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निर्मला अध्याय - 10

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Nirmala written by Premchand Narrated by Sarika Rathore Author : Premchad Producer : Saransh Studios Author : Premchand Voiceover Artist : Sarika Rathore
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निर्मला अध्याय दस अबकी सुधा के साथ निर्मला को भी आना पडा । वहाँ तो मैं की मैं कुछ दिन और रहना चाहती थी । लेकिन शौका दूर सुधार अकेले कैसे रही उसको आखिर आना ही पडा । रुकमनी ने मुंबई से कहा देखती हैं बहुत मई के से कैसे निखर कर आई है? भूमि ने कहा डीडी माँ की हाथ की रोटियाँ लडकियों को बहुत अच्छी लगती है । रुक्मणी ठीक कहती है होंगी खिलाना तो बस माही जानती है । निर्मला को ऐसा मालूम हुआ कि घर का कोई आदमी उसके आने से खुश नहीं है । मुझे जीने खुशी तो बहुत दिखाई, पर हिंदी अगर चिंता को ना छिपा सकें । बच्ची का नाम सुधारने आशा रख दिया था । वहाँ आशा की मूर्ति सी थी । देखकर सारी चिंताएं भाग जाती थी । मुंशीजी ने उसे गोद में लेना चाहा तो रोने लगी । दौड कर मां से लिपट गई । मानव पिता को पहचानती ही नहीं । मुझे जीने मिठाइयों से उसे पड जाना चाहा । घर में कोई नौकर तो था नहीं जाकर सी आराम से दो आने की मिठाई लाने को कहा । जी आराम भी बैठा हुआ था । बोल उठा हम लोगों के लिए तो कभी मिठाई या नहीं आती । मुझे जीने झुँझलाकर कहा तुम लोग बच्चे नहीं हूँ जी आराम और क्या बोलते हैं । मिठाई मंगवाकर रख दीजिए तो मालूम हो कि बच्चे हैं बूढे निकली चार आना और आशा की बदौलत हमारे नसीब दी जाएगी मुझे जी मेरे पास इस वक्त पैसे नहीं है । जाओ सिया जल्द आना जी आराम सिया नहीं जाएगा, किसी का गुलाम नहीं है । आशा अपने बाप की बेटी हैं तो वहाँ भी अपने बाप का बेटा है । मुझे जी क्या फुजूल की बातें करती हूँ मैं नहीं से बच्चे की बराबरी करते तो शर्म नहीं आती । जाऊ सी आराम ये पैसे लोग जी आराम मत जाना । क्या तुम किसी के नौकर नहीं हूँ । सिया बडी दुविधा में पड गया । किसका कहना माने अंत में उसे जियाराम का गहना मानने का निश्चय किया । बात ज्यादा से ज्यादा धुरत देंगे क्या? तो मारेगा फिरवा किसके पास फरियाद लेकर जाएगा? बोला मैं आ जाऊंगा । मुझे जीने धमकाकर कहा अच्छा तो मेरे पास फिर कोई चीज मांगने बताना । मुझे जीत खुद बाजार चले गए और एक रुपये की मिठाई लेकर लौटा दो आने की मिठाई मांगते हुए उन्हें शर्माएं हलवाई उन्हें पहचानता था । दिल में क्या कहेगा? मिठाई लिए हुए मुझे अंदर चले गए । सी आराम ने मिठाई का बडा सा दोना देखा तो बाप का गहना नाम मानने का उसे दुख हुआ । अब किस मुंह से मिठाई लेने अंदर जाएगा । बडी भूल हुई वहाँ मन ही मन जी आराम की चोटों की जोड और मिठाई की मिठास में तुलना करने लगा । सहसा होंगी ने दो तश्तरियां दोनों के सामने लाकर रखती जी । आराम ने बिगडकर कहा इसे उठा ले जाते होंगे । कहा है कोई बिगडते हो बाबू क्या मिठाई अच्छी नहीं लगती जी आराम मिठाई आशा के लिए आई है हमारे लिए नहीं आई ले जाओ नहीं तो सडक पर से दूंगा । हम तो पैसे पैसे के लिए रखते रहते हैं और यहाँ रुपये की मिठाई आती हैं । होंगी तो लेलो सिया बाबू यहाँ डालेंगे ना सही? सीताराम ने डरते डरते हाथ बढाया था कि जी आराम ने डाटकर कहा मध्य जूना मिठाई नहीं तो हाथ तोड कर रख दूंगा लाल की कही का सी आराम ये धुरकी सुनकर सहम उठा । मिठाई खाने की हिम्मत न पडी निर्मला ने ये कथा सुनी तो दोनों लडकों को मनाने चलिए मुझे जीने कडी कसम रखती है । निर्मला आप समझते नहीं है । ये सारा गुस्सा मुझ पर है । मुझे जी गुस्सा ठाक हो गया है । इस ख्याल से कोई शक्ति नहीं करता कि लोग कहेंगे बिना माँ के बच्चों को सताते हैं नहीं तो सारी शरारत घडी भर में निकाल दो । निर्मला इसी बदनामी का तो मुझे डर है । मुझे जी अब नाइडर होगा जिसकी जी में जो आये कहीं निर्मला पहले तो ये ऐसे नहीं थे । मुझे जी अजीत कहता है कि आपकी लडकी मौजूद थे अपनी शादी क्योंकि ये कहते भी से संकोच नहीं होता कि आप लोगों ने मंसाराम को विश्व दे दिया । लडका नहीं शत्रु है । जियाराम द्वार पर छिपकर खडा था । स्त्री पुरुष में मिठाई के विषय में क्या बातें होती है यही सुन्ने वहाँ आया था । मुझे जी का अंतिम वाक्य सुनकर उसे ना रहा गया । बोल उठा शत्रु ना होता तो आप उसके पीछे क्यों पढते? आप जो इस वक्त कर रहे हैं वहाँ मैं बहुत पहले समझे बैठा हूँ । भैया न समझते धोखा खा गए । हमारे साथ आपकी डालना गलेगी । सारा जमाना कह रहा है कि भाई साहब को जहर दिया गया है । मैं कहता हूँ तो आपको क्यों गुस्सा आता है? निर्मला तो सन्नाटे में आ गई । मालूम हुआ किसी ने उसकी देखिये पर अंगारे डाल दिए मुझे जीने डाटकर जी आराम को चुप कराना चाहा । जियाराम निशंक खडा ईंट का जवाब पत्थर से देता रहा । यहाँ तक कि निर्मला को भी उस पर क्रोध आ गया । यह कल का छोकरा इसी काम करना काज का यू खडा करा रहा है जैसे घर भर का पालन पोषण नहीं करता हूँ । त्योरियां चढाकर बोली बस अब बहुत हुआ जी आराम मालूम हो गया । तुम बडे लायक हो । बाहर जाकर बैठो मुझे जी अब तक तो कुछ दब दब कर बोलते रहे । निर्मला की शाह पाई तो दिल बढ गया । डांट पीसकर लक्की और इसके पहले की निर्मला उनके हाथ पकड सके । एक थप्पर चला ही दिया । थप्पड निर्मला के ऊपर पडा । वहीं सामने पडी माथा चकरा गया । मुझे जी के सूखे हाथों में इतनी शक्ति है इसका वहाँ अनुमान नहीं कर सकती थी । सिर पकडकर बैठ गई । मुझे जी का क्रोध और भी भडक उठा । फिर घुसा चलाया पर अबकी जियाराम ने उनका हाथ पकड लिया और पीछे धकेलकर बोला दूर से बातें कीजिए क्यों नाहक अपनी बेज्जती करवाते हैं । अम्माजी का लिहाज कर रहा हूँ, नहीं तो देख लेता हूँ । यह कहता हुआ वहाँ बाहर चला गया । मुझे जी संज्ञाशून्य से खडे रहे । इस वक्त अगर जियाराम पर देवी वज गिर पडता तो शायद उन्हें हार्दिक आनंद होता । जिस पुत्र का कभी गोद में लेकर निहाल हो जाते थे । उसी के प्रति आज भारती भारती की दुष् कल्पनाएं मन में आ रही थी । रुक्मणी अब तक तो अपनी कोठरी में थी । अब आकर बोली बेटा अपने बराबर का हो जाए तो उस पर हाथ ना छोडना चाहिए । मुझे जी ने ओट्स चबाकर कहा । मैं इसे घर से निकालकर छोडूंगा । एक मांगी चोरी करे । मुझ से कोई मतलब नहीं । रुक्मणी ना किसी कटे मुंशीजी इसकी चिंता नहीं । निर्मला मैं जानती हूँ की मेरे आने से यह तूफान खडा हो जाएगा तो भूलकर बिना आती अब भी भला है । मुझे भेज दीजिए इस घर में मुझे ना रहा जाएगा । रुक्मणी तुम्हारा बहुत लिहाज करता है । बहु नहीं तो आज अनर्थ ही हो जाता । निर्मला अब और क्या अनर्थ होगा । दे दीजिए । मैं तो फूट फूटकर पाव रखती हूँ । ये भी अब पेश लगी जाता है । अभी घर में पाव रखते देर नहीं हुई और ये हाल हो गया । ईश्वरी कुशल करें रात को भोजन करने कोई ना उठा । अकेले मुझे जी ने खाया । निर्मला को आज नहीं चिंता हो गयी । जीवन कैसे पार लगेगा । अपना ही पेट होता तो विशेष चिंता ना थी । अब तो एक नई विपत्ति गले पड गई थी । वही सोच रही थी । मेरी बच्ची के भाग्य में क्या लिखा है? राम चिंता में नींद कब आती है? निर्मला चारपाई पर करवटें बदल रही थी । कितना जहाँ दी थी कि नींद आ जाये पर नींद न आने की कसम से खाली थी । चिराग बुझा दिया था । खिडकी के दरवाजे खोल दिए थे । टिक टिक करने वाली घडी भी दूसरे कमरे में रख आई थी । पनीर का नाम नाम था । जितनी बातें सोच की थी । सब सोच चुकी चिंताओं का भी अंत हो गया । पर पाल के ना झपकी । तब उसने फिर लैंड चलाया और एक पुस्तक पडने लगी । दो चार ही पृष्ठ पढे होंगे की झपकी आ गई । किताब खुली रह गई । सहसा जी आराम ने कमरे में कदम रखा । उसके पास पत्थर तर्क आप रहे थे । उसने कमरे में ऊपर नीचे देखा । निर्मला सोई हुई थी । उसकी सिरहाने ताक पर एक छोटा सा पीतल का संदूक जा रखा हुआ था जी आराम दबे पांव गया । धीरे से संदीक्षा उतारा और बडी तेजी से कमरे के बाहर निकला । उसी वक्त निर्मला की आंखें खुल गई । चौक करोड खडी हुई द्वार पर आकर देखा कलेजा धक से हो गया । क्या जी आराम है मेरे कमरे में क्या करने आया था? कहीं मुझे धोखा तो नहीं हुआ? शायद दीदी जी की कमरे में आया हूँ । क्या उसका काम ही किया था? शायद मुझ से कुछ कहने आया हूँ । लेकिन इस वक्त क्या कहने आया होगा? इसके लिए क्या है उसका दिल का? आप उठा मुझे ही ऊपर छत पर सो रहे थे । मुंडेर न होने के कारण निर्मला ऊपर नहीं हो सकती थी । उसने सोचा चल कर उन्हें जगह पर जाने की हिम्मत ना पडी । शक की आदमी है ना जाने क्या समझ बैठे और क्या करने पर तैयार हो जाए । आकर फिर पुस्तक पडने लगी । सवेरे पूछने पर आपको मालूम हो जाएगा कौन जाने मुझे धोखा ही हुआ हूँ । नींद में कभी कभी धोखा हो ही जाता है । लेकिन सवेरे पूछने का निश्चित कर भी उसे फिर नींद नहीं । सवेरे वह जलपान लेकर स्वयं जी आराम के पास गए तो वहाँ उसे देख कर चौंक पडा । रोज तो भूमि आती थी, आज ही क्यों आ रही हैं? निर्मला की ओर ताकने की उसकी हिम्मत ना पडे । निर्मला ने उसकी ओर विश्वासपूर्ण नेत्र से देखकर पूछा रात को तुम मेरे कमरे में गए थे जी आराम ने जिसने दिखाकर कहा मैं बना । मैं रात को क्या करने जाता है? क्या कोई गया था? निर्मला ने इस भाव से कहा मानव उसे उसकी बात का पूरा विश्वास हो गया । हाँ, मुझे ऐसा मालूम हुआ कि कोई मेरे कमरे से निकला । मैंने इसका मोटो ना देखा और उसकी पीठ देखकर अनुमान किया कि शायद तुम किसी काम से आए हो । इसका पता कैसे चले? कौन था? कोई था जरूर इसमें कोई संदेह नहीं । जी आराम अपने को मेर अपराजित करने की चेष्टा करने लगा । मैं तो रात को थियेटर देखने चला गया था । वहां से लौटा तो एक मित्र के घर लेट रहा । थोडी देर हुई लौटा हूँ मेरे साथ और भी कई मित्र थे जिससे जी चाहे पूछने हाँ भाई में बहुत डरता हूँ । ऐसा ना हो कोई चीज गायब हो गई तो मेरा नाम लगे । चोर को तो कोई पकड नहीं सकता । मेरे मत्थे जाएगी बाबू जी तो आप जानती हैं । मुझे मारने दौडेंगे निर्मला तुम्हारा नाम क्यों लगेगा? अगर तुम ही होते हैं तो भी तो मैं कोई चोरी नहीं लगा सकता । चोरी दूसरे की चीज की जाती है । अब भी चीज की चोरी कोई नहीं करता । अभी तक निर्मला की निगाह आपने संदू बच्चे पर ना पडी थी । भोजन बनाने लगे । जब वकील साहब कचहरी चले गए तो वह सुधार से मिलने चली । इधर कई दिनों से मुलाकात ना हुई थी । फिर रात वाली घटना पर विचार परिवर्तन भी करना था । मुंबई से कहा कमरे से गहनों का बॉक्स उठाला भोगी ने लौटकर कहा वहाँ तो कोई संदूक नहीं है, कहाँ रखा था? निर्मला ने चिढकर कहा एक बार में तो तेरह कम ही कभी नहीं होता वहाँ छोड कर और जाएगा । कहा अलमारी में देखा था भूमि नहीं बहुत जी अलमारी में तो नहीं देखा छूट बोलो निर्मला मुस्कुरा बडी बोली ज्यादे जल्दी या एक्शन में भूमि फिर खाली हाथ लौट आई । अलमारी में भी नहीं है अब जहाँ बताओ वहाँ देखो निर्मला झुंझलाकर ये कहती हुई उठ खडी हुई तुझे ईश्वर ने आंखे ही ना जाने किस लिए दी देख उसी कमरे में से लाती हूँ कि नहीं होंगी भी पीछे पीछे कमरे में आ गई । निर्मला ने ताकपर नहीं रहा डाली अलमारी खुल कर देगी चारपाई कि नीचे झांककर देखा । फिर कपडों का बडा संदूक खोलकर देखा । बस का कहीं पता नहीं । आश्चर्य हुआ । आखिर बक्सा गया कहा सहसा रात वाली घटना बिजली की भारतीय उसकी आंखों के सामने चमक गई । कलेजा उछल बडा अब तक निश्चिंत होकर खोज रही थी । अब ताप सा चढ गया । बडी उतावली से चारों और खोजी लगे कहीं पता नहीं । जहाँ खोजना चाहिए था वहाँ भी खोजा और जहाँ नहीं खोजना चाहिए था वहाँ भी खोजा । इतना बडा संदूक चाहिए बिछावन कि नीचे कैसे छिप जाता । पर बिछावन भी झांक कर देखा । शन षणमुख की कांति मलीन होती जाती थी । प्राण नहीं में समाप्त हो जाती थी । अंत में निराश होकर उसके छाती पर एक घूसा मारा और रोने लगी । गहने किसी की संपत्ति होते हैं पति की ओर । किसी संपत्ति पर उसका अधिकार नहीं होता । इन्हीं गांव से बाल और गौरव होता है । निर्मला के पास पांच छह हजार के गहने दी । जब उन्हें पहन कर वहाँ निकलती थी तो उतनी देर के लिए उल्लास से उसका ही देख खिला रहता था । एक गहना मानो विपत्ति और बाधा से बचाने के लिए एक के रख शास्त्र था अभी रात की उसे सोचा था जी आराम की लांडी बनकर वाहना रहेगी । ईश्वर न करे कि वह किसी के सामने हाथ फैलाए । इसी खेलने से वहाँ भी नाव को भी पार लगा देगी और अपनी बच्ची को भी किसी किसी घाट पहुंचा देगी । उसी किस बात की चिंता है, उन्हें तो कोई उसे ना छीन लेगा । आज ही मेरी सिंगार है कल को मेरे आधार हो जाएंगे । इस विचार से उसका ही देखो कितनी सांत्वना मिली थी वहाँ संपत्ति आज उसके हाथ से निकल गयी । अब वन्नी रहा लडकी संचार उसे कोई अवलम, कोई सहारा ना था उसकी आशाओं का आधार जड से कट गया । फूट फूटकर रोने लगी ईश्वर तुमसे इतना बिना देखा गया मुझे डुबकियाँ को तुम्हें यूपी अपंग बना दिया था । अब आगे भी फोड दी । अब वहाँ किसके सामने हाथ फैलाएगी, किसके द्वारा पर भेद मांगेगी पसीने से उसकी देख भी गई । रोती रोती आंखे सूचकांक निर्मला से नीचा किए रो रही थी । रुक्मणी उसी धीरज भी ला रही थी, लेकिन उसके आंसू ना रुकते थे । शोक की ज्वाला काम न होती थी । तीन बजे जी आराम । स्कूल से लौटा निर्मला उसने आने की खबर पाकर विक्षिप्त कि भारतीय उठी और उसके कमरे के द्वार पर आकर बोले भैया, दिल्लगी की हो तो दे दो । दुखिया को सताकर क्या पाओगे? जी आराम एक्शन के लिए कातर होता था चोर काला में उसका ये पहला ही प्रयास था । ये कठोरता जिससे हिंसा में मनोरंजन होता है, अभी तक उसे प्राप्त हुई थी । ये भी उसके पास संदूक अच्छा होता और फिर इतना मौका मिलता की उसे ताक पर रखा हुए तो कदाचित वहाँ उसे मौके को ना छोड दूँ लेकिन संधू उसके हाथ से निकल चुका था । यारो ने उसे सराफे में पहुंचा दिया था और उन्होंने पोने बेच डाला था । चोरों कि झूठ के सिवा और कौन रक्षा कर सकता है । बोला भला अम्मा जी मैं आपसे ऐसी लगी करूंगा । आप अभी तक मुझ पर शक्कर दी जा रही हैं । मैं कह चुका हूँ में रात को घर पे था लेकिन आपको यकीन ही नहीं आज तक बडे दुख की बात है कि मुझे अब इतना नीच समझती हैं । निर्मला ने आंसू पहुंचते हुए कहा मैं तुम्हारे पर शक नहीं करती है या तो मैं चोरी नहीं लगती । मैंने समझा शायद दिल्लगी की हूँ । जी आराम पर वहाँ चोरी का समय है । कैसे कर सकती थी दुनिया यही तो कहीं की की लडकी की माँ मर गई हैं तो उस पर चोरी का इल्जाम लगाया जा रहा है । मेरे मूह में ही तो कालिक लगेगी जी । आराम ने आश्वासन देते हुए कहा चलिए मैं देखो अखिले कौन गया? चूर आया किस रास्ते से होंगी भैया तुम चोरों के आने को कहते हूँ । चोरी के बेस से तो निकल ही आते हैं । यहाँ तो चारों और ये फिर क्या है जी आराम खूब अच्छी तरह तलाश कर लिया है । निर्मला सारा घर तो छान मारा, अब कहाँ खोजने को कहते हूँ जी आराम । आप लोग सो भी तो जाती हैं मुर्दों से बाजी लगाकर । चार बजे मुझे जी घर आए तो निर्मला की दशा देखकर पूछा कैसी तबियत है? कहीं दर्द तो नहीं है, कहकर उन्होंने आशा को गोद में उठा लिया । निर्मला कोई जवाब न दे सकी । फिर रोने लगी । भूमि ने कहा ऐसा कभी नहीं हुआ था । मेरी सारी उम्र इस घर में कट गई । आज तक एक पैसे की चोरी नहीं हुई । दुनिया यही कहेगी की भूमि का काम है । अब तो भगवान ही पद पानी रखी । मुझे ही अचकन के बटन खोल रहे थे भी । बटन बंद करते हुए बोले क्या हुआ कोई चीज चोरी हो गई होंगी । बहुत जी के सारे गहने उठ गए । मुझे जी रखे कहा था । निर्मला ने सिसकियां लेते हुए रात की सारी घटना बयां कर दी । पर जी आराम की सूरत के आदमी के अपने कमरे से निकलने की बात नहीं है । मुझे जी ने ठंडी सांस भरकर कहा ईश्वर भी पडा, अन्यायी हैं । जो मारे उन्हीं को मारता है । मालूम होता है अदीना आ गए हैं । मगर चूर आया तो की देर से कहीं सेंड नहीं पडी और किसी तरफ से आने का रास्ता नहीं । मैं तो कोई ऐसा पाप नहीं किया जिसकी मुझे यह सजा मिल रही है । बार बार कहता रहा गहने का संदूक छत तट पर मतलब हूँ मगर कौन सुनता है? निर्मला मैं क्या जानती थी कि ये गजब टूर पडेगा? मुंशीजी इतना तो जानती थी कि सब दिन बराबर नहीं जाते हैं । आज बनवाने जाऊँ तो इसे हजार से कम ना लगेंगे । आजकल अपनी जो दशा है वहाँ तुम से छिपी नहीं । खर्च भर का मुश्किल से मिलता है । गहने कहाँ से बनेंगे? जाता हूँ । पुलिस में इतना कराता हूँ पर मिलने की उम्मीद ना समझो । निर्मला ने आपत्ति के भाव से कहा जब जानते हैं कि पुलिस में इत्तिला करने से कुछ नहीं होगा तो क्यों जा रहे हो? मुंशीजी दिल नहीं मानता और क्या इतना बडा नुकसान उठाकर चुपचाप तो नहीं बैठा जाता । निर्मला मिलने वाले होते तो जाते ही क्यों? तकदीर में ना थे तो कैसे रहते मुझे जी तकदीर में होंगे तो मिल जाएंगे । नहीं तो गए तो है ही मुझे जी कमरे से निकले । निर्मला ने उनका हाथ पकडकर कहा मैं कहती हूँ मत जाओ कहीं ऐसा ना हो लेने के देने पड जाए मुझे किसी ने हाथ छुडाकर कहा तुम भी बच्चों की सी जित कर रही हो । दस हजार का नुकसान ऐसा नहीं है जिससे मैं यूपी उठा लो । मैं तो नहीं रहा हूँ पर मेरे ही दे पर जो बीत रही है वहाँ मैं ही जानता हूँ । ये चोट मेरे कलेजे पर लगी है । मुझे भी और कुछ ना कह सके । गला फस गया । वहाँ तेजी से कमरे से निकल आए और थाने पर जा पहुंचे । थानेदार उनका बहुत लिहाज करता था । उसे एक बार रिश्वत के मुकदमे से बरी करा चुके थे । उनके साथ ही तफ्तीश करने आप पहुंचा । नाम था अ लाया था । शाम हो गई थी । थानेदार ने मकान के अगवा दे पिछवाडे घूम घूमकर देखा । अंदर जाकर निर्मला के कमरे को गौर से देखा । ऊपर की मुंडेर की जांच की । मोहल्ले की दो चार आदमियों से चुपके चुपके कुछ बात की और तब मुझे जी से बोले जा नाम खुदा की कसम ये किसी बाहर के आदमी का काम नहीं । खुदा की कसम अगर कोई बाहर का आदमी निकले तो आज से थानेदारी करना छोड दो । आप के घर में कुछ मुलाजिम ऐसा तो नहीं है जिसपर आपको शुबह हो । मुझे जी घर में तो आजकल सिर्फ एक महरी है । थानेदार अजीत वहाँ पगली है यह किसी बडे शातिर का काम है । खुदा की कसम मुझे जी तो घर में और कौन है? मेरे दोनों लडके हैं, स्त्री है और बहन है । इनमें से किस पर शकुर थानेदार खुदा की कसम घर के किसी आदमी का काम है चाहे वो कोई हो । इंशाल्लाह दो चार दिन में मैं आपको इसकी खबर दूंगा । ये तो नहीं कह सकता कि माल भी सब मिल जाएगा । पर खुदा की कसम चोर जरूर पकड दिखाऊंगा । थानेदार चला गया तो मुझे जीने आकर निर्मला से उसकी बातें कही । निर्मला सहम उठी । थानेदार से कह दीजिए तफतीश ना करें । आपके पैरों पडती हूँ मुझे जी आखिर क्यों? निर्मला अब क्या बताऊँ? वह कह रहा है की घर ही के किसी का काम है मुझे जी उसे बकने दो जी आराम अपने कमरे में बैठा हुआ भगवान को याद कर रहा था । उसके मूड पर हवाइयां उड रही थी । सुन चुका था कि पुलिस वाले चेहरे से भाग जाते हैं । बाहर निकलने की हिम्मत नहीं पडती थी । दोनों आदमियों में क्या बात हो रही है ये जानने के लिए छटपटा रहा था । यूरी थानेदार चला गया और भूमि किसी काम से बाहर निकले । जी आई । हमने पूछा थानेदार क्या कर रहा था? होंगी होंगी ने पास आकर कहा दाडी हजार कहता था घर से किसी आदमी का काम है बाहर का कोई नहीं है जी । आराम बाबू जी ने कुछ नहीं था होंगे कुछ तो नहीं का खडे हूँ करते रहे घर में एक भूमि ही रहना और तो सब अपनी है जी आराम मैं भी तो गैर हो तो ही क्यूँ होंगे तुम गैर का है हो भैया जी आराम बाबू जी ने थानेदार से कहा नहीं घर में किसी पर उनका शुबहा नहीं होंगी । कुछ तो कहते नहीं सुना । बेचारे थानेदार ने भले ही कहा होंगी तो पगली है वहाँ क्या चोरी करेगी? बाबू जी तो मुझे फंसाई देते थे जी आराम तब तो तू भी निकल गई अकेले मैं ही रह गया तो ही बता तो उन्हें मुझे उस दिन घर में देखा था । होंगी नहीं भैया, तुम तो थियेटर देखने गए थे जी आया गवाई देगी ना होंगी ये क्या कहते हैं भैया बहुत जी तफ्तीश बंद कर देंगे जी आराम सच होंगी । हाँ भैया बार बार कहती है की तफ्तीश ना कराओ, गहने गए जाने दो पर बाबू जी मानते ही नहीं पांच छह दिन तक जी आराम ने पेट भर भोजन नहीं । क्या कभी दो हजार कोर्स खा लेता? कभी कह देता, भूख नहीं है । उसके चेहरे का रंग उडा रहता था । राते जागृति कहती प्रतिक्षण थानेदार की शंका बनी रहती थी । यदि वहाँ जानता कि मामला इतना तूल खींचेगा तो कभी ऐसा कामना करता हूँ । उसने तो समझा था किसी छोर पर शुभा होगी । मेरी तरफ किसी का ध्यान देना जाएगा । पर अब भांडा फूटता हुआ मालूम होता था । अभागा थानेदार जिस ढंग से छानबीन कर रहा था, उसे सी आराम को बडी शंका हो रही थी । सातवें दिन संध्या समय घर लौटा तो बहुत चिंतित था । आज तक उसके बचने की कुछ ना कुछ आशा थी । माल अभी तक कहीं बरामद हुआ था, पर आज उसे माल के बरामद होने की खबर मिल गई थी । इसी दम थानेदार कांस्टेबल के साथ आता होगा । बच्चे को कोई उपाय नहीं । थानेदार को रिश्वत देने से संभव है । मुकदमे को दबा दे । रुपये हाथ में थी, पर क्या बातचीत भी रहेगी । अभी माल बरामद नहीं हुआ भी सारे शहर में अफवाह थी कि बेटे ने ही माल उडाया है । माल मिले जाने पर दो गली गली बाद फैल जाएगी । फिर किसी को मोना दिखा सकेगा । मुझे जी कचहरी से लौटे तो बहुत घबराए हुए थे । फिर थामकर चारपाई पर बैठ गए । निर्मला ने कहा कपडे क्यों नहीं उतारते? आज तो और दिनों से देर हो गयी है । मुझे जी क्या कपडे उतारूँ तुमने कुछ सुना? निर्मला क्या बात है? मैंने तो कुछ नहीं सुना । मुझे जी माल बरामद हो गया । अब जिया का बचना मुश्किल है । निर्मला को आश्चर्य नहीं हुआ । उसके चेहरे से ऐसा जान पडा । मानव से यह बात मालूम थी । बोली मैं तो पहले ही कह रही थी कि थाने में इतना मत कीजिए मुझे जी तो मैं जया पर शक ता । निर्मला शक क्यों नहीं था? मैंने उन्हें अपने कमरे से निकलते देखा था मुझे जी फिर तुमने मुझे क्यों न कह दिया? निर्मला ये बात मेरे कहने की नहीं थी । आपकी दिल में जरूर ख्याल आता कि एशिया वर्ष आक्षेप लगा रही है । कहीं ये ख्याल होता है या नहीं । झूठ ना बोलेगा । मुझे भी संभव है । मैं इनकार नहीं कर सकता हूँ । फिर भी उस दशा में तो मैं मुझे कह देना चाहिए था रिपोर्ट की नौ बतलाती तुमने अपनी एक नामी की तो फिक्र की पर ये ना सोचा कि परिणाम क्या होगा । मैं अभी थाने में चला जाता हूँ । अलाया कहाँ आता ही होगा । निर्माण ने हताश होकर पूछा फिर हम मुझे जीने आकाश की ओर ताकते हुए कहा । फिर जैसी भगवान की इच्छा हजार दो हजार रुपये रिश्वत देने के लिए होते तो शायद मामला दब जाता । पर मेरी हालत तो तुम जानती हूँ, तकदीर खोलती है और कुछ नहीं । पाप तो मैंने किया है । ठंड कौन भरेगा? एक लडका था उसकी वहाँ दशा हुई । दूसरे की ये दशा हो रही है । नालायक था, गुस्ताख था । काम चोर था पर था तो अपना ही लडका कभी ना कभी चेंज ही जाता हूँ । ये चोट अपना सही जाएगी । निर्मला अगर कुछ दे दिलाकर जान बच सके तो मैं रुपये का प्रबंध कर दूँ । मुझे जी कर सकती हूँ । कितने रुपए दे सकती हूँ । निर्मला कितना सरकार होगा मुझे जी एक हजार से कम तो शायद बातचीत ना हो सके । मैंने एक मुकदमे में उससे एक हजार लिए थे । वहाँ कसर आज निकालेगा । निर्मला हो जाएगा अभी खानी चाहिए । मुंशी थाने में बडी देर लगी एक कान में बातचीत करने का बहुत देर में मौका मिला । अलायड खान पुराना घाट था । बडी मुश्किल से अंटी पर चढा । पांच सौ रुपये लेकर भी अहसान का बोझा सिर पर लाभ भी दिया । कम हो गया । लौटकर निर्मला से बोला लो भाई, बाजी मार ली, रुपये तुमने दिए पर काम मेरी जबान ही नहीं किया । बडी बडी मुश्किलों से राजी हो गया । यह भी याद रहेगी जी आराम भोजन कर चुका है । निर्मला कहाँ, वो तो भी घूम कर लौटे ही नहीं । मुझे जी बारह तो बज रहे होंगे । निर्मला कई दफे चार जाकर देखाई । कमरे में अंधेरा पडा हुआ है मुझे जी और सी आराम । निर्मला वहाँ तो खाते करते हुए हैं । मुझे जी उससे पूछा नहीं जिया कहा । निर्मला वहाँ तो कहते हैं मुझ से कुछ कहकर नहीं गए । मुझे जी को कुछ शंका हुई सी आराम को जगह कर पूछा तुमसे जियाराम ने कुछ कहा नहीं । कब तक लौटेगा गया कहा है सीआर आमने सिर खुजलाते हुए और आखिर मारते हुए कहा मुझ से कुछ नहीं कहा मुझे जी कपडे सब पहन कर गया है । सी आराम जी नहीं कुर्ता और धोती मुझे जी जाते वक्त खुश था । सी आराम खुश तो नहीं मालूम होते थे । कई बार अंदर आने का इरादा क्या पर देहरी से ही लौट गए । कई मिनट तक साया बान में खडे रहे, चलने लगे तो आखिर पूछ रहे थे इधर कई दिन से अक्सर रोया करते थे मुझे जीने इसी ठंडी सांस ली । मानव जीवन में अब कुछ नहीं रहा हूँ और निर्मला से बोले तुमने किया तो अपनी समझ में भले ही के लिए, पर कोई शत्रु भी मुझ पर इससे कठोर आधार न कर सकता था । जी आराम की माता होती तो क्या वहाँ ये संकोच करती? कदापि नहीं । निर्मला बोली, जब डॉक्टर साहब की यहाँ क्यों नहीं चले जाते हैं, शायद वहाँ बैठी हूँ । कई लडके रोज आते हैं, उनसे पूछे शायद कुछ पता लग जाएं । खूब खूब कर चलने पर भी अब पेश लगी गया । मुझे जीने मानो खुली हुई खिडकी से कहा हाँ जाता हूँ और क्या करूंगा? मुझे से बाहर आए तो देखा डॉक्टर सिन्हा खडे हैं । चौक कर पूछा क्या आप देर से खडे हैं? डॉक्टर जी नहीं अभी आया हूँ आप इस वक्त कहाँ जा रहे हैं? साढे बारह हो गए हैं । मुझे आप ही की तरफ आ रहा था जी आराम अभी तक घूम कर नहीं आया आपकी तरफ तो नहीं गया था । डॉक्टर सिंहानी मुझे जी की दोनों हाथ पकड लीजिए और इतना कह पाए थे भाई साहब, अब धैर्य से काम की । मुझे जी गोली खाई हुए मनुष्य की भारतीय जमीन पर गिर पडे ।

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Nirmala written by Premchand Narrated by Sarika Rathore Author : Premchad Producer : Saransh Studios Author : Premchand Voiceover Artist : Sarika Rathore
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