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बेटिकट मुजरिम से अरबपति बनने की कहानी - Part 06

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बेटिकट मुजरिम से अरबपति बनने की कहानी writer: राजीव सिंह Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Rajeev Singh
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छह भले ही गोदना का ध्यान पूरी तरह से सिविल सेवा परीक्षाओं की और केंद्र था, लेकिन उन्नीस सौ सत्तासी की गर्मी की छुट्टियों में जैसे ही उसने गांव में प्रवेश किया, उसे बबुनी का खयाल आया । उसने बबुनी को सांत्वना देने का कई बार अभ्यास किया था तो भगिनी से मिलना चाहता था । इसीलिए रोज गाय भैंसों को नहलाने में बाबा की मदद करने हवेली जाने लगा । उनके पैर धोने में अधिक समय लगता था क्योंकि उनके पैरों के बीच में वो बिना किसी के ध्यान में आए लकडी के दरवाजे से अंदर देख सकता था । जहाँ दिनों तक गायब बच्चों को नहलाने और हवेली के चक्कर काटने के बाद इच्छाओ उसने मई से भगिनी के बारे में पहुँचा महीने बहूनि के हवेली में होने की पुष्टि कर दी । इसीलिए वो बबुनी को देखने और उससे बात करने की उम्मीद में गाय भैंसों को नहीं लाता रहा । उसकी तपस्या का फल उसे सातवें दिन मिला । वो गोवर साफ कर रहा था । हालांकि उसे कम बिल्कुल पसंद नहीं था । गाय भैंस को नहलाने से पहले उनका गोबर साफ करना सामान्य है । तभी लकडी के भारी फाटक की आवाज आई । उसने लापरवाही से उस दिशा में देखा तो वहाँ बबुनी खडी थी । वो सफेद साडी में थी । गोधरा मुडकर सबसे पास वाली बहस के पास गया और छुट गया । इस दौरान उसकी नजरें हर समय बहुत ही पडती । वो बहस की टांग के बीच दिखता रहा । उसने ना गोदना को देखा ना बॉस को । बस मेरे को पार करके चली गई । वहाँ से बुलट के वक्त उसने नीचे कुछ गिरा दिया । खोलना समझ गया कि वह गिरी हुई चीज उसके लिए थी । उसके चारों और देखा वहाँ कोई नहीं था । उसमें वो चीज झटपट से उठा ली । वो किसी चीज पर लपेटा हुए कागज का टुकडा था । उसने कागज अपने मुठ्ठी में दवा लिया । बहुत ही टहलते हुए बडे फाटक तक नहीं और रॉस आई । जब वो अंदर चली गई तो गोदना भागकर जामुन के पेड के पास चला गया । बाॅधकर देखा उसका दिल शुरू से धड रहा था । उसने कागज खोला जो छोटे से आलू पर लपेटा हुआ था । कागज पर टेडे मेढे अक्षरों में लिखा था, कल हम सलीमपुर बाजार जाना चाहते हैं । बबुआ जीप लेकर बाहर गया है । क्या तुम हमें बैलगाडी की सवारी करूँगी? गोदनामे चिट्ठी पहुँच बार बडी हर बार उसका रोमांच पडता गया । बिहार में होने का रोमांच ता हूँ तो अपनी आंखे बंद करके प्रेमपूर्वक बबुनी की तीन साल पहले कही गई बात की कल्पना करने लगा । उसने कहा था, कितना अच्छा होता अगर जीवन भर साथ रह पाते । बचपन के दोस्त प्रेमी बन रहे थे । वो इतना रोमांचित हो गया की शिक्षा से मिली उसके सारी बुद्धि हवा नोट गई । उसने एक पल के लिए भी अंजाम के बारे में नहीं सोचा । वो अच्छे थे और मामूली गुलाम जो ठाकुरों के यहाँ सिर्फ काम कर सकते थे, उनकी बेटियों से प्यार करने की हिम्मत नहीं कर सकते थे, सपने में भी नहीं है । फिर भी प्यार की ताकत कई बार इतिहास को पलट चुकी है । ठाकुर साहब ने बबुनी की शादी से पहले एक महिंद्रा इंटरनेशनल जीत खरीदी थी । पुलिस जी मरम्मत की स्थिति पार कर चुकी थी और एक दिन हमेशा के लिए होने में खडी कर दी गई । बबुआगिरी बाबा के साथ अपनी नानी और माओ से मिलने छपरा गया था । बबुनी ने अपनी माँ के सामने बाजार जाने की इच्छा जताई । सुहागपुर से निकटतम बाजार सलीमपुर था । वहाँ से चौदह किलोमीटर दूर था बबुनी बैलगाडी से जाने के लिए तैयार हो गयी भगोटला गाय भैंसों को नहलाने के साथ साथ बैलगाडी भी चलता था । उस शाम जब अकोला ने मई को बताया कि वो बबुनी को बाॅलिंग पुर ले जा रहा है तो उन्होंने सुन लिया और प्रस्ताव रखा बाबा उनको बाजार हम ले जाएँ, आप आराम करिये, हम उन बहनों को संभाल लोगे । माहौला ने पूछा बाबा कितनी बार आपके साथ गए हैं, हम को पहले नहीं संभाल है क्या पिछले सात साल में स्टेशन से आते जाते समय भगोटला ने कई बार कोदरा को बैलगाडी हांकने के लिए दी थी और गोद मैंने कभी निराश नहीं किया था । बहुत जिम्मेदारी का काम है, मालिक नहीं मानेंगे । भोला ने कहा महान जाएंगे बाबा और आप बहुत तकलीफ लग रहे हैं । हम थक गए हैं । हमारी तबियत भी ठीक नहीं है । लेकिन बस खोला ने संदिग्ध स्वर में कहा आप दीवार लग रहे हैं । बाबा तलाब आराम करियेगा । हम मालिक को समझा लेंगे । कोडनानी जबकि उस मौके को गंवाना नहीं चाहता था । भगिनी से मिलने की तीव्र इच्छा नहीं । उसे ठाकुर साहब से बात करने की हिम्मत दे दी । आखिर भगोटला मान गया माई बाप । बेटे की बातचीत के बीच में कुछ नहीं है तो इस बात से खुश थी कि भगोटला अगले दिन आराम करेगा । बहुत ज्यादा काम और आराम की कमी से अपनी चौवालीस साल की उम्र से कहीं अधिक उम्र का लगने लगा था । खाना की बबुनी ने दोपहर तक निकलने की योजना बनाई थी । फिर भी गोदना बेलगाडी तैयार करने के लिए सवेरे जल्द ही हवेली पहुंच गया । तब ठाकुर साहब ने खोदना को बहनों को खाना खिलाते और बैलगाडी तैयार करते देखा तो पूछा अकोला कहा है बाबा की तरह ठीक नहीं वाले । उनको बुखार है । वो धन सिर झुका का जवाब दिया भवनी को सलीमपुर कौन ले जाएगा? हम ले जायेंगे । अगले कुछ सेकंड ठाकुर साहब की कोई प्रतिक्रिया न मिलने से घर आ गया । उसका ध्यान रखना और सूरज डूबने से पहले वापस आ जा रहा था । कुछ साहब ने इतना ही कहा जी वाले आ जाएंगे । उसका सिर अभी भी जुडा हुआ था । उसने सिर्फ अभी उठाया जब ठाकुर साहब के लौटने कदमों की आवाज सुनी । गर्मी में सूरज डूबने का मतलब था शाम सात बजे के पहले कभी भी । हालांकि सलेमपुर सुहागपुर से सिर्फ चौदह किलोमीटर दूर था, लेकिन कच्ची सडक से जाने में चार घंटे लगते थे । अगर वे लोग बारह बजे भी निकलेंगे तो बाजार में तीन घंटे मिल जाएंगे । कोना सोच रहा था । हालांकि उन्हें घंटा ज्यादा मिल गया तो की बबुनी ग्यारह बजे ही तैयार हो कर आ गई । कोई नहीं समझ पाया था की दो साल पहले विदा होकर रुद्रपुर जाते वक्त बबुनी इतनी जोर जोर से क्यों रो रही थी । लोगों ने ही सोचा है कि माँ बाप के घर से विदा होते वक्त लडकी का रोना स्वाभाविक था । बबुनी ये सोच कर रो रही थी कि अब वह गोधरा से कभी नहीं मिल पाएगी । उसके कोमल दिल में बिहार की कलियां खेल चुकी थी लेकिन वो कभी कह नहीं पाई । गोधरा अभ्यास की हुई सारी बातें भूल गया । पहले आधे घंटे दोनों में से कोई नहीं बोला । जब गांव से दूर निकल आए तो गोद में सिर्फ इतना कह पाया की हमेशा ही साहब के बारे में सुन कर बहुत दुःख हुआ । बहुत कितनी अच्छी प्रतिक्रिया थी लेकिन उसने सामने वाला पडता उठा दिया । बेलगाडी को काॅमन एक धनुषाकार होड से सजाया गया था और आगे और पीछे पर्दे लगे हुए थे । जब भी सामने से कोई आता दिखाई देता वो पडता नीचे कर देती हूँ । लेकिन उसके चले जाने के बाद फिर से उठा देती । बैलों के गले में लटक रही घंटियों की आवाज के अलावा कोई आवाज नहीं सुनाई दे रही थी । बीच बीच में गोदना बहनों को हांकने के लिए चिल्लाता और और वह दौडने लगते हैं । तुम जल्दी में हो गया । बहुत ही ने पूछा । वहाँ मालिक ने सूरज डूबने से पहले लौटने को कहा है । पीछे देखे बिना गोद मैंने जवाब दिया हमको कोई जल्दी नहीं है । हम तो महीनो बाद बाहर निकले हैं तो बाबा आपको ले जा सकते हैं । बबुआ या गिरी बाबा भी आपको जीत पर ले जा सकते हैं । अगर आपका मन हो तो वहाँ कभी मन ही नहीं हुआ बाहर जाने का । गोधरा ने जवाब में सिर्फ ऍम कहा लेकिन उसे कारण पूछना चाहता था । बबुनी भी चाहती थी कि वह कहे पूछे दोनों के दिलों में एक दूसरे के लिए ईद जैसी भावनाएं थी । दोनों ही उन्हें जाहिर नहीं कर रहे थे । इसके अलावा गोधरा को बचपन से बबुनी का ध्यान रखना है और उसकी इज्जत करने की सीख मिले थे । उसे प्यार करने की नहीं । शायद यही कारण था कि वो एक घंटे से ज्यादा समय इसके साथ था । लेकिन उसने एक बार भी पीछे मुडकर नहीं देखा । बाजार में एक सकरी गली थी । उसके दोनों और दुकानें थी । दिन के वक्त बैलगाडी का उस गली में जाना असंभव था इसलिए गोदना नहीं बेलगाडी थोडा पहले ही रोक ली । उसने नीचे उतरकर दोनों बहनों को रिहा किया और आगे वाला बूम उठा दिया । गाडी पीछे छूट गई और बबुनी नीचे उतर आई । उतना सिर झुकाकर एक और खडा था ताकि उससे नजरे ना मिले । अभी तक उसने सिर्फ बबुनी की पूरे बॉर्डर वाली सफेद साडी देखी थी । उसने बहनों को एक पेड से बांध दिया और उनके सामने घाटा नहीं । बबुनी ने उसे साथ चलने के लिए कहा । एक आज्ञाकारी सेवक की तरह वो उसके पीछे चलने लगा । बबुनी लगभग हर दुकान पर रुकी जिसमें तीन घंटे लग गए । अंत में आपको की मिठाई की दुकान पर होगी जो अपनी स्मृतियों के लिए मशहूर थी । उसने गोदने को अपना बडा सा झूला पकडने के लिए कहा । बोला पकडते हुए एक पल के लिए दोनों की आखिर टकरा गई । गोधरा ने भी मरती खाई । जब सुहागपुर के लिए रवाना हुए तो चार बज चुके थे । गोधरा जल्दी कर रहा था क्योंकि उन्हें सात बजे से पहले हवेली पहुंचता था । जब बाजार से इतनी दूर आ गए कि बाजार का शोर सुनाई देना बंद हो गया तो बहुत ही नहीं पडता । उठाकर पूछा तो दिल्ली वापस कब जा रहे हो । अगले महीने की छब्बीस को जाना जरूरी है । क्या जानती थी कि उसने बेवकूफी भरा सवाल पूछा है । गोधरा ने कोई जवाब नहीं दिया तो फॅमिली परीक्षा कम हो गई । अगली गरमी के बाद किसी समय इस बीच गोदना दाहिने मुड कर बैलगाडी को गांव में जाने वाली दस किलोमीटर कच्ची सडक पर डाल चुका था । अचानक बनी होड से बाहर निकलकर उसके करीब आ गई और ऍम उसके कंधों पर रखते हुए बोली बच्चा हो ना, हम तुम्हारे बिना नहीं रह सकते । घबराकर खोदना इधर उधर देखने लगा । खुशकिस्मती से वहाँ देखने वाला कोई नहीं था । बबुनी आगे बोली, हम कभी कोर्स आपसे शादी नहीं करना चाहते थे । हमने अपने धोनी के रूप में हमेशा तुम को देखा था । उसकी बात में गोदना को बचपन की वह खेल याद दिला दिए तो साथ नहीं खेला करते थे । वही धोके बने । नकली चूल्हे पर खाना बनाकर छोटे छोटे बर्तनों में परोसती थी । गोधरा खेतों से लौटे हुए किसान का अभिनय करता था । बहुत होने लगी । पीछे मुडकर देखे बिना खोदना ने अपना बायां हाथ उसके सिर पर रखा और बोला अगर हम कलेक्टर बन जाए, तभी शायद हमारे साथ रहने का सपना पूरा हो पाएगा । तुम कलेक्टर बन जाओगे, तब भी पापा नहीं मानेंगे तो तुम हमारी बात समझ रहे हो ना कूदना । दरअसल समझ हो रहा था । ठाकुर लोग एक छूट जाती के लडके से अपनी बेटी की शादी करने के बजाय उसे जान से मार देना पसंद करेंगे । भले ही वो लडका कहीं का राजा हूँ, पूरा तालाब के पास रखते हैं । भगिनी ने प्रस्ताव रखा उस तालाब के पास से गुजर रहे थे । सडक की मई और एक छोटा सा गांव था और दाहिनी और तालाब । वो उतना डूबते हुए सूरज को देखने लगा तो लाल हो रहा था । उसने बैलगाडी को दाहिनी और मोडकर उस सक्रिय कच्ची सडक पर डाल लिया जो गांव वालों ने तालाब पर जाने के लिए बनाई थी । उसने बैलगाडी तालाब के पास एक पेड के पीछे खडे कर दी । उसके रुकते ही बबुनी बैलगाडी से कूद गई और कहाँ पकडकर उसे भी खींचने लगे । उसने भवनी को मना तो नहीं किया लेकिन कहा नहीं हमें बहनों की गर्दन से रस्सी निकालने दो, कोई जरूरत नहीं है । मौसम देखो ना कितना सुहाना हो रहा है तो रुक गई । प्रश्न गोधरा के गले में बाहें डालकर उसकी आंखों में देखते हैं । पूछा क्या तुम भी हमको अपनी दुल्हन के रूप में देखते हो? उतना उसकी ओर देखा न कानों में झुमके थे, न गले में हार न मान में सिंदूर फिर भी बहुत सुन्दर लग रही थी । उसके घर में काले वालों के बीच का पूरा चेहरा जिसमें उसकी लंबी नाथ बडी बडी काली आंखें और प्राकृतिक रूप से गुलाबी हो गई और गोरा लग रहा था उसके सफेद चेहरे नहीं जैसे डूबते हुए सूरज से लाली उधर लेनी थी । उसके सफेद साडी का पूरा किनारा उसके गले का हार बना हुआ था । गोदनामे उसका चेहरा अपने हाथों में ले लिया । उसने अपनी आंखे बंद कर ली । गोधरा को बचपन के दिन याद आ गए । बबुनी को अपनी माँ के लिपस्टिक लगाना बहुत अच्छा लगता था लेकिन अब वो लिपस्टिक नहीं लगा सकते हैं । गुजरात धीरे से उसके होठों को चूम लिया । अचानक वहाँ हवा चलने लगे । अवश्य तालाब के पानी में हलचल होने लगी । उसका चुम्बन लेने के बाद खोदना ने उसे उठाया और बैलगाडी में वापस लिया । नटखट बगैर जिन्हें अपनी गर्दन में बंद ही घंटियों की आवाज सुनने के लिए अपने सिर हिलाना अच्छा लगता था । इस समय शाम थे । जानवर ऐसा व्यवहार कर रहे थे जैसे वह इस क्रांति की साक्षी बनना चाहते हो । गोदा उसे बैल गाडी के पीछे ले गया और धीरे से उतार दिया । बस उन्होंने इस दौरान पूरे समय अपनी आंखे बंद कर रखी थी । जैसे उसने परवन शाही से शादी के बाद पहली रात हो रखी थी । उस रात हालांकि बलवन शाही प्यार कर रहा था लेकिन बंद आँखों से वह गोदना को देख रही थी । गोधरा उसके ऊपर झुका तो उसने अपनी आंखें खोली और प्यार से उसे अपनी बाहों में भर लिया । वहाँ के प्यार की मांग कर रही थी और दोनों बिहार में डूब गए । एक बार शादीशुदा जीवन बिताने के कारण बबुनी त्यार करना सीख गई थी । चलो भाग चले । उसने पिछाडी ठीक करते हुए प्रस्ताव रखा । भाग कर कहाँ जायेंगे । उसने अपनी पत्नी के बटन बंद करते हुए पूछा जो उसे बबुआ से मिली थी । कहीं भी उसने कहा और गोधना की खूब चुगली भाग कर आप अपने परिवार को बदनाम कर देंगे । हमारा भरोसा करिए भवनी हम आपको अपनी दुल्हन जरूर बनाएंगे । बबुनी ने अपनी उंगली उसके वोटों पर रखते हैं । कहा बडी नहीं तो हमें कविता का हो । हम तुम्हारे वाले के पूरा होने का इंतजार करेंगे । हम अपना वादा जरूर पूरा करेंगे । वापस चलिए पता नहीं गांव में क्या होने वाला है । मालिक आज हमने नहीं छोडेंगे । चिंता वक्त पर हम देख लेंगे । बस पापा के सामने चुप रहना दूर से बहनों की घंटियों की आवाज सुनकर अभी ठाकुर साहब ने राहत की सांस ली । बगल में देरी के लिए माफी मांग ली । फॅमिली में थोडी देर बाद सब सामान्य हो गया लेकिन गोदना के भीतर नहीं । बहनों को बांधने के बाद वो अपनी झोपडी में वापस चला गया । अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए और दृढ होकर

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बेटिकट मुजरिम से अरबपति बनने की कहानी writer: राजीव सिंह Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Rajeev Singh
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