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बेटिकट मुजरिम से अरबपति बनने की कहानी - Part 08

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बेटिकट मुजरिम से अरबपति बनने की कहानी writer: राजीव सिंह Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Rajeev Singh
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हाँ, पीठ पर पडी । एक लाख से गोदना की नींद खुल गई । उसने देखा डिब्बे में भगदड मची हुई थी । जल्दी जल्दी यात्री ट्रेन से उतर रहे थे । वो चिल्ला रहे थे । मजिस्ट्रेट चेकिंग हो रही है । भागों वो खडा हो गया । तीन टिकट कलेक्टर ट्रेन में चढ गए । उस पर ध्यान दिए बिना तेजी से बोगी के भीतर घुस गए । गोदना को कुछ समझ में नहीं आ रहा था । उसने खुले दरवाजे से बोगी के बाहर झांका । लोग जहाँ वहाँ भाग रहे थे और पुलिस वाले उनका पीछा कर रहे थे, वो कोई स्टेशन नहीं था । ट्रेन बस्ती स्टेशन के आउटर पर रुकी थी । अभी भी नई दिल्ली से हजार किलोमीटर दूर बीच भोगी के अंदर मौजूद टिकट कलेक्टर चिल्लाने लगे थे । आपने टिकट दिखाओ, कुछ समझ गया, वो खेला नहीं था जो बिना टिकट यात्रा कर रहा था और ये बेटिकट यात्रियों को पकडने का अभियान था । पोस्ट भागने की कोशिश नहीं की क्योंकि उससे वैसे भी उसका कोई फायदा नहीं होने वाला था । इसके अलावा वो होने वाला आईएएस अधिकारी था और एक आईएएस अधिकारी । कानून का पालन करने वाला नागरिक माना जाता है । तुम कहाँ जा रहे हो? किसी ने पूछा नई दिल्ली । बहुत मैंने जवाब दिया । क्रिकेट है तुम्हारे पास । पीछे में सामान्य भाव से पूछा और आगे बढ गया क्योंकि गोदना के हावभाव एक बेटिकट यात्री जैसे नहीं लग रहे थे । लेकिन टीसीके कदम रुक गए । जब गोदना ने नहीं कहा तीसरे पुलिस वाले को देखकर चलाया एक और पुलिस वाला दौड कर वहाँ आ गया । खोदना किसी से विनती करने लगा सर, हमारी बात सुनिए । उसकी व्यक्ति का जवाब पुलिसवाले ने दिया । तुम्हारी बात लॉकप में सुनी जाएगी । उन्होंने उसे बोगी के बाहर तीन बोगियों से मिले बाईस अन्य बेटिकट यात्रियों के साथ लाइन में खडा कर दिया । ट्रेन चलती है । गोदना की आंखों से आंसू बहने लगे । सभी तेईस बेटिकट यात्रियों को एक पुलिस वैन में बस्ती के रेलवे सुरक्षा बल के दफ्तर में ले जाकर दस बता आठ फीट के एक लॉकप में ठूस दिया गया । गुनाने ऐसी स्थिति की कभी कल्पना नहीं कि थी । रात को नौ बजे जब कांस्टेबल कोई औपचारिकता पूरी करने के लिए लॉकप खोल रहा था तो गोदना सेवंती की सर हम आपसे बात कर सकते हैं । कांस्टेबल लॉक खोलकर से खोलने लगा । बोलना ने आगे कहा सर, हम नई दिल्ली एक इंटरव्यू देने जा रहे थे । काॅस्टेबल ने पूछा सर, सिविल सेवाओं में भर्ती के लिए इंटरव्यू वो क्या होता है? सर, कलेक्टर और एसपी गोदना नहीं जवाब दिया । कॉन्स्टेबल से अजीब सी नजरों से घूमने लगा । तब तक वहाँ दो और कांस्टेबल आ गए थे । उनमें से एक ने पूछा हमारे पास इंटर्व्यू की चिट्ठी है, वो तो इस समय हमारे पास नहीं है । वो दिल्ली में कौन साहब ठाकुर रणविजय सिंह के पास है । वो सीआईएसएफ कमांडेंट है । उसने मासूमियत से जवाब दिया । जवाब में कांस्टेबल ने उसे जोर से थप्पड मारा और अपने साथियों से कहा देखो देखो इसको कमीना है, धमकी दे रहा है तुम को क्या लगता है फॅमिली ये नटवर लाल कबाब है । कितना बडा झूठा है खुद मैंने उस पर एक सबका सीखा । आप सच्चे हो तो भी हो सकता है आप पर कोई विश्वास ना करें और आपको मार भी खानी पडे । गोदना की प्रतिक्रिया पर ध्यान न देते हुए कांस्टेबल ने दरवाजा बंद कर दिया और ऊंची आवाज में कहा कल सुबह तुम सब दस बजे तक तैयार हो जाना । तुम लोगों की मजिस्ट्रेट के सामने पेशी है और तीनों कांस्टेबल वहां से चल दिए । अगली सुबह वही पुलिस वैन उन्हें द्वितीय श्रेणी जुडीशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में ले गई । वैन में सवार होने के पहले सबके एक एक हार चार पांच अन्य लोगों के हाथों के साथ एक मोटी रस्सी से बांध दिए गए और प्रत्येक दल की जिम्मेदारी एक पुलिसवाले को दी गई । उन्हें अपनी बारी के लिए तीन घंटे इंतजार करना पडा । सबको एक एक करके मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया । अपने सामने रखे कागजातों पर से सिर उठाए बिना मजिस्ट्रेट सबसे एक जैसे सवाल पूछते रहे, हम अपना अपराध कबूल करते हो । सभी ने हाँ में जवाब दिया और मजिस्ट्रेट सजा सुनाते गए । बोलना ने भी अपराध स्वीकार कर दिया, लेकिन उसने अपनी बात रखने की इजाजत मांगी । सर, हमें सिविल सेवाओं की मुख्य परीक्षा पास करनी है और हम इंटरव्यू देने के लिए नई दिल्ली जा रहे थे । हम बहुत गरीब है । हमारे पास ट्रेन के टिकट के लिए पैसे नहीं थे । मजिस्ट्रेट में पहली बार से उठाया और कहा, मुझे ऍर दिखाओ सर फॅार नई दिल्ली में कमांडेंट साहब के पास है । मजिस्ट्रेट की प्रतिक्रिया से गोदना के भीतर एक उम्मीद की किरण जगी । मजिस्ट्रेट ने गोदना के साथ आई पुलिस वाले की और देखा और घोषणा की दो सौ रुपए जुर्माना या तीन महीने की जेल तो मैं क्या मंजूर है सर, हमारे पास सिर्फ बयालीस रुपये हैं । अगर हमारे पास दो सौ रुपए होते तो हम सबसे पहले ट्रेन का टिकट खरीद थे । मजिस्ट्रेट ने जवाब में कहा, अगला अभियोग ऍम स्पष्ट हो चुका था । तीन महीने की जेल गोदना ने कभी नहीं सोचा था कि नब्बे रुपए का टिकट न हो, ना उसको इतना महंगा पडेगा । अगले दिन सभी अपराधियों को बस्ती के जिला कारावास में भेज दिया गया । जेल में गोदना को एक संपादकीय याद आया । संपादकीय ने समाज के विभिन्न वर्गों के बीच समानता की जोरदार वकालत की थी । उसमें समाज के पिछडे वर्गों और दलितों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया था । संपादकीय में कहा गया था कि उन्हें ऊपर उठाने पर जोर देना चाहिए क्योंकि वर्षों से सिर्फ उनकी जातीय पेशे के कारण उनकी उपेक्षा होती आई है । उस समय लेकिन उसे बहुत प्रभावित किया था । लेकिन ठाकुर साहब की मानसिकता समझ जाने के बाद उसे एहसास हुआ कि सिर्फ आरक्षण से उसके जैसे लोग अन्य जातियों की बराबरी पर नहीं आ सकते । सिर्फ अडतालीस रुपये पास में होने से उसे देश की सबसे प्रतिष्ठित नौकरी के इंटरव्यू में जाने के अवसर से वंचित होना पडा । जबकि आरक्षण व्यवस्था अपनी जगह पर थी और ये सब देश को स्वतंत्रता मिलने के इकत्तीस साल पार हो रहा है । ठाकुर साहब से मजिस्ट्रेट तक मासाब टिकट कलेक्टर, पुलिस कांस्टेबल इनमें से कोई भी उसकी मदद कर सकता था लेकिन किसी ने नहीं की । वो जानता था जेल के मुख्य फाटक के ऊपर लिखी इबारत, जिला कारावास बस्ती उसे आने वाले कई सालों तक एक बुरे सपने की तरह सताती रहेगी । वो आपने मई बाबा को बदनाम नहीं करना चाहता था इसलिए उसने जेल के अधिकारियों को गलत पता बता दिया । हालांकि पिता का नाम पूछे जाने पर वह झूठ नहीं बोल पाया । उसे पांच अन्य कैदियों के साथ दस बता दस की कोठरी में रखा गया । इसमें बिना दरवाजे का एक शौचालय था, लेकिन उसे इस बात में परेशान नहीं किया क्योंकि उसका पालन पोषण इससे बेहतर परिस्थिति में नहीं हुआ था । जेल में दयाशंकर चौबे नाम का एक आदमी जोशी के साथ बिना टिकट यात्रा करने की सजा भुगत रहा था । उसका दोस्त बन गया । एक दिन उसने खोजना से पूछा, तुम्हारे पास बयालीस रुपये थे तो तुम टिकट क्यों नहीं खरीदा क्योंकि वह काफी नहीं थे । नई दिल्ली का टिकट नब्बे रुपए का आता है गोद मैंने मासूमियत से जवाब दिया तो मैं कम से कम उस स्टेशन तक का टिकट खरीद लेना था । यहाँ तक का उतने पैसे में आ जाता है । कम से कम तुम जेल जाने से तो बच जाते । उतना उतना छत और नहीं था । उदय शंकर की बुद्धि से बहुत प्रभावित हुआ । उसका पूछा तुमने ये चाल क्यों नहीं चली? हमारे पास कम से कम बयालीस रुपये तो थे । हमारे पास तो एक रुपया नहीं था । हमने पहले कभी ये चाल चली है? नहीं तुम कहाँ जा रहे थे? हम बैंक की नौकरी के लिए लिखित परीक्षा देने लखनऊ जा रहे थे । तुम्हें कितनी पढाई की है हमने हम काम किया है । तुम कौन सा स्टेशन से ट्रेन में बैठे थे? गोरखपुर दयाशंकर ने जवाब दिया, हमारे माता पिता क्या करते हैं? हमारे पिताजी पंडित और कथावाचक हैं । वो दूसरों के घरों में पूजा पाठ करवाते हैं । वहाँ से जो दान दक्षिणा मिलती है उसी से हमारा घर चलता है । मैं घर संभालती है । हमारी दो बहनें हैं । दोनों हमसे छोटी । हमें नौकरी की बहुत जरूरत है । लेकिन आरक्षण का दैत्य सारी सरकारी नौकरियाँ खा गया है । वो नहीं जानता था कि गोदना अनुसूचित जाति का है । उसका मतलब सरकारी नौकरियों में आरक्षण से उसका भी नुकसान हुआ था । वो इतना सोच रहा था । उसने पूछा तो गोरखपुर में कहा रहते हो । हमारा घर गोरखपुर के पास मोतीराम अड्डा में है । जेल के अधिकारियों ने अच्छे आचरण और व्यवहार के आधार पर गोधरा को इक्कीस दिनों में रिहा कर दिया । वास्तव में जेल खचाखच भरी हुई थी और नए कैदियों के लिए जगह बनाने में अधिकारियों को मुश्किल हो रही थी । इसीलिए उन्होंने छोटी मोटी सजा भुगत रहे कुछ कैदियों को छोड दिया । उन्हें रिहा करने का कारण जेल में उनका अच्छा आचरण दर्ज किया गया । गोधरा को उसके बयालीस रुपये वापस दे दिए गए, जो गांव जाने का टिकट खरीदने के लिए पर्याप्त थे । ठाकुर साहब को गोदना के जाने के तीन दिन बाद उसके नई दिल्ली जाने के बारे में पता चला । बहुत मैं उनकी मर्जी के खिलाफ गया था । पिछले उन्होंने तहसील दफ्तर से दुनिया को ट्रंककॉल लगाया । उन्हें ये जानकर राहत महसूस हुई कि गोदना इंटरव्यू की चिट्ठी लेने उनके पास नहीं पहुंचा था । वो जानते थे कि बिना वो चिट्ठी लिए गोदना इंटरव्यू में शामिल नहीं हो सकता था । दस दिन बाद उन्होंने दुनिया को फिर फोन किया । इस बार भी उन्हें वही जवाब मिला । तब जाकर ठाकुर साहब ने भगोडा के सामने गोधना के प्रति अपनी चिंता जाहिर की । उन्होंने भगोडा से धैर्य रखने के लिए कहा । हालांकि जब बोलना पंद्रह दिन बाद भी नहीं लौटा तो उन्होंने अंदाजा लगाया हो सकता है उसमें अवसाद ने आकर आत्महत्या कर ली हो । उन्होंने अनुमान लगाया उसने चलती ट्रेन के नीचे आकर जान दे दी होगी । उन्होंने भगोरा से फायदा क्या कि वह नई दिल्ली के रास्ते में पडने वाले सभी रेलवे स्टेशनों पर गोदना के हो रही है के साथ संदेश भिजवाने की व्यवस्था कर देंगे । गरीब अंतर भगोटला कुछ नहीं बोला । मई गोदना के बारे में ठाकुर साहब का अनुमान सुनकर बीमार पड गई । उन लगातार हो रही थी । उसने अगले चार दिनों तक कुछ नहीं खाया और हवेली भी नहीं गयी । विचारे गरीब पति पत्नी अपने बेटे को ढूंढने भी नहीं जा सकते थे । बस किसी चमत्कार के लिए प्रार्थना करते रहे । आखिर उनकी प्रार्थना स्वीकार हो गए । उनका बेटा उनके सामने खडा था हताश और टूटा हुआ । फिर भी बेटे को जिंदा अपने सामने देखकर उसके मई बाबा की खुशी की सीमा नहीं थी । इससे पहले हवेली में सब लोग बबुनी को लेकर परेशान थे । बबुनी गोदना के बारे में सुन कर सदमे में आ गई थी और उदयपुर से विधवा के रूप में लौटने के बाद से वो हवेली में एक अलग कमरे में रहती थी । शादी से पहले वो टकरा इनके साथ वीके कमरे में रहती थी । टकरा इनके लिए वो अभी भी उनकी लाडली बेटी थी । लेकिन ठाकुर साहब की माँ यानी ठकुराइन की साथ रीति रिवाजों को मानती थी और हवेली में उन्हें लागू भी करती थी । एकांत में रहना, रसोई घर में आना जाना, कहने त्याग देना और सिर्फ सफेद कपडे पहनना वो नहीं थे जिनका पालन करना एक विधवा के लिए जरूरी था । उन्होंने बबुनी को सफेद कपडे पहनने से छूट दे दी थी लेकिन वो सिर्फ हल्के रंग पहन सकती थी । जिस समय बबुनी को गोदना के बारे में पता चला वो अपने कमरे में गहने पहनकर देख रही थी । योजना की तरह बहूनि भी उससे शादी करने के सपने देख रही थी । दिन में सपने देखने से उसके मन में उत्साह लौट आया था । त्यागी हुई रंगीन साडिया शिंगार का सामान और गहने एक बार फिर उसी आकर्षित करने लगे थे । ऐसे ही एक दिन सूखों ने उसे ठाकुर साहब की सोची हुई गोधरा की आत्महत्या की कहानी सुनाई । सुख हो गांव के नई दिगंबर हजाम की पत्नी थी । वो हफ्ते में एक बार महिलाओं की मालिश करने हवेली में आती थी । गोधरा की वापसी की खबर गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई तो ले के सब लोग उसकी छोपडी में इकट्ठा हो गए । वो जानने के लिए उत्सुक है कि उसके साथ क्या हुआ था । वह की जानने के लिए भी उत्सुक है कि वह कलेक्टर बनकर लौटा था या नहीं । बोलता ने अपने मई बाबा से झूठ बोल दिया कि चुकी है । वो लोग ठाकुर साहब की मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकते थे । इसलिए वह नौकरी की तलाश में लखनऊ चला गया था । लेकिन उसे नौकरी नहीं मिली । गोधना मई की हालत देखकर परेशान था । इसीलिए उसने वहाँ एकत्र लोगों से विनती की कि वो उन्हें अकेला छोड दें । जब उसके लौटने की खबर हवेली पहुंची तो ठाकुर साहब ने उसे संदेश भेजा कि वह अगली सुबह आकर उनसे मिले । हालांकि भगोटला को ठाकुर साहब का सामना करने में शर्म महसूस हो रही थी । गोधरा बिल्कुल शर्मिंदा नहीं था । बबुनी के अलावा हवेली में रहने वाले बाकी लोगों को जिज्ञासा हो रही थी कि वह आदमी की एक झलक देखना चाहते थे, जिसे मारा हुआ मान लिया गया था । बबुनी की जिज्ञासा का दूसरा कारण था अकोला और गोधरा एक बार फिर उसी बैठक में ठाकुर साहब का इंतजार कर रहे थे, जहाँ वो होली के एक दिन पहले आए थे । उस समय वो किसी और प्रयोजन चाहे थे, लेकिन अब गोदना के लिए सब कुछ समाप्त हो चुका था । ठाकुर साहब बीस मिनट बाद आए । उन्होंने अपनी चप्पल उतारी और पालथी मारकर दीवान पर बैठ गए । बाप बेटे दोनों ने उनकी चप्पलों को छुआ, फिर से जमीन पर बैठ गए । ठाकरे साहब के चेहरे पर जीत का संतोष था, जो गोधरा की नजरों से नहीं बच्चों का । हालांकि ठाकुर साहब ने औपचारिक बने रहने का प्रयास करते हुए पूछा कहाँ थे तो इतने दिनों से नई दिल्ली में तो नहीं थे? हमने दे दिया से पूछा था । उन्होंने अपेक्षित सवाल पूछा । बाबा नहीं जवाब दिया था, लेकिन नई दिल्ली के लिए निकला था । लेकिन फिर इसको अपनी गलती समझ में आ गई और ये लखनऊ में रेल से उतर गया । अगर हम लोग आपकी मर्जी के खिलाफ इसी जा सकते हैं, इसको यहाँ पर आपका सामना करने में धर लग रहा था । इसलिए ये लखनऊ में भटक रहा था । जब इसके पास सब पैसा खत्म हो गया तो उसका दिमाग ठिकाने आया । वो ना उम्मीद नहीं थी कि बाबा कितनी चतुराई से बात संभाल लेंगे । समझते हो तुम्हारे मई बाबा तुम्हारे लिए कितने पर शाम थे तो भाई भाई बीमार पड गयी । वो खाना पीना छोडकर रात दिन हो रही थी और हम लखनऊ में शहर की जिंदगी का मजा ले रहे थे । उन की चिंता के पीछे छोटे पाखंड पर गोदना को बेहद गुस्सा आ रहा था । वो अपनी खुद की चप्पल से ठाकुर साहब की पिटाई करके अपना गुस्सा बाहर निकालना चाहता था । कुछ कहने ही वाला था । हाथ में चाहे का प्याला लिए बबुनी बैठक में आ गई, जिसके लंबे वाला गीले और खुले हुए थे । उसके चेहरे पर खुशी साफ दिखाई पड रही थी । जो बीमारी और चिंता से समझा गया था, गोदना का उसका गायब हो गया और दिल की धडकनें तेज हो गई । क्या वो सब लोग मर गए हैं? ठाकुर साहब का तात्पर्य फॅमिली के नौकरों से था । वो बबुनी को चाहे लाते देख नाराज हो गए । वो लोग दूसरा काम कर रहे हैं और चाहे ठंडी हो रही थी । उसने जवाब दिया वो जानती थी कि गोदना ठाकुर साहब से मिलने आया है । कुछ टेबल पर चाहे रखती और ठाकुर साहब के पास खडी हो गई । उसी पल उसकी नजरे गोधरा की नजरों से टकराई । बबुनी की आंखों में प्यार और उम्मीद का सागर लहरा रहा था । ठाकुर सामने मुडकर से देखा इस बात का संकेत था कि वह वहां से चली जाएगी । वो चली गई, चाय पी होगे । ठाकुर साहब ने पूछा । एक असामान्य प्रस्ताव था । हालांकि गुजरा ने मना कर दिया । खोला हमने वायदा क्या है कि हम तुम्हारे बेटे को इंजीनियर बनाएंगे । अगले महीने देवरिया पॉलिटेक्निक में दाखिला शुरू हो जाएगा । हुआ और सो देवरिया जाएगा । फिर उन्होंने गोदना की और देखते हुए कहा । उसके साथ जाकर दाखिले का फॉर्म भर दो । अपना जाति प्रमाणपत्र लगाना, मत भूलना और सिविल इंजीनियरिंग का चुनाव करना । उनकी दयार तो हमें गोदना को प्रभावित नहीं किया । इसलिए वह निर्विकार बना रहा था और सब खडे हो गए । बकौल और गोधरा भी खडे हो गए । हम खेतों में जा रहे हैं । हमने जैसा कहा, वैसा ही करना । उन्होंने दोनों को आदेश दिया और चले गए । उस रात गोदना ने ठाकुर साहब के प्रस्ताव के बारे में विचार किया । वो सब पता विश्वास था । पी ठाकुर साहब उसे दोबारा सिविल सेवाओं की परीक्षा में नहीं बैठने देंगे । अटल और विद्रोही गोदना नहीं, खुद से कहा या तो कलेक्टर या कुछ नहीं, उसके सरल ऑल दे रहे कि पक्ष ने कहा, शिक्षा प्राप्त करना हमेशा महत्वपूर्ण होता है । शिक्षा ने न सिर्फ उसे सपने देखने का साहस दिया बल्कि एक ठाकुर की बेटी से शादी करने का सपना देखने की हिम्मत भी दी और फिर इंजीनियर बनने के बाद वह आत्मनिर्भर हो जाएगा और उसके पास पैसे भी आ जाएंगे और तब वो अपना कलेक्टर बनने का सपना भी पूरा कर पाएगा । उसने सोचा कलेक्टर बनना उसका अंत लक्ष्य था । ठाकुर साहब दलित जाति के इंजीनियर से अपनी बेटी को कभी शादी नहीं करने देंगे लेकिन एक कलेक्टर के बारे में वो जरूर सोच सकते हैं । हालांकि इसकी ये धारणा गलत थी ।

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बेटिकट मुजरिम से अरबपति बनने की कहानी writer: राजीव सिंह Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Rajeev Singh
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