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निर्मला अध्याय - 12

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Nirmala written by Premchand Narrated by Sarika Rathore Author : Premchad Producer : Saransh Studios Author : Premchand Voiceover Artist : Sarika Rathore
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निर्मला अध्याय बारह मुंशी पांच बजे कचहरी से लौटे और अंदर आकर चारपाई पर गिर पडे । बुढाते की दी है उस पर आज सारे दिन भोजन ना मिला । मूड सुख गया । निर्मला समझ गई । आज दिन खाली गया । निर्मला ने पूछा आज कुछ मिला मुंशीजी सहारा दिन दौडते गुजरा पर हाथ कुछ नहीं लगा । निर्मला फौजदारी वाले मामले में क्या हुआ? मुझे जी मेरे मुवक्किल को सजा हो गई । निर्मला पंडित वाले मुकदमे में मुझे जी पंडित पर डिग्री हो गयी । निर्मला आपको कहते थे दावा खारिज हो जाएगा । मुझे जी कहता तो था और जब भी कहता हूँ की दावा खारिज हो जाना चाहिए था । मगर उत्तर सिर मस्जिद कौन करें? निर्मला और सिर वाली दावे में मुंशीजी उसने बिहार हो गयी । निर्मला तो आज आप किसी आभारी का मोदी कर उठे थे । मुझे जी से अब काम बिल्कुल ना हो सकता था । एक तो उनके पास मुकदमे आते ही नहीं थे और जो आते हुए थे तो बिगड जाते थे । मगर अब भी और सफलताओं को वह निर्मला से छिपाते रहते थे जिससे कुछ हारना लगता । उस दिन किसी से दो चार रुपये उधार लाकर निर्मला को देते प्राय सभी मित्रों से कुछ ना कुछ ले चुके थे । आज वहाँ डोल बिना लगा । निर्मला ने चिंता पुंछ स्वर में कहा आमदनी का ये हाल है तो ईश्वर ही मालिक है । उस पर बेटे का ये हाल है कि बाजार जाना मुश्किल है । होंगी ही से सब काम कराने को जी चाहता है ही लेकर ग्यारह बजे लौटा कितना कहकर हार गई की लकडी लेते हो, पर सुना ही नहीं मुझे जी तो खाना नहीं पकाया । निर्मला ऐसी ही बातों से तो आप मुकदमे हारते हैं । ईंधन के बिना किसी ने खाना बनाया है कि मैं ही बना लेती हूँ । मुझे तो बिना कुछ खाए ही चला गया । निर्मला घर में और क्या रखा था, जो खिला देती मुझे जीने डरते डरते कहा कुछ पैसे वैसे न दे दिए । निर्मला ने बोले सिकोडकर कहा घर में पैसे पडते हैं ना । मुझे जी ने कुछ जवाब नहीं दिया । जरूरत देर तक तो प्रतीक्षा करते रहे कि शायद चल पाने के लिए कुछ मिलेगा । लेकिन जब निर्मला ने पानी कितना मंगवाया तो बिचारी निराश होकर चले गए । सी आराम की कष्ट का अनुमान करके उनका चिट चंचल हो उठा । एक बार भूमि ही से लकडी मंगा ली जाती तो ऐसा क्या नुकसान हो जाता है । ऐसी की फायद भी किस काम की की घर के आदमी भूखे रह जाएगा । अपना संदूक खोलकर टटोले लगे कि शायद दो चार आने पैसे मिल जाएगी । उसके अंदर के सारे कागज निकाल डाले । एक एक खाना देखा, नीचे हार डालकर देखा पर कुछ ना मिला । अगर निर्मला के संदूक में पैसे न फलते थे तो इस संदर्भ में शायद इसके फूल बिना लगते हो । लेकिन सहयोगी कहीं कि कागजों को झाडते हुए एक चवन्नी गिर पडी मारे हर्ष के मुझे जी उछल पडे । बडी बडी रख में इसके पहले कमा चुके थे । पर ये चवन्नी पाकर इस समय उन्हें जितना आहत हुआ उनको पहले कभी ना हुआ था । चवन्नी हाथ में लिए हुए सी आराम के कमरे के सामने आकर पुकारा । कोई जवाब नहीं मिला । तब कमरे में जाकर देखा सी आराम का कहीं पता नहीं क्या अभी स्कूल से नहीं लौटा मन में ये प्रश्न उठते ही मुझे जी ने अंदर जाकर भूमि से पूछा मालूम हुआ स्कूल से लौट आएगा । मुझे जी ने पूछा कुछ पानी दिया हैं होंगी ने कुछ जवाब नहीं दिया । नाक सिकोडकर वो फेरे हुए चली मुझे जी आहिस्ता आहिस्ता आखिर अपने कमरे में बैठ गए । अच्छा । पहली बार उन्हें निर्मला पर क्रोध आया लेकिन एक ही शरण क्रोध का आघात अपने ऊपर होने लगा । इस अंधेरे कमरे में पचपन लेते हुए अपने पुत्र की और से इतना उदासीन हो जाने पर धिक्कारने लगे । दिन भर के रखे थे । थोडी ही देर में उन्हें नींद आ गई । भूमि ने आकर पुकारा बाबूजी रसोई तैयार है, मुझे जी चौक कर उठे । बैठे कमरे में लैंप जल रहा था और पूछा कि बज गए होंगी, मुझे तो नहीं आ गई थी । भूमी ने कहा कोतवाली के घंटे में नौ बज गए हैं और हम ना ही जानी । मुझे सीएम बाबू आए होंगे । आए होंगे तो घर ही में ना होंगे मुझे जीने झल्लाकर पूछा मैं पूछता हूँ आये कि नहीं और तू ना जाने क्या क्या जवाब देती है । आई कि नहीं होंगी । मैंने तो नहीं देखा झूठ कैसे कह दूँ मुझे जी फिर लेट गए और बोले उनको आया जाने दे तब चलता हूँ । आठ घंटे द्वार की और आंख लगाए मुझे जिले दे रहे हैं । तब वहाँ उठकर बाहर आए और दाहीने हाथ कोई दो प्लान तक चले । तब लौटकर द्वार पर आए और पूछा सी बाबू आ गई । अंदर से आवाज आई अभी नहीं । मुझे जी फिर भाई और चले और गली के नुक्कड तक गए सी आराम कहीं दिखाई नहीं दिया । वहाँ से फिर घर आए और द्वार पर खडे होकर पूछा सी आ बाबू आ गए । अंदर से जवाब मिला नहीं । कोतवाली के घंटे में दस बजे लगे मुझे भी बडे बेग से कंपनी बाग की तरफ चले । सोचने लगे शायद वहाँ घूमने गया हूँ और घास पर लेटे लेटे नींद आ गई हूँ । बाद में पहुंचकर उन्होंने हर एक बैंच को देखा । चारों तरफ खून में बहुत से आदमी घास पर पडे हुए थे पर सी आराम कर निशाना था । उन्होंने सी आराम का नाम लेकर जोर से पुकारा पर कहीं से आवाज ना आएं । ख्याल आया शायद स्कूल में तमाशा हो रहा हूँ । स्कूल एक मील से कुछ ज्यादा ही था । स्कूल की तरफ चले पर आधे रास्ते से ही लौट बडे बाजार बंद हो गया था । स्कूल में इतनी रात तक तमाशा नहीं हो सकता । अब भी उन्हें आशा हो रही थी कि सी आराम लौट आया होगा । दुआर पर आकर उन्होंने पुकारा सिया बाबू आई की वार्ड बंद थे । कोई आवाज आई फिर जोर से पुकारा होंगी । किवाड खोलकर बोली अभी तो नहीं आई मुझे जीने धीरे से भूमि को अपने पास बुलाया और करोड स्वर में बोले तू तो घर की सब बातें जानती हैं । बताओ आज क्या हुआ था? होंगी? बाबूजी छूटना बोलूंगी मालकिन छोडा देंगे और क्या दूसरे का लडका इस तरह नहीं रखा जाता जहाँ कोई काम हुआ, बस बाजार भेज दिया । दिनभर बाजार दौडते बीतता था आज लकडी लाने ना आ गए तो चूल्हा ही नहीं चला । कहो तो मुफ्त । बुलावे जब आप ही नहीं देते तो दूसरा कौन देखेगा? चलिए भोजन कर लीजिए । बहुत जी कब से बैठी हैं मुझे जी कह दे इस वक्त नहीं खाएंगे मुझे फिर अपने कमरे में चले गए और एक लंबी सांस ली । वेदना से भरे हुए ये शब्द उनके मुंह से निकल पडे । ईश्वर क्या अभी दंड पूरा नहीं हुआ । क्या इस अन्य की लकडी को हादसे चीनी होगी? निर्मला ने आकर कहा आज सी आराम अभी तक नहीं आए । कह भी रही थी खाना बनाए देती हूँ खालो मगर सब जाने कब उठकर चल दिए है । न जाने कहाँ घूम रहे हैं । बात तो सुनते ही नहीं । कब तक उनकी रह देखा करूँ आप चलकर खा लीजिए उनके लिए खाना उठाकर रख दूंगी मुझे जीने निर्मला की ओर कठोर नेत्रों से देख कर कहा अभी के बजे होंगे निर्मला क्या जाने दस बजे होंगे मुझे जी जी नहीं बारह बजे हैं । निर्मला बारह बजकर इतनी तू कमीना करते थे तो कब तक उनकी राह देख होगी । दोपहर को भी कुछ नहीं खाया था । ऐसा शैतानी लडका मैंने नहीं देखा मुझे जी जी तो में दिख करता है । क्यों निर्मला देखी ना इतनी रात गयी और घर की सोच ही नहीं मुझे जी शायद ये आखिरी शरारत हो । निर्मला कैसी बातें मुझसे निकालते हैं जाइएगा । कहा किसी यार दोस्त के यहाँ पढ रहे होंगे मुझे जी शायद ऐसा ही हूँ । ईश्वर करे ऐसा ही हो । निर्मला सबेरे आवे तो जरा तब भी कीजिएगा । मुझे जी खूब अच्छी तरह करूंगा । निर्मला चले खा लीजिए । देर बहुत हुई मुझे कि सवेरे उसकी तभी करके खाऊंगा कहीं नहीं आया तो तुम्हें ऐसा ईमानदार नौकर कहाँ मिलेगा? निर्मला ने ऐड कर कहा तो क्या मैंने भगा दिया? मुझे जी नहीं ये कौन कहता है तो उसे क्यों भागने लगे? तुम्हारा तो काम करता था । शामत आ गई होगी निर्मला ने और कुछ नहीं कहा । बाद बढ जाने का भय था । भीतर चली आई । सोने को भी नहीं कहा जरा देर में भूमि ने अंदर से कि वह भी बंद कर दिए । क्या मुझे जी को नींद आ सकती थी? तीन लडकों में केवल एक बच रहा था, वहाँ भी हाथ से निकल गया तो फिर जीवन में अंधकार के सिवा और गया है । कोई नाम लेने वाला भी नहीं रहेगा । हाँ, कैसे कैसे रतन हाथ से निकल गए । मुझे किसी की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी तो कोई आश्चर्य हैं । उस व्यापक पश्चताप उस सघन ग्लानि तिमिर में आशा की एक हल्की सी देखा उन्हीं संभाली हुई थी, जिस शिक्षण वहाँ देखा लुप्त हो जाएगी । कौन कह सकता है उन पर क्या बीतेगी? उनकी उस वेदना की कल्पना कौन कर सकता है? कई बार मुझे जी की आखिर झपकी लेकिन हर बार सी आराम की आहट के तो के में चौक पडेगी । सवेरे होते ही मुझे जी फिर सी आराम को खोजने निकले । किसी से पूछते शर्म आती थी । किस मुझसे पूछे उन्हें किसी से सहानुभूति की आशा थी । प्रकट ना कहकर मन में सब यही कहेंगे । जैसा किया वैसा होगा सारे दनी । वह स्कूल के मैदानों, बाजारों और बगीचों का चक्कर लगाते रहे । दो दिन निराहर रहने पर भी उन्हें इतनी शक्ति कैसे हुई? ये वही जानी । रात के बारह बजे मुझे भी घर लौटे । दरवाजे पर लालटेन चल रही थी । निर्मला द्वार पर खडी थी । देखते ही बोले कहाँ भी नहीं न जाने कब चल दिए कुछ पता चला मुझे जीने अगरे नेत्रों से ताकते हुए कहा हट जाओ सामने से नहीं तो पूरा होगा मैं आपसे में नहीं ये तुम्हारी करनी है तुम्हारे ही कारण आज मेरी यह दशा हो रही है आज से छह साल पहले । क्या इस घर में यही दर्शाती तुमने मेरा बना बनाया घर बिगाड दिया तुमने मेरे लहराते बांग को जात दिया केवल एक छूट रह गया है उसका निशान मिटाकर तभी तुमे संतोष होगा । मैं अपना सर्वनाश करने के लिए तो मैं घर नहीं लाया था । सुखी जीवन को और भी सुख में बनाना चाहता था । ये उसी का प्रायश्चित है । जो लडके पान की तरफ जाते थे, उन्हें मेरे जीते जी तुम्हें जाकर समझ लिया और मैं आंखों से सब कुछ देखते हुए भी अंधा बना बैठा रहा जाओ मेरे लिए थोडा सा संख्या बीच तो बस यही कसर रह गई है । वहाँ भी पूरी हो जाए । निर्मला ने रोते हुए कहा मैं तो भाग नहीं हूँ । आप कहेंगे तब जाना कि न जाने ईश्वर ने मुझे जन्म क्यों दिया था । मगर ये आपने कैसे समझ लिया कि सी आराम आवेंगे ही नहीं । मुझे जी ने अपने कमरे की ओर जाते हुए कहा जलाओ मत जाकर खुशियाँ मना । तुम्हारी मनोकामना पूरी हो गई । निर्मला सारी रात होती रही । इतना कलंक उसने जियाराम को गहने ले जाते । देखने पर भी वो खोलने का साहस नहीं किया । क्यों? इसीलिए दो लोग समझेंगे कि ये मित्तियां दोषारोपण करके लडकी से वे साठ रही हैं । आज उसकी मौन रहने पर उसे अपराधी नहीं ठहराया जा रहा है । यदि वहाँ जियाराम को उसी के अनुरूप दी थी और जी आराम लग जा, वर्ष कहीं भाग जाता तो क्या उसके सिर अपराध ना बढ जाता है? सी आराम ही के साथ उसने कौन सा दुर्व्यवहार किया था? वह कुछ बचत करने के लिए ही विचार से तो सी आराम से सौदा मंगवाया करती थी । क्या वहाँ बचत करके अपने लिए गहना करवाना चाहती थी? जब आमदनी का ये हाल हो रहा था तो पैसे पैसे पर निगाह रखने के सेवाएं, कुछ जमा करने का उसके पास और साधन ही किया था । जवानों की जिंदगी का तो कोई भरोसा ही नहीं । बूढे की जिंदगी का क्या ठिकाना? बच्ची के विवाह के लिए वह किस के सामने हाथ फैला दी । बच्चों का भाग खुद उसी पर तो नहीं था । वहाँ केवल पति की सुविधा ही के लिए कुछ बटोरने का प्रयत्न कर रही थी । पति ही क्यों सी आराम ही तो पिता के बाद घर का स्वामी होता बहन की विभाग करने का भार क्या उसकी सिर्फ पढना पडता? निर्मला सारी कतर ब्योंत पति और पुत्र का संकट मोचन करने ही के लिए कर रही थी बच्ची का विवाह इस परिस्थिति में संकट के सिवा और क्या था पर इसके लिए भी उसके भाग्य में अब पेश की बता था दोपहर हो गयी पर आज भी चूल्हा नहीं चला । खाना भी जीवन का काम है इसकी किसी को सोच ही नहीं थी । मुझे भी बाहर बीजान से पडे थे और निर्मला भीतर थी । बच्ची कभी भीतर जाती कभी बाहर कोई उससे बोलने वाला नहीं था । बार बार सी आराम के कमरे के द्वार पर जाकर खडी होती और भैया भैया पुकारती पर बयान कोई जवाब नहीं देता था । संध्या समय मुझे जी आकर निर्मला से बोले तुम्हारे पास कुछ रुपये हैं । निर्मला ने चौक कर पूछा क्या कीजिएगा मुझे जी मैं पूछता हूँ उसका जवाब तो निर्मला क्या आपको नहीं मालूम है । देने वाले तो आप ही हैं । मुझे जी तुम्हारे पास कुछ रुपये हैं या नहीं । अगर हो तो मुझे दे दो, न हो तो साहब । जवाब तो निर्मला ने अब भी साफ जवाब नहीं दिया । बोली होंगे तो घर ही में ना होंगे । मैंने कही और नहीं भेज दिए । मुझे जी बाहर चले गए । वहाँ जानते थे कि निर्मला के पास रुपए हैं, वास्तव में थे । निर्मला ने ये भी नहीं कहा कि नहीं है या मैं नहीं दूंगी । पर उसकी बातों से प्रकट हो गया कि वह देना नहीं चाहती । नौ बजे रात तो मुझे जीने आकर रुक्मणी से कहा बहन, मैं जरा बाहर जा रहा हूँ । मेरा बिस्तर भूमि से बनवा देना और ट्रंक में कुछ कपडे रखवाकर बंद कर देना । रुक्मणी भोजन बना रही थी । बोली बहुत कमरे में हैं, क्या है? क्यों नहीं देते? कहा जाने का इरादा है मुझे जी मैं तुमसे कहता हूँ । बहुत से कहना होता तो तुमसे क्यों कहता? आज तुम क्यों खाना पका रही हो? रुक्मणी कौन पक आवे? बहु के सिर में दर्द हो रहा है । आखिर इस वक्त कहाँ जा रहे हैं? सवेरे ना चले जाना मुझे इस तरह डालते । डालते तो आज तीन दिन हो गए । इधर उधर घूम घुमा कर देखो शायद कहीं सी आराम का पता मिल जाए । कुछ लोग कहते हैं कि एक साधु के साथ बातें कर रहा था । शायद वह कहीं बहका ले गया हूँ । रुकमनी तो लौट ओके कब तक मुझे जी कह नहीं सकता । हफ्ता भर लग जाए । महीना भर लग जाएगा । क्या दिखाना है? रुक नहीं आज कौन दिन है किसी पंडित से पूछ लिया है कि नहीं मुझे भोजन करने बैठे । निर्मला को इस वक्त उन पर बडी दया आई । उसका सारा क्रूड शांत हो गया । खुद तो ना बोली बच्चे को जाकर चुम कार्ति हुई । बोली देख तेरे बाबू जी कहाँ जा रहे हैं? पूछ तो बच्ची ने द्वार से झांककर पूछा बाबू थी कहाँ चाहते हो? मुझे बडी दूर जाता हूँ । बेटी तुम्हारे भैया को खोजने जाता हूँ । बच्ची ने वही से खडे खडे कहा हम भी चलेंगे मुझे जी बडी दूर जाते हैं । बच्चे तुम्हारे वास्ते चीज लाएंगे । यहाँ क्यों नहीं आती? बच्ची मुस्कुराकर छिप गयी और एक्शन में फिर कि वार से से निकालकर बोली हम भी चलेंगे । मुंशी जी ने उसी स्वर में कहा तुम को नहीं लेते लेंगे । पच्चीस हमको क्यों ने ले चलेंगे मुझे जी तुम तो हमारे पास आती नहीं हो । लडकी टॉप मक्ति हुई आकर पिता की गोद में बैठ गई । थोडी देर के लिए मुझे भी उसकी बाल क्रीडा में अपनी अंतर्वेदना भूल गए । भोजन करके मुझे भी बाहर चले गए । निर्मला खडी हुई ताकती रही । कहना चाहती थी वेट जा रहे हो । पर कहना सकती थी कुछ रुपये निकाल कर देने का विचार करती थी, पर देना सकती थी । अंत को ना रहा गया । रुक्मणी से बोली दीदी जी, जरा समझा दीजिए, कहाँ जा रहे हैं? मेरी जवान पकडी जाएगी, पर बिना बोले रहा नहीं जाता है । बिना टिकाने कहाँ खोजेंगे । व्यक्त की हैरानी होगी । रुकमनी ने करूंगा सूचित नेत्रों से देखा और अपने कमरे में चली गई । निर्मला बच्चे को गोद में लिए सोच रही थी कि शायद जाने के पहले बच्चे को देखना या मुझसे मिलने के लिए यहाँ पर उसकी आशा विफल हो गई । मुझे जीने बिस्तर उठाया और तांगे पर जा बैठे । उसी वक्त निर्मला का कलेजा महसूस नहीं लगा । उसे ऐसा जान पडा कि इन से भेंट ना होगी । वह अधीर होकर द्वार पर आई की मुझे जी कुछ रोक ले । पर तांगा चल चुका था । दिन गुजरने लगे । एक महीना पूरा निकल गया, लेकिन मुझे जी ना लौटे । कोई खत्म बिना भेजा । निर्मला को अब नितियां यही चिंता बनी रहती है । केवल लौटकर न आए तो क्या होगा? उसी इसकी चिंता ना होती थी कि उन पर क्या बीत रही होगी । वह कहाँ मारे मारे फिरते होंगे । स्वास्थ्य कैसा होगा उसे केवल अपनी और उससे भी बढकर बच्चे की चिंता थी । गृहस्ती का निर्वाह कैसे होगा? ईश्वर कैसे बेडापार लगाएगा? बच्ची का क्या हाल होगा? उसने कतर ब्यूंग करके जो रुपये जमा कर रखे थे उसमें कुछ न कुछ रूस ही कमी हो जाती थी । निर्मला को उसमें से एक एक पैसा निकालते इतनी अखर होती थी । मानव कोई उसकी देह से रक्त निकाल रहा हूँ । झुंझलाकर मुझे जी को कोस्ट लडकी किसी चीज के लिए रोती तो उसे अभागिन कल मोहि कहकर झल्लाती । यही नहीं रुक्मणी का घर में रहना उसे ऐसा जान पडता था । मानव वहाँ गर्दन पर सवार है । जब ही देख चलता है तो वानी भी अग्रिम हो जाती है । निर्मला बडी मधुर भाषिणी थी, पर अब उसकी गणना कक्षाओं में की जा सकती थी । दिनभर उसके मुख से जली कटी बातें निकला करती थी । उसके शब्दों की कोमलता न जाने क्या हो गई भावों में माध्यम का कहीं नाम नहीं । भूमि बहुत दिनों से इस घर में नौकर थी, सवभाव की सहनशील थी वही आठ दोपहर की बक बक उससे बिना सह सकी । एक दिन उसने भी घर की रहाली यहाँ तक कि जिस बच्चे को प्राणों से भी अधिक प्यार करती थी । उसकी सूरत से भीग रहना हो गई । बाद बाद पर घुडक पडती । कभी कभी मार बैठती । रुक्मणी रोई हुई बालिका को गोद में बैठा लेती और चुन कार दुलारकर चुप कराती । उस अनाथ के लिए अब यही एक आश्रय रह गया था । निर्मला को हम अगर कुछ अच्छा लगता था तो वह सुधा से बात करना था । वो वहाँ जाने का अवसर खोजती रहती थी । बच्चे को अब वह अपने साथ नाली जाना चाहती थी । पहले जब बच्चे को अपने घर सभी चीजें खाने को मिलती थी तो वहाँ जाकर हस्ती खेलती थी । अब वहीं जाकर उसे भूख लगती है । निर्मला उसे घूर घूरकर देखती । मुठिया बांधकर धमकाती, पर लडकी भूख कीरट लगाना ना छोड दी थी । इसलिए निर्मला उसे सात डाली जाती थी । सुबह के पास बैठ कर उसे मालूम होता था की मैं आदमी हूँ । उतनी देर के लिए वह चिंताओं से मुक्त हो जाती थी । किसी शराबी शराब के नशे में सारी चिंताएं भूल जाता है । उसी तरह निर्मला सुधर के घर जाकर सारी बातें भूल जाती थी जिसमें उसे उसके घर पर देखा हो । वहाँ उसे यहाँ देखकर चकित रह जाता था । वहीं कर्कशा कटुभाषा तीसरी यहाँ कर हास्यविनोद और माधुरी कि पुतली बन जाती थी । यौवनकाल के स्वाभाविक वृत्तियां अपने घर पर रास्ता बंद पाकर यहाँ किलो ली करने लगती थी । यहाँ आते वक्त वहाँ मांग छोटी कपडे लगाते से लेस होकर आती और यथासाध्य अपनी विपत्ति खता को मन ही में रखती थी । वहाँ यार रोने के लिए नहीं फसने के लिए आती थी । पर कदाचित उसके भाग्य में ये सुख भी नहीं पता था । निर्मला मामूली तौर से दोपहर को ये तीसरे पहर से सुधर के घर जाया करती थी । एक दिन उसका जी इतना हुवा इस सवेरे ही जा पहुंची । सुधा नदी स्नान करने गई थी । डॉक्टर साहब अस्पताल जाने के लिए कपडे पहन रहे थे । मेहरी अपने काम धंधे में लगी हुई थी । निर्मला अपनी सहेली के कमरे में जाकर निश्चिंत बैठ गई । उसने समझा सुबह कोई काम कर रही होगी, अभी आती होगी । जब बैठे दो तीन मिनट गुजर गए तो उसने अलमारी से तस्वीरों की किताब उतारेगी और केस कोई पलंग पर लेटकर चित्र देखने लगी । इसी बीच में डॉक्टर साहब को किसी जरूरत से निर्मला के कमरे में आना पडा । अपनी एनएन ढूंढते फिरते थे । बेधडक अंदर चले आए । निर्मला द्वार की ओर केश खोले लेटी हुई थी । डॉक्टर साहब को देखते ही चौक करोड बैठे और से ढाक थी । हुई चारपाई से उतरकर खडी हो गई । डॉक्टर साहब नहीं लौटते हुए ठीक के पास खडे होकर कहा शमा करना निर्मला मुझे मालूम था कि यहाँ हो मेरी एनेट मेरे कमरे में नहीं मिल रही है । न जाने कहाँ उतारकर रख दी थी । मैंने समझा शायद यहाँ हूँ निर्मला सैनिक चारपाई के सिरहाने आने पर निगाह डाली तो एन एक डिब्बा दिखाई दी । उस ने आगे बढकर डिब्बियां उतार और सिर झुकाए दे समेटे संकोच से डॉक्टर साहब की ओर हाथ बढाया । डॉक्टर साहब ने निर्मला को दो एक बार पहले भी देखा था पर इस समय के से भाव कभी उसके मन में नहीं आए थे । जिस जो आजा को वो बरसों से हिंदी में दवाएं हुए थे वह आज पवन खर्च मौका पाकर दहक उठी । उन्होंने एनक् लेने के लिए हाथ बढाया तो हाथ कांप रहा था । मेहनत लेकर भी वहाँ बाहर ना करें । वहीं खोले हुए से खडे रहे निर्मला ने इस एक कान से भयभीत होकर पूछा, सुधा कही गई है क्या? डॉक्टर साहब से झुकाए हुए जवाब दिया हाँ जरा स्नान करने चली गई । फिर भी डॉक्टर साहब बाहर ना गए वहीं खडे रहे । निर्मला ने फिर पूछा कब तक आएगी? डॉक्टर साहब से झुकाए हुए कहा आती होगी । फिर भी वहाँ बाहर नहीं गए । उसके मन में घोर द्वंद मचा हुआ था । वो चित्तियां का बंधन नहीं भी रोता का कच्चा धागा उनकी जबान को रोके हुए था । निर्मला ने फिर कहा कहीं घूमने घूमने लगी होगी । मैं भी इस वक्त जाती हूँ । दी रोता का कच्चा ढाका भी टूट गया । नदी के कगार पर पहुंच कर भागती हुई सेना में अद्भुत शक्ति आ जाती है । डॉक्टर साहब ने सिर उठाकर निर्मला को देखा और अनुराग में डूबे हुए सर में बोले नहीं निर्मला अब आती ही होगी । अभी ना जाओ । रूस सुधा की खाते से बैठी हूँ । आज मेरी खाते से बैठो । बताओ कब तक इस आग में जलाकर सत्य कहता हो? निर्मला निर्मला ने कुछ और नहीं सुना । उसे ऐसे जान पडा । मानव सारी पृथ्वी चक्कर खा रहे हैं, मानो उसके प्राणों पर सहस्त्रों वजहों का आघात हो रहा है । उसे जल्दी से अलगनी पर लटकी हुई चादर उतार ली और बिना मुंह से एक शब्द निकले कमरे से निकल गई । डॉक्टर साहब किसी आते हुए से रोना मूव बनाए खडे रहे उसको रोकने की क्या कुछ कहने की हिम्मत ना पडे । निर्मला जी हुई द्वार पर पहुंची है । उसने सुधा को तांगे से उतरते देखा । सुधा को निर्मला ने अब सेना दिया । तीन की तरह झपट कर चली सुना एक्शन तक जिसमें की दशा में खडी रही । बात क्या है उसकी समझ में कुछ नहीं आ सका । वहां व्यग्र होती जल्दी से अंदर गई । बाहरी से पूछने की क्या बात हुई है? वहाँ अपराधी का पता लगाएगी और अगर उसे मालूम हुआ कि मेहरी या किसी नौकर से उसे कोई अपमानसूचक बात कह दी हैं तो वह खडे खडे निकाल देगी । लडकियों ही वो अपने कमरे में गई । अंदर कदम रखते ही डॉक्टर को मूल अटकाये । चारपाई पर बैठे देखा पूछा निर्मला यहाँ आई थी । डॉक्टर साहब ने सिर खुजलाते हुए कहा हाँ आई तो थी सुधार किसी मेहरी अहरी ने उन्हें कुछ कहा तो नहीं । मुझसे बोली तक नहीं झपट कर निकल गई । डॉक्टर साहब की मुख् कांति मशीन हो गई । कहा यहाँ तो उन्हें किसी ने भी कुछ नहीं कहा । सुना किसी ने कुछ नहीं कहा है । देखो मैं पूछती हूँ ना ईश्वर जानता है पता पास जाउंगी तो खडे खडे निकाल दूंगी । डॉक्टर साहब से बिताते हुए बोले मैंने तो किसी को कुछ कहते नहीं सुना तो मैं उन्होंने देखा ना होगा । सुधा वह देखा ही ना होगा । उसके सामने तो मैं तांगे से उत्तरी हूँ । उन्होंने मेरी ओर टका भी पर बोली कुछ नहीं इस कमरे में आई थी । डॉक्टर साहब के प्राण सूखे जा रहे थे । इसकी जाते हुए पूरे आई क्यों नहीं थी? सुना तो तुम्हें यहाँ बैठे देखकर चली गई होगी । बस किसी महरी ने कुछ कह दिया होगा । नीच जात है ना किसी को बात करने की तमीज तो है नहीं । अरे वो सुंदरिया जरा यहाँ तो डॉक्टर उसे क्यों बुलाती हूँ वहाँ यहाँ से सीधे दरवाजे की तरफ कहीं मेहरियां से बात तक नहीं हुई । सुबह तो फिर तुम ही नहीं कुछ कह दिया होगा । डॉक्टर साहब का कलेजा धक धक करने लगा । बोली मैं भला क्या कह देता हूँ । क्या ऐसा गवाह सुना है तुमने उन्हें आते देखा तब भी बैठे रह गए । डॉक्टर मैं यहाँ था ही नहीं । बाहर बैठक में अभी एनएच ढूंढता रहा । जब वहाँ ना मिली तो मैंने सोचा शायद अन्दर हूँ । यहाँ आया तो उन्हें बैठा देखा । मैं बाहर जाना चाहता था की उन्होंने खुद पूछा किसी चीज की जरूरत है । मैंने कहा जरा देखना यहाँ मेरी एनएफ तो नहीं है । ऍम इसी सीधा आने वाली ताकपर की उन्होंने उठा कर देनी बस इतनी ही बात हुई । सुधा वस्तु में एनएच देते ही फिर झल्लाई बाहर चली गई क्यों? डॉक्टर झल्लाई हुई तो नहीं चली गई । जाने लगी तो मैंने कहा बैठे वहाँ आती होगी ना बैठे तो मैं क्या करता? सुधारने कुछ सोच कर कहा बाद कुछ समझ में नहीं आती । मैं जरा उसके पास जाती हूँ । देखो क्या बात है । डॉक्टर तो चली जाना ऐसी जल्दी क्या है? सारा दिन तो पडा हुआ है । सुबह ने चादर ओड होते हुए कहा मेरे पेट में खलबली मची हुई हैं । कहते हूँ जल्दी हैं । सुबह तेजी से कदम बढाती हुई निर्मला के घर की ओर चली और पांच मिनट में जा पहुंची । देखा तो निर्मला अपने कमरे में चारपाई पर पडी जो रही थी और बच्चे उसके पास खडी रही थी । अम्मा क्यों होती हो सुधर? लडकी को गोद में उठा लिया और निर्मला से बोली बहन सच बताऊँ क्या बात है मेरे यहाँ किसी ने तुम्हें कुछ कहा है । ये सब से पूछ चुकी कोई नहीं बतलाता । निर्मला आंसू पूछती हुई बोली किसी ने कुछ कहा नहीं । बहन बहन वहाँ मुझे कौन कुछ कहता? सुधा तो मुझे बोले क्यों नहीं? और आते ही रोने लगी । निर्मला आपने नसीबों को रो रही हूँ और क्या सुना तुम यू ना बदला होगी तो मैं कसम तुम्हें निर्मला कसम कसम ना रखना भाई, मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा । झूठ किसी लगा दु सुबह खाओ मेरी कसम निर्मला तू तू नाहक ही जिद्द करती हूँ । सुबह अगर तुमने न बताया निर्मला तो मैं समझूंगी में शराबी प्रेम नहीं है, बस सब जवानी जमा खर्च है । मैं तुमसे किसी बात का पर्दा नहीं रखती और तुम मुझे गैस समझती हूँ । तुम्हारे ऊपर मुझे बडा भरोसा था । अब जान गई कि कोई किसी का नहीं होता । सुधा की आंखे सजल हो गई । उसने बच्ची को गोद से उतार लिया और द्वार की और चली । निर्मला ने उठाकर उसका हाथ पकड लिया और रोती हुई बोली सुधा मैं तुम्हारी पहर पडती हूँ, मत पूछो, सुनकर दुख होगा और शायद मैं पीठ में अपना मोना दिखा सकता हूँ । मैं अभागिनी न होती तो ये दिन ही क्यों देखती? अब तो ईश्वर से यही प्रार्थना है कि संसार से मुझे उठा ले । अभी ये दुर्गति हो रही है तो आगे ना जाने क्या होगा । इन शब्दों में जो संकेत था वहाँ बुद्धिमती सुधार से छिपाना रहा सका । वहां समझ गई कि डॉक्टर साहब ने कुछ छेडछाड किए हैं । उनका हिचक ही चक्कर, बातें करना और उसके प्रश्नों को डालना । उनकी बहुत ग्लानि में कांति ही मुद्रा उसी याद आ गयी । वो सिर से पांव तक आप उठी और बिना कुछ कहसुनी सीखने की भर्ती रोज से भरी हुई द्वार की और चली । निर्मला ने उसे रोकना चाहा, पर ना पा सकें । देखते देखते हुए सडक पर आ गई और घर की ओर चली । तब निर्मला वही भूमि पर बैठ गई और फूट फूटकर रोने लगी । निर्मला दिनभर चारपाई पर पडी रही । मालूम होता है उसकी देह में प्राण नहीं है, न स्नान किया, भोजन करने उठी । सन्य समय कुंवर हुआ आया । रात भर दे दवे की भर्ती तपती रही । दूसरे दिन वरना उतरा हाँ कुछ कुछ काम हो गया था । वह चारपाई पर लेटी हुई निश्चित नेत्रों से द्वार की और ताक रही थी । चारों ओर शून्य था । अंदर भी शून्य बाहर भी सोनिया कोई चिंता ना थी, ना कोई स्मृति, न कोई दुःख । मस्तिष्क में बंधन की शक्ति ही ना रही थी । सहसा रुक्मणी बच्ची को गोद में लिए हुए आकर खडी हो गई । निर्मला ने पूछा क्या वहाँ बहुत रोती थी? रुक्मणी नहीं ये तो जिसकी तक नहीं रात भर चुप चाप पडी रही सूजा ने थोडा सा दूध भेजा था । निर्मला आइरिन दूर न दी गई थी । रुक्मणी कहती थी पिछले पैसे दे दो तो तुम्हारा जी अब कैसा है? निर्मला मुझे कुछ नहीं हुआ है । कल देर गर्म हो गई थी । रुक्मणी डॉक्टर साहब का बुरा हाल है । निर्मला ने घबराकर पूछा क्या हुआ क्या कुशल से है ना? रुक्मणी कुशल से है की लाश उठाने की तैयारी हो रही है । कोई कहता है जहर खा लिया था । कोई कहता है दिल का चलना बंद हो गया था । भगवान जाने क्या हुआ था? निर्मला ने ठंडी सांस ली और रूंधे हुए कांदा से बोली हाई भगवान सुधार की क्या करती होगी? कैसे जियेगी ये कहते कहते वह रो पडी और बडी देर तक से सकती रही । तब बडी मुश्किल से उठकर सुधा के पास जाने को तैयार हुई पाओ । थरथर कम रहे थे । दीवार था में खडी थी पर जीना मानता था । न जाने सुधा ने यहाँ से जाकर पति से क्या कहा? मैंने तो उससे कुछ कहाँ भी नहीं न जाने में बातों का वहाँ क्या मतलब समझे । हाई ऐसे रूप, पान, दयालु ऐसे सुशील प्राणी का ये अनंत अगर निर्मला को मालूम होता की उसके क्रोध का ये भीषण परिणाम होगा तो जहर का घूंट पीकर भी उस बात को हंसी में उडा देती ये सोचकर कि मेरी ही निष्ठुरता के कारण डॉक्टर साहब का ये हाल हुआ । निर्मला के हद्य के टुकडे होने लगे । ऐसी वेदना होने लगी । मानव ही दिया में शूट रहा हूँ । वहाँ डॉक्टर साहब के घर चली । लाश उठ चुकी थी । बाहर सन्नाटा छाया हुआ था । घर में ऑस्ट्रिया जमा थी । सुबह जमीन पर बैठे हो रही थी । निर्मला को देखते ही वहां जोर से चिल्लाकर रो पडी और आकर उसकी छाती से लिपट गई । दोनों देर तक रोती रहे । जब और तो की भीड कम हुई और एकांत हो गया । निर्मला ने पूछा ये क्या हो गया? बहन तुम्हें क्या कह दिया? सुबह अपने मन को इसी प्रश्न का उत्तर कितनी ही बार देख चुकी थी । उसका मन जिस उत्तर से शांत हो गया था, वहीं उत्तर उसने निर्मला को दिया बोली जो भी तो ना रह सकती थी । बहन क्रोध की बात पर ग्रुप आता ही है । निर्मला मैंने तो तुमसे कोई ऐसी बात भी ना कहीं थी । सुना तुम कैसे कहती ही नहीं सकती थी । लेकिन उन्होंने जो बात हुई थी वहाँ रहती थी उस पर मैंने जो कुछ में आया । कहा जब एक बार दिल में आ गई तो उसे हुआ ही समझना चाहिए । अवसर और घात मिले तो वहाँ अवश्य ही पूरी हो । ये कहकर कोई नहीं निकल सकता कि मैंने तो हंसी जी थी । एकांत में ऐसा शब्द जबान पर लाना ही कह देता है की नियत बुरी थी । मैंने तुमसे कभी कहा नहीं बहन, लेकिन मैंने उन्हें कई बार तुम्हारी और झाकते देखा । उस वक्त मैंने भी यही समझा कि शायद मुझे धोखा हो रहा हूँ । अब मालूम हुआ कि उसका ताकझांक का मतलब क्या था । अगर मैंने दुनिया ज्यादा देखी होती तो तुम्हें अपने घर ना नहीं देती । कम से कम तुम पर उनकी निगाह कभी ना पडने देती । लेकिन ये क्या जानती थी कि पुरुषों के मोह में कुछ और मन में कुछ और होता है । ईश्वर को जो मंजूर था वह हुआ । ऐसे सौभाग्य से मैं वैद्यकीय को बुरा नहीं समझती । दरिद्र प्राणी उस धनी से कहीं सुखी है जिसे उसका धन साहब बनकर काटने दौडे । उपवास कर लेना आसान है । विषैला भोजन करना उससे कई मुश्किल । इसी वक्त डॉक्टर सिन्हा के छोटे भाई और कृष्णा ने घर में प्रवेश किया । घर में कोहराम मच गया । एक महीना और गुजर गया । सुबह अपने देवर के साथ तीसरे ही दिन चली गई । अब निर्मला अकेली थी । पहले हस बोलकर जी बहला लिया करती थी । अब रोना ही एक काम रह गया । उसका स्वास्थ्य दिन दिन बिगडता गया । पुराने मकान का किराया अधिक था । दूसरा मकान थोडी किराये का लिया । यह तंग गली में था । अंदर एक कमरा था और छोटा सा आंगन प्रकाश जाता । ना वायु दुर्गन जुडा करती थी । भोजन का ये हाल की पैसे रहते हुए भी कभी कभी उपवास करना पडता था । बाजार से लाइक और फिर अपना कोई मदद नहीं । कोई लडका नहीं तो रोज भोजन बनाने का कष्ट कौन उठाएगा । और तो के लिए रूस भोजन करने की आवश्यकता है क्या? अगर एक वक्त खा लिया तो दो दिन के लिए छुट्टी हो गई । बच्चे के लिए ताजा हाल हुआ । ये रोटियां बन जाती थी । ऐसी दशा में स्वास्थ्य क्यों ना बिगडता? चिंता शौक दुरवस्था एक हो तो कोई कहीं यहाँ तो क्रियता का दावा था । उस पर निर्मला ने दवा खाने की कसम खा ली थी । करती थी । क्या उन थोडे से रुपये में दवा की गुंजाइश कहाँ थी? जहाँ भोजन का दिखाना था वहाँ दवा का जिक्र ही क्या? दिन दिन सूखती चली जाती थी । एक दिन रुकमनी ने कहा बहुत इस तरह कब तक खुला करोगी? जीईसी तो जहाँ है चलो किसी वैध को दिखाना हूँ । निर्मला ने विरक्त भाव से कहा जिसे रोने के लिए जीना हो उसका मर जाना ही अच्छा रुक नहीं बुलाने से तो मौत नहीं आती । निर्मला मौत तो बिन बुलाए आती है, बुलाने में क्यों नहीं आएगी? उसके आने में बहुत दिन लगेंगे । बहन जे दिन चलती हूँ, उतने साल समझ लीजिए । रुक्मणी दिन ऐसा छोटा मत करो । बहुत अभी संसार का सुखी क्या देखा है? निर्मला अगर संसार का यही सुख है जो इतने दिनों से देख रही हूँ तो उससे जी भर गया । सच कहती हूँ बहन इस बच्ची का मोह मुझे बांधे हुए हैं । नहीं तो अब तक कब की चली गई होती? न जाने इस बिचारे के भाग्य में क्या लिखा है? दोनों महिलाएं होने लगी । इधर जबसे निर्मला ने चारपाई पकड ली है, रुक्मणी के हिंदी में दया का सोता सा खुल गया है । दिवेश का लेश भी नहीं रहा । कोई काम करती हूँ । निर्मला की आवाज सुनते ही दौडती है घंटों उसके पास तथा पुरान सुनाया करती है । कोई ऐसी चीज पकाना चाहती हैं जिसे निर्मला रूचि सिखाये । निर्मला को कभी हस्ते देख लेती हैं तो निहाल हो जाती है और बच्ची को दो अपने गले का हार बनाए रहती है । उसी की नींव होती है उसी की नहीं दी जाती है । वहीं बालिका अब उसके जीवन का आधार है । रुकमनी ने जरा देर बाद कहा बहुत तो इतनी निराश की होती हूँ । भगवान चाहेंगे तो तुम दो चार दिन में अच्छी हो जाओगी मेरे साथ आज राज्य के पास चलो बडे सज्जन है निर्मला डीडीजी अब मुझे किसी वैद हकीम की दवा फायदा ना करेगी । अब मेरी चिंता न करें । बच्चे को आपकी गोद में छोड जाती हूँ । अगर जीती जाती रहे तो किसी अच्छे कुल में विवाह कर दीजिएगा । मैं तो इसके लिए अपने जीवन में कुछ न कर सके । केवल जन्म देने भर की अपराध नहीं हूँ । चाहे कवारी रखेगा चाहे विश्व देकर मार डालेगा पर को पात्र की गाली नाम अंडा देगा । इतनी आपसे मेरी दिन है । मैंने आपकी कुछ सेवा ना कि इसका बडा दुख हो रहा है । मुझे अभागिनी से किसी को सुख नहीं मिला जिस पर मेरी छाया भी पड गयी उसका सर्वनाश हो गया । अगर स्वामी जी कभी घर आगे तो उनसे कहीं आएगा कि िसकर्म जाली के अपराध शमा कर दी । रुक्मणी रोती हुई बोली बहुत तुम्हारा कोई अपराध नहीं । ईश्वर से कहती हूँ तुम्हारी और से मेरे मन में जरा भी मैं नहीं । हाँ मैंने साडी तुम्हारे साथ कपट क्या इसका मुझे मरते दम तक दुख रहेगा । निर्मला ने कातन नेत्र से देखते हुए कहा दीदी जी कहने की बात नहीं, पर बिना कहीं रहा नहीं जाता । स्वामी जी ने हमेशा मुझे और विश्वास की दृष्टि से देखा, लेकिन मैंने कभी मन में भी उनकी उपेक्षा नहीं की । जो होना था वो तो हो ही चुका था । धर्म करके अपना पर लोग क्यों बिगाडती पूर्व जन्म में ना जाने कौन सा पाप किया था, जिसका वहाँ प्रायश्चित करना पडा । इस जन्म में काटे बोलती तो कौन गति होती? निर्मला की सांस बडे वेग से चलने लगी । फिर घाट पर ली गई और बच्चे की और एक ऐसी दृष्टि से देखा जो उसके चरित्र जीवन की संपूर्ण विमुक्त खता की वृहद आलोचना थी । वाणी में इतनी सामर्थ्य कहाँ? तीन दिनों तक निर्मला की आंखों से आंसू की धारा बहती रहे । वहाँ ना किसी से बोलती थी, ना किसी की ओर देखती थी और ना किसी का कुछ सुनती थी । उस वेदना का कौन अनुमान कर सकता है । चौथे दिन संध्या समय वहाँ विपत्ति कथा समाप्त हो गयी । उसी समय जब पशु पक्षी अपने अपने बस मेरे को लौट रहे थे । निर्मला का प्रांत पक्षी भी दिनभर शिकारियों के निशानों, शिकारी चिडियों के पंजों और वायु के प्रचंड झोंकों से आहत और व्यथित अपने बसेरे की ओर उड गया । मोहल्ले की लोग जमा हो गए । लाश बाहर निकाली गई । कौन राहत करेगा? यहाँ प्रश्न उठा । लोग इसी चिंता में थी कि सहसा एक बूढा पथिक एक बक ऊचा लटकाएं, आकर खडा हो गया । यहाँ मुझे तोताराम थी ।

Details
Nirmala written by Premchand Narrated by Sarika Rathore Author : Premchad Producer : Saransh Studios Author : Premchand Voiceover Artist : Sarika Rathore
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