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प्यार तो होना ही था - Part 14

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यह प्रेमकथा उन सारे युगल प्रेमियों को समर्पित है, जिनकी प्रेम कहानी हमेशा के लिए अधूरी रह गई... writer: हिमांशु राय Author : Himanshu Rai Script Writer : Shreekant Sinha
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वैदेही और रोहन एक दूसरे के लिए बने थे और उनके बीच में कोई नहीं आ सकता था । यहाँ तक कि रोहन अपने हॉस्टल गए दोस्तों को भी खोते जा रहा था । मुझे नहीं पता कि वो कितना सही था या पहले ही एक दम सही थी । पर मुझे लगा कि मैं एक अच्छे दोस्त को होता जा रहा हूँ क्योंकि वह प्यार में खोया हुआ था । मेरे लिए वो हमेशा मेरा सबसे पक्का दोस्त था और उसके लिए मैं हमेशा ही उसके पास मौजूद था । मैं दूसरे सेमेस्टर की परीक्षा के बाद अपने घर सागर में छुट्टियों में आया हुआ था । अगले दिन मैं जबलपुर जाने वाला था और फिर मेरा तीसरा सदस्य भी शुरू होने वाला था । सुवेदी ने हमें एक दिन अपने घर रात के खाने पर बुलाया था क्योंकि वो भी सागर में ही रह गई थी तो छुट्टियों में कभी कभार उनसे मिलने चला जाता था । उस दिन अनुचित जी टूटें, मुझे खाने पर बुलाया और मेरे लिए मटन बनाया था । मैंने सुना ही था कि वह सुस्वादु भोजन बनाते हैं पर आज तक खाने का मौका नहीं मिल पाया था इसलिए खाने पर जाने के लिए उत्साहित था । शाम के सात बजे तक हम उनके घर पहुंच गए । माँ पापा ने अपना स्कूटर लिया और मैं उनके पीछे अपने स्कूटी से आ गया । मुझे सुबेदी की वो खुला भी स्कूटी जो शादी से पहले उन्होंने अपने लिए खरीदी थी को चलाने में बहुत छेड होती थी । पर पापा ने उस समय मुझे बाइट देने से मना कर दिया था । अनुसनी दरवाजा खोला और हमारा स्वागत करते हुए कहा पिंक स्कूटी में सवार हीरो आओ तुम्हारा स्वागत है । मैंने मूल लटकाकर वो नहीं जवाब दिया । एक दिन में मैं इसे पेंट कर दूंगा । सुवेदी दौडते हुई बाहर आई और मुझे गले लगा लिया । माने मेरी बहन से पूछा क्या तो माफी भी खाना पका रही हो । मेरी कोई मदद चाहिए । उसने कहा नहीं नहीं सब कुछ तैयार हम आप वो तो अनूशी अभी तक खाना बना रहे हैं । मैं तो उनकी मदद कर रही थी । पूरे घर में मटन की खुशबू फैली हुई थी । हम लोग आराम से बैठ गए । मैं खुद को रोक नहीं पाया और रसोई में जाकर मटन को एक नजर देखने चला गया । मैंने कहा हाँ हाँ, ये तो बहुत साधु लग रहा है और मुझे बहुत भूख भी लगी है । अनुज ने मटन हिलाते हुए अपनी शरारत भरे तो उनमें मुझसे का अरे यार, मुझे थोडा समय और दो मटन जल्दी तैयार हो जाएगा । तुम पेट भरकर छत्तर खालो क्योंकि मुझे नहीं लगता कि आगे आने वाले कुछ सालों के बाद तो मैं मांसाहारी भोजन मिलेगा । अभी मैं थोडा चक्कर आया और पूछा क्यों उन्होंने मुझे चिढाते हुए का? मुझे लगता है मैं ही ब्राह्मण है । मैंने मुस्कुराया और फिर जला दिया । जे जो आप भी ब्राह्मण हूँ और आप मटन बना रहे हैं । हम लोग हंसने लगे और मैं बैठक में वापस आकर अपनी बहन के पास जाकर बैठ गया । सुर्वे देने मुझसे पूछा अब तुम्हारा कौन सा सेमिस्टर शुरू होगा? मैंने कहा तीसरा और अगले दिन की यात्रा के बारे में सोचते हुए कहीं खो ही गया । मैंने ये गौर किया कि वैदेही से मिलने के बाद मेरे विचारों में थोडा परिवर्तन आया है । मैं अपनी बहन के वहाँ रात के खाने पर आया था पर मेरा दिल और दिमाग वहीं रहते ही पर अटका हुआ था । अनुज बाहर आए और पापा के साथ बैठकर राजनीति पर चर्चा करते लगे और माँ और बेटी को रसोई में मदद करने को चली गई । मैं कॉलेज में आपने अगले दिन के बारे में सोच रहा था । मैंने नई टीशर्ट और चीज खरीदी थी क्योंकि हमें अब पहले साल जैसे ड्रेस कोड का पालन नहीं करना था । मैंने अपने बालों का स्टाइल भी बदल लिया था और अपने लिए चुकते भी खरीदे थे । मैं वैसे ही को रिझाने के लिए एक भी मौका नहीं होना चाहता था । मुझे पता है तो मुझे चाहती है और ये जरूरी है कि मैं उसे कभी नीचा नासिक । हम हम दोनों साथ में बहुत अच्छे युगल लगते थे । मैं पांच फिर ट्राॅला और वह बहुत ही सुंदर शारीरिक संरचना वाली करीब पांच फिर अच्छा इंच लंबे लडकी थी । जब से मैंने सुरभि और अनुज को एक साथ खुश रहते देखा है तब से मैं उसे बहुत मिस कर रहा था । मैं खडा हुआ और पापा को कहा पापा मैं अभी आ रहा हूँ । उन्होंने मेरी तरफ देखा और अखबार नीचे रखकर पूछा कहाँ जा रहे हो? कुछ नहीं बोर हो रहा हूँ इसलिए थोडा घूम कराता हूँ । उन्होंने कहा अच्छा, अच्छा ठीक है जल्दी आना और मैं चला गया । मैं बैठे ही से बात करना चाहता था क्योंकि मैं उसे बहुत मिस कर रहा था । सुरभि दी के घर से उसे फोन करना मुझे सही नहीं लगा । इसलिए मैं एक्स टेलीपोर्ट बचाना गया । जो रोड के किनारे पर ही था कि आपका फोन खाली है । मुझे जबलपुर में एक नंबर मिला रहा है । मैंने एसटीडी बूथ के मालिक से ये पूछा जो टीवी देख रहा था । उसके बिना बोले ही इशारा किया कि फोन की डाल के दिन के अंदर रखा हुआ है । अब मुझे उस से बात करने में और छूटने में आसानी होगी । मैंने रिसीवर उठाया और उसका नंबर डायल किया जिसे मैं लडकियों से बात करने के लिए हो सकता था । पैसे दही के साथ नहीं था और अगर किसी दूसरे व्यक्ति ने फोन उठा लिया तो मैं उसके बारे में ही पूछूंगा । मैंने उसका नंबर डायल किया था । कुछ देर इंतजार करने के बाद तीसरी घंटे में किसी ने फोन उठाया और कहा हेलो, वो किसी महिला ने फोन उठाया । मैंने कहा हैलो, क्या मैं वैदेही से बात कर सकता हूँ? उन्होंने पूछा क्या मैं जान सकती हूँ कि आप कौन बोल रहे हैं? मैंने झिझकते हुए एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा ही मैं तो रोहन हूँ उसका सहपाठी फिर ऐसा हुआ जिसकी मुझे कभी उम्मीद थी । उन्होंने गुस्से में कहा, रोहन मैं तो मैं साफ साफ बता देना चाहती हूँ कि बैठे ही तुमसे बात करने में कतई भी इच्छुक नहीं है । जम्मू से ना तो फोन करना मैं उससे बात करने की कोशिश कर रहा हूँ । आशा है तो मैं साफ साफ सब समझ में आ गया होगा । मैं हैरान हो गया और मेरी सांसे रुक सी करेंगे । मेरा गला सूखा जा रहा था और मेरे सिर में अचानक दर्द शुरू हो गया । मैंने तो सुना था उसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी । मेरी आवाज भारती गई और माथे से पसीने की भूमिका भूख नहीं लगी और मुझे लगा कि मेरे शरीर में रिसीवर पकडने के लिए भी ऊर्जा नहीं बची है । उन्होंने फोन पटक दिया । मैं थोडा आश्चर्य में पड गया कि फोन उठाने वाला इंसान कौन था, क्या रहते ही हैं या वो किसी मुसीबत में हैं । मैंने दिमाग में काम करना बंद कर दिया । मैं वहाँ कुछ मिनटों के लिए बैठ गया और ये सोचने लगा कि क्या मुझे उसे फिर से फोन करना चाहिए । पर मैंने सोचा नहीं तो महिला बहुत गुस्से में लग रही थी । मैं खडा हुआ केबिन खोला और बाहर आ गया । मैं इतना परेशान हो गया कि मैं भूत के मालिक को पैसे देना ही भूल गया । उसने मुझे पीछे से आवाज थी और दस रुपये मांगे । मैं बहुत उदास हो गया और अपने दिल की आवाज तक नहीं सुन पा रहा था । मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूँ पर मुझे इतना समझ आ गया था की ऐसे में मुझे सुरभि दी के घर नहीं जाना चाहिए । मैं थोडा शांत हुआ और बगल के एक पार्क में बेंच पर जाकर बैठ गया । क्या हुआ होगा वो कौन और होगी हूँ तो उसने मुझे अभी टाटा है । हो सकता है कि उसने अपने पापा को हमारे बारे में बताया होगा और उन्होंने उसे मुझसे बात करने से जबरदस्ती रोका होगा । पर अगर उसके पापा को कोई समस्या है तो उन्हें मुझे प्राधानाध्यापक के पास ले जाना चाहिए था तो क्योंकि वो तो सीधे मैनेजमेंट के लोगों को जानते हैं क्या बैठे ही मुझसे बोर हो गई है या क्या मुझ से पीछा छुडाने का उसे यही सबसे अच्छा तरीका लगा? मेरे दिमाग में बहुत सारे सवाल कौन रहते हैं और मेरे पास किसी का जवाब नहीं था । कुछ दिन पहले तो वह मेरी बहु में थी, मुझे चूम रही थी । कुछ ही दिनों में ऐसा क्या हो गया? मैं आसमान को देखकर दूसरे सेमिस्टर के अंतिम दिन की बात याद करने लगा । हम लोग ज्योति टॉकीज में फिल्म देख रहे थे । मुझे अच्छे से याद है कि वो पिक्चर हॉल में मेरे बगल में बैठी थी । उसने मोनालिजा वाली मादक मुस्कान के साथ मुझे कहा जब तुम्हें लग रहा है कि तुम अपनी सारी जिंदगी किसी के साथ बिताना चाहते हो और तुम्हारी वो असली जिन्दगी जल्द से जल्द शुरू हो, तब ऐसे में तुम मुझे एक महीने के लिए छोड रहे हो । धो कहेंगे । मैं उसे याद करके मुस्कुराने लगा और फिर अचानक लगने लगा कि मेरा शरीर गर्म हो रहा है क्या मुझे बुखार हो गया है? मैं उठा और सीधे सुरभि दी गई । घर वापस आ गया । जैसे ही मैं घर में घुसा पैसे ही अनुज ने मुझसे कहा हूँ आजाओ डिनर तैयार हैं । तुम कहाँ रह गए थे सुरभि देने का सब लोग पाॅल पर आ जाइए । मैं उदास सा दिख रहा था और वेरी आखिर लाल हो गई थी । पापा ने मेरे चेहरे की ओर देखकर का क्या हुआ? रोल सब कुछ ठीक है ना । मैंने भी उन्होंने देखकर का हाँ पापा सब कुछ ठीक है । फिर उन्होंने कहा नहीं नहीं तुम्हारे यहाँ के लाल है और चेहरा पीला पड गया है । मैंने कहा मुझे बुखार लग रहा है तभी माँ जल्दी से मेरे पास आई और मेरा माथा हुआ कि वह गरम है या नहीं । उन्होंने कह दिया कि मुझे बुखार है, उस कॉल का मेरे ऊपर क्या प्रभाव पडा । वो कॉल मेरे दिलो दिमाग में घर कर गई । पापा ने गुस्साते हुए गा, जल्दी खाना खाओ और आराम करो तो मैं कल सुबह जाना भी तो है । और अगर बुखार कल भी रहा तो कल मत जाना । मैंने बिना कुछ कहे सब खिलाया । ऍम के कारण दर्द हो रहा था । मेरे दिमाग में बहुत सारे सवाल कौन रहे थे और दिल उन सवालों के जवाब होने में लगा था । मैं जोर जोर से रोना चाहता था पर मुझे अंदर से ये बात बता रही हूँ कि बैठे ही मुझ से बहुत प्यार करती हैं और ये कोई मजाक नहीं है । मुझे दिल से पता था कि कल जब मैं कॉलेज चाहूंगा तो मुस्कुराकर मेरी तरफ आएगी । मैं कल ही कॉलेज चाहूंगा । उसके पास मुझसे बात नहीं करने का कोई कारण नहीं है । पर मुझे नहीं पता कि मैं फिल्म के इंटरवल के बाद वाले भाग में पहुंच चुका हूँ, जहाँ से पटकथा अब मौन हो चलेगी । मेरे तीसरे सेमेस्टर का पहला दिन था । मैंने नीली जींस और सफेद टीशर्ट पहनी हुई थी जिसमें हस्ता हुआ स्माइली प्रिंट किया हुआ था । पर मैं भीतर से परेशान वह बुझाता था, मेरा दिल रो रहा था और मुझे मेरे सवालों का जवाब चाहिए था मैं नहीं तो अनुराग के साथ फॅसा, वो लोग भी जिनसे और टीशर्ट में अलग से दिखाए थे । मैं जैसे ही घुसा मेरी आंखें उसे ढूंढने लग गईं और वह नहीं देखी । नहीं । मेरे अधिकतर स्टाॅर्म के बाहर में खडे थे । मैंने अपनी पार्टी से पूछा हम सब लोग यहाँ पर क्यों खडे? उसने कहा तीसरे सदस्य की कक्षाएं यहाँ लगेंगी । मैं उसे देखकर मुस्कुराया और चारों ओर उसे देखने लगा । अंततः रहते ही दिख नहीं वह महिला सूट पहने आपने दो चार हुआ रीना के साथ बैठी हुई थी । हे भगवान, आपका धन्यवाद । वो मुझे दिख गई । मैं उसके पास मुस्कुराता हुआ भागा ये सोचकर कि वह मुझे गले लगाकर मेरा स्वागत करेगी । पर पता नहीं क्यूँ मैंने कदम वहाँ जाने से रुक गए । मैं उसे बैठा हुआ देखता था क्योंकि मैं उसे कुछ ही कदम पीछे था । मेरे मुस्कान गायब हो गई और दिल की धडकन भी तीस हो गई । मैं आपका हुआ, पीछे मुड गया । कुछ चीज थी जो मुझे उस तक जाने से रोक नहीं थी कि पूछूँ कि क्या हो गया । मैंने जब उसे प्रपोज किया और फिर उसे एबॅट किया तो वह मेरे पीछे ही थी । मुझे इन सबके बीच उसने सायद किया था । उसने इस बात का भरोसा था कि अगर सब कुछ सही है और हमारे बीच कुछ भी नहीं बदला है तो मेरे पास आएगी और मुझसे बात करेगी । वो अचानक से बात करना नहीं छोड सकती । मुझे दिल से सौ फीसदी यकीन था कि वो मेरे पास कुछ ही समय में मुस्कुराते हुए आ जाएगी तो मेरे बिना नहीं रह सकती है हूँ और मैं भी उसके बिना आप पूरा हूँ । मैंने अपने कदम वापस कैसे और किनारे जाकर बेंच पर जाकर बैठ गया । मैं एक दम अकेला बैठा हुआ था पर मेरी आंखें उसी पार्टी की थी । वो मेरी सीधी लाइन पर थोडी दूरी पर बैठी हुई थी । मैंने कंधे से अपना बैग निकाला और उसे किनारे रखा । मैं बिना पलकें झपकाए उसे देखे जा रहा था । मुझे पता है कि उसने भी मुझे देख लिया है कि मैं उसके सामने बैठा हूँ और उसे अब पालक देखे जा रहा हूँ । वो चारों से बात कर रही थी पर अजीब सी लग रही थी । उसकी आंखों से लग रहा था कि वह मेरे कारण परेशानी थी, पर मैं उसे देखता रहा तो चेहरे से परेशान दिख रही थी और वह मुस्कुरा भी नहीं रही थी और फिर हमारी आंखें मिलेंगे । मैं कोई मौका खोना नहीं चाहता था इसलिए उसे देख मैं मुस्कुराया । उसने शक्ति आंखों से मेरी ओर देखा पर उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं थी । मेरे बल्कि झपकी और मुस्कान गायब हो गई और चेहरे पर ठोक दिखने लगा । वो खडी हुई उसने अपनी पुस्तकें उठाए और मैंने पीछे दूसरी तरफ जाकर बैठ नहीं ऐसा क्या हो गया? मैं तो एक काम भी नहीं समझ पाया । मैं पिछले एक महीने से घर पर था । मैंने इसी क्या गलती करती । कुछ ना कुछ तो वही होगा । तो मैं समझ नहीं पा रहा हूँ क्या जो मुझे याद नहीं आ रहा । मैंने सोचा की मुझे उस से बात करनी चाहिए । इसलिए मैं उसके पीछे जाने लगा । पर हमारे इलेक्ट्रॉनिक्स के टीचर आ गई और उन्होंने सबको क्लास में आने होगा । मैं भी अंदर आ गया और देखा कि उसके बगल की सीट खाली है । क्लास में सभी जानते थे कि मैं उसी के साथ बैठ होगा इसलिए किसी ने भी वह सीट नहीं मैं मुख्यद्वार पर खडा उस की तरफ देखता रहा । मैं थोडा परेशान था कि उसके बगल में बैठे या नहीं । कुछ सेकंड सोचने के बाद मैंने निश्चय किया कि मैं आगे चला जाऊंगा तो मुझसे प्यार करती है और मुझे इस बात का कोई शक्ति हैं । एक बात तो मुझे समझ आ गई थी कि वो मुझ से दूर भाग रही थी पर मुझे इन बातों के जवाब चाहिए थी कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं । मैं उसके पीछे खडा हो गया और अपना बैग उठाकर आगे उसके पास जाकर बैठ गया । पर उसने अपनी सारे पूछ सकें उठाई जो वो लेकर आई थी और बिना देखे सीट पर रखती पर क्यूँ वो ऐसा क्यों कर रही थी । मैं उसकी आवाज मिस कर रहा था । खुद को अपमानित महसूस कर मैंने अपना पैर उठाकर अपने कंधे पर रखा और पीछे की सीट पर बैठ गया । हर कोई जोडे में या अपने दोस्तों के साथ बैठा था । मैं चारों ओर घुमा फिर एक सीट खाली भाई । मैं सीढियों के सारे अंतिम सीट पर जाकर अकेले बैठ गया । हमारे अधिकांश सहपाठियों ने परिवर्तन देखा । समझ गए कि हमारे बीच कुछ तो गडबड है । मेरी आंखें उस पर टिकी हुई थी । मैं अपनी कॉपी पर उसका नाम बार बार देखे जा रहा था और क्लास में जो हो रहा था उस पर मेरा ध्यान थोडा भी नहीं था । पैंतालीस मिनट के बाद क्लास खत्म हुई और हर कोई अपनी सीट से उठकर इधर उधर पत्ते आते । फसते और आपस में कुछ करते दिखा पर मैं अपनी सीट में बैठा रहा । उसे अपलक परेशान होकर लाल आंखों से देखता रहा । कोई भी मेरे पास नहीं आया और नहीं किसी ने मुझ से कुछ बात की । मैं अकेला बैठा उसका इंतजार करता रहा । पिछले एक साल में मैं दही के प्यार में इतना डूब चुका था कि मैंने अपने कई दोस्तों को नजर अंदाज कर दिया था रे लोग भी आगे बढ गए थे । मुझे उसके साथ छोड कर मैं अपनी सीट से उठा और उसके पास गया । वो चिंतित चेहरे के साथ अपना पाॅप कर रही थी । मैंने अंतर तब बहुत पहुंची होकर उससे पूछ लिया कैसी हो उसने जवाब देना जरूरी नहीं समझा पर मैं देख पा रहा था कि वो कितनी असहज दिख रहे थी । मैंने उसे फिर पूछा पर वह मुझे डालकर चारों से बात करने लगी जो आपने चश्में के पीछे से मुझे देखने जा रही थी । बैठे ही ने चारों से कहा, चारों हूँ, चलो लाइब्रेरी चलेंगे । वो खडी हो गई और आगे बढने लगे । तभी मैंने उसका हाथ पकडकर जोर से कहा, मुझे जवाब चाहिए । उसने मुझे देखे बिना अपना पैर पुस्तकें उठाएं और चली गई । मैं पशोपेश था मैं उसके पीछे चलता रहा और क्लास उनके दरवाजे पर जाकर रुक गया और देखता रहा कि वह मुझे छोडकर कहाँ जा रही है । मैं अपनी आंखों के भीतर उमडते कुमार से हुए आंसू उनको महसूस कर पा रहा था । मैं खुद से ये कह रहा था कि रोहन तो मुझे ऐसे ऐसे जाने नहीं दे सकते जब तुम्हें ये पता ही नहीं है कि तुम्हारी गलती किया है । मैंने अपने कंधे पर अपना बैग डाला और क्लास में चला गया । मैं अकेला महसूस कर रहा था । अनुराग और मिले सदर बाजार ऍम खाने हुए थे । मैं क्लास उनके बाहर गया और वहाँ बेंच पर अकेला बैठा रहा । कुछ ही मिनटों के बाद मैं हॉस्टल वापस चला गया । उस दिन तू कॉलेज जम्मू से इतना पसंद था । एक अश् मशान की तरह दिखने लगा । मैं हॉस्टल अकेले जाने लगा । एक मैं ही अकेला वापस आ गया था और बाकी सारे लोग अभी कॉलेज ही में थे । मैंने अपना कमरा खोला और अंदर जाकर एक किनारे बैठ रखा और किनारे जाकर बैठ गया । हर जगह शांति पसरी हुई थी । सिर्फ हॉस्टल की इमारत के आसपास गाडियों की आवाज आ रही थी । क्या हम सात मिले थे? मुझे पता था कि वो तुम ही हो जिसके बारे में सोचकर तिन निकल जाएगा और तुम है सपनों में साथ दें, रात कट जाएंगे जो मुझे रोते हुए संभाल लोगी और मेरी हँसी को साथ मिल के खिलाफ हट बनाते हो कि जो मेरे साथ मेरी जिंदगी बांट लेकिन और उससे ही मैं हमेशा प्यार करता रहूंगा । मुझे पता था ये सब जब हम साथ साथ मिले थे मेरे दिल की धडकन रुक गई थी । उसके बारे में ऐसा सोच कर वो मुझसे दूर जा रही थी । मेरे आश्रम का सब बारह फूट पडा । आंसू ऐसे बहने लगे जैसे किसी प्रताप में चल बैठा हूँ हो । मेरे चेहरे से होते भी नीचे बहर जा रहे थे । मैं भीतर से परेशान बच्चा बन चुका था जिसका दिल अंदर से कच्चा था । ऐसा लगा की किसी ने मेरे भीतर से कुछ ले लिया है । उसने मेरी आत्मा को छुडाया था । ये एक ऐसी छूट थी जो कोई आदमी देख भी नहीं सकता था । पैसो जोर से रोता रहा है । उस दिन मेरे आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे । मैं तकिये में अपना मुख ऐसा कर होता रहा । कुछ पता ही नहीं चला की रोते रोते कब तीन आ गई है । पर जब मैं उठा तो मुझे अपने हॉस्टल के दोनों दोस्तों की आवाज सुनाई थी जो मुझे रात के खाने के लिए नीचे बुला रहे थे । रात के भोजन के दौरान आकाश ने मुझसे पूछा क्या सब कुछ सही है? मैंने सर हिलाते हुए वहाँ का और काम कर सब कुछ नहीं है । पर उसके पास कुछ और प्रश्न विशेष थे । तुम आज इतनी जल्दी की वहाँ गए थे । मैंने उससे कहा कि मैं अंदर से अच्छा नहीं महसूस कर पा रहा हूँ आकाश आकाश में । उसके बाद तो उससे कुछ पूछा नहीं पर उसके अंदर अभी बहुत सारे सवाल मेरे पास जिनका कोई जवाब नहीं थी । मैं मेस में अपनी सीट पर बैठा रहा जबकि सभी लोग वहाँ से जा चुके थे । उसने मुझसे बात करना छोड दिया था और मेरी जिंदगी को छुप सा बनाकर चली गई थी । मेरा के बाद सिर्फ उसी के बारे में सोच रहा था । मुझे पता था कि मैं किन स्थितियों से होकर गुजर रहा था पर मैं किसी को बताना नहीं चाहता था । मुझे खुद ही पता नहीं था कि मैं क्या करूँ । अगर मैंने उससे जबरदस्ती की तो मैं उसे और तकलीफ पहुंचाऊंगा । क्या मुझे समय पर ही ये छोड देना चाहिए और इंतजार करना चाहिए कि वह मेरे पास वापस है? पिछले तीन दिनों से मैं जब कॉलेज जा रहा था और क्लासरूम के बाहर बैठकर उसे भी बाहर से दर्द नहीं देखा करता था, वो मेरी तरफ देखना भी नहीं चाहती थी । अगर मैं एक सेकंड के कुछ भाग में भी उस पर ध्यान केंद्रित कर लेता तो मेरी आंखें आंसुओं से भर जाता । मुझे पता है कि वह मुझे चाहती है पर मैं उसके ख्यालों में भी नहीं आ रहा था । ये बहुत ही कष्टप्रद था । सूरज हर रोज एक नए दिन के स्वागत के लिए उक्ता पर उन दिनों में अब उसकी हंसी शामिल ना थी । नहीं । उसमें नहीं शिकायतों की स्पोर्ट ली थी या कोई प्यारभरी कमेंट्री । मैं चाहता था कि वह मुझे फिर से स्टुपिड करें या मेरे हाथ हटाकर अपने पैरों पर इल्जाम लगाते । मैं चाहता था कि बहुत नरोवाल नीचे फर्श पर किराये और उसे अपने साथ ले जाना भूल जाएँ और मेरे साथ टिपिन खाने के लिए लंच टाइम का इंतजार करें । अब तक तो सब को पता लग गया था की हम लोगों के बीच कुछ तो हुआ है पर मैं इस बारे में घबराया नहीं था और अब मैं किसी भी बारे में घबरा नहीं रहा था । मैं अपनी पढाई के बारे में भी परेशान नहीं था । मैं खाने के बारे में भी परेशान नहीं था । मुझे अपनी सेहत की भी कोई फिक्र नहीं थी । मुझे अपने परिवार की भी चिंता नहीं थी । मुझे उसके अलावा अब किसी और बात से मतलब नहीं था । वो बहुत ही अजीब सा बरता हूँ कर रही थी । वो मेरी तरफ नहीं देख रही थी । उसने मुस्कुराना भी बंद कर दिया था । वो किसी से भी नहीं मिलती थी और वह पीली और उदास से दिखने लग गई थी । मैंने सोच लिया था कि मैं उससे बात करके ही रहूंगा और अपने सवालों के जवाब मिले बिना उसे छोडो ना नहीं । मैं क्लास के बाहर बैठा रहा और क्लास के खत्म होने का इंतजार करता रहा । कुछ ही देर में प्रोफेसर क्लास से बाहर निकले और धीरे धीरे करके विद्यार्थी भी बाहर निकलने लगे । मैं चरित्र जैसा दिख रहा था । मेरे बाल लंबे हो चुके थे । मैं बहुत बेहतर तीन कपडे पहनने लगा था और यहाँ तक कि मेरी दाढी भी बढ चुकी थी ।

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यह प्रेमकथा उन सारे युगल प्रेमियों को समर्पित है, जिनकी प्रेम कहानी हमेशा के लिए अधूरी रह गई... writer: हिमांशु राय Author : Himanshu Rai Script Writer : Shreekant Sinha
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