं आया । ये क्या कह रही होगी ना, कैसा गुना कैसी सजा । उसने अपनी जेब से रूमाल निकालकर बिना के आंसू पहुंच डाले । फिर बैठकर टकटकी लगाए बिना को देखने लगा ये क्या हाल बना रखा है अपना बच्चे कहाँ है? बीना ने अपना निशाना हो दातों में दबा लिया और भर रहे हुए स्वर्ग कहा । बच्चा भरा हुआ पैदा हुआ था और फिर वो रोने लगी । राकेश सहम उठा ये कैसे बेटा मेरा जब दोनों ने मिल जुलकर सुख चैन से रहना चाहा तभी कैसे विषाद की छाया उसका दिल रोढा । कुदरत ने हमें अपने गुनाहों की सजा दे दी है । तीनों कहकर राकेश तक पडा बिना विचलित हो । ठीक है बहुत मदद की आगे हो सकती है । पहला आप कर सकती है । मगर अगर मजदूर भारत के आगे रोकर प्रलाप करने लगे तो कैसे सह सकेगी? उसने अपने आंसू पहुंच दिए और कहा अरे ये क्या हुआ तो धोनी लगे सांत्वना देने वाला हीरो दे लगे तो बीना ने दैनिक उठकर राकेश के आंसू पहुंच लीजिए । माँ को नहीं लाए बाप को चुकी ठोकर राकेश ने पूछा था क्या मानी अभी मुझे माफ नहीं किया मानी लेकिन वो यहाँ है कहाँ अभी तक तो लौट कर नहीं आई । कितने दिन वहीं से तीर्थ यात्रा पर चली गई है । बस अब लौटने ही वाली है तो माँ को खत लिख दो कि अब वो चल दिया जाए । मगर तो मेरे दिन कहाँ खाते पीते रहें । किसी रह पाई होगी अकेले राकेश मौज उसके एक बार अपनी नजरे उठाकर पीना को देखा फिर बल्कि झुका दी । बडे निशु होता हूँ इतना भी नहीं हुआ कि अकेला देखकर मुझे बुला लिया होता हूँ तुम भी तो नहीं आई तुम भी तो लिवाने नहीं आई । राकेश चुप कर रहा हूँ आशंकी ठोठा कहीं पुराने कराने ना चर्चाएँ इसलिए उसने बिना की हथेली थामकर कहा अब लिवाने आया हूँ सच जुलाई के बीच मुस्कुराते हुए बिना ने कहा लगा है जैसे घटा दो बातों के बीच बिजली चमक उठी है । राकेश ने अपनी बल्कि गिराकर हामी भरी और फिर वो मुस्कुरा बडा हैं हूँ ।

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लड़की की शादी होते ही और उसके ससुराल चले जाने पर किस तरह अपने पराए और पराए अपने हो जाते हैं, रिश्‍तों के इस भंवर को बीना न समझ सकी। और उसकी इस नासमझी ने पति-पत्‍नी के बीच दरारें आ गईं। उनके फूलों से सुखद जीवन में कांटों की चुभन पैदा कर दी। यह बात बीना को बहुत देर से समझ में आई कि उसके दांमपत्‍य जीवन में कटुता लानेवाली कोई और नहीं उसकी अपनी मां ही है। छोटी-छोटी बातों से गृहस्‍थ जीवन में किस तरह विष घुलता है और कैसे इससे बचा जा सकता है… इस उपन्‍यास में बड़ी रोचकता से बताया गया है। Writer: रा. श्याम सुंदर
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