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बेटिकट मुजरिम से अरबपति बनने की कहानी - Part 23

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बेटिकट मुजरिम से अरबपति बनने की कहानी writer: राजीव सिंह Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Rajeev Singh
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तो भी वर्ष दो हजार पांच के मध्य में हसमुखभाई ने गोदना के सामने ॅ के साथ उसकी कंपनी के विलय का प्रस्ताव रखा । कंपनियां विलय को लचीलेपन, विकास और निवेशकों में वृद्धि द्वारा एक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ विकसित करने के लिए कंपनी के पुनर्गठन के रूप में देखती हैं । फिलहाल एक कंपनी को ऑर्गेनिक विकास करने की बजाय विस्तार समझौते के माध्यम से रातोरात बढने के अवसर देता है । वित्तीय विशेषज्ञ भी एक बडे समूह द्वारा विलय को एक आईपीओ के लिए रणनीतिक तैयारी के रूप में देखते हैं । हसमुखभाई की योजना ॅ को सार्वजनिक क्षेत्र में ले जाने की थी क्योंकि ॅ और जीआरएम माइनिंग के अलग और और संबंधित व्यवसाय थे । ये एक सभी विलय होता एक समूह विलय अधिग्रहण करने वाली कंपनी को विलय के बाद पहले से अधिक वित्तीय संसाधनों के उपयोग की सुविधा द्वार लाभान्वित करता है । एक नई बाजार और अलग व्यवसाय ने विस्तार ऍफ का के लिए एक रिजल्ट पोर्टफोलियो का सृजन करता हूँ जिसमें व्यापार के जोखिम में संतुलन स्थापित होता । आम तौर पर विलय बराबर की कंपनियों में होता है इसलिए तकनीकी रूप से दो कंपनियों का विलय वास्तव में फॅस का अधिग्रहण था । मीडिया और निवेशकों के सामने विलय दिखाया गया । खरीदी गई दिखाने से जीआरएम माइनिंग केक रहा । निवेशक और संयुक्त उद्यम भागीदार नकारात्मक अर्थ निकाल सकते थे । विलय के बाद कंपनी का नाम बदलकर ऍफ हो गया । आर का मतलब था राम विलय में जी ऍफ का मूल्य हजार करोड और ऍम का बारह हजार करोड दिखाया गया । जीआरएम माइनिंग ने साठ प्रतिशत शेयर होने के नाते गोदना को नई फिल्म में सात प्रतिशत शेयर प्राप्त हो गए था तो भाई ने अपने पास प्रतिशत शेयर रखें । तेरह सौ करोड रुपये की अधिकृत पूंजी को अस्थायी रखा गया । योजना के पास नई कंपनी के साठ प्रतिशत शेयर थे इसलिए वह बोर्ड का सदस्य बन गया । फिर नई कंपनी में पच्चीस प्रतिशत शेयर चाहता था । बोर्ड में सहमती नहीं दी क्योंकि उसने जी माइनिंग में किसी प्रकार का योगदान नहीं दिया था । इसलिए उसे नवगठित कंपनी में तेईस प्रतिशत शेयर से संतुष्ट रहना पडा । अब अपने सपनों को पूरा करने की दिशा में बढने का वक्त आ चुका था । वो उतना ने देश के हर गांव में स्कूल, कॉलेज और अस्पताल बनाने का सपना देखा था । लेकिन शुरुआत उसे अपने गृह चलेंगे, देवरिया से करनी थी । भारत के विभिन्न राज्यों के अनेक शहरों की यात्रा करने के बाद मुझे लगा कि देवरिया को इस पहल की सबसे ज्यादा जरूरत है तो सुहागपुर जाता रहता था । लेकिन उसने वहाँ के स्कूल में कभी कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं देखा । उसके तो ले के घरों में शौचालय नहीं थे । लोग शौच के लिए खेतों में जाते थे । महिलाओं की स्थिति दयनीय थी । वो अंधेरा होने के पहले शौच के लिए नहीं जा सकती थी । हालांकि हर घर में शौचालय की एक सरकारी योजना थी लेकिन वो सिर्फ कागज तक ही सीमित रह गई । गांव में कोई अस्पताल नहीं था । यहाँ तक कि एक प्राथमिक चिकित्सा केंद्र भी नहीं था । निकटतम सरकारी प्राथमिक चिकित्सा केंद्र सात किलोमीटर दूर जनकपुर गांव में था । उस केंद्र में ना कोई डॉक्टर था फॅार से ज्यादा दाई थी । इसकी एकमात्र जिम्मेदारी थी गांव की ओर तो की है बच्चे पैदा करने में मदद करना । उद्यम पिछडे क्षेत्रों में निवेश करने के लिए तैयार रहे थे क्योंकि उसमें कोयला नहीं था और चैरिटी में किसी की रूचि नहीं थी । उन्होंने दयाशंकर को गांव, तहसीलो ब्लॉक और जिले की प्रत्येक तहसील के राजनीतिक नक्शे के रिकॉर्ड एकत्रित करने के लिए प्रतिनियुक्त किया । जिले में कुल मिलाकर पांच तहसीले और सोलह ब्लॉक थे तो पांच तहसीलों में करीब एक हजार पांच सौ गांव थे । उनकी तहसील सलीमपुर में दो सौ चौवालीस गांव थे । गोधरा और उसकी टीम ने उनकी तहसील के लिए मास्टर प्लान तैयार कर दिया । पांच हजार से ज्यादा जनसंख्या वाले प्रत्येक गांव में एक प्राइमरी स्कूल, प्रत्येक बीस गांवों के बीच एक इंटरमीडियट स्कूल और पूरी तहसील के लिए एक डिग्री कॉलेज और एक औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र की परिकल्पना हुई । स्कूलों और कॉलेजों के लिए भूमि की व्यवस्था करना राज्य की जिम्मेदारी होगी । खेतों के स्वामियों से मामूली फीस ली जाएगी । भूमिहीन ग्रामीणों के बच्चों के लिए शिक्षा निशुल्क होगी । उसके अलावा उनके बच्चों को राज्य द्वारा एक एक साइकिल प्रदान की जाएगी । भारती और शिक्षण और संबद्ध कर्मचारियों के वेतन की जिम्मेदारी राज्य की होगी । प्रत्येक गांव के लिए तीनों पार्टियों में प्रशिक्षित पुरुष और महिला नर्स के साथ एक बुनियादी प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, आवश्यक दवाओं और टेलीफोन की सुविधा और तहसील में एक पच्चीस बिस्तरों के अस्पताल और एंबुलेंस की योजना बनाई गई । गांव के स्वस्थ्य केंद्रों पर हर दूसरे दिन डॉक्टरों के दौरे को दर्शाने वाला रॉस्टर अपनी जगह पर होगा । एक बार फिर भूमि भारती और डॉक्टरों और संबद्ध कर्मचारियों के वितरण की जिम्मेदारी राज्य पर होगी । भूमि स्वामियों को दवाओं का मूल्य चुकाना होगा और अन्य सेवाओं के लिए मामूली शुल्क देना होगा । भूमिहीन ग्रामीणों के लिए दवाएं और सेवाएं निशुल्क होंगे । स्कूलों कौन है जो स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों का प्रशासन ऍम द्वारा स्थापित ट्रस्ट के हाथों में होगा । पांच वर्ष के संचालन के बाद ट्रस्ट पूरी व्यवस्था राज्य सरकार के परिषद को सौंप देगा । परिषद ने ट्रस्ट का एक सदस्य हमेशा शामिल रहेगा । दूसरे बाहर राज्य को अपने स्तर पर हर घर में शौचालय योजना लागू करनी होगी । पहले चरण में योजना को शुरू करने के लिए बीस गांवों को चुना जाएगा । योजना ऊपर से नीचे लागू की जाएगी । अस्पताल, कॉलेज और आरटीआई का काम पहले शुरू होगा और उसके बाद उन बीस गांव में स्कूलों और स्वस्थ्य केंद्रों का काम शुरू होगा । बाद में योजना का विस्तार तहसील के अन्य गांवों में किया जाएगा । उसके बाद इसी मॉर्डल पर अन्य तहसीलों में कम होगा । पूरे जिले के लिए परियोजना के कार्यान्वयन की अवधि दस साल होगी । पहले चरण में करीब अस्सी करोड की लागत का मूल्यांकन किया गया । वर्ष दो हजार छह में बजटपूर्व की एक औपचारिक बोर्ड मीटिंग में गोधरा ने अपना प्रस्ताव सामने रखा । कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी, सीएसआर या कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी कुछ नया शब्द नहीं था । लेकिन सामाजिक जिम्मेदारियों पर खर्च करने वाले कॉरपोरेट घराने उंगलियों पर गिने जा सकते थे । निजी स्वामित्व वाले कॉरपोरेट घरानों द्वारा सामाजिक जिम्मेदारियों पर एक निर्धारित हुई है । उस समय अनिवार्य नहीं था । मेरे नहीं तो जल्दी में था । प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया । वो सुबह की फ्लाइट से बॉम्बे से आया था । उस ने तर्क दिया कि उनकी कंपनी अभी भी निर्माण की अवस्था में है और कंपनी को आगे ले जाने के लिए उन्हें विभिन्न चरणों में पूंजी की जरूरत होगी । समाज सेवा बाद में भी की जा सकती है । बोलना ने खर्च पर कर छूट और सामाजिक सेवाओं के माध्यम से कॉर्पोरेट प्रोफाइल के निर्माण का हवाला देते हुए तर्क प्रस्तुत किया । एक सुनियोजित और संरचनाएँ तरीके से समाज के लिए खर्च करने से उसका कॉर्पोरेट विज्ञापन पर खर्च करने की अपेक्षा अधिक नाम होगा, उसको कर दिया । फिर इनको कॉर्पोरेट विज्ञापन के उल्लेख पर बुरा लगा क्योंकि वो उसका विचार था । गोधरा में प्रस्तावित ट्रस्ट में पचास पचास फीसदी के संयोजन की पेशकश की । इसका मतलब था ट्रस्ट के कुल कोष में आधा निवेश उसका और आधा कंपनी का होना था । मुकुल बहस में हिस्सा नहीं ले रहा था । उसका ध्यान कहीं और था, रूप में जिससे पहले की बोर्ड मीटिंग में उपस्थित रहती थी । शहर से बाहर भी है वो मुंबई में नहीं बहस के बीच में हसमुखभाई को आठ साल पहले बोलना को कहे हुए अपने शब्द याद आ गए । पैसा ताकत हासिल करने का हथियार है लेकिन उसी पैसे का उपयोग जनता का सम्मान हासिल करने के लिए भी किया जा सकता है । बस भाई अपने व्यक्तिगत खाते से बंद को नियमित रूप से दान देते थे । उस पाँच के अध्यक्ष गुरु महेशानंद थे जो उनके भी गुरु थे । पाँच समाज के लिए विभिन्न चैरिटी के कार्यकर्ता था । अंत में जब बहस का कोई नतीजा नहीं निकला तो हसमुखभाई को बीच में आना पडा । उन्होंने बोर्ड के चेयरमैन की हैसियत से घोषणा की चाहे अभी या बाद में सभी कॉर्पोरेट घरानों को सीएसआर गतिविधियों में हिस्सा लेना होगा, अनिवार्य रूप से या स्वैच्छिक रूप से । कंपनियां अपने वार्षिक बजट में ऐसी गतिविधियों के लिए फंड निर्धारित करती हैं । हालांकि वह से खर्च नहीं करती क्योंकि हमने इस वित्त वर्ष में कोई फंड आवंटित नहीं किया है । इसलिए ये काम फौरन हाथ में लेना संभव नहीं होगा । लेकिन कंपनी के वित्तीय परिणाम बाहर आ जाने के बाद बोर्ड इस मुद्दे पर विचार विमर्श करेगा । भाई अम् बोर्ड से तत्काल निर्णय लेने का आग्रह नहीं कर रहे हैं, लेकिन हम ट्रस्ट के निर्माण की प्रक्रिया तो शुरू कर सकते हैं । हमारे मास्टर प्लान में राज्य सरकार भी शामिल है । हम उस बंदे को बोर्ड के सामने इसलिए लाएंगे क्योंकि राज्य सरकार के पास जाने से पहले हमें बोर्ड की सहमती चाहिए । आज की स्थिति में हम कोई वादा नहीं कर सकते हैं, लेकिन हम तुम्हारे प्रस्ताव को खारिज नहीं कर रहे हैं । मेरा सुझाव है कि तुम राज्य सरकार से बात करो और बोर्ड के सामने एक व्यापक कार्यक्रम पर सब करो । हम अगले वार्षिक बजट में चालीस करोड रुपए का बजट आवंटित करने का प्रयास करेंगे । धन्यवाद हो पाएगी । फिर इनके गुस्से से भरे चेहरे को अनदेखा करते हुए गोदना बोला ऍम दोपहर की फ्लाइट से मुंबई चला गया । मुकुंद भी उसी दिन मुंबई रवाना हो गया, लेकिन बात की फ्लाइट चाहिए । उसी रात गोधरा ने खूब सिंह से फोन पर अपने इरादे पर चर्चा की और मुख्यमंत्री के साथ मुलाकात तय करवाने का अनुरोध किया तो पहले भी इस मुद्दे पर औपचारिक रूप से चर्चा कर चुके थे । खूब सिंह यादव का राजनीतिक दल दो हजार दो सही उत्तर प्रदेश में सत्ता में था । राज्य में अगले साल चुनाव होने थे । चुनाव से पहले सरकार की ओर से जनता को खुश करने वाली लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा एक सामान्य नौटंकी है । अब लम्बी दल के सत्ता में आ जाने पर भी इनमें से कई योजनाएं कभी आकार नहीं लेती । ऐसी परिस्थितियों में गोधरा कि गांव में शिक्षा और स्वास्थ्य पर निवेश करने की योजना, जो उत्तर प्रदेश के गांवों के दो सर्वाधिक उपेक्षित क्षेत्र थे, सरकार के लिए प्रकार से वरदान बनकर आई राज्य सरकार की मनमोहक नीतियां कॉर्पोरेट घरानों को राज्य में अपने कारोबार स्थापित करने के लिए भी आकर्षित नहीं कर पाई थी । चैरिटी में निवेश तो दूर की बात है । अनियंत्रित भ्रष्टाचार और राज्य में कानून व्यवस्था की खराब स्थिति कॉर्पोरेट घरानों की उदासीनता का मूल कारण नहीं । सरकार अपने गांव पर निवेश प्राप्त करने का ऐसा मौका नहीं छोड सकती थी और उसके लिए इससे बेहतर समय नहीं हो सकता था । खूबसिंह मुख्यमंत्री दोनों ही इस निवेश का महत्व समझते थे । एक हफ्ते बाद खोदना और दयाशंकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से उनके ऑफिस में मिले । मध्यस्थ खूब सिंह यादव के अलावा प्राथमिक शिक्षा मंत्री, उच्च शिक्षा मंत्री और स्वास्थ्य मंत्री भी मीटिंग में मौजूद थे । वो उतना में उनके पीछे की कुर्सियों पर नजर डाली । वहाँ राज्य के मुख्य सचिव और विभिन्न मंत्रालयों के सचिव बैठे थे । सबके हाथ में नोट राइड और पैंथे वो सब भारतीय प्रशासनिक सेवा आईएस के अधिकारी थे । गोधरा पुराने दिनों को याद करने से खुद को रोक नहीं पाया । राज्य सरकार ने उसकी शर्तें मान ली और समझौता ज्ञापन, मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग या अहम यू पर हस्ताक्षर करने की पेशकश की । गोदना को एमओयू पर हस्ताक्षर करने से पहले हसमुखभाई की सहमती की जरूरत थी । उसने लंच के बाद हस्ताक्षर करने का प्रस्ताव रखा । लंच राजभवन कॉलोनी के वीवीआईपी गेस्ट हाउस में था । उसे अपने पीडब्ल्यूडी के दिन यहाँ आ गए । उसके अच्छा उसने उसके जीवन में महत्वपूर्ण निर्णायक भूमिका निभाई थी । लंच ब्रेक के दौरान गोदना ने हसमुखभाई को फोन किया । उनका सफल बंद था । उसने मुझे उन को फोन किया । उसका फोन भी बंद था । ऐसे पहले कभी नहीं हुआ था । फॅमिली को फोन किया । उसने बताया कि हसमुखभाई अस्वस्थ थे । मुकुंद के बारे में कोई जानकारी नहीं है । मेरे से बात करने का कोई फायदा नहीं था । यदि वो उसे हसमुखभाई से सलाह ये बिना एमओयू पर हस्ताक्षर कर देता तो एक जटिल स्थिति में पड सकता था । तो उतना उनके घर पर कॉल किया और उन खाने वाले नौकर से पूछा । नौकर ने बताया कि घर पर कोई नहीं है उसे हर फोन करने वाले को और हर आगंतुक को यही बताने का निर्देश मिला था । घूमना को कुछ गडबड लगी लेकिन उसे लर्न समाप्त होने से पहले निर्णय लेना था । उसने सिर्फ पहले चरण के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर करने का प्रस्ताव रखा । उसने कहा कि पूरी परियोजना केएमओयू पर बाद की एक मीटिंग में हस्ताक्षर होगा क्योंकि उसके पास सौ करोड से अधिक के सौदों पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं है । उसने किसी प्रकार स्थिति संभालने की कोशिश की और सफल रहा । सरकार को जो वैसे भी अल्पकालिक उपायों को देख रही थी, कोई आपत्ती नहीं थी । अस्पताल, कॉलेज और आईटीआई का शिलान्यास छब्बीस जून को करने का निर्णय लिया गया । जिस दिन पार्टी अपने चुनाव अभियान की शुरुआत करने वाली थी, गोधरा मीटिंग की सफलता से बेहद उत्साहित था । लेकिन अहमदाबाद से फोन कॉल्स का कोई जवाब लाने से उसे बेचैनी महसूस हो रही थी । उससे सिमी के पास हसमुखभाई के लिए ऍम भी छोडा था लेकिन उसका भी जवाब नहीं । एयरपोर्ट से वो सीधे हसमुखभाई के घर चला गया । अगले दिन उदासी छाई हुई थी । रुक्मणी केस्ट्रोल उसे मिलने आई । उसने पिता पुत्र के सर फोन बंद होने के पीछे कर है । इससे खोला तो गोदना हक्काबक्का हो गया । कुछ नहीं बौद्धभिक्षु बनने के लिए घर छोड दिया था । एक दिन पहले जब लेके एक मठ में जाने के लिए घर से निकला था तो उसके शरीर पर सिर्फ एक वीरवर होगा था । मुंबई से लौटने के बाद मुकुल में नहीं एक फॅमिली तैयार करवाई जिसमें उस नहीं कंपनी से सम्बंधित सभी मामलों के लिए अपनी और सही हसमुखभाई को अधिकृत किया हूँ । हसमुखभाई और कादंबरी मैंने तो रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वो नहीं रोका । ब्लैक मनी के बदले हसमुखभाई को अधिकृत करने के उसके फैसले ने गोरा हो खडा कर दिया । उसने को याद आया पिछले साल के मुद्दे पर चल रही बहस में मुकुंद हिस्सा नहीं ले रहा था और सब भाई इस अचानक आई परेशानी के बारे में कुछ बता सकते थे । लेकिन वो बात करने को तैयार नहीं थे । उससे मिलने नहीं तो भाई आई और ना कादंबरी बेन । इन परिस्थितियों में बोलना को ही कादंबरी ग्रुप की पूरी जिम्मेदारी संभालने पडेगी । एफएमसीजी चाहिए । हैरानी की बात थी के रूप में नहीं । इस से पहले अपना अधिकांश समय मुंबई में बिताना पसंद था । कारोबार में दिलचस्पी लेने लगी । वो प्रतिदिन सिर्फ ऑफिस बल्कि फैक्ट्री भी आने लगी । घटाने हसमुखभाई और कादंबरी ब्रेन को तोड दिया । शादी के पांच साल बाद के मुकुल और अपनी का कोई बच्चा नहीं था । इस देखकर उन्हें कुछ शांति मिलती है । अगले दो हफ्तों तक हसमुखभाई न तो घर से बाहर निकले नहीं, किसी आगंतुक से मिलेंगे । हम तो नहीं । जब निकले तो ले ही जाकर मुकुंद को मनाने के लिए कादंबरी । मेन तो उसके साथ आई मुकुंद पर अपने माता पिता की आंखों का कोई असर नहीं हुआ । नहीं । उस ने अपने अचानक लिए इस निर्णय का कारण बताया । मुकुंद के जाने के बाद फिर चौथे हफ्ते में एक दिन घोषणा को रुक्मणी के माध्यम से संदेश मिला । हसमुखभाई से मिलना चाहते हैं । कारण कुछ भी हो सकता था । शायद वो लखनऊ में साइन किए उसके एमओयू को समाप्त करना चाहती हूँ । आशंका से बडा गोधरा हसमुखभाई से मिलने गया भारत में भी मौजूद थे । गोदने को इस बात की उम्मीद नहीं थी जो हसमुखभाई ने सबसे पहले नहीं, हम मुकुंद के नाम से ट्रस्ट बनाएंगे । तुम मैं और स्वामी जी उसके ट्रस्टी होंगे । कंपनी के दो हजार पांच छह के पूरे लाभ ऐसे कर्मचारियों को बोनस देने के बाद जो रकम बचेगी ट्रस्ट को दान कर दी जाएगी । मैं फिर इनसे बात कर लूंगा क्योंकि हॅारर था पिछले लाभ की रकम । ट्रस्ट को दान करने से पहले उसकी सहमती लेना आवश्यक था । स्वामी जी का मतलब था हसमुखभाई के आध्यात्मिक गुरु स्वामी महेशानंद । इनकम टैक्स भरने के बाद दो हजार पांच छह में कंपनी का लाभ था आठ सौ चालीस करोड दस चरणों के लिए । पर्याप्त अशोक भाई हम सब आपको पहले की तरह वापस रखते हैं । कारोबार चलाने के लिए आप क्या शर्मा की जरूरत है? आपके देखने और हस्ताक्षर करने के लिए कुछ प्रस्ताव और दस्तावेज रखे हैं । वो उतना नहीं कहते हुए रुक्मिनी की और देखा । जो कुछ घबराई हुई से लग रही थी ऍम मैं कल से काम शुरू करूँगा । हसमुखभाई के आश्वासन से कूदना खुश हो गया । जब अगली सुबह हसमुखभाई ने ट्रस्टियों मेहरेन का नाम भी शामिल करने के लिए कहा तो उदाहरण हो गया । असल में हीरोइन पिछली शाम ही अहमदाबाद पहुंच गया था और उसने ट्रस्ट के बारे में हसमुखभाई के साथ मीटिंग भी कर ली थी । वो ट्रस्टियों में अपना नाम चाहता था लेकिन पूरा लाभ ट्रस्ट को दान करने के पक्ष में नहीं था । गुलाब में से अपने हिस्से का आधा ट्रस्ट में देने को तैयार था । सुनवाई नहीं माने । उन्होंने कहा कि या तो लाभ में अपना पूरा हिस्सा लेकर ट्रस्ट से दूर रहे या पूरा हिस्सा ध्यान देकर ट्रस्टी बन जाए । थाईलैंड में दूसरे विकल्प का चुनाव किया क्योंकि खोदना को दाल में कुछ काला लग रहा था । इसलिए उसने हिम्मत करके हस्तक भाई से पूछा । क्या उन्होंने फिर इनको अहमदाबाद फोन करके उससे ट्रस्ट के बारे में चर्चा की थी तो भाई ने हिरण को फोन नहीं किया था । गोधरा का रुक्मणी पर शक और मजबूत हो गया । हालांकि अत्यधिक व्यस्त होने के कारण उस मुद्दे पर ध्यान नहीं दे पाया और धीरे धीरे इस बात को भूल गया ।

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बेटिकट मुजरिम से अरबपति बनने की कहानी writer: राजीव सिंह Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Rajeev Singh
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