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द बॉय हू लव्ड -47

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मैं रघु गांगुली हूँ। आज मैं अपनी आपबीती लिखने बैठ ही गया हूँ। कागजों की सरसराहट और उस पर चलती हुई कलम की तीखी निब, धीरे-धीरे स्याही का सोखना तथा इन अजीब से लगने वाले मुड़े हुए अक्षरों को देखना निश्चित तौर पर संतुष्टि दे रहा है। मैं कह नहीं सकता कि मेरे जैसे मौनावलंबी (सिजोफ्रेनिक) के लिए इस डायरी लेखन में ही सारे सवालों के जवाब होंगे; पर मैं आज कोशिश कर रहा हूँ। मेरा सिर बुरी तरह से चकरा रहा है। पिछले दो साल से मैं जिंदगी की सबसे ऊँची लहरों पर सवार था। अधिकतर दिनों में मैंने जान देने के लिए तरह-तरह के साधनों की तलाश की—मेरे घर के आस-पास की सबसे ऊँची इमारत, रसोई का सबसे तेज धार चाकू, सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन, कोई केमिस्ट शॉप—जो बिना कोई सवाल किए सोलह बरस के लड़के को बीस या उससे ज्यादा नींद की गोलियाँ दे दे, एक पैकेट चूहे मारने की दवा और कभी-कभी तो यह भी चाहा कि माँ-बाबा से गणित के पेपर में अच्छे नंबर न लाने के लिए फटकार मिले। सुनिये क्या है पूरी कहानी| writer: दुर्जोय दत्ता Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Durjoy Dutta
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भाई अगस्त उन्नीस सौ निन्यानवे माँ ने मुझे पंद्रह मिनट तक थाने रखा और ऐसे बिलसूरी मानो कोई मर ही गया हूँ मेरा क्यों ना मेरा सोना देबिना क्या करूंगी मैं वो ही तो मेरा सब कुछ है नहीं तो कहा था तो अच्छी तरह खा रहा है । देख तो क्या हाल बना लिया । मेरे बाजु थामकर होने लगी । उन्होंने बाबा की और इल्जाम सा देते हुए कहा और कंधे ष्टिकोण लिए माने खुली को आने का संकेत दिया । होली के आने से पहले ही बाबा ने बैग उठा लिया । अभी इतना बूढा नहीं हुआ । बाबा नहीं शुष्क स्वर में कहा माँ बाबा ने घर जाते हुए भी कोई बात नहीं की । माँ अपने हाथों से मुझे कसकर थाने रखा । मुझे चूमती रही और बार बार बालों में हाथ फिराती रही । मानो उन्हें मेरे अब तक होने पर हैरानी हो रही हो । हमारा घर जल्दी ही पिछली सरसों में पकी इलिश मार्च और लाल मटन करी से महत्व । बाबा ऐसा दिखावा क्या मानो ये कोई बडी बात नहीं थी । दादा ने हमेशा की तरह खाना खाकर टीवी देखा मानो बंगलौर में अपनी गर्भवती मुसलमान पत्नी के साथ नहीं बल्कि कॉलेज के हॉस्टल में पढ रहे थे । जब मैं स्कूल का काम कर रहा था तो मैंने मेरा कमरा फिर से व्यवस्थित क्या कपडे और किताबें टिकाई, कपडे धोते और पलंग की चादर बदल डाली । हम एक नई शुरुआत करने जा रहे थे हूँ । शाम को जब मैं मंदिर जाने लगा तो किसी ने कोई सवाल नहीं किया । पिछले सप्ताह से मैं और भाषा में शाम को छिटपुट सामान खरीदने के लिए मिल रहे थे जिसकी उसे अपने नए जीवन की शुरुआत के बाद विधान के घर में जरूरत पड सकती थी । हम दोनों नहीं अपने घरों के सदस्यों के बटुओं से पैसे चुराए । एक दिन सब खरीदा । एक दिन डियोड्रेंट, ट्रोल्स, टिकली और एक दिन राजमार्ग मैगी के पैकेट दिए । मैं किसी पर बाहर नहीं बनना चाहती । मुझसे कहती आज हम उसके लिए अंडरगारमेंट लेने के लिए थे । ये उतना ही शर्मिंदगी भरा काम था जितना सुनने में लगता था । जब दुकान में घुसी तो मैं उस से काफी दूर रूपया दुकान के बाहर अधनंगी । लडकियों के पोस्टर चिपके हुये थे । मुझे इस तरह घूम रहे थे । मानव मुझ पर उन्हें छोडने का इल्जाम लगा रहे हूँ । मैंने उसके हाथ में पकडा । वर्जित सामान वाला काला पॉलिथिन पकडने से मना कर दिया तो बहुत हंसी । क्या तुम खुश हूँ? उसने पूछा । राजीव सवाल है माँ बाबा के आने से कुछ बेहतर हुआ । पता नहीं कैसा लग रहा है । मैंने उनका बत्तर रूप देखा इसलिए अभी सब कुछ उपेक्षित नहीं कर पा रहा । कॅर पसंद है तो क्योंकि मुझे भी बहुत पसंद है और हम से खाने जा रहे हैं । पर तो में सांभर में सारी इडली डुबोकर खानी होगी क्योंकि उसे खाने का यही तरीका है । उसने कहा जब तक घर आए तो मेरा पेट भरा हुआ था । मुझे स्कूल प्रैक्टिकल की फाइलों, टीचरो वगैरह के बारे में बेतुके सवाल पूछे गए । जब वहाँ बाबा बर्तन समेट रहे थे तो मैं बहाने से अंदर बाहर आ जा रहा था तो उनके बीच अचानक बात बंद हो जाती है । मैंने कहा अगर आप नहीं जाना चाहते तो हम उन्हें कुछ दिन के लिए बुला सकते हैं । उन पर बहुत दबाव है । सुविधा के माँ बाप को परवाह नहीं है । बेचारी लडकी को जीने के लिए अकेला छोड दिया है । रूस उसकी तबियत खराब हो जाती है । उन्हें कोई काम वाली भी नहीं मिली । मैं उस लडकी को अपने घर नहीं आने दूंगा । बाबा ने रुखाई से कहा मैं अपने बेटे को नहीं होने वाली । माँ छुट्टी बाबा रसोई से निकली और पूरा एक घंटा बालकनी में खडे सिगरेट पीते रहे । जब अंदर आएगा तो किसी हारे हुए आदमी के से स्वर में बोले अगर वो यहाँ आएगी तो रहेगी । कहा ज्यादा से नफरत करने का संकल् मंद होता जा रहा था । हम आगे वाले बडे कमरे में हो जाएंगे । उसे तो बाहर नहीं सुना सकते हैं । मैंने कहा ।

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मैं रघु गांगुली हूँ। आज मैं अपनी आपबीती लिखने बैठ ही गया हूँ। कागजों की सरसराहट और उस पर चलती हुई कलम की तीखी निब, धीरे-धीरे स्याही का सोखना तथा इन अजीब से लगने वाले मुड़े हुए अक्षरों को देखना निश्चित तौर पर संतुष्टि दे रहा है। मैं कह नहीं सकता कि मेरे जैसे मौनावलंबी (सिजोफ्रेनिक) के लिए इस डायरी लेखन में ही सारे सवालों के जवाब होंगे; पर मैं आज कोशिश कर रहा हूँ। मेरा सिर बुरी तरह से चकरा रहा है। पिछले दो साल से मैं जिंदगी की सबसे ऊँची लहरों पर सवार था। अधिकतर दिनों में मैंने जान देने के लिए तरह-तरह के साधनों की तलाश की—मेरे घर के आस-पास की सबसे ऊँची इमारत, रसोई का सबसे तेज धार चाकू, सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन, कोई केमिस्ट शॉप—जो बिना कोई सवाल किए सोलह बरस के लड़के को बीस या उससे ज्यादा नींद की गोलियाँ दे दे, एक पैकेट चूहे मारने की दवा और कभी-कभी तो यह भी चाहा कि माँ-बाबा से गणित के पेपर में अच्छे नंबर न लाने के लिए फटकार मिले। सुनिये क्या है पूरी कहानी| writer: दुर्जोय दत्ता Voiceover Artist : Ashish Jain Author : Durjoy Dutta
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