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द बॉय हू लव्ड -74

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मैं रघु गांगुली हूँ। आज मैं अपनी आपबीती लिखने बैठ ही गया हूँ। कागजों की सरसराहट और उस पर चलती हुई कलम की तीखी निब, धीरे-धीरे स्याही का सोखना तथा इन अजीब से लगने वाले मुड़े हुए अक्षरों को देखना निश्चित तौर पर संतुष्टि दे रहा है। मैं कह नहीं सकता कि मेरे जैसे मौनावलंबी (सिजोफ्रेनिक) के लिए इस डायरी लेखन में ही सारे सवालों के जवाब होंगे; पर मैं आज कोशिश कर रहा हूँ। मेरा सिर बुरी तरह से चकरा रहा है। पिछले दो साल से मैं जिंदगी की सबसे ऊँची लहरों पर सवार था। अधिकतर दिनों में मैंने जान देने के लिए तरह-तरह के साधनों की तलाश की—मेरे घर के आस-पास की सबसे ऊँची इमारत, रसोई का सबसे तेज धार चाकू, सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन, कोई केमिस्ट शॉप—जो बिना कोई सवाल किए सोलह बरस के लड़के को बीस या उससे ज्यादा नींद की गोलियाँ दे दे, एक पैकेट चूहे मारने की दवा और कभी-कभी तो यह भी चाहा कि माँ-बाबा से गणित के पेपर में अच्छे नंबर न लाने के लिए फटकार मिले। सुनिये क्या है पूरी कहानी| writer: दुर्जोय दत्ता Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Durjoy Dutta
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बाईस जनवरी दो हजार मैंने आज ब्राहमी से भेंट के अगर मैं ऐसे कहता हूँ थोडा अजीब लगेगा । दरअसल मैंने तीन सुबह उनके ऑफिस के बाहर इंतजार किया । ये निर्णय किसी तरह पर आधारित नहीं था । इसमें मेरे दिल, दिमाग और आत्मा की तरह थी । मैं बता नहीं पा रहा की मैं कैसा महसूस कर रहा था । हो सकता है की हल्की सी जलन जैसे सब कुछ सुन रहा हूँ और केवल वहीं उस जलन को मिटा सकती हो । पता है सुनने में बेहुदा लगेगा और शायद इससे बेहतर कोई उपमा नहीं दे सकता हूँ । माँ बाबा की एक्टिंग ने मुझे बुरी तरह से भडका दिया था । उन का मीठा बर्ताव एक झूठ था । उनका मन आज भी उतना ही खोटा था । बस पहले से और भी छोटा हो गया था । उन्हें इस बात से मतलब नहीं था कि दादा बच्चे को कैसे संभालेंगे । क्या अगर उन्होंने दादा को नहीं स्वीकारा तो वो उन्हें खो देंगे । उन्हें बस यही था की उन का पोता पोती नाजिया या अब्दुल ना बन जाए । हर चीज एक झूठ है । मैं उसके ऑफिस के बाहर खडा । ये जानने की कोशिश में था क्या ध्यान नहीं और मैं भी एकदम झूठ था क्या उसने भी हमारे प्यार के बारे में झूठ कहा था । घूप कमियाँ कैसे मुझे देखकर हैरान हूँ । मैंने कुछ दिन पहले मैं भी दिया था । कॉल करने के लिए नंबर छोडा था तो वहाँ फोन तो करना था पर पर शायद तुम बहुत व्यस्त थी । बहुत कम है ना? नए दोस्त नया साथ ही तो ऐसे बातें क्यों कर रहे हो? अगर ऐसा सच नहीं है तो तुम मिलने क्यों नहीं आई? चाय दी होगी । ब्राहमी के चेहरे पर छाई नकली खुशी भी की पड चुकी थी जो उसने मुझे देखते ही छोड दी थी । पास वाली दुकान तक जाते जाते मेरा गुस्सा और भडक चुका था । मैं चाय नहीं पीता हूँ । मैंने कहा मेरे लिए हम से दूर नहीं रह सकता हूँ । मुझे आप की बात पूरी करने दो । आने में ही दो घंटे लगेंगे । और ये सोचने में बहुत वक्त लगा है कि मैं कहना क्या चाहता हूँ । मैं जानता हूँ कि मुझे क्या करना होगा तो इसके बारे में क्या करना होगा । हमारे बारे में मैंने कहा रघु ब्राहमी हमें इस कहानी का अंत करना होगा । अब ये इस तरफ आ हो गई है । इस बारे में गहराई से सोचा है तो वहाँ जीवन यहीं है । तुम्हें शायद मेरी जरूरत नहीं है । मैं स्कूल में तुम्हारा इंतजार नहीं कर सकता । हमारे पास तो बात करने के लिए फोन तक नहीं है । रघु फोन हो भी तो मुझे तुम्हारे फोन का इंतजार करना पडता है कि तुम्हारी गलती नहीं उदास मत हो । इससे मेरे दिल को दुःख होता है । मुझे ऐसा हुआ है कि तुम्हारे मुकाबले तुम्हारे लिए मेरी भावना कहीं गहरी है और मुझे से कोई दिक्कत नहीं है । पता है तो तुम हो सबसे बेस्ट लडकी और मैं मैं हूं । हालांकि मैंने तुम्हारे बारे में जो महसूस किया मैं इसके लिए तैयार तक नहीं था । मैं अपने साथ ऐसा नहीं कर सकता । मुझे तुम्हारे बारे में सोचना बंद करना होगा तो तुम्हारी सब सब क्या करना चाहिए? धमी ने पूछा मैं तुम्हारा इंतजार नहीं करना चाहता हूँ । तुम्हारे बारे में सोचना बंद करना चाहता हूँ । उनसे प्यार करना बंद करना चाहता हूँ । उसकी खामोशी मेरे कानों के पर्दे फाड रही थी । मैं अपने दिल की धडकन सुन सकता था था था, मुझे घूमती रही और उसकी आंखों नहीं हजारो बातें कह दी । मुझे उसमें से उन बातों को अनुवाद करना था जो ये कह सकें कि वह मुझ से मोहब्बत करती थी । अगर हम यही चाहते हो उसमें मालूम मुझ पर एहसान किया । उसने न तो कोई लडाई की और ना ही मेरी किसी बात पर सवाल उठाया । उसी तरह बैठी रही मानव । वो भी यही सोच रही थी । उसने दोनों कपूर की चाय पीकर पैसे दिए । मुझे भी पैसे देकर बोली । टैक्सी में वापस जाना । ऍम तक आए जाने से पहले वो बोली वैसे समय बात के बारे में गलत थे वो क्या मुझे यहाँ तुम्हारी जरूरत पहले से भी कहीं ज्यादा है? मैं टैक्सी में घर आया तो यही सोचता रहा कि ये बातचीत और कैसे आगे बढ सकती थी । पर अब उसके आखिरी शब्द ही बार बार ध्यान में आ रहे थे । उसकी नजरों में एक उदासी और एक तरफ थी । हो सकता है मेरा मन ही मुझे पहला रहा हूँ तो दोबारा उसके पास जाने के बहाने तलाश रहा हूँ । उसने किसी सांत्वना पुरस्कार की तरह कहा था मैं ठीक हूँ मेरे आसपास की हर चीज की तरह । मैंने उससे जो कहा वो भी छूट था । नौ से दूर नहीं रहना चाहता था । उससे प्यार करना बंद नहीं करना चाहता था । मैंने कभी नहीं चाहा । मैं चाहता था कि मुझ से लडे मुझे अपने से दूर न जाने दे । उससे प्यार देना चाहता था । और उसके प्यार को महसूस करना चाहता था । इतनी चाहत थी और मुझे जानना भी जरूरी था कि वह मेरे बारे में क्या एहसास रखती थी और अब भी मुझे कुछ खास नहीं पता । वो उस से पहले ही झूठ बोल चुकी थी ।

Details
मैं रघु गांगुली हूँ। आज मैं अपनी आपबीती लिखने बैठ ही गया हूँ। कागजों की सरसराहट और उस पर चलती हुई कलम की तीखी निब, धीरे-धीरे स्याही का सोखना तथा इन अजीब से लगने वाले मुड़े हुए अक्षरों को देखना निश्चित तौर पर संतुष्टि दे रहा है। मैं कह नहीं सकता कि मेरे जैसे मौनावलंबी (सिजोफ्रेनिक) के लिए इस डायरी लेखन में ही सारे सवालों के जवाब होंगे; पर मैं आज कोशिश कर रहा हूँ। मेरा सिर बुरी तरह से चकरा रहा है। पिछले दो साल से मैं जिंदगी की सबसे ऊँची लहरों पर सवार था। अधिकतर दिनों में मैंने जान देने के लिए तरह-तरह के साधनों की तलाश की—मेरे घर के आस-पास की सबसे ऊँची इमारत, रसोई का सबसे तेज धार चाकू, सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन, कोई केमिस्ट शॉप—जो बिना कोई सवाल किए सोलह बरस के लड़के को बीस या उससे ज्यादा नींद की गोलियाँ दे दे, एक पैकेट चूहे मारने की दवा और कभी-कभी तो यह भी चाहा कि माँ-बाबा से गणित के पेपर में अच्छे नंबर न लाने के लिए फटकार मिले। सुनिये क्या है पूरी कहानी| writer: दुर्जोय दत्ता Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Durjoy Dutta
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